मीडिया और मनुष्य का नाता बहुत पुराना है। किन्तु, जिस मीडिया की हम चर्चा कर रहे हैं, उसका जन्म लगभग सौ-डेढ़ सौ वर्ष पहले उस समय हुआ जब औद्योगिक क्रांति और उससे उत्पन्न नवीन सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाएं यूरोप में धीरे-धीरे सामने आ रही थीं। अखबार के रूप में अवतरित इस मीडिया का आने वाले वर्षों में ऐसा महत्व बढ़ा कि उसे किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक अंग माना जाने लगा। उसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की संज्ञा दे दी गई। मीडिया के आकार-प्रकार में भी बढ़ोतरी हुई। जहां पहले अखबार कुछ सौ या कुछ हजार के दायरे में एक खास इलाके तक सीमित रहते थे, वहीं अब वे लाखों में और एक बड़े इलाके तक पहुंचने लगे। इसी दौरान रेडियो और टेलीविजन ने भी मीडिया के सशक्त और प्रभावी माध्यमों के रूप में अपनी जगह बना ली। आज मीडिया अपने विभिन्न स्वरूपों में एक ऐसी ताकत बन गई है जिसके पास लोकतांत्रिक व्यवस्था के विभिन्न सत्ता प्रतिष्ठानों को अंकुश में रखने की ताकत है। पिछले कुछ दशकों में जहां मीडिया की ताकत बढ़ी है, वहीं मीडिया के भीतर पत्रकारों की ताकत घटी है। आज मीडिया की सफलता में पत्रकारिता से अधिक महत्व पूंजी और व्यावसायिक सूझ-बूझ को दिया जाता है। पूंजी और मुनाफे की इस दौड़ में वे लोग पीछे छूटते गए जो मीडिया को व्यवसाय कम, मिशन अधिक मानते थे। जबकि, वे लोग मीलों आगे निकल गए जिन्होंने मुनाफे को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया। आज जितने भी बड़े मीडिया समूह हैं उनमें यही लोग हैं। समाज के लिए बाजारीकरण और केन्द्रीयकरण की प्रवृत्तियां हानिकारक हो सकती हैं। लेकिन, इनके लिए यह बड़े काम की चीज है क्योंकि, इससे इन्हें विज्ञापन रूपी अमृत की प्राप्ति होती है। समाज का हित इस वर्ग को तभी तक दिखाई देता है जब तक उसके मुनाफे पर असर न पड़ता हो। सत्ता पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अपना मुनाफा बढ़ाने में इसे कोई संकोच नहीं है। यह सत्ता पर अंकुश रख कर ही संतुष्ट नहीं है। इसे तो सत्ता में परोक्ष रूप से भागीदारी भी चाहिए। अपनी इन्हीं प्रवृत्तियों के कारण इन बड़े मीडिया समूहों से किसी सार्थक सामाजिक बदलाव में मदद की उम्मीद करना बेमानी हो गया है। बड़े मीडिया समूहों के इस दौर में छोटी और मझोली मीडिया कमजोर हुई है, पर खत्म नहीं। इस वर्ग की उपस्थिति दैनिक अखबार और इलेक्ट्रानिक चैनलों में तो नहीं है, पर साप्ताहिक/पाक्षिक/मासिक एवं त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं में यह आज भी जीवित है। मीडिया के इस वर्ग को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले वर्ग में वे प्रकाशन हैं जो व्यक्तिगत स्वामित्व और व्यक्तिगत पूंजी के बल पर चल रहे हैं। दूसरे वर्ग में वे पत्र-पत्रिकाएं शामिल हैं जो संस्थाओं द्वारा समाज के पैसे और कार्यकर्ताओं के परिश्रम से निकलती हैं। इन्हें हम सही अर्थों में सामाजिक मीडिया कह सकते हैं। मुनाफे के लिए नहीं बल्कि समाज को सार्थक दिशा देने के लिए मीडिया का जो वर्ग तत्पर है, वह यही है। हालांकि इस तत्परता के बावजूद यह वर्ग प्रभावी नहीं है। कारण है पूंजी की कमी और बुनियादी सुविधाओं व पेशेवर क्षमताओं का भारी अभाव। इस सबके बावजूद यदि सार्थक सामाजिक बदलाव में मीडिया का इस्तेमाल करना है तो आशा की किरण यहीं है। इस वर्ग को मजबूत करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। समाज के लिए समर्पित इस मीडिया को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी समाज को ही उठानी होगी। आज आवश्यकता एक ऐसे केन्द्रीय संस्थान की है जो समाज के सम्मिलित प्रयास से चल रही पत्र-पत्रिकाओं को उच्चस्तरीय प्रकाशन सामग्री उपलब्ध कराने के साथ ही आवश्यक विपणन एवं तकनीकी सहयोग भी दे। उनकी नीतियों में तालमेल बिठाए और उनके लिए वह सब कुछ करे जिससे वे सार्थक सामाजिक बदलाव के सशक्त माध्यम बन सकें। उनमें इतनी ताकत आ जाए कि वे धीरे-धीरे दैनिक अखबार, इलेक्ट्रानिक चैनल और रेडियो के क्षेत्र में भी मजबूती के साथ स्वयं को स्थापित कर सकें। अधिकतर लोगों के लिए ये बातें कपोलकल्पना हो सकती हैं। लेकिन, यदि सही लोग सही दिशा में काम करें तो यह सब संभव है। और जब ऐसा होगा तब पत्रकारिता का अर्थ बदल जाएगा। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने की बजाय लोकतंत्र की छत बन जाएगी, जिसकी छाया में समाज प्रगति की नित नई ऊंचाइयां छूएगा। |
पत्रकारिता (मीडिया) का प्रभाव समाज पर लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद यह पेशा अब संकटों से घिरकर लगातार असुरक्षित हो गया है। मीडिया की चमक दमक से मुग्ध होकर लड़के लड़कियों की फौज इसमें आने के लिए आतुर है। बिना किसी तैयारी के ज्यादातर नवांकुर पत्रकार अपने आर्थिक भविष्य का मूल्याकंन नहीं कर पाते। पत्रकार दोस्तों को मेरा ब्लॉग एक मार्गदर्शक या गाईड की तरह सही रास्ता बता और दिखा सके। ब्लॉग को लेकर मेरी यही धारणा और कोशिश है कि तमाम पत्रकार मित्रों और नवांकुरों को यह ब्लॉग काम का अपना सा उपयोगी लगे।
शनिवार, 21 जनवरी 2012
मीडिया में आशा की किरण
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