सोमवार, 21 जनवरी 2013

पत्रकारिता अब मिशन या मशीन


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     विवेक त्रिपाठी

समाचार पत्र जन मानस में संदेश पहुँचाने का शसक्त माध्यम है, लेकिन अब पत्रकारिता जगत में कार्पोरेट हावी है। समाचार पत्रों को अपनी जवाबदेही समझनी होगी। पत्रकारिता जगत में कोई छोटा बड़ा नहीं होता चाहे पत्रकार हो या समाचार पत्र। बस उसे अपने धर्म और कर्म को समझना चाहिए। देश व समाज के लिए वह कितना उपयोगी है यह महत्वपूर्ण होता है। मीडिया की आवश्यकता समाज को ही नहीं बल्कि सरकार के लिए भी आवश्यक है। आज समाचार पत्र विश्व के हर देश के लोगों के दैनिक जीवन का आवश्यक अंग बन गया है। समाज में फैली कुरीतियों अन्धविश्वासों रूढियों आदि को पत्रकारिता ने लगभग समाप्त किया है। प्रिन्ट मीडिया में समाचार पत्रों के महत्व को प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार लिप मैन ने इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है समाचार पत्र को सर्च लाइट के प्रकाश के उस झोंक की तरह होते हैं जो इधर से उधर घूमता रहता है। कभी एक को कभी दूसरे को अंधकार से प्रकाश की ओर घसीट करा लाया है।

आजादी से पूर्व पत्रकारिता का उद्देश्य आजादी प्राप्त करना था लेकिन आजादी के बाद उद्योग के रूप में विकसित होता गया। बदलते हुए माहौल के साथ मीडिया के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं भावनात्मक समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं। यह तो सही है कि पहले की अपेक्षा समाज की रूढि़यों को मिटाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। वहीं सामाजिक सरोकारों में वह अपने पंख फैला रहा है। पहले की अपेक्षा जनमानस को तेजी से जागृत करने में भी अग्रसर है। कुछ हिस्सों में तो मीडिया का कार्य सराहनीय है। अभी हाल में ही 16 दिसम्बर 2012 को चलती बस में एक 23 वर्षीय छात्रा के साथ चलती बस में बलात्कार हुआ। इस घटना को उजागर करने में मीडिया का बहुत बड़ा सहयोग रहा।छात्रा की मौत के बाद समाज में उमड़ा जनाक्रोश भी मीडिया की ही देन है। उमड़े जनाक्रोश को अनदेखा नहीं किया जा सका न समाज के द्वारा न सरकार द्वारा। इस पूरे मामले को अलख जगाने में सोशल मीडिया का भी भरपूर सहयोग रहा। अगर बात करें प्रिन्ट मीडिया की तो लगभग 225 साल पुराना है। लेकिन आधुनिक सूचना क्रान्ति के इस दौर में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने युवाओं को ज्यादा आकर्षित किया। लेकिन मीडिया जगत के बदलते स्वरूप ने पत्रकारिता को भी लज्जित किया है। इसका उदाहरण एक बड़े ग्रुप के दो संपादकों को धन उगाही के मामले में जेल भी जाना पड़ा। ऐसे और भी कई मामले हांेगे लेकिन संपादकों की गिरफ्तारी को लेकर पत्रकारिता का सबसे गिरा दौर कहा जा सकता है क्योंकि अगर मीडिया को समाज का आइना मानते हैं। तो इस आइने ने समाज में अपने को धुंधला करने का काम किया है। जिससे लोगों का विश्वास कम हुआ है और पत्रकारिता की साख भी गिरी है। अखबारों की संख्या और संस्करण दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे है कभी कोई व्यवसायी अखबार लेकर खड़ा हो जाता है तो कभी कोई ब्यूरोक्रेट्स। क्या उनका लक्ष्य पत्रकारिता हो सकता है। एक तरह से यह भी कह सकते हैं कि पत्रकारिता मिशन नहीं मशीन है पैसा कमाने की। अगर बड़े अखबारों  को देखा जाय तो उन्होंने अपने पैर इतने पसार लिये हैं कि उनको छूना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। क्योंकि बड़े- बड़े मीडिया हाउस बन गये हैं और विज्ञापन से लेकर सर्कुलेशन इतना ज्यादा है कि छोटे समाचार पत्रों को पनपने की जगह नहीं मिल पा रही है। इसी कारण छोटे अखबार और पीछे होते जा रहे हैं। और वह बड़े अखबारों की बराबरी करने के चक्कर में अपना सब कुछ गंवा बैठते हैं। उनके पास पहले भी पूंजी कम होती है।  कुछ लोग बड़े ग्रुप से निराश होकर अपना अखबार निकालते हैं।

पहले उन्हें पूंजी के लिए बड़ी मशक्कत करनी होती है लेकिन उनको हासिल कुछ भी नहीं होता। उनका हाल वही पुराना का पुराना फिर उनके सामने एक ही रास्ता है ब्लेकमेलिंग और उगाही का। और जो व्यवसायी हैं वे इसे आत्मरक्षक और सुरक्षात्मक मानते हैं। क्या पत्रकारिता महज एक प्रोटक्शन है। संपादक और लेखक से अधिक महत्वपूर्ण मालिक और विज्ञापन व्यवस्थापक हो गये हैं। कुछ सजग पत्रकारों की जागरूकता की वजह से ही सरकारों को जनहित के फैसले लेने पड़ते हैं। हलांकि अब आजादी की लड़ाई नहीं रह गई हैं लेकिन आजाद भारत में अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कृषि जैसे ज्वलंद मुद्दे आज भी हैं। जिसके लिए जनमानस को आज भी जागृत करने की आवश्यकता है। लेकिन दुर्भाग्य कि जमीनी स्तर से इसके लिए प्रयास नहीं हो पा रहा है। मीडिया का स्वरूप तो वृहद होता जा रहा है लेकिन मूल उद्देश्य पीछे छूटते जा रहे हैं।

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