बुधवार, 16 जनवरी 2013

आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप




          कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं है. सिर्फ छत्तीस साल पहले की यानी वर्ष १९७५ की बात है ,जब  लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति आंदोलन से देश में दूसरी आज़ादी के लिए सत्याग्रह का माहौल तेजी से बन रहा था.उन्हीं दिनों  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद है कोर्ट का फैसला आया ,जिसमें समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका को स्वीकार कर हाई कोर्ट ने इंदिराजी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया . इन दोनों घटनाओं से इंदिराजी को लगा कि उनकी कुर्सी खतरे में है . उन्होंने अपनी कुर्सी पर मंडराते खतरे को देश पर मंडराता खतरा मान लिया और घबरा गयीं घबराहट में उन्होंने  अपने गलत सिपहसालारों की बातों में आ कर देश में आपातकाल लगा दिया .दिल्ली से ले कर देश के दूर-दराज गाँवों और कस्बों तक अपनी सरकार की आलोचना करने वाले छोटे-बड़े हर विरोधी नेता को उन्होंने गिरफ्तार करवा कर जेलों में डाल दिया . उन्हें इतने से ही संतुष्टि नहीं हुई .चार कदम आगे बढ़ कर उन्होंने संविधान प्रदत्त नागरिकों की अभिव्यक्ति की आज़ादी भी छीन ली और अखबारों पर सेंसरशिप लागू कर दी  .
        उन दिनों भारत में इलेक्ट्रानिक मीडिया के नाम पर केवल सरकारी रेडियो अर्थात आकाशवाणी और सरकारी टेलीविजन यानी दूरदर्शन का ही बोलबाला था , जिनसे  वैसे भी इंदिरा सरकार को कोई ख़तरा नहीं था . लेकिन देश भर में अखबारों पर लगी सेंसरशिप ने तो जैसे आम जनता की आवाज़ का गला ही घोंट दिया था .  अखबारों में जो कुछ भी छपना होता , संपादक की कलम से नहीं ,बल्कि सेंसर की कैंची से कट-छंट कर ही छपता था.इसलिए देश के जन-जीवन से विपक्ष की आवाज़ गायब हो गयी थी . लोकतंत्र की जुबान सिल चुकी थी . देश में एक गहरी खामोशी का अजीब सा माहौल था. सेंसरशिप के कारण देशवासी एक-दूसरे के राज्यों की घटना-दुर्घटना और अन्य महत्वपूर्ण ख़बरों से वंचित रह गए थे. अल्पज्ञानी सरकारी अधिकारी अखबारों के दफ्तरों में जाकर ख़बरों को उलटते -पुलटते और उन्हें जिन खबरों में सरकार और प्रशासन की आलोचना अथवा खिलाफत का अंदेशा होता , वे उस खबर को छपने से रोक देते थे. ऐसा घुटन भरा माहौल देश में लगभग अठारह महीने तक रहा . संभवतः यह फरवरी १९७७ का महीना था ,जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटाने और लोकसभा का आम चुनाव करवाने की घोषणा कर दी . विपक्ष के सारे नेता ,जिनमे सभी  विरोधी दलों के लोग शामिल थे , जेलों से रिहा कर दिए गए . उन लोगों ने एकजुट होकर जनता पार्टी बनायी और चुनाव लड़ा . आपातकाल के जोर-ज़ुल्म से परेशान और नाराज़ जनता ने इंदिरा गांधी की कांग्रेस को लोकसभा से बाहर का रास्ता दिखा दिया . .जनता पार्टी की सरकार बनी ,हालांकि ज्यादा चल न सकी और अपने ही आंतरिक मतभेदों के चलते ढाई साल में चारों खाने चित्त भी हो गयी , लेकिन देश की जनता ने इंदिरा गांधी के आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप के खिलाफ मतदान कर यह तो बता ही दिया कि एक सभ्य समाज और   लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला करने वालों को वह किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं कर सकती . करीब छत्तीस बरस पहले का यह वाकया आज फिर इसलिए याद आ रहा है ,क्योंकि   इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है. महज़ साढ़े तीन दशक में पूरी दुनिया में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनेक नए आविष्कार हुए हैं . संचार क्रान्ति के ज़रिये इंटरनेट ,वेबसाईट उसमे फेसबुक और ब्लॉग जैसे अभिव्यक्ति के ताजातरीन माध्यम करोड़ों लोगों तक पहुँचने लगे हैं .इनके ज़रिये लोग अपने दुःख-सुख की बातें एक-दूसरे से 'शेयर' करते हैं.ज़ाहिर है कि लोग सरकारी भ्रष्टाचार और लालफीताशाही पर भी तो कुछ न कुछ टिप्पणी करेंगे. ये टिप्पणियाँ सरकार के खिलाफ जाएँगी .हो सकता है कि इससे सरकार के खिलाफ जनमत बनने लगे और उसकी कुर्सी हिलने लगे .जैसा कि उन दिनों लोकनायक जयप्रकाश जी के सम्पूर्ण क्रान्ति आंदोलन के दौरान हुआ था ,जब अधिकाँश अखबारों में इस आंदोलन की ख़बरें प्रमुखता से छपा करती थीं . आज अखबारों के साथ-साथ इंटरनेट , वेबसाईट और ब्लॉग लेखन के माध्यम से लाखों-करोड़ों लोग अपने विचार देश के भीतर और सारी दुनिया में फैला रहे हैं . प्रचार और संचार माध्यमों के इन नए अवतारों ने आम नागरिकों के हाथों में दिल की बात कहने ,लिखने और प्रकाशित-प्रसारित करने का नया हथियार दे दिया है. हाल ही में लोकपाल क़ानून की मांग को लेकर दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठे समाज सेवी अन्ना हजारे के जन-आंदोलन का सन्देश इन ताजा प्रचार माध्यमों से भी समाज में बहुत दूर तक फैला . ज़ाहिर है कि यह सब सोनियाजी की अध्यक्षता वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन यानी यूं.पी. ए . सरकार खिलाफ ही गया . हालांकि इस सरकार के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह हैं, लेकिन रिमोट कंट्रोल तो सोनियाजी के हाथों में है,जो स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा जी की पुत्र-वधु हैं . बहरहाल उनकी संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार अब वेब-माध्यमों पर बंधन लगाने जा रही है,बल्कि लगा ही चुकी है . हिन्दी  मासिक पत्रिका 'आऊट-लुक 'के जून २०११ के अंक में प्रकाशित एक समाचार आलेख के अनुसार केन्द्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून २००८ में इस वर्ष ११ अप्रेल को गोपनीय तरीके से कुछ ऐसे कठोर प्रावधान जोड़ दिए हैं, जिनसे अब कोई भी नागरिक वेबसाईट, फेसबुक ,ट्विटर आदि किसी भी सायबर संचार माध्यम से सरकारी नेताओं और सरकारी अफसरों के भ्रष्टाचार पर ,उनकी ज्यादतियों पर कुछ भी नहीं लिख पाएगा.  ये  प्रावधान ब्लॉग लेखन पर भी लागू होंगे. सरकार इन माध्यमों में प्रकाशित किसी भी सामग्री को आपत्तिजनक तथा राष्ट्र विरोधी मान कर उन्हें यानी वेब-साईट , सर्च-इंजन अथवा ब्लॉग को अवरुद्ध कर सकती है .क़ानून में  इस बदलाव अथवा संशोधन की अनुमति संसद से नहीं ली गयी.इससे ही सरकार की बदनीयती का सबूत मिल जाता है .देश के प्रबुद्ध नागरिक इसे अदालत में चुनौती भी दे सकते हैं .
          बहरहाल , संशोधित क़ानून के  नए प्रावधानों के अनुसार अगर इंटरनेट पर सरकार को किसी नागरिक की टिप्पणी पर .या उसके आलेख पर आपत्ति है तो इंटरनेट सर्विस प्रदाता को उसे छत्तीस घंटे के भीतर हटाना होगा .अन्यथा सरकार उस पर एकतरफा कार्रवाई कर सकेगी. इसमें तीन साल से लेकर आजीवन कारावास और एक लाख से दस लाख रूपए तक जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है. अब यह सोचने की बात है कि सरकार वेबसाईट पर अथवा ब्लॉग पर किसकी कौन सी टिप्पणी को आपत्तिजनक मानेगी , किस लेख को आपत्तिजनक मान कर उसके लेखक पर राष्ट्र-विरोधी होने का आरोप लगा दिया जाएगा . आज भारत में इंटरनेट पर वेबसाईट और ब्लॉग-लेखन करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. सत्ताधारी दलों के साथ साथ लगभग सभी विरोधी दलों की अपनी-अपनी वेबसाईट है.आडवाणीजी जैसे विपक्ष के कई वरिष्ठ नेता ब्लॉग पर भी सम-सामयिक विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते हैं. वे देश की जन-भावनाओं को भी स्वर देते हैं. स्पष्ट है कि उनका लेखन सरकार के पक्ष में नहीं हो सकता . तब क्या आडवाणीजी भी रास्त्र-विरोधी ठहराए जाएंगे ? भारतीय जनता पार्टी की अपनी वेबसाईट है. उसमे सत्तासीन कांग्रेस की प्रशंसा तो होगी नहीं .तो क्या भाजपा की इस वेबसाईट को भी राष्ट्र विरोधी मान लिया जाएगा ? केन्द्र सरकार निजी टेलीविजन चैनलों के फूहड़ कार्यक्रमों पर तो लगाम नहीं लगा पा रही है , अश्लील फिल्मों पर सेंसर की कैंची नहीं चलवा पा रही है ,शायद इन दोनों माध्यमों से उसे कोई तकलीफ नहीं है ,क्योकि इनसे देश की संस्कृति को तो खतरा हो सकता है .लेकिन देश को हांकने वाली सरकार को खतरा इनसे नहीं है. उसे फेस बुक पर अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में आए करोड़ों संदेशों से डर  लगने लगा है .जैसे जयप्रकाश नारायण के अहिंसक आंदोलन से इंदिरा सरकार भयभीत हो गयी थी और उसने जनता पर आपातकाल थोप दिया था .
      मुझे लगता है कि सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून २००८ में चोरी-चोरी चुपके -चुपके किया गया यह बदलाव प्रेस-सेंसरशिप का ही एक नया संस्करण है ,जो हमे छत्तीस साल पहले इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार द्वारा लागू किए गए आपातकाल की याद दिलाता है ,लेकिन आपातकाल हटते ही उन दिनों की इंदिरा कांग्रेस का क्या हश्र हुआ था ,यह आज की सोनिया कांग्रेस को अच्छी तरह याद तो रहना चाहिए . अगर याद नहीं है तो इतिहास के पन्ने पलटकर देख लिया जाए, और यह भी याद रखा जाए कि जब कभी किसी अप्रिय इतिहास ने  खुद को दोहराया है , उस वक्त की सत्ता ने कुछ न कुछ ज़रूर खोया है.
                                                                                         
                                                                                                 भारत प्रहरी

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी सुचना हमें प्राप्त हुई।।।।धन्यवाद

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  2. बहुत अच्छी सुचना हमें प्राप्त हुई।।।।धन्यवाद

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