रविवार, 13 जनवरी 2013

काँटों के बिस्तर पर अमृत की बूँदें / मार्क टली







 रविवार, 13 जनवरी, 2013 को 12:36 IST तक के समाचार
कुंभ
महाकुंभ का सबसे अभूतपूर्व नजारा होता है भीड़ के बीच में साधुओं को नाचते हुए देखना
भारत विभिन्न नजारों का देश है. यहाँ करोड़ो लोग बसते हैं. ये पुरातन संस्कृति और सभ्यता का देश है.
भारत में रहते मुझे सालों बीत चुके हैं और इस दौरान मैने कई भव्य नजारे देखे हैं लेकिन महाकुंभ जैसी भव्यता और उत्कृष्टता मुझे कहीं नहीं दिखी.
मैं दो बार महाकुंभ गया हूँ. मैने भारी भीड़ को इकट्ठा होते देखा है लेकिन असंख्य लोगों की जो भीड़ मैने इलाहाबाद में महाकुंभ के दौरान देखी, वो कहीं नहीं दिखी.
भारत के उत्तर में स्थित शहर इलाहाबाद में गंगा का धुंधला पानी यमुना के नीले पानी से मिलता है.
इन दो महाकुंभ में मुझे भारतीय प्राचीन सभ्यता की सशक्त उपस्थिति का अहसास हुआ.
जो भी व्यक्ति महाकुंभ का आनंद उठाना चाहता है उसे इस मेले के विभिन्न पहलुओं को समझना होगा.
महाकुंभ वाकई एक महान पर्व है. कुछ लोगों के मुताबिक ये दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक पर्व है. लेकिन महाकुंभ का महत्व स्नान के अलावा दूसरे कारणों से भी है.
महाकुंभ का सबसे अभूतपूर्व नजारा होता है भीड़ के बीच में नग्न साधुओं को नगाड़ों की ताल पर नाचते हुए देखना. ये साधू हवा में उछलते नदी की ओर स्नान करने के लिए बढ़ते हैं.

अद्भुत साधू


इलाहाबाद में कुंभ मेले की ओर जाते वक्त थोड़ी विश्राम करते मार्क टली
ऐसे भी साधू हैं जो अद्भुत कार्य करते नजर आते हैं.
मैने एक साधू को देखा जिसने लंबे वक्त से अपने हाथ खड़े कर रखे थे जिसके कारण उसका चमड़ा सूख गया था. उसके नाखून बढे हुए थे. एक दूसरा साधू एक पाँव पर खड़ा हुआ था. एक तीसरा साधू काँटों के बिस्तर पर लेटा हुआ था.
कुंभ मेले के दौरान धार्मिक शिक्षा और उपदेश भी दिया जाता हैं जो हिंदू परंपराओं और सहिष्णुता प्रदर्शित करता है.
इन उपदेशों में कुछ बातों में मुझे रूढ़िवादिता नजर आई, कुछ बातों में काफी गहराई थी और कई बातों ने मुझे काफी आश्चर्यचकित किया.
पंद्रहवीं सदी के महात्मा कबीर के भक्तों ने मुझे बताया कि वो देवताओं की तस्वीरों की भर्त्सना करते हैं. उनके मुताबिक गंगा में और नल के पानी से नहाने में कोई फर्क नहीं है. लेकिन किसी ने भी उनकी बातों का विरोध नहीं किया.
इसका कारण शायद ये है कि हिंदू धर्म विविधताओं से भरा है.
कुंभ शब्द का अर्थ है जलपात्र. मान्यता है कि देवताओं और असुरों के समुद्र मंथन से अमृत का प्याला निकला. असुरों ने प्याले को छीनने की कोशिश की लेकिन स्वर्ग के राजा इंद्र ने इसे दोबारा हासिल कर लिया. इस छीना-झपटी में अमृत की कुछ बूंदें संगम के अलावा कुछ इलाकों में गिरीं जहाँ कुंभ मेलों का आयोजन होता है.

कुंभ और राजनीति

भारत में राजनीति का अस्तित्व जीवन के हर क्षेत्र में है और कुंभ मेला भी राजनीति से अछूता नहीं है. वर्ष 1989 में दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी या बीजेपी ने हिंदू राष्ट्रवादिता का सहारा लेकर सत्ता हासिल करने की कोशिश की.
एक टेंट में मैने कुछ वक्ताओं को अयोध्या की मस्जिद के खिलाफ बयान देते सुना.
कुंभ
महाकुंभ में भारतीय प्राचीन सभ्यता की सशक्त उपस्थिति का एहसास होता है
उनके मुताबिक ये मस्जिद भगवान राम के जन्मस्थान पर बनाई गई थी. वो इस मस्जिद को गिराकर मंदिर के निर्माण की मांग कर रहे थे.
कुंभ मेले के दौरान काफी कारोबार भी होता है. यहाँ हर तरह के स्टॉल होते हैं जो पूजा सामग्री से जुड़ी हर चीजे बेचते हैं.
नाइयों का काम चरम पर रहता है. पुजारियों के लिए भी काफी काम होता है. वो वंशावली का नवीनीकरण करने के अलावा मृतकों की आत्मा की शांति के लिए पूजा करवाते हैं.
दोनो महाकुंभ का आयोजन बेहतरीन था. टेंट की मदद से एक बड़ा शहर खड़ा किया गया था, कई किलोमीटर लंबी सड़कें बनीं और कई पुलों का निर्माण हुआ.
प्रशासन ने भक्तों के लिए खाना, पानी, सफाई और बिजली का प्रबंध किया था. पुलिसवाले लोगों से बहुत तरीके से बात कर रहे थे, उन्हें गंगा नदी के किनारे ले जा रहे थे. वो उन्हें एक लाइन में खड़ा कर रहे थे ताकि नहाते वक्त सुरक्षा बरकरार रहे.
ऐसी परिस्थितियों में जब कई देशों में बवाल मच जाएगा, यहाँ भारतीय बेहद व्यवस्थित तरीके से व्यवहार कर रहे थे.
वर्ष 1989 कुंभ मेले के मुख्य स्नान दिवस पर मैं भक्तों के साथ प्रेस कैंप की ओर जा रहा था. अपने अनुभवों पर मैने लिखा था, “मैं आज तक इतनी शांत भीड़-भाड़ में नहीं रहा. यहाँ कोई पागलपन नहीं है, सिर्फ श्रद्धा की शांत निश्चितता है.”
कुंभ मेले में विश्वास का मुख्य स्थान है.
महाकुंभ हिंदू धर्म में भिन्नता और जोश का जबरदस्त प्रदर्शन है. ये राजनीतिक उपदेश और व्यापार का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन कुंभ मेले में करोड़ों लोगों के आने का मुख्य कारण है, विश्वास, जिसके कारण वो इलाहाबाद में संगम की ओर खिंचे चले आते हैं.

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