बुधवार, 16 जनवरी 2013

आप सो गये दास्ताँ कहते-कहते - डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री
 
 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री श्रीकान्त जोशी जी का आज आठ जनवरी को प्रात:काल पाँच बजे 76 साल की आयु में  मुम्बई में निधन हो गया ।  श्रीकान्त शंकर जोशी जी का जन्म 21 दिसम्बर, 1936 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के देवरुख गाँव में हुआ था । आप के पिता का नाम शंकर जोशी था । शंकर जी के चार बेटे और एक पुत्री थी । इन पाँच संतानों में से श्रीकान्त जी सबसे बड़े थे ।  प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद आप उच्च शिक्षा के लिये मुम्बई में आ गये । आपने राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र विषय लेकर  मुम्बई विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की । मुम्बई के गिरगांव में ही आप संघ के स्वयंसेवक बने । बी ए में पढ़ते समय ही आप ने जीवन बीमा निगम में कार्य करना शुरु किया । उन दिनों शिवराज तेलंग जी मुम्बई में ही संघ के प्रचारक थे । श्रीकान्त जी की उनसे बहुत घनिष्ठता थी । उन्हीं की प्रेरणा से आपने नौकरी से त्यागपत्र देने का निर्णय किया और 1960 में त्यागपत्र देकर पूरा समय संघ कार्य को समर्पित करने के लिये प्रचारक जीवन को धारण किया । प्रारम्भ में प्रचारक के नाते नान्देड़ गये । नान्देड़ वही स्थान है यहां भारत को विदेशी शासन से मुक्त करवाने की कामना को लेकर मध्यकालीन भारतीय दश गुरु परम्परा के दशम गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने अपनी इहलीला समाप्त की थी । कुछ अरसा महाराष्ट्र में काम करने के बाद आप 1963 में संघ कार्य हेतु असम प्रदेश में गये । असम में आपने निरन्तर पच्चीस साल 1987 तक कार्य किया । 1971 से 1987 तक असम के प्रान्त प्रचारक रहे । प्रारम्भ में आप ने तेजपुर के विभाग प्रचारक का दायित्व संभाला । बाद में वे शिलांग के विभाग प्रचारक बने । 1967 में विश्व हिन्दू परिषद ने गुवाहाटी में पूर्वोत्तर का जनजाति सम्मेलन करने का निश्चय किया । उन दिनों यह सचमुच बहुत कठिन कार्य था । जोशी जी को इस सम्मेलन के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गई । सम्मेलन की सफलता से जोशी जी की संगठन कुशलता का परिचय मिला ।]
  1969 में स्वामी विवेकानन्द जी की स्मृति में तमिलनाडु में कन्याकुमारी के स्थान पर शिला स्मारक बनाने का उपक्रम प्रारम्भ हुआ । देश भर में लोगों ने उत्साहपूर्वक योगदान देना प्रारम्भ किया । एकनाथ रानाडे सारे देश का प्रवास कर रहे थे । असम में यह ज़िम्मेदारी श्री कान्त जोशी जी पर आई । पूरे पूर्वोत्तर  भारत से लोगों ने इस राष्ट्रीय यज्ञ में उत्साह पूर्वक दान दिया । इस क्षेत्र में विद्या भारती के माध्यम से जनजातियों तक में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जोशी जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही । जोशी जी जानते थे कि पूर्वोत्तर में सामाजिक समरसता के लिये जनजातियों में संघ कार्य को ले जाना अनिवार्य  है । उन दिनों उन्होंने जनजाति संगठन सेंग खासी से सम्बंध बढ़ाना शुरु किया जिसके कारण बाद में मेघालय में संघ कार्य के विस्तार में बहुत सहायता मिली । जोशी जी का मानना था कि यदि पूर्वोत्तर में राष्ट्रीय क्रियाकलापों को त्वरित करना है तो संघ के अपने स्थायी कार्यालय होने चाहिये । गुवाहाटी , मणिपुर और अगरतल्ला इत्यादि स्थानों पर संघ कार्यालयों के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही ।

       असम के इतिहास में असम आन्दोलन ( 1979-1985) का कालखंड अत्यन्त संवेदनशील माना जाता है । क्षेत्रीयता की भावना ध्रुवान्त तक न जाये और राष्ट्र भाव ओझल न हो पाये , इसके साथ-साथ असम के साथ हो रहे अन्याय का सफलता पूर्वक प्रतिरोध भी हो , इन सभी के बीच संतुलन बिठाना था । उन दिनों जोशी जी ने यह कार्य सफलतापूर्वक किया ।
1987 में उन्हें तत्कालीन सरसंघचालक माननीय बाला साहेब देवरस जी के सहायक का उत्तरदायित्व दिया गया ।1994 में देवरस  जी ने स्वास्थ्य सम्बंधी कारणों से सरसंघचालक का दायित्व त्याग दिया । परन्तु जोशी जी उसके बाद भी उनके सहायक का कार्य करते रहे । वे बाला साहेब देवरस जी के साथ सहायक के नाते 1996 में उनकी मृत्यु पर्यन्त रहे । 1997 से 2004 तक आप ने संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख का दायित्व संभाला । 2004 में वे संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य बनाये गये ।
 2002 में मूच्र्छित हो चुकी भारतीय भाषाओं की एक मात्र संवाद समिति  हिन्दुस्थान समाचार को पुन: सक्रिय करने का उपक्रम प्रारम्भ किया ।यह संवाद समिति 1985 के आसपास सरकारी हस्तक्षेप के कारण बंद हो गई थी । जोशी जी ने 2001 में इस समिति को पुनर्जीवित करने के प्रयास प्रारम्भ किये तो पत्रकारिता जगत में बहुत लोग कहते सुने गये कि यह कार्य असम्भव है । लेकिन जोशी जी ने कुछ वर्षों में ही इस असम्भव कार्य को ही सम्भव कर दिखाया । आज देश के प्रत्येक हिस्से में समिति के कार्यालय कार्यरत हैं ।
 पिछले कुछ दिनों से जोशी जी को खाँसी का प्रकोप हो रहा था । कुछ दिन वे चिकित्सा के लिये केरल भी गये । नागपुर में सभी परीक्षण किये गये जो सामान्य थे । वे विश्राम के लिये दो दिन पहले ही दिल्ली से मुम्बई पहुँचे थे । आज आठ जनवरी को प्रात:काल उनके सीने में दर्द हुआ । अस्पताल को ले जाते समय रास्ते में ही उन्होंने अन्तिम साँस ली । मुम्बई पहुँच रहे हैं ।
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इस कठिन समय में उनके बिना 

 व्यक्ति जब तक हमारे आसपास होता है, उसका अहसास होते हुए उसके द्वारा किए गए कार्यों की महत्ता को हम श्रेष्ठतम रूप से कई बार आंक नहीं पाते हैं, लेकिन जब वही व्यक्ति अचानक हमारे बीच से चला जाता है तब गहराई से पता चलता है कि जो कल तक हम सभी के साथ थे, उनका होना ही कितना महत्वपूर्ण था। वह कितने श्रेष्ठ थे, कितने उच्चस्तरीय कार्य कर रहे थे। माननीय श्रीकान्त जोशी जी आज हम सभी के बीच नहीं है। बार-बार, रह-रह कर उनका चेहरा सामने आता है मानो कह रहे हैं कि भारत माता के चरणों में अर्पित है फूल मुझसे अनेक सारे।
श्रीकान्त जोशी जी जब तक हमारे बीच रहे, बस चलते ही रहे, गढ़ते ही रहे, उनका एक ही ध्येय वाक्य था, राष्ट्रकार्य कीन्हें बिना मोहि कहाँ विश्राम। अपने जीवन में मुझ जैसे जाने कितने युवा होंगे, जिन्हें न केवल दिशा दिखाने का कार्य आपने किया, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर और अर्थ-निर्भर भी बनाया। वे जानते थे कि व्यक्ति ऊर्जा का पुंज है, इसकी ऊर्जा यदि सही दिशा की ओर मोड़ दी गई तो यह सृजनात्मक है और यदि यही बुराइयों की तरफ चली गई तो विध्वंस करेगी।
मेरा उनसे पहला संपर्क हिन्दुस्थान समाचार में कार्य करते हुए रेलवे स्टेशन पर आया, तब वे मुंबई से नई दिल्ली की यात्रा पर थे। भोपाल से गुजरते वक्त उन्होंने स्टेशन पर मुझसे मिलने को कहा था। यह श्रीकान्त जोशी जी का व्यक्तित्व ही था, जो पहली मुलाकात निरंतर मिलने वाले सामिप्य में बदल गई। कई-बार उतार-चढ़ाव आए, लेकिन माननीय श्रीकान्त जोशी जी ने मुझ अकिंचन को नहीं छोड़ा। पता ही नहीं चला कि कब वे मेरे अभिभावक बन गए। जब उनके देहावसान की खबर प्रात: मिली तो पहले विश्वास नहीं हुआ, लगा जैसे मैं कोई स्वप्न देख रहा हूँ, वह भी खुली आँखों से, लेकिन जब एक के बाद एक फोन यह जानने के लिए आए क्या ऐसा हुआ? कब, कैसे हुआ? तब यह विश्वास करना ही पड़ा कि अब सिर से घर के बुजुर्ग का साया उठ गया है। इस कठिन समय में उनके बिना कैसा होगा हमारा भविष्य, आज यह सोचकर ही सिहरन दौड़ उठती है।
21 दिसंबर 1936 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के देवरुख ग्राम में श्री शंकर जी के यहाँ बड़े बेटे के रूप में जन्म लेने वाले श्रीकान्त जोशी जी के भविष्य के बारे में किसे पता था कि यह एक दिन देश में तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित चाहता हँू माँ तुझे और भी कुछ दूँ की भावधारा से भारत माता की सेवा करते हुए अपने गाँव-जिला और राज्य का नाम गौरवान्वित करेंगे। आज एक नहीं अनेक देशभक्ति के प्रकल्प हैं जिन्हें सृजनात्मकता-रचनात्मकता और सेवा-सहकार के अप्रीतम उदाहरण कहा जा सकता है, इन्हें खड़ा करने, नन्हें पौधे से विराट वृक्ष बनाने तक का श्रेय श्रीकान्त जोशी जी को जाता है, जिन्होंने रात-दिन देशभर में घूम-घूमकर इन्हें सींचा है।
यह उनकी राष्ट्र कार्य के प्रति अदम्य ललक ही थी जो वे बाल्यकाल में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आ गए। देश आजाद नहीं था, पराधीन देश में जन्म तो लिया, लेकिन मृत्यु उन्हें पसंद नहीं थी। वे उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे ताकि माँ भारती की सेवा और अधिक तन्मयता तथा तार्किकता के साथ की जा सके। आप उच्च शिक्षा प्राप्त करने मुंबई चले आए। राजनीति और अर्थशास्त्र में स्नातक किया, बीमा सेक्टर में नौकरी का अवसर मिला तो उससे जुड़ गए, लेकिन अंत में उन्हें यही लगता रहा कि मैं इस कार्य के लिए नहीं बना हूं। मुंबई संघ प्रचारक शिवराज तेलंग जी, जिनसे घनिष्ठता थी से आपने अपने मन की बात कही। बात आगे बढ़ी-प्रेरणा मिली और श्री जोशी ने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। राष्ट्र कार्य के लिए आजीवन जीवन देने का व्रत ले लिया, उन्होंने प्रचारक जीवन आत्मसात कर लिया।
संघ कार्य का विस्तार और प्रभाव अर्जित करने के लिए श्री जोशी जी को नान्देड़ भेजा गया, वहाँ इन्होंने संघ कार्य को आगे बढ़ाया, श्री जोशी जी के कार्य की यह श्रेष्ठगति ही थी कि उन्हें 1963 में असम भेज दिया गया। तेजपुर के विभाग प्रचारक का जो दायित्व आपने सम्भाला तो आगे प्रांत प्रचारक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी आपके कंधों पर आई। 1971 से 1987 तक प्रांत प्रचारक रहते हुए आपने अपने जीवन के 25 वर्ष असम को दिए। गरीब बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगाने की मंशा से पहला शिशु मंदिर शुरू करते हुए विद्या भारती के माध्यम से आपने सम्पूर्ण असमी समाज में शिक्षा की अलख जगाई। वे शिक्षा के महत्व को जानते थे। देश की आजादी में जिन भारतीयों का अभूतपूर्ण योगदान माना जाता है वे सभी प्राय: उच्च शिक्षित ही थे। भारत के नवनिर्माण और विकास के लिए यह आवश्यक भी था कि देश के संपूर्ण भाग में रहने वाले समूह भले ही वह भाषा-भूषा प्रांत की विविधता रखते हों, लेकिन शिक्षा के स्तर पर उच्च शिक्षित हों। असम में विद्याभारती के विद्यालयों के विस्तार के साथ स्वयंसेवकों को प्रेरणा देकर विद्यालय एवं सुदूर अंचल में निजी महाविद्यालय खुलवाने का श्रेष्ठ परिणाम आज दिखने लगा है। पूर्वोंत्तर भारत अब निरअक्षर जनजातियों का क्षेत्र नहीं रहा।
जब बात आई विश्वहिन्दू परिषद के तत्वावधान में जनजाति सम्मेलन करने की, तो आप ही थे संगठन के समक्ष जिनकी संगठन कुशलता पर सभी को भरोसा था। श्री जोशी जी को इस सम्मेलन की जिम्मेदारी दी गई। आपने विहिप के बैनरतले असम में वृहद और श्रेष्ठ जनजाति सम्मेलन करवाकर अपने संगठन कौशल का परिचय दिया। वे जानते थे कि भारत का सर्वांगीण विकास देश के विकास में पीछे छूट चुकी जनजातियों को साथ लिये बिना असंभव है। सामाजिक समरसता तथा चहुँमुखी विकास के लिए भी जरूरी था कि यहाँ की जनजातियों को उनके आस-पास के समाज के साथ जोड़ा जाए। वे अपने इस कार्य में सफल रहे। उनके मागदर्शन में पूर्वाेत्तर भारत में अनेक सेवा प्रकल्प शुरू हुए, वहीं संघ कार्यालयों का निर्माण हुआ।
यह माननीय श्रीकान्त जोशी जी की संगठन कुशलता थी कि वे असम आंदोलन (80 और 90 के दशक) को अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष दिशा देने में सफल रहे। वे जानते थे कि यदि असमवासियों में क्षेत्रीयता की भावना बलबती हो गई, तो एक राष्ट्र-एक, एक-ध्येय का चिंतन जिसके लिए अभी तक अनेक हुतात्माओं ने अपना बलिदान दिया वह व्यर्थ चला जाएगा। अपने संगठन से आपने असम आंदोलन को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान किया।
श्री जोशी जी की एकनाथ रनाडे जी के साथ के वक्त की भी कुछ स्मृतियाँ हैं, जिनका जिक्र यहाँ होना नितांत आवश्यक है। बात है कन्याकुमारी में विवेकानंद की स्मृति में शिला स्मारक के निर्माण की। असम से इस शिला स्मारक के लिए योगदान दिलाने की पे्ररणा देने की जिम्मेदारी एकनाथ जी द्वारा श्री जोशी  को दी गई, देशभर के लोग अपने प्रिय आदर्श की स्मृति में बन रहे स्मारक के लिए खुले मन से दान दे रहे थे। ऐसे में पूर्वोत्तर भारत कैसे पीछे रहता। मा. श्रीकान्त जी ही थे जिन्होंने असम एवं पूर्वोत्तर भारत के लोगों को मुक्तहस्त से विवेकानंद शिला स्मारक में सहयोग देने की प्रेरणा दी।
बात आई कि तत्कालीन संघ के सरसंघचालक मा. बाला साहब देवरस के निजि सहायक बनाए जाने की तो संघ ने श्री जोशी को उनका सहायक चुना। लगातार 10 वर्षों तक वे देवरस जी के सहायक रहे। एक बार वे मुझे अपना संस्मरण सुना रहे थे कि देवरस जी के अस्पताल में भर्ती के दौरान सभी डाक्टरों ने यही मान रखा था कि मैं उनका पुत्र हूँ। आखिर एक डाक्टर ने उनसे पूछ ही लिया कि इतनी सेवा आज के वक्त में कहाँ देखने को मिलती है, श्रेष्ठ पुत्र हो तुम इनके, तब मैंने चिकित्सक को बताया था कि मैं संघ का स्वयंसेवक हूँ और यह जबाव सुन उन डाक्टर ने कहा कि संघ यदि ऐसे सेवा के संस्कार सिखाता है तो मैं भी स्वयंसेवक बनना चाहूँगा। वास्तव में ऐसे थे हमारे मा. श्रीकान्त जोशी जी। किसी भी कार्य को करना तो पूरी तन्मयता से उसमें डूबकर करना।
जब उन्हें 1997 में अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख बनाया गया तो मीडिया में परहेज करने की छवि बना चुके संघ को सभी ने हर दृष्टि से खुलकर विचार-विमर्श करते देखा। रा.स्व.संघ अब किसी के लिए अछूत नहीं रहा। विश्वसंवाद केंद्र का विस्तार और विकास में मा. श्रीकान्त जोशी जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संवाद की नई शैली विकसित की। आद्य पत्रकार नारद मुनि हैं। इसकी स्थापना उन्होंने की। इतने पर भी वे कहाँ रूकने वाले थे, वह निरंतर चल रहे थे, गढ़ रहे थे पल-पल, पग-पग नींव के पत्थर।
 अप्रैल 2002 में आपने बीमार और गरीब पत्रकारों, उनके परिवार की मदद करने की मंशा से राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास की स्थापना की। आज यह संगठन प्रतिवर्ष मूर्धन्य पत्रकारों को पत्रकारिता के श्रेष्ठ योगदान के लिए राष्ट्रीय पुरूष-महिला और फोटो पत्रकारिता का सम्मान देता है। वहीं कई पत्रकारों को आर्थिक सहयोग दे चुका है।
राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास शुरू करने के बाद आप ने हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद समिति जो कभी देश की एकमात्र भारतीय भाषाओं की न्यूज एजेंसी थी को पुर्नजीवन देने का संकल्प लिया। देशभर में निरंतर प्रवास और अथक परिश्रम से उसे नया जीवन दिया। जब वे इस कार्य से पत्रकारों और अन्य वरिष्ठजनों से मिलते थे तो सभी का यही कहना था कि हिन्दुस्थान समाचार का पुन: शुरू होना असंभव है, लेकिन यह आपकी जिजीविषा ही थी कि कठोर परिश्रम और निरंतर अपने से लोगों को जोडऩे की प्रवृत्ति के कारण इस सुशुप्त अवस्था में पड़ी संवाद समिति को आपने नया जीवनदान  दे दिया। असंभव अब संभव हो गया समाचार एजेंसी न केवल खड़ी हो गई बल्कि आज देशभर में राज्यों की राजधानी, जिला केंद्रों सहित विदेशों में भी इसके कार्यालय खुल चुके हैं। राष्ट्रवादी पत्रकारों की टोली संपूर्ण भारत में संवाद एजेंसी के साथ उठ खड़ी हुई है।
समग्र ग्राम विकास के बिना भारत का विकास अधूरा है यह जानकर आपने बाला साहब एवं भाऊराव देवरस सेवा न्यास की स्थापना कारंजा-बालाघाट मध्यप्रदेश में की। जो आज ग्रामीण विकास के संदर्भ में अपना श्रेष्ठ योगदान दे रहा है।
अब उनके बिना क्या होगा हमारा! यह सोचने भर से दु:ख का अहसास असीम हो जाता है, फिर एक आशावादी भाव का जागरण भी होता है। जिस श्रेष्ठ पथ के पथिक बनकर उन्होंने जो राह दिखाई है उस पथ के निरंतर पथगामी बने रहे हम सभी। पत्रकारिता में राष्ट्र कार्य की श्रीकांत जी ने जो लौ जलाई है, उस लौ को जलाए रखने का दायित्व आज हम सभी पर आ गया है। ईश्वर शक्ति दे, कि इस दायित्व का निर्वाह करने में हम सक्षम बनें।

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