शनिवार, 19 जनवरी 2013

पत्रकार की डायरी से बवाल

पत्रकार की डायरी  पर
                          मचा  बवाल,
 आरएसएस ,बीजेपी  नाराज़ 


अरविंद कुमार सिंह


अयोध्या से बहुत करीब ही बस्ती जिले की सीमा में मेरा गांव पड़ता है। गांव के पड़ोस में ही सरयू नदी बहती है और कई बार वहां से अयोध्या की झलक भी साफ-साफ दिख जाती है। दूसरी तरफ मनोरमा और रामरेखा नदी हैं। ये दोनों छोटी पर ऐतिहासिक महत्व की नदियां हैं। हमारे गांव से ही कभी-कभी हिमालय के दर्शन भी हो जाते हैं। बचपन में अयोध्या के मेले में मैं कई बार गया।
उस दौरान की अयोध्या की रौनक की यादें आज भी दिलो-दिमाग में ताजा हैं। अयोध्या के मेले में एक बार खो भी गया था। पर वे दिन और थे और तब अयोध्या दुनिया भर में उतनी विख्यात नहीं थी जितनी राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के गरमाने के बाद हुई। अब तो बहुत से लोगों को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद ही अयोध्या का पर्याय ही लगता है लेकिन सच्चाई यह नहीं है। एक दौर वह भी था जब देश के तमाम हिस्सों से हजारों लोग शांति की तलाश में अयोध्या पहुंचते थे और महीनों रुकते भी थे। पर खास तौर पर 1989-90 के बाद खास मौकों पर अयोध्या किसी सैनिक छावनी जैसी लगती है। अयोध्या की कई ऐतिहासिक इमारतों पर उग रहे झाड़-झंखाड़ की फिक्र भले ही किसी को न हो पर यहां  सुरक्षा तामझाम पर करोड़ो रूपए खर्च हो रहे हैं। बीते तीन दशकों के अयोध्या के बदलाव का मैं साक्षी रहा हूं।
जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहा था तभी 1983-84 में इलाहाबाद में जनसत्ता का संवाददाता नियुक्त हो गया। कुछ समय बाद फैजाबाद मंडल का काम भी  मेरे पास आ गया। उसके बाद दिल्ली में चौथी दुनिया, अमर उजाला और जनसत्ता एक्सप्रेस में रहने के दौरान भी मैं अयोध्या विवाद से जुड़े विभिन्न आयोजनों को कवर करता रहा और अयोध्या के साथ विभिन्न धर्म नगरियों का भ्रमण भी करता रहा। अमर उजाला में तो एक दशक से अधिक के मेरे कार्यकाल का काफी हिस्सा अयोध्या विवाद को कवर करते हुए ही बीता था। शिलान्यास से लेकर तमाम मंदिरों के ध्वंश और अंततोगत्वा बाबरी मस्जिद ध्वंश से लेकर बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाओं और अयोध्या के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने उतार-चढ़ाव का भी मैं साक्षी रहा हूं।
अयोध्या विवाद: एक पत्रकार की डायरी वस्तुत: आंखो देखी घटनाओं का ब्यौरा है। इनका अपना ऐतिहासिक महत्व है क्योंंकि पुस्तक में विभिन्न कालखंडों और परिस्थितियों का तिथिवार ब्यौरा दिया गया है। वैसे तो अयोध्या पर पुस्तक लिखने के लिए बीते कई वर्षों से मेरे मुझे जोर देते रहे हैं। उनका कहना था कि अयोध्या और उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आपने इतना काम किया है तो आपको किताब लिखनी चाहिए। इतिहास और पुरातत्व का विद्यार्थी रहने के नाते मैने इसके विभिन्न पक्षों पर बारीकी से देखने का प्रयास भी लगतार किया था। अपने पूर्व संपादक श्री संतोष भारतीय और श्री संजय सलिल के सुझाव पर 1993-94 के दौरान विश्व हिंदू परिषद की पड़ताल करते हुए  एक किताब लिखने की शुरूआत भी मैने की थी पर अतिशय व्यस्तता के नाते, काम आगे बढऩे के बावजूद  किताब अधूरी रही। कुछ माह पूर्व मेरे मित्र और विख्यात रचनाकार श्री पंकज चतुर्वेदी और श्री ललित शर्मा ने दबाव बनाया कि आपने इस विषय पर इतना काम किया है तो उसे संकलित कर तिथिवार संपादन के साथ किताब लिखनी चाहिए। यह इस विषय पर अनुसंधान करने वालों के साथ ही मीडिया के छात्रों और आम पाठकों सबके लिए उपयोगी होगी। इस बीच में मेरे साथी श्री त्रिलोकीनाथ उपाध्याय ने कुछ विशेष रिपोर्टो को लिखवा कर पुस्तक की भूमिका तैयार करने में मेरी मदद की।
मुझे पहले लगता था कि जब पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री पी.वी. नरसिंहराव से लेकर फैजाबाद के पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्व. डी. बी. राय तक की किताबें इस विषय पर आ चुकी हैं तो एक और किताब का औचित्य क्या है? पर इन किताबों को पढऩे के बाद मैंने पाया कि इनमें जमीनी हकीकत के बजाय अपने को सही साबित करने का प्रयास अधिक था। मैंने तो जो घटनाएं अपनी आंखों से देखी हैं, वे सभी बिना नमक-मिर्च लगा कर प्रस्तुत की हैं। कुछ माह पूर्व लिब्रहान आयोग ने 17 साल की अपनी जांच के बाद भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। उस रिपोर्ट पर हंगामा भी मचा। मैने लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट और संसद की बहस को पढऩे के बाद पाया कि अयोध्या का सच वही नहीं है जो कहा जा रहा है। बहुत सी बातों को और उसकी पृष्ठभूमि तक न तो लिब्रहान आयोग गया न ही संसद। मुझे लगा कि यही किताब के लिए सही समय है। आंखों देखी घटनाएं लखनऊ और दिल्ली में बैठ कर तैयार किसी भी जांच आयोग की रिपोर्ट से कहीं अधिक और दस्तावेजी महत्व की होती हैं।
एक छोटी सी धर्मनगरी में एक इमारत को कैसे तिल का ताड़ बनाया गया और कैसे उसका अंतर्राष्ट्रीयकरण किया गया, किस तरह से लोगों में घृणा फैलायी गयी, कौन-कौन से प्रयास चले इन सबका ब्यौरा इस पुस्तक में एक साथ मिल जाता है। बाबरी मस्जिद का ध्वंश तो बहुत से पत्रकारों की आंखों देखी थी लेकिन मैने इस दौरान इससे जुड़ी कई खबरें ब्रेक भी की हैं। इस किताब के पहले खंड में दिसंबर 1992 में घटित घटनाओं का ब्यौरा है, जबकि दूसरे खंड बाबरी विध्वंश: पूर्व भूमिका में दिसंबर से पूर्व की वर्ष 1992 की सभी प्रमुख घटनाओं का विवरण दिया गया है। तीसरे खंड कैसे गरमाया अयोध्या आंदोलन में 1989 से 1991 तक की प्रमुख घटनाओं पर रोशनी डाली गयी है। चौथे खंड में जनवरी 1993 से जुलाई 2005 के दौरान के राजनीतिक दांव-पेंच का वर्णन है।
इनमें से कुछ रिपोर्टें ऐसी भी शामिल हैं, जिनमें मेरे अन्य साथियों ने भी मुझे मदद की थी। मैं उन सबके प्रति ह्रदय से आभारी हूं। मैं इस बात को स्वीकारता हूं कि खास तौर पर अयोध्या विवाद के संदर्भ में 1989-92 के दौरान हिंदी पत्रकारिता के एक बड़े वर्ग ने  विध्वसंक भूमिका निभायी थी। हमारे कुछ पत्रकार साथी तो जयश्रीराम ब्रांड की पत्रकारिता में संलग्न हो गए थे, जबकि कई अखबारों ने सांप्रदायिक विषवमन को अपनी नीति का हिस्सा मान लिया था। विवाद इतना तूल पकड़ गया था कि विश्व हिंदू परिषद या बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के छोटे से आयोजन को कवर करने सैकड़ों देशी-विदेशी पत्रकार पहुंच जाते थे। खुद विहिप ने भी पत्रकारों को दो श्रेणियां बना दी थी-रामभक्त और रामद्रोही या बाबरी समर्थक पत्रकार। मुझे नहीं पता कि मैं उनकी किस श्रेणी में था। पर मैं इस बात का गवाह हूं कि बाबरी मस्जिद ध्वंस के समय सबसे ज्यादा वही पत्रकार पीटे गए थे जो आंखों देखी लिखने में यकीन रखते थे।
मैं अपने पत्रकारिता के शुरुआती काल से ही अयोध्या के विभिन्न पक्षों पर लिखता रहा हूं। इसके बाद 1986 में दिल्ली में चौथी दुनिया का संवाददाता बनने के बाद साधु-संतों तथा अल्पसंख्यक संगठनों की बीट मेरे पास ही रही। अमर उजाला में 1990 से 2001 के दौरान के मेरे कार्यकाल में अयोध्या विवाद लगातार मेरी बीट का हिस्सा रहा। हिंदी के विभिन्न अखबारों की तुलना में अमर उजाला की स्थिति अलग थी। वहां महत्वपूर्ण मौकों पर अयोध्या में पूरी टीम भेजी जाती थी और बिना किसी बयार में बहे आंखों-देखी खबरों को उसी साहस के साथ प्रकाशित भी किया जाता था। हालांकि अयोध्या कांड ने उस समय पश्चिमी उ.प्र. में सबसे ताकतवर अखबार होने के बावजूद अमर उजाला का प्रसार डगमगा दिया था। वहीं अतिरंजित कवरेज वाले आज जैसे अखबार तेजी से इस इलाके में अपना प्रसार बढ़ा रहे थे।
1990 के अंत में अमर उजाला की गिरती प्रसार संख्या को रोकने की रणनीति के तहत आगरा में एक उच्चस्तरीय बैठक हुई। हम सबकी राय जानने के बाद अमर उजाला के अध्यक्ष और प्रधान संपादक श्री अशोक अग्रवाल ने बहुत साहसिक फैसला लिया और कहा कि प्रसार संख्या गिरे या बढ़े, अमर
विहिप की तरफ से पत्रकारों को जारी किए गए प्रेस कार्ड
विहिप की तरफ से पत्रकारों को जारी किए गए प्रेस कार्ड
उजाला में वही छपेगा जो सच होगा। अखबार होने के नाते समाज के प्रति हमारा सबसे ज्यादा दायित्व बनता है और दंगा भडक़ाने वाली पत्रकारिता हम किसी कीमत पर नहीं करेंगे। इसी बैठक में संवाद संकलन के लिए खुले दिल से पैसा खर्च करने का फैसला भी लिया गया और नेटवर्क को और मजबूत बनाया गया। शायद इसी साहसिक नीतिगत फैसले के नाते मैं बहुत कुछ बेबाकी से लिख पाया और वह उसी तरह से छपा भी।
अयोध्या विवाद से जुड़े देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले महत्वपूर्ण आयोजनों को तो मैं कवर करता ही था, अयोध्या के प्रमुख आयोजनों को भी मेरे नेतृत्व में अलग-अलग संस्करणों से पहुंची एक बड़ी और व्यवस्थित टीम पूरी तन्मयता से कवर करती थी।  इस नाते मैं इस किताब का वास्तविक प्रेरक अमर उजाला के प्रधान संपादक श्री अशोक अग्रवाल को मानता हूं और उनके प्रति विशेष आदर और आभार प्रकट करता हूं। इसी के साथ जनसत्ता के पूर्व संपादक स्व. श्री प्रभाष जोशी, चौथी भारतीय, श्री प्रबाल मैत्र, श्री रामशरण जोशी, श्री कमर वहीद नकवी, श्री रामकृपाल और श्री जोसेफ गाथिया  के प्रति विशेष आभारी हूं। अमर उजाला के हमारे साथी रहे सर्वश्री आशीष अग्रवाल, अजीत अंजुम, अनिल सिन्हा, अतुल सिन्हा, श्याम लाल यादव, दिलीप मंडल, आलोक भदौरिया, अखिलेश सिंह, भानुप्रताप सिंह, सुनील छइयां, असद और  सुभाष गुप्ता के प्रति भी मैं आभारी हूं।  इसी के साथ ही भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य और जनमोर्चा के संपादक श्री शीतला सिंह, त्रियुग नारायण तिवारी, श्री वी.एन.दास, सुश्री सुमन गुप्ता आदि से मुझे अयोध्या में काफी सहयोग मिला। मेरे करीबी मित्र सुभाष चंद्र सिंह (दैनिक जागरण), कृपाशंकर चौबे, अन्नू आनंद, पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ, जयप्रकाश पांडेय, विख्यात छायाकार जगदीश यादव, श्री अरुण खरे और हिमांशु द्विवेदी (हरिभूमि), के सहयोग के प्रति भी विशेष आभार प्रकट करना जरूरी समझता हूं। लेकिन इस रचना को साकार करने में मेरे अनुज तुल्य रवींद्र मिश्र, संजय त्यागी, श्री मनोज कुमार, श्री जयप्रकाश त्रिपाठी और श्री मृणाल पौश्यायन का विशेष योगदान रहा है।
साथ ही मैं विशेष आभारी हूं विख्यात लेखक श्री प्रेमपाल शर्मा और प्रतिष्ठित कवि श्री तहसीन मुनव्वर का, जो अपने अंदाज में लगातार पूछते रहे कि कितना काम आगे बढ़ा? इस नाते कोई शिथिलता नहीं आने पायी। पुस्तक के प्रकाशन के अवसर पर मैं अपनी पुत्रियों गरिमा सिंह तथा निवेदिता कुमारी अयोध्या विवाद पर अरविंद कुमार सिंह की किताब का कवर पेजसिंह के श्रम को भला कैसे भुला सकता हूं जिनके प्रयासों से ही मेरा लेखन संरक्षित रह सका है। इसी तरह भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ अधिकारी डा.पी.के.शुक्ला और डा.शबी अहमद ने अयोध्या के इतिहास से जुड़े विविध पक्षों पर बार-बार मेरा मार्गदर्शन किया। मैं अपने से जुड़े सभी मित्रों और परिजनों को इस रचना में मददगार मानते हुए उनके योगदान की सराहना करता हूं। श्री ललित शर्मा (शिल्पायन प्रकाशन) के प्रति खास तौर पर मैं आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने विशेष रुचि लेकर इस पुस्तक को प्रकाशित किया है। लेकिन कोई भी रचना स्वयं में पूर्ण नहीं होती है। उसमें कुछ कमियां रह जाती हैं और कुछ न कुछ सुधार की गुंजाइश भी होती है। अपने इस प्रयास में मैं कितना सफल-विफल रहा, यह फैसला मैं पाठकों पर ही छोड़ता हूं।  
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह की नई किताब 'अयोध्या विवाद : एक पत्रकार की डायरी' के आमुख का यहां प्रकाशन किया गया है अरविंद से संपर्क 09810082873 के जरिए किया जा सकता है.

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