Mobile Site: m.mynews.in • क्या है नागरिक संवाददाता ? • नागरिक संवाददाता बनने के लिए • ट्यूटोरियल साइन अप करें ! लॉगिन करें!
Tuesday January 31,2012 | Last Updated 12:43 PM
- Article
- Comments
गुलजार का ‘इब्नबतूता’ क्या सर्वेश्वर दयाल के ‘इब्नबतूता’ की नकल है?
राजीव रंजन, 01-Feb-2010 06:19:11 AM
Font Size:
Keywords: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गुलजार, हिंदी फिल्म इश्किया, इब्नबतूता गाने पर विवाद, नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी, विद्या बालन, अमीर खुसरो, बुल्लेशाह, मजरुह सुल्तानपुरी, फैज अहमद अहमद, नूरजहां सर्वेश्वर दयाल सक्सेना | गुलजार | हिंदी फिल्म इश्किया | इब्नबतूता गाने पर विवाद | नसीरुद्दीन शाह | अरशद वारसी | विद्या बालन | अमीर खुसरो | बुल्लेशाह | मजरुह सुल्तानपुरी | फैज अहमद अहमद | नूरजहां |
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और गुलजार
नई दिल्ली: इन दिनों ‘इब्नबतूता’ गाने की काफी चर्चा है। नसीरुद्दीन शाह, विद्या बालन, अरशद वारसी स्टारर और विशाल भारद्वाज के सहायक अभिषेक चौबे निर्देशित ‘इश्किया’ के इस गाने को ऑस्कर विजेता संपूर्ण सिंह ‘गुलजार’ ने लिखा है। ये गाना आजकल सबकी जुबान पर चढ़ा हुआ है।
लेकिन, इस गाने से जुड़ा एक दूसरा पहलू भी है और गुलजार जैसे बेहतरीन गीतकार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला साबित हो सकता है। कई लोगों का कहना है कि ये गाना हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार-पत्रकार दिवंगत सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बालगीत ‘इब्न बतूता का जूता’ की नकल है। ये गीत सक्सेना ने बहुत पहले बच्चों के लिए लिखा था।
हिंदी के मशहूर नवगीतकार यश मालवीय का कहना है कि किसी की रचना से कुछ शब्द ले लेना या या एकाध पंक्ति ले लेना बुरा नहीं है। लेकिन, ‘इश्किया’ के गाने ‘इब्नबतूता’ और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बालगीत ‘इब्न बतूता का जूता’ की थीम एक ही है। लिहाजा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को क्रेडिट देना चाहिए।
ये विवाद धीरे-धीरे जोर पकड़ता जा रहा है। इस विवाद पर गुलजार अभी चुप्पी साधे हुए हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो सवाल को टाल रहे हैं। हालांकि, इससे पहले भी गुलजार ने दूसरे शायरों/कवियों की गजलों/कविताओं की किसी पंक्ति को आधार बनाकर गीतों की रचना की है और इस बात को माना भी है। मसलन- अमीर खुसरो की अरबी-फारसी-हिंदी में लिखी गई प्रसिद्ध गजल ‘जेहाले-मिस्कीं मकुं तगाफुल’ को आधार बनाकर ‘गुलामी’ फिल्म का हिट गाना ‘जेहाले-मिस्कीं... सुनाई देती है जिसकी धड़कन तुम्हारा दिल या हमारा दिल है...’ की रचना की।
इसी तरह मिर्जा गालिब की पंक्तियां ‘दिल ढूंढता है फिर वहीं फुर्सत के रात दिन...’ को लेकर ‘मौसम’ के बेहतरीन गीत ‘दिल ढूंढता है... बैठे रहे तसव्वुरे जाना किए हुए...’ की रचना की। प्रसिद्ध सूफी संत बुल्लेशाह की रचना ‘तेरे इश्क नचाया कर थैया थैया...’ की पंक्ति लेकर फिल्म ‘दिल से’ के गीत ‘चल छैयां छैयां...’ की रचना की और इस बात को स्वीकार भी किया। इस तरह कई गीत हैं, जो किसी रचनाकार के कुछ शब्दों से प्रेरित होकर उन्होंने लिखे हैं। खुद गुलजार का कहना है- ‘मिसरा गालिब का कैफियत अपनी अपनी।’ यानि उन्हें इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं कि उन्होंने प्रेरणा ली है।
वैसे फिल्म इंडस्ट्री में ये परंपरा कोई नहीं है। बहुत पहले मजरुह सुल्तानपुरी ने 1969 में रिलीज हुई फिल्म ‘चिराग’ (सुनील दत्त, आशा पारेख की मुख्य भूमिकाएं) के लिए एक बहुत खूबसूरत गाना लिखा था- ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है/ये उठे सुबह चले ये झुके शाम ढले/मेरा जीना मेरा मरना इन्हीं पलकों के तले।’ इसे गाया था अमर गायक मोहम्मद रफी ने। इस गाने की पहली पंक्ति ‘तेरी आंखों के सिवा...’ कालजयी शायर फैज अहमद फैज की मशहूर नज्म ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग...’ (मल्लिका तरन्नुम नूरजहां ने इसे गाकर इसमें चार चांद लगा दिए) से ली गई है और मजरुह ने बाकायदा इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया था। ऐसे कई उदाहरण हैं।
अब सवाल है कि गुलजार इस बात को सार्वजनिक रूप से मानेंगे- जैसाकि वे पहले कई बार स्वीकार कर चुके हैं- कि ‘इश्किया’ का ‘इब्नबतूता ता ता’ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बालगीत ‘इब्नबतूता का जूता’ से प्रभावित है? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है। बहरहाल, हम आपके लिए सक्सेना जी के बालगीत और गुलजार साहब के फिल्मी गीत को सामने रख रहे हैं। अब खुद ही पढ़ कर फैसला कीजिए कि हकीकत क्या है?
सर्वेश्वर दयाल का बालगीत ‘इब्न बतूता का जूता’
लेकिन, इस गाने से जुड़ा एक दूसरा पहलू भी है और गुलजार जैसे बेहतरीन गीतकार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला साबित हो सकता है। कई लोगों का कहना है कि ये गाना हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार-पत्रकार दिवंगत सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बालगीत ‘इब्न बतूता का जूता’ की नकल है। ये गीत सक्सेना ने बहुत पहले बच्चों के लिए लिखा था।
हिंदी के मशहूर नवगीतकार यश मालवीय का कहना है कि किसी की रचना से कुछ शब्द ले लेना या या एकाध पंक्ति ले लेना बुरा नहीं है। लेकिन, ‘इश्किया’ के गाने ‘इब्नबतूता’ और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बालगीत ‘इब्न बतूता का जूता’ की थीम एक ही है। लिहाजा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को क्रेडिट देना चाहिए।
ये विवाद धीरे-धीरे जोर पकड़ता जा रहा है। इस विवाद पर गुलजार अभी चुप्पी साधे हुए हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो सवाल को टाल रहे हैं। हालांकि, इससे पहले भी गुलजार ने दूसरे शायरों/कवियों की गजलों/कविताओं की किसी पंक्ति को आधार बनाकर गीतों की रचना की है और इस बात को माना भी है। मसलन- अमीर खुसरो की अरबी-फारसी-हिंदी में लिखी गई प्रसिद्ध गजल ‘जेहाले-मिस्कीं मकुं तगाफुल’ को आधार बनाकर ‘गुलामी’ फिल्म का हिट गाना ‘जेहाले-मिस्कीं... सुनाई देती है जिसकी धड़कन तुम्हारा दिल या हमारा दिल है...’ की रचना की।
इसी तरह मिर्जा गालिब की पंक्तियां ‘दिल ढूंढता है फिर वहीं फुर्सत के रात दिन...’ को लेकर ‘मौसम’ के बेहतरीन गीत ‘दिल ढूंढता है... बैठे रहे तसव्वुरे जाना किए हुए...’ की रचना की। प्रसिद्ध सूफी संत बुल्लेशाह की रचना ‘तेरे इश्क नचाया कर थैया थैया...’ की पंक्ति लेकर फिल्म ‘दिल से’ के गीत ‘चल छैयां छैयां...’ की रचना की और इस बात को स्वीकार भी किया। इस तरह कई गीत हैं, जो किसी रचनाकार के कुछ शब्दों से प्रेरित होकर उन्होंने लिखे हैं। खुद गुलजार का कहना है- ‘मिसरा गालिब का कैफियत अपनी अपनी।’ यानि उन्हें इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं कि उन्होंने प्रेरणा ली है।
वैसे फिल्म इंडस्ट्री में ये परंपरा कोई नहीं है। बहुत पहले मजरुह सुल्तानपुरी ने 1969 में रिलीज हुई फिल्म ‘चिराग’ (सुनील दत्त, आशा पारेख की मुख्य भूमिकाएं) के लिए एक बहुत खूबसूरत गाना लिखा था- ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है/ये उठे सुबह चले ये झुके शाम ढले/मेरा जीना मेरा मरना इन्हीं पलकों के तले।’ इसे गाया था अमर गायक मोहम्मद रफी ने। इस गाने की पहली पंक्ति ‘तेरी आंखों के सिवा...’ कालजयी शायर फैज अहमद फैज की मशहूर नज्म ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग...’ (मल्लिका तरन्नुम नूरजहां ने इसे गाकर इसमें चार चांद लगा दिए) से ली गई है और मजरुह ने बाकायदा इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया था। ऐसे कई उदाहरण हैं।
अब सवाल है कि गुलजार इस बात को सार्वजनिक रूप से मानेंगे- जैसाकि वे पहले कई बार स्वीकार कर चुके हैं- कि ‘इश्किया’ का ‘इब्नबतूता ता ता’ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बालगीत ‘इब्नबतूता का जूता’ से प्रभावित है? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है। बहरहाल, हम आपके लिए सक्सेना जी के बालगीत और गुलजार साहब के फिल्मी गीत को सामने रख रहे हैं। अब खुद ही पढ़ कर फैसला कीजिए कि हकीकत क्या है?
सर्वेश्वर दयाल का बालगीत ‘इब्न बतूता का जूता’
इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में
कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।
गुलजार का लिखा ‘इश्किया’ का गाना
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में
कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।
गुलजार का लिखा ‘इश्किया’ का गाना
इब्नबतूता ता ता
बगल में जूता ता ता
पहने तो करता है चुर्र
उड़ उड़ आवे आ आ
दाना चुग आ आ
उड़ उड़ आवे आ आ
दाना चुग आ आ
उड़ जावे चिडि़या फुर्र
ओह अगले मोड़ पे पे मौत खड़ी है
मरने की भी क्या जल्दी है
इब्नबतूता...
हॉर्न बजाके आ आ बगिया में
दुर्घटना से देर भली है
चल उड़ जा उड़ जा फुर फुर्र
दोनों तरफ से बजती है ये
आय हाय जिंदगी क्या ढोलक है
हॉर्न बजाके आ आ बगिया में
अरे थोड़ा आगे गतिरोधक है
अरे चल चल चल उड़ जा उड़ जा फुर फुर्र
इब्नबतूता...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें