रविवार, 13 जनवरी 2013

दबे पांव नहीं, खुलेआम घुसाया घरों में पोर्न (इंडिया टुडे महिमा)



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2012.12.09
 





(इंडिया टुडे समय-समय पर सेक्स सर्वे,मसलों और नारी देह पर अंक निकाल चर्चा में रहता है इस बार फिर सेक्स सर्वे को लेकर चर्चे में है ...क्या लिखा गया इस पर देखते है -संपादक ) :-दो-
 लीना  
 ‘‘दबे पांव आपके घर में घुसा पोर्न’’ आवरण कथा और तस्वीर छापकर ( इंडिया टुडे, 23-29 फरवरी 2012) पत्रिका ने यह साबित कर दिया है कि इसका मकसद सिर्फ और सिर्फ अश्लीलता परोसकर बाजार में अपने को कायम रखना भर है। एम. जे. अकबर जैसे संपादक और हाल ही में दिलीप मंडल द्वारा पत्रिका का संपादक बनने के बावजूद यह स्पष्ट है कि सब अश्लीलता को ही बाजार और पाठकों की पसंद (जबरदस्ती ) मानते हुए खामोश हैं। शायद यह पत्रिका के दिवालियेपन की निशानी भी झलकाती है।
लेकिन ऐसी तस्वीरें छापने से पहले यकीनन पत्रिका को खुद को ‘‘केवल वयस्कों के लिए’’ घोषित कर देना चाहिए। क्योंकि अमूनन घर के सभी लोगों द्वारा पढ़ी जाने वाली यह पत्रिका इस बार यह न सिर्फ बच्चों के सामने रखने के लायक नहीं है, बल्कि इसे आम भारतीय घरों में आप बड़े बुजुर्गों के सामने भी नहीं रख पाएंगें। मतलब कि यह सिर्फ निजी तौर पर इस्तेमाल की जा सकेगी !
विषय पर लिखी गई सामग्री की बात जाने दें। यह तो पत्रकारिता के हिसाब से खबर है, (हांलांकि इस खबर का कोई सरोकार नजर नहीं आता) लेकिन ऐसी तस्वीरें छापने की क्या जरूरत? यह कह सकते हैं कि सनी लियोनी तो महीनों राष्ट्रीय चैनल पर दिखाई दी हैं। लेकिन देखने वाले जानते हैं कि वहां भी सनी ऐसी वेशभूषा में नहीं दिखीं।
और ऐसा करके पत्रिका ने जिस कहानी को परोसा है उसे ही पुरजोर बढ़ावा दे रहा है। यानी खासकर बच्चों में पोर्न के प्रति उत्कंठा जगाना। यही नहीं पत्रिका ने कहां कहां चीजें उपलब्ध हैं सारी जानकारी भी जुटा दी है।
वैसे यह सर्वविदित तथ्य है कि हमेशा से ही व्यस्क लोगों का पोर्न के प्रति रुझान रहा है और वे इसे देखते रहे हैं। घरों में एक परिवार में हर माता पिता अपने बहू- बेटे या फिर घर में रहने वाले किसी भी दम्तत्ति या (इसके उलट) के बारे में जानते हैं कि बंद कमरे में क्या होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे इसकी सार्वजनिक चर्चा करते हों ? खबर के नाम पर पत्र-पत्रिकाएं और इस बार इंडिया टुडे ने जो किया है वह कुछ ऐसा ही है।
पत्रिका के लिए वैसे यह कोई नई बात नहीं है। खबर या सर्वे के नाम पर अश्लीलता परोसने का काम वह अक्सर ही करता रहा है। सर्वेक्षणों के बहाने अश्लीलता परोसने का कोई मौका नहीं चूके देश के कई प्रतिष्ठित, लोकप्रिय और आमजनों की पत्रिका। वैसे भी पत्रिका ने ‘पोर्न बाजार की काली कहानी’ शीर्षक से इस इंडस्ट्री की वही पुरानी और बार बार दोहराने वाली कहानी छाप कर यह साबित कर दिया है कि वह नई बोतल में पुरानी शराब ही पेश कर रही है। इसे क्या कहें ? खबरों का अभाव, वैचारिक दारिद्र्यता, विचारों-विश्लेषणों का अभाव, या फिर प्रकाशकों- संपादकों की संकीर्ण होती यह सोच कि पाठकों को सिर्फ और सिर्फ अश्लीलता के माध्यम से ही खींचा जा सकता है। या फिर बाजारवाद इतना हावी है और आपको ऐसा लगता है कि सिर्फ अश्लीलता से ही पत्रिकाएं बिकेंगी। और आपको सिर्फ बेचने से ही मतलब है तो फिर क्यों न ‘केवल व्यस्कों के लिए’ पत्रिकाएं निकाली- छापी जाएं ? एक पारिवारिक पत्रिका नहीं। इंडिया टूडे, आउटलुक जैसी पत्रिकाएं पारिवारिक हैं। (अब तक तो लोग यही मानते हैं ।) लेकिन पिछले कई वर्षों के कई अंक किसी भी मायनों में सबके बीच घर की मेज या विद्यार्थियों के स्टडी टेबल पर रखने लायक नहीं थे। शहरी पुरुषों की नजर में कैटरीना कैफ की सेक्स अपील का प्रतिशत बताने के लिए पेड़ों के पीछे जोड़े को प्रेमरत दिखाने का क्या मतलब ? या फिर यौन सर्वेक्षण विशेषांक के आवरण पर लगभग पोर्नग्राफी वाली तस्वीर जरूरी है। यानि जान बूझकर बेमतलब ही परोसी गई अश्ललीता। चर्चा में आने के लिए! माना चर्चा में आए भी। लेकिन क्या यह जरूरी- उचित है ? या पाठकों को सचमुच खींचने में सफल रहे आप- यह तो पत्रों को सोचना ही पड़ेगा।

Comments

इंडिया टुडे के लिे यह कोई सिरदर्द का मामला है ही नही. .ह तो उनके प्रचार प्रसार और पब्लिसिटी का हथकंड़ा है जिसमें वे लोग 200 फीसदी सफल रहे है। इंडिया टुडे की भारतीय पत्रकारिता में केवल एक ही योगदान है कि इसने भारत में धर्म, सेहत खेल पत्रकारिता की तरह ही सेक्स पत्रकारिता को स्थापित और लोकप्रिय बनाकर समाज में स्वीकार्य बना दिया है. हालांकि इनका स्टैणडर्ड सड़क छाप खुल्लम खुल्ला रस चटकारी लेखक मस्तराम से थोड़ा उपर और बेबाक है, मगर अभी भी करोड़ों खर्च करके भी पत्रिका का प्रसार मस्तरामू से कम ही होगा। मस्तरामू एक साल में सैकड़ों किताबें लिखकर बिना किसी हो हल्ला हंगामा के करोड़ो कमा लेता है। जिसके सामने हल्ला हंगामा (नाटक) खड़ा करके भी टुडे वाले मस्त भैय्या के सामने पानी भरते हुए ही दिख रहे है। तमाम भारचीय सेक्स बुक लवर की तरफ से निवेदन है कि तमाम बंधन नाता छोड़ के आ गई ये ले तेरे वास्ते ........( कोई गाना इसी तरह का है) की तरह टुडे समूह को अब एक सेक्स पत्रिका का प्रकाशन आरंभ कर ही देना चाहिए( इस विलाप के साथ कि किस तरह मस्तराम सरेआम बाजार और सड़क तौराहों पर हमारे महान देश की सती कुलवंती सरूपा मां बहनों और रिश्तों को तार तार कर रहा है उसको देखते हुए समाज को पतिभ्रष्ट होने से बचाने के लिए और मार्गदर्शन के लिए ही सेक्स टुडे ( या कोई भी नाम रख दे नाम में क्या रखा है) को घर घर में लाने या घुसाने की मुहिम के तहत ही इसको लाया जा रहा है। सेक्स पत्रकारिता के नैतिकवान और (दूर) दिगदर्शी समूह के तमाम सेक्स राईटर और संयोजकों को किसी धार्मिक संस्था श्रीश्री रविशंकर जी के हाथों कोई पुरस्कार दिलाने की जरूरत है। हां इस मौके पर सेक्स ज्ञान बॉटने वाले यौन विशेषज्ञ प्रकाश कोठारी (कोठरिया) को भी जरूर नवाजा जाए.
मीडिया और बुद्दिजीवी-वर्ग, जिसने जनलोकपाल और दिल्ली गैंग-रेप में मध्यम वर्ग की भूमिका का अंधा समर्थन किया, मध्यम वर्ग के युवाओं के साथ मिलकर भारतीय राज्य के खिलाफ एक भयंकर षडयंत्र कर रहा है.
एच एल दुसाध /2011 के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के बाद जब युवाओं ने 2012 के दिसंबर में एकाधिक बार तहरीर चौक के दृश्य की पुनरावृति किया, भारतीय मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग उसकी तारीफ में पहले से कही ज्यादा मुखर हो उठा,जिस युवा वर्ग ने मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग को चमत्कृत किया है वह और कोई नहीं,सवर्णों की वे संताने हैं,जिन्होंने भूमंडलीकरण के दौर के नव-सृजित अवसरों का लाभ उठाकर खुद एक ताकतवर वर्ग में तब्दील कर लिया है.इसके कृतित्व से अभिभूत एक बुद्धिजीवी ने हाल ही में उसके विषय में कुछ रोचक सूचनाएँ उपलब्ध कराते हुए कहा है-‘अबतक इस वर्ग के युवा इसलिए सो रहे थे क्योंकि जानते थे कि कुछ भी करना व्यर्थ होगा,उनकी 2001 तक देश की कुल आबादी में महज 6 फीसदी हिस्सेदारी थी. ऐसे में इस वर्ग के लोग जानते थे कि वे चुनावी नतीजों पर असर नहीं डाल सकते. लेकिन यह सब इतिहास है.
मध्यम वर्ग ने अभूतपूर्व गति से अपनी तादाद बढ़ाने के साथ यह भांप लिया है कि उसकी राजनीतिक अप्रासंगिकता का दौर अब लद गया है.’नेशनल कौंसिल फॉर एप्लायड इकोनोमी’ की रिसर्च के मुताबिक 2001-2002 में 5.7 फीसदी मध्यम वर्ग था,जो आज देश की कुल आबादी का 15फीसदी है.उम्मीद है कि देश की कुल आबादी में इसकी हिस्सेदारी 2015-16 तक बढ़कर 20.3 और 2025-26 तक 37.2 फीसदी हो जायेगी .ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि मध्यम वर्ग इस तरह का बर्ताव करने लगा है, मानो उसके पर लग गए हों और वह देश के भविष्य को अपने हाथों में लेकर इसे सवारना चाहता है.
मगर मध्यम वर्ग वास्तव में चाहता क्या है? इसका जवाब पाने के लिए आपको सिर्फ यह देखना है कि वे किस तरह के मसलों पर सडकों पर उतर रहे हैं.पहला और सबसे महत्वपूर्ण ,वे सुदृढ़ कानून –व्यवस्था तथा अपराधमुक्त सड़कें चाहते हैं.वे कानून का राज्य और नेताओं, नौकरशाहों, पुलिसकर्मियों से जवाबदेही की उम्मीद करते हैं. वे चाहते हैं कि भ्रष्टों को दण्डित किया जाय. वे बेहतर लोक सेवायें चाहते हैं. वे उच्च गुणवत्ता शिक्षा चाहते हैं. यह सूची और भी लंबी है. जरा सोचें कि इस सूची की उन चीजों के बीच कितनी विसंगति है, जिनको लेकर अमूमन राजनेता अपना अभियान चलाते हैं. इन चीजों में मुफ्त खैरात(साईकिल,टीवी सेट्स इत्यादि) तथा विभिन्न जातियों और समुदायों के लिए आरक्षण शामिल है...भारतीय राजनीति व्यापक बदलाव की दहलीज पर खड़ी है.नए मध्यम वर्ग को अपनी क्षमताओं का अहसास हो गया है. हालांकि यह अबतक खुद अपनी मुखर आवाज़ नहीं खोज पाया है, लेकिन तलाश जारी है और यह उसे पा भी लेगा . दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि जब मध्यम वर्ग खेल में उतरता है तो लोकतंत्र में मजबूती आती है और शासन भी सुधरता है.’
तो पाठक बंधुओं! अरब जनविद्रोह के बाद भारतीय मध्यम वर्ग ने भ्रष्टाचार और बलात्कार के नाम पर रह-रह कर जो जनसैलाब पैदा किया है, उसके पीछे उसका अघोषित लक्ष्य देश का नहीं, बल्कि अपने बाल-बच्चों का भविष्य सवारने के लिए सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेना है.वह 2025-26 को ध्यान में रखकर,जब भारत विश्व आर्थिक महाशक्ति बन जायेगा तथा उसकी(मध्यम वर्ग) कुल आबादी में 37.2 प्रतिशत हिस्सेदारी हो जायेगी,छोटे-मोटे मुद्दों पर संगठित होकर सत्ता कब्जाने का पूर्वाभ्यास कर रहा है.
भारतीय राज्य पर कब्ज़ा ज़माने का पूर्वाभ्यास कर रहे मध्यम वर्ग कि कुत्सित षड्यंत्रों के तरफ पाठकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए मैं 2011 के उस दौर की याद दिलाना चाहूँगा जब हमारा मध्यम वर्ग इंडिया अगेंस्ट करप्सन वालों के पीछे लामबंद हुआ था. तब टीम हजारे हो या मध्यम वर्ग अथवा मिडिया और बुद्दिजीवी वर्ग,हर किसी को भ्रष्टाचार के खात्मे की एकमेव दवा नज़र आई थी-जनलोकपाल समिति का निर्माण.इनमें किसी ने भी भ्रष्टाचार के पीछे क्रियाशील सामाजिक मोविज्ञान;‘भ्रष्टाचार का जातिशास्त्र’;धन-तृष्णा के पीछे क्रियाशील आकांक्षा-स्तर(लेवल ऑफ एस्पिरेशन) तथा उपलब्धि- अभिप्रेरणा(एचीवमेंट मोटिवेशन) इत्यादि को समझने की कोशिश ही नहीं किया.बहरहाल जनलोकलोकपाल/लोकायुक्त की कवायद के पीछे भूमंडलीकरण के दौर के सवर्णों का बहुजन प्रधान राजनीति पर सुपर-कंट्रोल स्थापित करना था,यह बात इस कालम में कई बार लिख चुका हूँ, लिहाज़ा इसके विस्तार में न जाकर दिल्ली गैंग रेप पर आता हूँ.
जनलोकपाल के अभियान के दौरान मैंने जो आशंका व्यक्त की थी वह दिल्ली गैंग-रेप के खिलाफ युवक-युवातियों की लामबंदी के बाद यकीन में तब्दील हो गयी, जिसे पुख्ता करने में उपरोक्त सूचना ने बड़ा योगदान किया है.इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि मध्यम-वर्ग इसके पीछे क्रियाशील सामाजिक और यौन-मनोविज्ञान की एक बार फिर पूरी तरह अनदेखी कर, अबिलम्ब जबरन बलात्कारियों को फांसी या नपुंसक बनाने की उग्र मांग उठा रहा है . वैसे ऐसा नहीं है कि वह कठोर कानून की व्यर्थता से नावाकिफ है.वह जबसे कठोर कानूनों की मांग उठा रहा है, तबसे देश के विभिन्न इलाको में पहले की भांति ही नियमित अंतराल पर दुष्कर्म की घटनाएँ हो रही हैं. बावजूद इसके वह उठा रहा तो इसलिए कि जब एक बार जनदबाव में आकर सरकार उसकी फौरी मांग मान लेती है, वह जनभावना से जुड़े तरह-तरह के मुद्दों के नाम पर सरकार को झुकाता चला जायेगा.इस तरह एक अंतराल के बाद शासन-प्रशासन का मामला अपने हाथ में ले लेगा.
यदि वह सदिच्छा के साथ दुष्कर्म घटना की तह में जाता तो पता चलता बलात्कार जैसी वैश्विक समस्या हिंदी पट्टी में ही महामारी का रूप धारण की है. इसलिए कि यह इलाका मानव-सभ्यता की दौड में में 600 साल पीछे है , जहाँ के लोगों में मानवाधिकारों की कोई कद्र नहीं तथा अधिकतम लोग ही यौन-कुंठा के शिकार हैं.ऐसा है इसीलिए इस इलाके में शरत चटर्जी की ‘देवदास’,विमल मित्र की ‘खरीदी कौडियों के मोल’या निमाई भट्टाचार्य की ‘मेमसाब’जैसी कोई साहित्यिक रचना वजूद में नहीं आई.तब वह हिंदी-पट्टी के सर्वोत्तम शहर दिल्ली में हर साल औसतन साढ़े 500 से ऊपर होने वाली दुष्कर्म की घटनाओं को कोलकाता के 47 घटनाओं के स्तर पर लाने का उपक्रम चलाता; वह उपलब्धि करता कि दिल्ली रेप के पीछे यदि यौन-कुंठा है तो सुदूर इलाकों में भूरि-भूरि घटनाओं के पीछे उभरते वंचित समाज का मनोबल तोडना है.मुख्यतःहिंदी-पट्टी का यह खुद कुंठित मध्यम वर्ग, यदि महिला अधिकारों के प्रति जरा भी संवेदनशील होता तो इस जनसैलाब का इस्तेमाल वह शक्ति के स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक,धार्मिक-में लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन की मांग उठाता,ताकि भारत महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर बांग्लादेश देश जैसे पिछड़े राष्ट्र से पीछे रहने के कलंक से निजात पा सके .लेकिन ऐसा न करके उसने इच्छाकृत रूप से नारी-अशक्तिकरण के बजाय बलात्कार को नारी-जाति की सबसे बड़ी समस्या के रूप में स्थापित कर दिया है.इससे महिला सशक्तिकरण का मामला सालों पीछे चला गया है.बहरहाल मेरा मानना है कि मीडिया और बुद्दिजीवी-वर्ग ,जिसने जनलोकपाल और दिल्ली गैंग-रेप में मध्यम वर्ग की भूमिका का अंधा समर्थन किया,मध्यम वर्ग के युवाओं के साथ मिलकर भारतीय राज्य के खिलाफ एक भयंकर षडयंत्र कर रहा है.अगर उसमें सत-साहस है तो उसे मुझ जैसे 51 किताबों के लेखक को भ्रांत प्रमाणित करने के लिए सामने आना चाहिए.अगर नहीं करता है तब मान लिया जाएगा कि वह षड्यंत्र रच रहा है.(ये लेखक के पने विचार है )।

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