नई दिल्ली,24 सितम्बर
पैसा देकर खबर छपवाना और सुर्खियों मे बने रहना अमीरों का शौक बन गया है । जिससे मीडिया की सक्रियता और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं । इसी विषय पर शुक्रवार को दिल्ली के कन्स्टीट्यूशन क्लब में “हिन्दू अखबार” में ग्रामीण मामलों के सम्पादक पालागुम्मी साईंनाथ ने कहा कि मीडिया का व्यावसायीकरण हो गया है जिसकी वजह से ग्रामीण अंचलो की खबरें नही छप पाती और पत्रकार अपनी भूमिका निभाने मे नाकाम रहते हैं ।क्ष्री साईनाथ प्रख्यात लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उन्हें 2007 मे मैगसेसे अवार्ड भी मिल चुका है ।
पी. साईनाथ ने पैसा लेकर खबर छपने का कारण मीडिया का कारपोरेट जगत से सम्बन्ध होना बताया जिसने धीरे-धीरे व्यवसाय का रुप ले लिया । विज्ञापन आजकल मीडिया का अभिन्ऩ अंग बन गये हैं । जिसकी वजह से अखबारों मे साज-सज्जा पर अधिक जोर दिया जाता है और काम की बातें सीमित बन कर ही रह गयी हैं । टेलीविजन व अखबार ज्यादातर शहरो में हैं और उनके संवाददाता शहरो तक ही सीमित हैं जिसकी वजह से गांवो के पिछड़े इलाकों की आवाज उठाने वाले पत्रकारों की कमी है ,जबकि गांवों में 75 प्रतिसत आबादी बसती है ।
क्ष्री साईनाथ ने इस बात पर चिंता जतायी कि मीडिया कारपोरेट जगत को बिजनेस अवार्ड देती है जबकि सामाजिक कार्यकर्तायों कोई को पूछता तक नही, मीडिया के व्यावसायिक प्रेम का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है । खबरें आजकल विज्ञापनों की तरह छपती हैं ।
हिन्दुस्तान मे हर तीन घन्टे मे पांच सौ तेरह बच्चे भूखमरी से मरते है, छ: किसान आत्महत्या कर लेते है जबकि चालीस से पचास किसान आत्महत्या की असफल कोशिश करते हैं और दो सौ पचहत्तर किसान खेती करना छोड़ देते हैं । क्या सरकार यह सब देख नही रही है ? इन्हीं तीन घंटों में सरकार 175 करोड़ रुपये उद्योग धन्धो के आयात-निर्यात पर कर की छूट देती है । गांवों की तरफ बहुत कम उद्योग धन्धे खुले है ।संसाधन हीन किसानो के लिये बीज भी बड़ी कम्पनियां ही बनाती हैं । पी. साईनाथ ने कहा कि ये आकड़े तो 2006 के हैं इससे 2010 की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है । क्ष्री साईंनाथ ने बताया कि 2008 मे तीन हजार पत्रकारों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था जिसमे से चार सौ पचास पत्रकार महाराष्ट्र के थे । मीडिया कारपोरेट जगत ने इसकी वजह मंदी की मार बताया था ।
पी. साईनाथ के अनुसार पत्रकार दो तरह के होते हैं एक वह जो पत्रकारिता करता है दूसरा स्टेनोग्राफर बन बैठा है । 2006 में महाराष्ट्र में लक्मे फैशनवीक पांच सौ से ज्यादा पत्रकारों ने कवर किया वहीं महाराष्ट्र के ही 453 किसानों के आत्महत्या के मामले को सिर्फ छ: पत्रकार कवर कर रहे थे ।यह मीडिया के व्यावसायीकरण का नतीजा है । उन्होंने देश में व्याप्त गरीबी का हवाला देते हुए महाराष्ट्र के एक स्कूल के बारे में कहा कि एक शिक्षिका ने बताया कि सोमवार को जब बच्चे स्कूल आते हैं तो सुबह उनका मन पढ़ने में नहीं लगता और वह खाने की घण्टी बजने का इन्तजार करते हैं ताकि मिड डे मील के तहत मिलने वाला भोजन खा सकें । इसकी वजह यह है कि बच्चे भरपेट खाना शनिवार को खाये होते हैं और उनके परिवार में उन्हें रविवार को भरपेट खाना नहीं मिलता ।
पी. साईनाथ को सुनने के लिए पूर्व फिल्म अभिनेत्री शर्मीला टैगोर , बड़ी संख्या में बुध्दिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता , पत्रकार , वकील और छात्र आये थे ।सेमिनार की अध्यक्षा विख्यात इतिहासकार रोमिना थापर ने की ।सेमिनार का आयोजन दिल्ली यूनियन आँफ जर्नलिस्ट ने किया था ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें