रविवार, 13 जनवरी 2013

दलित चिंतन करते अश्लील चिंतन, इंडिया टुडे घर में रखना मुश्किल


Print Friendly and PDF


2012.12.09
(इंडिया टुडे समय-समय पर सेक्स सर्वे,मसलों और नारी देह पर अंक निकाल चर्चा में रहता है इस बार फिर सेक्स सर्वे को लेकर चर्चे में है ...क्या क्या लिखा गया है इस पर, देखते है -संपादक ):-एक
 
शुभम / दिलीप मंडल को आप दलित चिन्तक कहेंगे तो वे भड़क जायेंगे. फ़ौरन आपको ब्राहमण चिन्तक या दलित विरोधी करार देंगे. इसलिए उनके लिए दलित चिन्तक नहीं प्रयुक्त करेंगे. वैसे भी ठीक ही है. चिन्तक को सिर्फ चिन्तक ही कहना चाहिए. लेकिन दलित चिंतन वे करते हैं , इसपर उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा. ऐतराज होगा भी कैसे, इसी दलित चिंतन के सहारे उन्होंने काफी कुछ पाया. ख़ैर दलित चिंतन करते – करते आजकल वे अश्लील चिंतन करने लग गए हैं और लगता है कि सन्नी लियोन के भी फैन हो गए हैं. तभी आजकल उनके एफबी स्टेटस पर भी योनी – लिंग जैसे शब्द बहुतायत में लिखे हुए मिल जायेंगे. कुछ दिन पहले ही वे फेसबुक पर लिख रहे थे कि भारत में विवाह योनी और लिंग का मिलन मात्र है और पिता का कर्तव्य है एक योग्य लिंग का चयन कर पुत्री को उसके हवाले कर देना. यह अपने आप में अलग ही तरह का अश्लील विश्लेषण है और शायद ही ऐसा विश्लेषण कभी किसी गालीबाज या अश्लील से अश्लील व्यक्ति ने भी किया होगा जैसा विश्लेषण इंडिया टुडे के संपादक दिलीप मंडल ने किया.

ख़ैर यह तो रही फेसबुक की बात. लेकिन उनके संपादकीय में निकलने वाले इंडिया टुडे भी इस अश्लील चिंतन से दूर नहीं. इंडिया टुडे का हालिया अंक सेक्स सर्वे पर आया. ऐसा अंक जिसे देखकर सन्नी लियोन जैसी पोर्न स्टार भी एक क्षण के लिए रश्क कर बैठे और ऐसी तस्वीर के लिए इंडिया टुडे के संपादक का हाथ चूम ले. लेकिन सवाल उठता है कि क्या यही सब करने के लिए दिलीप मंडल इंडिया टुडे में आये हैं. उम्मीद तो ये थी कि इंडिया टुडे में उनके आने के बाद से कुछ दलित चिंतन होगा. उनकी बातें पत्रिका के पन्नों पर दिखेगी. दलित, मुस्लिम आदि पर आवरण कथा निकलेगी . लेकिन ऐसा देखने के लिए आँखें तरस गयी. महीने – दर – महीने बीत गए. लेकिन इंडिया टुडे में ऐसा कुछ भी नहीं छपा जिसमें दिलीप मंडल जी की कथनी और करनी का अंतर मिटता नज़र आता हो. उलटे उभार की सनक और सेक्स सर्वे छप रहे हैं.

साफ़ है कि दलित चिन्तन अब अश्लील चिंतन में बदल चुका है और पहले का सारा चिंतन महज एक छलावा था. ख़ैर छलावा तो अब भी हो रहा है. तभी शशांक द्विवेदी (Shashank Dwivedi) अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं कि हमारे देश में आजकल कुछ तथाकथित दलित चिंतक हो गए है जिनका दलितों से कोई सरोकार नहीं है ..वास्तव में ये दलित चिन्तक शब्द ही सबसे बड़ा छलावा है दलितों के साथ ...आप देख लीजिए ना देश के एक प्रमुख तथाकथित दलित चिन्तक दिलीप मंडल जी इंडिया टूडे में बैठकर सेक्स सर्वे छाप रहे हैं ....उसका कवर पेज ऐसा है कि वो खुद भी या कोई भी अपने घर में माँ ,बहनों को नहीं दिखा सकता ...ये उपलब्धि है इन दलित चिंतकों की ..पहले कारपोरेट मीडिया को गाली देते थे अब उसी की गोद में बैठकर सेक्स सर्वे करा रहें है ...वाह रे वाह ...ये है इस देश के दलित चिन्तक ....ये क्या दिशा देंगे दलितों को जो एसी आफिस में बैठकर सेक्स सर्वे "उभार की सनक "और छोटे शहर बने देश के काम क्षेत्र " छाप रहें है ...इन लोगों की रूचि अब सिर्फ" काम" रह गई है ..अब इन्हें दलितों के कामों से कोई मतलब नहीं है ...वो तो बस मन बहलाने और बेवकूफ बनाने के लिए है ...

वहीं दूसरी तरफ सुभाष त्रिपाठी (Subhash Tripathi) फेसबुक पर इंडिया टुडे के सेक्स सर्वे वाले अंक की आलोचना करते हुए लिखते हैं – “ छोटे शहर इंडिया टुडे के नए कामक्षेत्र। इंडिया टुडे का ये विशेषांक किसी घर में कैसे रखा जाए। ये बड़ा सवाल बन गया है। मैं आउटलुक व इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं का सामान्य पाठक हूं। घर में वेंडर किताबें दे गया। जब देखी गयी तो कहीं छिपाना पड़ा आखिर ऐसे विशेषांकों से ही ये प्रतिष्ठित पत्रिकाएं बाजार बनाएंगी। पहले से ही अब पढ़ने की ललक कम हुई है। ऐसे विशेषांक पिछले कई सालों से सचित्र प्रकाशित हो रहे हैं। इसके दूसरे चित्रों की बात छोड़िए कवर पेज का फोटो भी यहां देना पसंद नहीं करता हूं। पत्रिकाएं पूरे घर के लिए होती हैं। इंडिया टुडे में जो विशेषांक और प्यास बुझाने के गुर सिखाए हैं। वे आम पाठकों के लिए बेहद आपत्तिजनक हैं। अब घर में कौन सी पुस्तकें आए ये बड़ा मुद्दा है। पहले साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, ब्लिट्ज व करंट, रविवार व दिनमान जैसी पत्रिकाएं रूचि के साथ पढ़ी जाती थी। करंजिया के लेखों को पढ़ने में मुझे बड़ा मजा आता था। फिर एसपी सिंह कुरबान अली की खबरें समीक्षा के साथ, अब इंडिया टुडे कैसे पढ़े और कहां रखे।“

बात वाकई में सही है . दलित चिंतन के नाम लोगों को बहला – फुसला और भड़काकर कुछ बुद्धिजीवी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. ऐसे बुद्धिजीवी नेताओं से भी खतरनाक है. ये दलित चिंतन के नाम पर अश्लील चिंतन करने वाले लोग हैं जिनकी कलई समय आने पर खुल ही जाती है. दिक्कत है कि लोग ऐसे बुद्धिजीवियों को पहचानते नहीं और जबतक पहचानते हैं तबतक वे पुराना चोला उतार नया चोला पहन चुके होते हैं. मीडिया का अंडरवर्ल्ड से दलित चिंतन और दलित चिंतन से सीधे अश्लील चिंतन. लगे रहे आप. हम तो आपके चिंतन से वाकिफ थे ही अब दुनिया भी परिचित हो जायेगी. बधाई ! (मीडिया खबर से )

1 टिप्पणी:

  1. कुपात्र को विद्या देने से ऐसे ही चिंतन परोसे जायेंगे। पत्रिकायें पवित्र कर्तव्य के चोले को उतार कर बाज़ार में प्रविष्ट होती जा रही हैं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान और धर्मयुग जैसी पत्रिकायें तो अब इतिहास हो गयीं हैं। क्या वे दिन फिर आ सकेंगे बबल जी?

    उत्तर देंहटाएं