CWC: Gunjan Sangwan & Saurabh Dwivedi

Updated on Monday
सौरभ 2006-07 एचजे. गुंजन सांगवान इसी बरस के ईजे की स्टूडेंट. सौरभ ने दो महीने स्टार न्यूज में इंटर्नशिप की फिर लाइव इंडिया में रहे और कुछ महीनों बाद नवभारत टाइम्स पहुंचे. वहां पौने तीन बरस रहे और उसके बाद से दैनिक भास्कर में हैं. फिलहाल लुधियाना में भास्कर के सिटी एडिटर हैं. गुंजन कैंपस प्लेसमेंट से इंडियन एक्सप्रेस पहुंची. डेढ़ साल एक्सप्रेस में काम करने के बाद उन्होंने इंटरनेशनल रिलेशन में एमए के लिए जेएनयू में दाखिला लिया. फिर वहीं से एमफिल भी किया. अभी लुधियाना के एक कॉलेज में असिस्टेंट प्रफेसर हैं......................... बीएस (बिफोर स्क्रिप्ट, अगर ऐसा कोई टर्म होता है तो)..........दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वे जो प्यार करते हैं, महसूसते हैं और वो उनमें व्याप्त होता है. दूसरे वे जो प्यार की बातें करते हैं, उसके बारे में लिखते हैं, पढ़ते हैं और जानने समझने का दावा करते हैं.- अज्ञात. ...................................इन अज्ञात महाशय को नहीं पता था कि एक तीसरी तरह के लोग भी होते हैं, कम संख्या में ही सही. जो आईआईएमसी में पढ़े हैं, कैंपस वाले कपल के दायरे में आते हैं और जिनको लगातार आग्रह के तहत अपनी बदमाशियों के, साजिशों के बारे में लिखना ही होता है, हलफनामा. तो पेशे नजर है साजिशों का एक ब्यौरा...........थोड़ा लंबा है मगर सत्य, भगवान या कहें कि पवित्र सुंदरता बारीक ब्यौरों में ही बसती है...................आईआईएमसी में सेशन की शुरुआत होती है ओरिएंटेशन लेक्चर्स से. हमारे वक्त भी ऐसा ही हुआ. पहला या दूसरा ही दिन था, जब प्रोफेसर अरुण कुमार आए थे ब्लैक इकॉनमी पर बोलने. उस दौरान उनकी गांधी जी पर एक टिप्पणी को लेकर मैं सवाल-जवाब सत्र के दौरान जिरह करने लगा. उसी क्रम में हिंद स्वराज का भी हवाला आया और कांग्रेस के 1916 के लखनऊ अधिवेशन में पेश हुए कुछ आर्थिक प्रस्तावों का भी. प्रोफेसर साहब ने तो जो कहा, सो कहा, मगर मिनी ऑडिटोरियम में बाबा के ज्ञान और उनकी हिंदी का चरचराटा कायम हो गया. इसमें थोड़ा योगदान जेएनयू में मास्टर्स करने के दौरान अपनाई वेश भूषा का भी था. वैसे भी जींस और दाढ़ी का कॉम्बो सदा से डेडली पाया जाएगा, ऐसा कल्कि भगवान कह गए हैं...............................दूसरे तीसरे दिन तक एक किस्म की फुसफुसाहट शुरू हो जाती थी, जब मैं पहुंचता था कैंपस में, या तब जब ऑडिटोरियम में सवाल पूछने के लिए खड़ा होता था. तभी एक दिन, एक दोपहर, बदमाशी का पहला स्ट्रोक लगा जिंदगी के मटमैले कैनवस पर..........................ब्रह्मपुत्रा से दोपहर का भोजन निपटाकर अपने राम वापस कैंपस आ रहे थे. गेट से दाखिल हुए ही थे कि नजर किनारे पीला रंग आने लगा, जमी ओस सी सफेदी में लिपटा. देखा, तो एक लड़की देख रही थी. बाप कसम, साहब बहादुर का दिल हलक में आ गया. सफेद कॉटन का कुर्ता, जिसके किनारे पर कुछ चिकन का काम. वीर बहूटी की पीठ के किनारे पाए जाने वाले नीले रंग से बने प्रिंट का पीला सलवार. मगर ये ब्यौरे तो फुटनोट की तरह अटके रह गए. सबसे पहले दिखीं आंखें, जो कुछ सेकंड ही ठिठकी थीं हम पर. हमने आज तक ऐसी आंखें नहीं देखी हैं. और इसकी सजा हमारी महबूब आज तक भुगतती हैं. मानव सभ्यता में आंखों पर लिखे गए घटिया से घटिया गाने हम उन्हें जब तब अक्सर बेवक्त नजर करते रहते हैं. और दूसरी चीज जो अटकी कहीं भीतर, वो थे बाल. घुटनों से भी नीचे तक जाते. मां याद आ गई. उनके भी बहुत लंबे बाल हैं. और मां की याद आते ही उनके लिए बहू खोजने का अनकहा दायित्व भी दिमाग में आ गया.........................मगर कहां यहां मैं कांसे का गिलास, कहां ये मेरे ओल्ड वर्ल्ड रेड वाइन से इसे भरने के ख्वाब...........साजिश निहायत जरूरी थी...........दो दिन बाद योगेंद्र यादव का लेक्चर था. पिछड़ों के उभार पर कुछ बोल रहे थे. फिर हमारे गुफ्तगू के दौरान बात शाह बानो केस और उस दौरान की गई अकबर अहमद डंपी की तकरीर पर आकर निपटी. उसके बाद पीछे की रो से किसी ने सवाल पूछा. ये आरित्रो चौधरी नाम के सज्जन थे, एड-पीआर में थे, बंगाली बाबू हैं, घुंघरालें बालों और पीली रंगत में टंकी पारदर्शी आंखों के चलते खासे मोहक हैं. कंडोम बनाना चाहते हैं, जिसका नाम डिपर रखेंगे, ताकि हर ट्रक वाला इनका ऐड करे, अपने ट्रक के पीछे लिखे, यूज डिपर एट नाइट..............दिन पर लौटते हैं. तो आरित्रो ने सवाल पूछा, और उन्हें देखने के लिए मैं पीछे पलटा. ये साजिश थी प्रकृति की. क्योंकि मैं पलटा मगर वहां तक नजर नहीं पहुंची, जहां तक जाने का इरादा किया था. आरित्रो के आगे वाली बेंच पर वही वीर बहूटी के सूट वाली लड़की बैठी थी. इस बार चंदन के रंग वाले सूट में. पीतल के बड़े-बड़े बुंदे धारण किए देवी ने एकबारगी मेरी तरफ देखा, मगर फिर मेरी ठीठ निगाहों से घबरा इधर उधर हो गईं......................ये शुरुआत थी. उसके बाद मैं जब जहां उसे देखता, अवाक बस देखता रह जाता. इस देखने में अबोधपन था. ऐसे कैसे हो सकती हैं किसी की आंखें वाला भाव. और फिर धीमे धीमे आसपास की हवा के साथ सहज होना शुरू हुआ. बाकी लोगों से यारी-दोस्ती शुरू हुई. एड-पीआर में सबसे ज्यादा दोस्त बनीं. कुछ ईजे और आरटीवी में भी. उन सबसे हाई स्कूल डेज टाइप की बातचीत में जब भी क्रश शब्द का जिक्र आता और मेरा क्रश पूछा जाता, पूरी ठिठाई से मैं बस गुंजन ही बोलता..................अगस्त में होने वाले सालाना उत्सव में पहली बार मेरी बात हुई. एक फैशन शो हो रहा था, जिसमें तब तक हमारी दोस्त बन चुकी शिवानी एंकरिंग कर रही थीं, जिसके हर्फ समेटने में हम उनकी मदद कर रहे थे. नीली सीटों पर एक कतार में शिवानी, गुंजन और पीछे वाली कतार में मैं. शिवानी उठकर चली गईं, वो बैठी रह गईं और मेरे तो उठने का सवाल ही नहीं था. फिर पूरी हिम्मत बटोरकर मैंने कहा, जी मैं आगे आकर बैठ जाऊं. उनकी आंखों में पहली बार शरारत का स्ट्रोक दिखा, हां......फिर पॉज.................मैं बैठ तो गया मगर कुछ समझ नहीं आया क्या बात करूं. तो खिसक लिए कुछ देर में किसी काम का टेरा पड़ने पर....................तब तक कैंपस वाकिफ हो चुका था बाबा के बौराने की वजह से. तो वो जब जहां मिलतीं, मैं उनके आसपास किसी चेहरे की खूंट तलाशता टंग जाने के लिए. कभी शिवानी, कभी सौम्या, कभी रायना.....................मगर ये सब इतना आसान नहीं था. मेरे अक्खड़ रवैये की वजह से गुंजन उखड़ने लगी थीं. मेरा घूरना या बिना किसी हिचक के सबके सामने ये कहते रहना कि गुंजन मुझे सबसे अच्छी लगती है, उसे असहज कर देता था. अभी ठीक से समझ नहीं आ रहा होगा. उसी की जुबान में कहता हूं, “डूड इट वॉज वेरी इंबैरसिंग फॉर मी”............मगर अपने राम लगे रहे. कुछ हफ्तों बाद मैं उसकी मौजूदगी में कुछ सहज रहने लगा. उसका ध्यान खींचने के लिए पागलपन भरी हरकतें बंद कर दीं. फिर एक दिन कैंटीन में हम थे, हमारी बड़ी अम्मा रायना उर्फ लाली थी और बीच में कुछ दिलचस्प जरूरी बिचिंग सेशन थे. उसके बाद हमें लगा कि हम यकीन कर सकते हैं एक दूसरे और तीसरे पर. ये दोस्ती की शुरुआत थी. बुरी दोस्ती की बुराइयों भरी शुरुआत. जो आज भी जारी है..............बड़े झटके थे इसके. मैडम का रात 12 बजे फोन आ जाता. कल डिबेट है, तो शिवानी और रायना की स्पीच सुनो और जरूरी सुझाव दो............गोया इन दो काबिलों को वाकई मेरी लंतरानी की जरूरत हो. फिर डिबेट पीछे छूट जाती और शब्दों का रंगीला तिसिस्म रचा जाने लगता. मैं उसे अपनी दुनिया की हर चीज एक किस्से के वरक में लपेट पेश करता और वो फ्रॉक पहने बैठी डलिया से निकलते मिट्टी के खिलौने निहारती रहती................दीवाली पर हम अपने अपने घर गए, तो लगातार मैसेज के जरिए टच में रहे. हम उन्हें लगातार बुंदेलखंडी जबान और गालियां सिखाते रहे. वापस आए, तो कुछ था जो पिघल चुका था. अब हमें हमेशा बात करने के लिए भाषा की या बोलने की जरूरत नहीं पड़ती थी. हम दोस्त थे, आज भी हैं, मगर कैंपस में ज्यादातर को लगता कि वी आर गोइंग अराउंड.............एक अचरज ये भी रहता कि ईजे की लड़की एचजे के लौंडे के साथ क्या कर रही है..................फरवरी तक आते आते मौसम का मिजाज और हमारे तेवर बदल चुके थे. तो 4 फरवरी को स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की सीढ़ियों पर रात 10 बजे गेट बंद होने की मियाद से कुछ बीसेक मिनट पहले, हमने रायता बघरा दिया. सामने कुहासा सा था कुछ, तो एक ब्रह्मास्त्र बचाकर रखा था अपन ने, क्यों, सिर्फ इसलिए कि मैं जाट नहीं हूं.............बस इसके बाद हरि बोल गंगे...............छह बरसों से साथ हैं, बियाह को भी 8 मार्च को दो साल बीत जाएंगे. इस दौरान हमने बेहद खराब वक्त देखा, जिसने हमारे साथ को और सख्त किया...........और उसका यकीन हर बीतते दिन के साथ मुझे बेहतर बना रहा है. दोस्त कहते हैं कि हमारी केमिस्ट्री अच्छी है, हमें तो ये मिस्ट्री लगती है, जिसे हर दिन हम नए सिरे से सुलझाने की कोशिश करते हैं, इस भरोसे के साथ कि ये हमें आखिरी दम तक साथ उलझाए रखेगी............. वीरेन डंगवाल की कविता की पहली पंक्ति याद करें. ......प्यार तुम्हें छोड़ेगा नहीं, वो खुश और तबाह कर देगा.
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  • Kuldeep Mishra मैंने तेरी आंखों में पढ़ा अल्लाह ही अल्लाह
    सब भूल गया याद रहा अल्लाह ही अल्लाह

    ग़जब़ ढा दिया सर। हर बात में महके हुए जज़्बात की ख़ुशबू। (दूसरी बार पढ़ने के बाद)
  • Chetna Bhatia दोस्त कहते हैं कि हमारी केमिस्ट्री अच्छी है, हमें तो ये मिस्ट्री लगती है, जिसे हर दिन हम नए सिरे से सुलझाने की कोशिश करते हैं, इस भरोसे के साथ कि ये हमें आखिरी दम तक साथ उलझाए रखेगी.............mast story hai boss!!!!! " writing skill" ke liye super waaa like!!

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