गुरुवार, 17 जनवरी 2013

तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत..



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Written by sidhi Bat   
Tuesday, 31 May 2011 09:30
 







लोकतंत्र को जीवंत और गतिशील बनाए रखने के लिए स्वंतंत्र प्रेस अति आवश्यक है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि लगातार सरकार और औघोगिक घराने प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने का काम कर रहे हैं। अखबारों की विश्वसनियता प्रायोजित समाचारों, लांबिग और स्टिंग आपरेशन में फंस गया है।
देश की पत्रकारिता मिशन के रूप में शुरू होकर प्रोफेशन के रास्ते अब कामर्शियल में तब्दील हो गई है। इसीलिए मीडिया और पत्रकारों को ध्यान में रखते हुए तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत है।  ये विचार वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी का है। वह प्रभाष परंपरा न्यास द्वारा आयोजित तीसरे प्रेस कमीशन के औचित्य विषय पर बोल रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन प्रज्ञा संस्थान ने किया था। रामशरण जोशी ने जो दलील और तर्क दिये उससे तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत की बात साफ तौर पर समझ में आती है. जोशी जी तर्क देते हैं कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में दो प्रेस आयोग का गठन किया जा चुका है. पहले प्रेस आयोग का गठन 1952 में किया गया था जबकि दूसरे प्रेस आयोग का गठन देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार जनता पार्टी ने 1978 में किया था. 78 में गठित प्रेस आयोग की रिपोर्ट 1982 में आ गयी थी. पहले और दूसरे प्रेस आयोग की रपट में दिये गये सुझावों का हवाला देते हुए रामशरण जोशी ने कहा कि इनमें से अधिकांश महत्वपूर्ण सुझाव नहीं माने गये लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि इन आयोगों के गठन की कोई जरूरत ही नहीं थी. रामशरण जोशी का कहना है कि पहले और दूसरे प्रेस आयोग के बीच 26 साल का अंतराल था. लेकिन अब दूसरे प्रेस आयोग की रिपोर्ट आये 29 साल बीत गये हैं.।
ऐसे में प्रेस की कार्यशैली में व्यापक बदलाव आये हैं, जिसे देखते हुए तीसरे प्रेस आयोग के गठन की जरूरत है.मार्केट स्टेट बनाम नेशन स्टेट का हवाला देते हुए रामशरण जोशी ने कहा कि दूसरे प्रेस आयोग ने ही यह सिफारिश की थी कि अखबारी घरानों को पूंजीपति घरानों से अलग चिन्हित किया जाए. उस आयोग में यह सुझाव भी दिया गया था कि बोर्ड आफ ट्रस्ट का गठन किया जाना चाहिए ताकि समाचार विचार और विज्ञापन के बीच बढ़ते असंतुलन को रोका जा सके. दूसरे प्रेस आयोग ने पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के पुनर्गठऩ की सिफारिश की थी और राष्ट्रीय विज्ञापन नीति बनाने की सिफारिश की थी. लेकिन इतना वक्त बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस का नहीं किया जा सका है. जोशी जी ने कहा कि अगर ईमानदारी से देखा जाए तो 1952 से लेकर अब तक प्रेस सामंतों ने अपनी सरहदों का विस्तार ही किया है, वे अधिक शक्तिशाली हुए हैं और भारतीय राष्ट्र राज्य को ललकारने की हैसियत में आ गये हैं.रामशरण जोशी ने तीसरे प्रेस आयोग की दलील देते हुए कहा कि पहले दूसरे आयोग के गठन, सुझाव और परिणामों के परिप्रेक्ष्य में तीसरे प्रेस आयोग के गठन की बात करनी चाहिए. श्री जोशी ने कहा कि अब परंपरागत भारतीय प्रेस इंडियन मीडिया के रूप में स्थापित हो चुका है ऐसे में बावन से अब तक सत्तावन साल के मीडिया इतिहास को देखते हुए तीसरे प्रेस आयोग के गठन की जरूत है जिसमें न केवल प्रिंट मीडिया बल्कि इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया को भी शामिल किये जाने की जरूरत है. तीसरे प्रेस आयोग पर चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार जवारलाल कौल, देवदत्त, अवधेश कुमार, गोपाल कृष्ण और मनोज मिश्र ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। इन सुझावों के साथ तैयार दस्तावेज 12 जून की बैठक में रखा जाएगा।प्रभाष जोशी परंपरा न्यास ने आगामी 12 जून को इसी मसले पर आगे बात करने के लिए दिल्ली के आईटीओ पर एक बड़ी बैठक का आयोजन किया है जिसमें स्वेच्छा से कोई भी पत्रकार शामिल हो सकता ह. न्यास का कहना है कि वह तीसरे प्रेस आयोग की मांग को आगे बढ़ायेगा और एक ज्ञापन सरकार को नहीं बल्कि संसद को सौंपने की तैयारी कर रहा है ताकि हम सबसे बड़ी पंचायत से कह सकें कि कैसे मीडिया को प्रेस बनाये रखने के लिए तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत है. जुलाई में इंदौर में प्रभाष जोशी को याद करने के लिए एक दो दिवसीय सम्मेलन का भी आयोजन किया जा रहा है जिसमें इस मांग को जोर शोर से उठाया जाएगा। ब्यूरो रिपोर्ट सीधीबातडॉटकॉम
 

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