मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

आनंद प्रधान के कुछ आलेख

महंगाई नहीं, मुद्रास्फीति कम हुई है

महंगाई की हकीकत आंकड़ों में नहीं, आम आदमी की थाली में दिखाई देती है




पिछले ढाई-तीन सालों से यू.पी.ए सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई खाद्य मुद्रास्फीति की दर २६ नवंबर को खत्म हुए सप्ताह में गिरकर ६.६ प्रतिशत क्या हुई, सरकार के आर्थिक मैनेजरों के चेहरों पर न सिर्फ खुशी लौट आई है बल्कि उनमें अपनी और एक-दूसरे की पीठ थपथपाने की होड़ शुरू हो गई है.


यही नहीं, एक बार फिर से बड़बोले दावों का दौर शुरू हो गया है. दावा किया जा रहा है कि अगले मार्च तक थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित खाद्य मुद्रास्फीति और आम मुद्रास्फीति की दर पूरी तरह से काबू में आ जायेगी और सात फीसदी से नीचे की आरामदेह स्थिति में होगी.


इसके साथ ही सरकार के राजनीतिक और आर्थिक मैनेजरों में महंगाई पर काबू पाने की चुनौती को लेकर एक निश्चिन्तता और खुशफहमी का भाव भी दिखाई पड़ने लगा है. हालांकि जल्दबाजी में महंगाई की आग में कई बार हाथ जला चुके ये मैनेजर खुलकर यह कह नहीं पा रहे हैं.


लेकिन उनके हालिया बयानों का निष्कर्ष यही है कि मुद्रास्फीति खासकर खाद्य मुद्रास्फीति न सिर्फ काबू में आ गई है बल्कि वह उतनी बड़ी आर्थिक समस्या नहीं रह गई है जितनी कि उसे लेकर राजनीतिक शोर मचाया जा रहा है. संसद में महंगाई पर हुई चर्चा में वित्त मंत्री के जवाब और सरकार द्वारा पेश अर्थव्यवस्था की छमाही समीक्षा में इसकी झलक देखी जा सकती है.


लेकिन यह पूरा सच नहीं है. पूरा सच यह है कि मुद्रास्फीति की दर भले कम हुई है लेकिन महंगाई कम नहीं हुई है. तथ्य यह है कि मुद्रास्फीति की दर और वास्तविक महंगाई के बीच बहुत बड़ा फासला है.


यही कारण है कि सरकार और उसके आर्थिक मैनेजर भले ही मुद्रास्फीति की दर में कमी और उसके ७ फीसदी से कम होने का जश्न मना रहे हों लेकिन हकीकत यह है कि आसमान छूती महंगाई की मार से आम लोगों को अभी भी कोई खास राहत नहीं मिली है.


यह ठीक है कि अच्छे मानसून के कारण सब्जियों और कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तात्कालिक तौर पर थोड़ी नरमी आई है लेकिन उससे महंगाई की आंच पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है.


असल में, मुद्रास्फीति की दर में हालिया गिरावट के आधार पर महंगाई में कमी का दावा इस कारण थोथा है क्योंकि मुद्रास्फीति की दर में गिरावट काफी हद तक एक ‘सांख्कीय चमत्कार’ भर है. यह पिछले वर्षों के ऊँचे आधार प्रभाव यानी बेस इफेक्ट के कारण संभव हुआ है.


चूँकि पिछले वर्ष इन्हीं महीनों और सप्ताहों में मुद्रास्फीति की वृद्धि दर ९ से १० फीसदी की असहनीय ऊँचाई पर थी, इसलिए इस वर्ष कीमतों में वृद्धि के बावजूद मुद्रास्फीति की वृद्धि दर तुलनात्मक रूप से कम दिखाई दे रही है. लेकिन सच यह है कि महंगाई कम होने के बजाय बढ़ी है और उसकी मार इसलिए और भी तीखी है क्योंकि पिछले तीन वर्षों से कीमतें लगातार ऊपर ही जा रही हैं.


अगर आप अब भी नहीं समझे तो इस ‘सांख्कीय चमत्कार’ को इस तरह से समझिए. जैसे पिछले वर्ष किसी वस्तु/उत्पाद जिसकी कीमत १०० रूपये थी और उसकी कीमत में १० रूपये की वृद्धि हुई. इस तरह पिछले वर्ष उस वस्तु की मुद्रास्फीति वृद्धि दर १० फीसदी हुई. इस वर्ष उसकी कीमत में फिर ७ रूपये की वृद्धि हुई और उसकी कीमत बढ़कर ११७ रूपये हो गई लेकिन उसकी मुद्रास्फीति की दर में सिर्फ ६.३ फीसदी की वृद्धि दर्ज होगी.


इस तरह मुद्रास्फीति की दर में पिछले वर्ष के १० फीसदी की तुलना में इस वर्ष ६.३ फीसदी की दर काफी कम दिखाई देगी लेकिन वास्तविकता यह है कि आम उपभोक्ता के लिए उस वस्तु की कीमत में कोई कमी नहीं आई है और उसे अभी भी ऊँची कीमत चुकानी पड़ रही है.


जाहिर है कि इस ‘सांख्कीय चमत्कार’ से अर्थशास्त्री और सरकार के आर्थिक मैनेजर खुश हो सकते हैं लेकिन इससे आम आदमी कैसे खुश हो सकता है? इसीलिए कहते हैं कि ‘झूठ, महाझूठ और सांख्कीय.’


अफसोस की बात यह है कि महंगाई के मामले में सरकारें इसी सांख्कीय झूठ का सहारा लेकर अपनी पीठ थपथपाती रही हैं लेकिन दूसरी ओर, आम आदमी की पीठ महंगाई के बोझ से दोहरी होती गई है. यू.पी.ए सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है. वह भी इस आधार पर अपनी पीठ ठोंकने में जुट गई है कि मार्च तक मुद्रास्फीति की दर ७ फीसदी से नीचे आ जायेगी.


दोहराने की जरूरत नहीं है कि उसके इस दावे के पीछे महंगाई को कम करने की ठोस कोशिशों से ज्यादा उसी ‘सांख्कीय चमत्कार’ पर भरोसा है जिसके कारण मुद्रास्फीति की दर गिरकर फिलहाल ६.६ फीसदी हो गई है.


असल में, पिछले वर्ष आम मुद्रास्फीति की दर दिसम्बर से लेकर जनवरी तक क्रमश: ९.४५, ९.४७, ९.५७ और ९.६८ फीसदी थी. यही नहीं, वर्ष २०१० में इन्हीं महीनों में खाद्य मुद्रास्फीति की दर १६ से २० फीसदी के बीच थी और पिछले वर्ष २०११ के इन महीनों में यह दर ७ से १० फीसदी के बीच थी. इसी आधार पर आर्थिक मैनेजरों को उम्मीद है कि इस साल दिसंबर से लेकर अगले साल के जनवरी-मार्च के महीनों में मुद्रास्फीति की दर ७ फीसदी से नीचे आ जायेगी.


दूसरी बात यह है कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित खाद्य और आम मुद्रास्फीति की दर से वास्तविक महंगाई का इसलिए भी पता नहीं चलता है क्योंकि आम आदमी को खुदरा स्तर पर जो कीमत चुकानी पड़ती है, उसमें और थोक मूल्य में काफी अंतर होता है.


यही नहीं, थोक मूल्य सूचकांक में आम आदमी की बुनियादी जरूरत की अधिकांश चीजों का भारांक कम है जिसके कारण उनकी कीमतों में वृद्धि सूचकांक में उस तीखेपन के साथ नहीं दिखाई पड़ती है जो आम आदमी को झेलनी पड़ती है.


इस कारण सरकार मुद्रास्फीति में कमी के आधार पर भले महंगाई में कमी के दावे करे लेकिन साफ़ है कि महंगाई के मामले में न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम लागू नहीं होता है. सच यह है कि महंगाई के मामले में इस नियम का उल्टा लागू होता है यानी जो कीमतें ऊपर जाती हैं, वे कभी नीचे नहीं आती हैं.


मुद्रास्फीति और महंगाई के इस खेल की यही कड़वी सच्चाई है जिसमें आंकड़े चाहे जो कहें, आम आदमी का कोई पुरसाहाल नहीं है. सच्चाई यह है कि महंगाई की हकीकत आंकड़ों में नहीं, आम आदमी की थाली में दिखाई देती है.


('नया इंडिया' में १२ दिसंबर और 'जनसंदेश टाइम्स' के १३ दिसंबर के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख)

Wednesday, December 07, 2011


टोटकों से नहीं संभलेगी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था

मंदी का डर दिखाकर नव उदारवादी सुधारों को अनिवार्य साबित करने की कोशिश की जा रही है




भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है. चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में जी.डी.पी. की वृद्धि दर गिरकर ६.९ प्रतिशत रह गई है. यह पिछले दो वर्षों की किसी भी तिमाही की सबसे धीमी रफ़्तार है. इसमें सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर सिर्फ २.७ फीसदी रह गई है.


कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर भी घटकर ३.२ फीसदी रह गई है. दूसरी ओर, पिछले कई महीनों से आश्चर्यजनक रूप से लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे निर्यात की वृद्धि दर में भी सुस्ती दिखाई पड़ने लगी है. अक्टूबर महीने में निर्यात की वृद्धि दर १०.८ प्रतिशत रह गई है.


यही नहीं, मुद्रास्फीति की वृद्धि दर में मामूली गिरावट के बावजूद खाद्य वस्तुओं की थोक मुद्रास्फीति दर ८ फीसदी पर बनी हुई है. इस बीच, रिजर्व बैंक के लिए मुद्रास्फीति के साथ-साथ नया सिरदर्द डालर के मुकाबले रूपये की लगातार गिरती कीमत है. डालर के मुकाबले रूपया लुढकते हुए ५२ रूपये के नए रिकार्ड पर पहुँच गया है.


इसके साथ ही, नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का बैरोमीटर माने-जानेवाले शेयर बाजार की हालत भी खस्ता है. विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ.आई.आई) के भारतीय बाजारों से निकलने के कारण बाजार न सिर्फ कराह रहा है बल्कि डालर की मांग बढ़ने के कारण रूपये पर दबाव बढ़ रहा है.


जैसे इतना ही काफी न हो. रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार की वित्तीय स्थिति भी काफी नाजुक है. राजस्व वृद्धि दर उम्मीदों से कम है जबकि खर्चों में वृद्धि की दर तेज है. इसके कारण अप्रैल से अक्टूबर के बीच सिर्फ सात महीनों में वित्तीय घाटे के लक्ष्य का ७४ फीसदी पूरा हो चुका है.


खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार किया है कि इस साल वित्तीय घाटे को जी.डी.पी के ४.६ फीसदी के अनुमान के भीतर रख पाना संभव नहीं होगा. कई स्वतंत्र खासकर बाजार विश्लेषकों का मानना है कि वित्तीय घाटा जी.डी.पी के ५ से लेकर ५.५ फीसदी तक पहुँच सकता है.


कहने की जरूरत नहीं है कि अर्थव्यवस्था से आ रही इन नकारात्मक और बुरी ख़बरों से बाजार में घबड़ाहट और बेचैनी का माहौल है. बाजार से फील गुड फैक्टर गायब है और निराशा का माहौल हावी होता जा रहा है.


दूसरी ओर, देश में राजनीतिक अनिश्चितता और वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता के कारण भी अर्थव्यवस्था के प्रमुख घटकों में घबड़ाहट का माहौल है. इससे स्थिति और खराब होने की आशंका बढ़ती जा रही है.


इसकी वजह यह है कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ ‘मार्केट सेंटिमेंट’ पर चलता है. अगर बाजार में अनिश्चितता और निराशा का माहौल है तो निजी निवेशक नया निवेश नहीं करेंगे या निवेश के फैसले को स्थगित कर देंगे जिससे अर्थव्यवस्था में सुस्ती आने लगती है.


ऐसे माहौल में आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं. बाजार विश्लेषकों खासकर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकारों का आरोप है कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के लिए यू.पी.ए सरकार जिम्मेदार है जिसकी ‘नीतिगत पक्षाघात’ की स्थिति के कारण अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता का माहौल बना है.


उनका यह भी कहना है कि मौजूदा स्थिति से निकलने के लिए जरूरी है कि सरकार आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाए. गुलाबी अख़बारों से लेकर औद्योगिक-वाणिज्यिक संगठनों के सम्मेलनों तक में इन मुखर आवाजों को सुना जा सकता है.


मजे की बात यह है कि सरकार में बैठे अर्थव्यवस्था के मैनेजर भी काफी हद तक इन आरोपों और सुझावों से सहमत दिखते हैं.


आश्चर्य नहीं कि पिछले एक पखवाड़े में यू.पी.ए सरकार ने बाजार में फील गुड का माहौल पैदा करने के लिए न सिर्फ आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाने का फैसला किया बल्कि धड़ाधड़ कई फैसलों को एलान कर दिया. पेंशन, नई मैन्युफैक्चरिंग नीति से लेकर खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी एफ.डी.आई जैसे कई फैसले बाजार और बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए ही किये गए हैं.


यू.पी.ए सरकार इन फैसलों के जरिये बाजार खासकर विदेशी पूंजी को यह सन्देश देने की कोशिश कर रही है कि सरकार आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने और उसके लिए राजनीतिक जोखिम भी उठाने को तैयार है.


हालांकि सरकार और बाजार विश्लेषक इन फैसलों के पक्ष में यह तर्क भी दे रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाती स्थिति के लिए एक बड़ा कारण आर्थिक सुधारों का ठहर जाना है. इसके कारण देशी-विदेशी निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था में भरोसा कमजोर हुआ है. वे नया निवेश नहीं कर रहे हैं. वे अपना पैसा निकालकर वापस जा रहे हैं.


इस तरह नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के पक्ष में अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाती स्थिति को लेकर ऐसा डरावना माहौल बनाया जाता है जिससे इन सुधारों को जायज ठहराया जा सके. लोगों को यह कहकर डराया जाता है कि अगर आर्थिक सुधारों को आगे नहीं बढ़ाया गया तो अर्थव्यवस्था की हालत और पतली और खस्ता होगी.


जबकि सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था की पतली होती स्थिति के लिए ये नव उदारवादी सुधार ही जिम्मेदार हैं. इनके कारण ही मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट पैदा हुआ है जिसका असर भारत पर भी पड़ रहा है. यही नहीं, अर्थव्यवस्था की कई मौजूदा समस्याओं के लिए भी यही सुधार जिम्मेदार हैं


लेकिन मजा देखिए कि उनकी चर्चा नहीं हो रही है, उल्टे इन सुधारों के कथित तौर पर ठहर जाने को अर्थव्यवस्था के सारे मर्जों की वजह साबित करने की कोशिश हो रही है. इसी आधार पर इन मर्जों के इलाज के बतौर सुधारों के नए कड़वे डोज को लोगों के गले के नीचे जबरन उतारने की कोशिश हो रही है.


लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जायेगी? इसके आसार कम हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था की समस्याओं के समाधान के नाम पर मनमोहन सिंह सरकार मर्ज का इलाज करने के बजाय टोटके कर रही है.


बाजार को खुश करने के लिए जल्दबाजी में किये गए फैसलों से स्थिति नहीं सुधरने वाली है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याएं बाजार के लिए फील गुड पैदा करने से हल नहीं होने वाली हैं.


असल में, यू.पी.ए सरकार ‘नीतिगत पक्षाघात’ की शिकार है लेकिन यह ‘नीतिगत पक्षाघात’ वह नहीं है जो नव उदारवादी बाजार विश्लेषक, गुलाबी अखबार और औद्योगिक-वाणिज्यिक लाबी संगठन कह रहे हैं.


सच यह है कि यू.पी.ए सरकार के ‘नीतिगत पक्षाघात’ के कारण भोजन के अधिकार से लेकर कृषि और आधारभूत ढांचा क्षेत्र में सार्वजनिक बढ़ाने तक कई महत्वपूर्ण फैसले लटके हुए हैं. उदाहरण के लिए, भोजन के अधिकार को ही लीजिए, सरकार की हीलाहवाली और टालमटोल के कारण न सिर्फ करोड़ों गरीबों को भूखे पेट सोना पड़ रहा है बल्कि सरकार के अनाज भंडारों में रिकार्ड अनाज होते हुए भी एक ओर खाद्य वस्तुओं की महंगाई आसमान छू रही है.


दूसरी ओर, सरकार की खाद्य सब्सिडी बढ़ रही है. यही नहीं, गोदामों में अनाज सड़ रहा है और सरकार कोई फैसला नहीं कर पा रही है.


इसके अलावा सरकार अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के लिए भी तैयार नहीं है. माना जाता है कि जब अर्थव्यवस्था की रफ़्तार सुस्त पड़ रही हो तो सार्वजनिक निवेश बढ़ाने से निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलता है. मौजूदा माहौल में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है क्योंकि सिर्फ फील गुड से निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे नहीं आएगा.


खासकर जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऐसी अनिश्चितता और संकट हो. ऐसे समय में जरूरत घरेलू अर्थव्यवस्था को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए घरेलू मांग को बढ़ाने और उसके लिए सार्वजनिक निवेश पर जोर देने की है.


जाहिर है कि सिर्फ निजी क्षेत्र पर भरोसा करने से बात नहीं बनेगी. सरकार को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उतना अच्छा होगा.


लेकिन इसके लिए उसे मौजूदा नीतिगत पक्षाघात और उससे अधिक नव उदारवादी अर्थनीति के प्रति मानसिक सम्मोहन से निकलना होगा. वित्तीय घाटे की चिंता को छोड़ना होगा. क्या यू.पी.ए सरकार इसके लिए तैयार है?


('नया इंडिया' के ५ दिसंबर'११ के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख का पूरा हिस्सा)

Tuesday, December 06, 2011


अपराध और दंड

जो दूसरों की आज़ादी के हक में नहीं खड़ा होता, उसे अपनी आज़ादी को गंवाने के लिए तैयार रहना चाहिए






न्यूज चैनलों की ‘परपीड़क सुख’ की प्रवृत्ति किसी से छुपी नहीं है. अकसर देखा गया है कि चैनलों को दूसरों के दुःख या परेशानी या कष्ट की खिल्ली उड़ाने में बहुत मजा आता है. लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी ऊंट भी पहाड़ के नीचे आ जाता है. संयोग देखिए कि कोई और नहीं बल्कि ‘परपीडक सुख’ में सबसे अधिक मजा लेने वाला चैनलों का चैनल ‘टाइम्स नाउ’ पहाड़ के नीचे आ गया है.


हुआ यह कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पी.बी. सावंत द्वारा दाखिल मानहानि के एक मुकदमे में पुणे की एक स्थानीय अदालत ने ‘टाइम्स नाउ’ पर १०० करोड़ रूपये का जुर्माना ठोंक दिया है.




यही नहीं, इस फैसले के खिलाफ मुंबई हाई कोर्ट में ‘टाइम्स नाउ’ की अपील पर कोर्ट ने कोई राहत देने से पहले चैनल से कोर्ट में २० करोड़ रूपये और ८० करोड़ रूपये की बैंक गारंटी जमा करने का आदेश दिया है. चैनल ने इसके बाद राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की जिसे कोर्ट ने यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि वह राहत के लिए हाई कोर्ट के पास ही जाए.


कहने की जरूरत नहीं है कि इस फैसले ने न्यूज चैनलों के साथ-साथ सभी समाचार माध्यमों को सन्न कर दिया है. एडिटर्स गिल्ड से लेकर प्रेस काउन्सिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू तक अनेक मीडिया संगठनों और बुद्धिजीवियों ने इस फैसले की आलोचना की है. अरुण जेटली जैसे इक्का-दुक्का नेताओं ने भी इस फैसले से असहमति जाहिर की है.


लेकिन विरोध के सुर बहुत तीखे नहीं बल्कि दबे-दबे और कुछ सहमे-सहमे से हैं. विरोध में औपचारिकता अधिक है और गर्मी और शोर कम. यही नहीं, इस फैसले का विरोध जुर्माने की भारी राशि को लेकर ज्यादा है. सभी मान रहे हैं कि ‘टाइम्स नाउ’ से गलती हुई है और वह गलती जान-बूझकर नहीं हुई है.


ऐसे में, वे हर्जाने की इतनी भारी राशि को पचा नहीं पा रहे हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, मानहानि के किसी मुकदमे में यह पहला ऐसा मामला है जहां इतनी बड़ी राशि का हर्जाना ठोंका गया है. अच्छी बात यह है कि इस फैसले का किसी प्रमुख व्यक्ति ने खुलकर समर्थन नहीं किया है.


लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अलग-अलग कारणों से ‘टाइम्स नाउ’ पर ठोंके गए इस हर्जाने से अंदर ही अंदर खुश हैं. बहुतों को इसमें एक तरह का ‘परपीडक सुख’ मिल रहा है. यही कारण है कि देश में अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी के लिए गंभीर और गहरे निहितार्थों से भरे इस फैसले को लेकर वैसी बहस और चर्चा नहीं हो रही है, जैसीकि अपेक्षा थी.


यह संयोग नहीं है कि देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी और मानवाधिकार के लिए लड़ने और बोलने वाली चर्चित आवाजें इस मुद्दे पर खामोश हैं या उतनी मुखर नहीं हैं जितनी अकसर दिखाई पड़ती हैं?


यह भी सिर्फ संयोग नहीं है कि ‘टाइम्स नाउ’ पर मानहानि का मुकदमा करनेवाले जस्टिस पी.बी. सावंत सुप्रीम कोर्ट के उदार जजों में माने जाते रहे हैं जिन्होंने वायु तरंगों को सार्वजनिक संपत्ति घोषित करने का ऐतिहासिक फैसला दिया था. इस फैसले ने ही दूरदर्शन-आकाशवाणी को स्वायत्तता देने के साथ-साथ निजी न्यूज चैनलों के लिए प्रसारण को आसान बनाया था.


जस्टिस सावंत बाद में प्रेस काउन्सिल के मुखर और सक्रिय अध्यक्ष भी रहे जिन्होंने हमेशा अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी के हक में बोला और लिखा. आखिर ऐसा क्या हुआ कि उन जैसे उदार जज को ‘टाइम्स नाउ’ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने के लिए मजबूर होना पड़ा.


चैनलों के लिए यह सोच-विचार और आत्मावलोकन का समय है. मामला बहुत गंभीर है. उन्होंने अपने कारनामों से अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी को खतरे में डाल दिया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ‘टाइम्स नाउ’ के मामले में पुणे कोर्ट का फैसला सिर्फ ‘टाइम्स नाउ’ तक सीमित मामला नहीं है.


यह एक तरह से टेस्ट केस है. अगर यह एक नजीर बन गई तो अख़बारों और चैनलों का आज़ादी और निर्भीकता के साथ काम करना बहुत मुश्किल हो जाएगा. इसका सबसे अधिक फायदा ताकतवर लोग और कंपनियां उठाएंगी. वे इस फैसले का दुरुपयोग चैनलों और न्यूज मीडिया को धमकाने और उनका मुंह बंद करने के लिए करने लगेंगे.


आश्चर्य नहीं होगा, अगर इस फैसले से प्रेरणा लेकर ताकतवर राजनेता, अफसर, कारोबारी और कम्पनियाँ सिर्फ परेशान करने के लिए चैनलों और अखबारों पर मुकदमे ठोंकने लगें. कितने अखबार और चैनल ये मुकदमे लड़ने के लिए संसाधन जुटा पायेंगे?


यही नहीं, आखिर कितने चैनल और अखबार १०० करोड़ रूपये का हर्जाना देकर चलते और छपते रह सकते हैं? ब्रिटेन और अमेरिका जैसे कई विकसित देशों में कड़े मानहानि कानूनों के कारण पत्रकारिता के तेवर पर असर पड़ा है. समाचार कक्षों में वकील नए गेटकीपर बन गए हैं. खबरों को संपादकों के साथ-साथ वकीलों के चश्मे से भी गुजरना पड़ता है.


इससे एक तरह की सेल्फ सेंसरशिप की स्थिति पैदा हो जायेगी जो वाचडाग पत्रकारिता के लिए घातक साबित हो सकती है. लेकिन यह कहने का अर्थ यह कतई नहीं है कि चैनलों को मनमानी करने, जान-बूझकर किसी पर कीचड़ उछालने और लापरवाही करने की छूट देनी चाहिए.


निश्चय ही, चैनलों को खबरों और विजुअल के चयन और प्रस्तुति में तथ्यों, वस्तुनिष्ठता, संतुलन और निष्पक्षता जैसे सम्पादकीय मूल्यों के पालन पर जोर देना चाहिए. गलतियों को दोहराने से बचना चाहिए.


लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि तमाम सावधानियों के बावजूद समाचार संकलन और माध्यम के साथ-साथ पत्रकारों की सीमाओं के कारण चैनलों से गलतियाँ होना असामान्य बात नहीं हैं. अलबत्ता, ध्यान दिलाने पर उन गलतियों खासकर तथ्यों सम्बन्धी भूलों को तुरंत दुरुस्त न करना कहीं बड़ी गलती है जो चैनल की बदनीयती को जाहिर करता है.


जाहिर है कि बदनीयती का कोई इलाज नहीं है. ऐसे मामलों में कानून को अपना काम करना चाहिए. लेकिन अपराध और सजा के बीच भी कोई अनुपात, संतुलन और तर्क होना चाहिए. कहने की जरूरत नहीं कि ‘टाइम्स नाउ’ के मामले में अदालत के फैसले में यह संतुलन और अनुपात नहीं है.


लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी की दुहाईयाँ देनेवाले चैनलों को इस बात का जवाब जरूर देना चाहिए कि वे खुद अपने आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए मानहानि कानून की धमकी क्यों देने लगते हैं?


ऐसे अनेकों मामले हैं जिनमें ‘टाइम्स नाउ’ जैसे बड़े चैनलों ने मीडिया साइटों, ब्लाग लेखकों को ऐसे कानूनी नोटिस भेजे हैं. उनमें अपनी आलोचना सुनने को लेकर इतनी तंगदिली क्यों है? यही नहीं, ‘टाइम्स नाउ’ वह चैनल है जिसने कश्मीर मसले पर अरुंधती राय के बयान को देशद्रोह बताते हुए उनके खिलाफ अभियान चलाया था.


क्या यह दोहराने की जरूरत है कि जो दूसरों की आज़ादी के हक में नहीं खड़ा होता, उसे अपनी आज़ादी को गंवाने के लिए तैयार रहना चाहिए?


('तहलका' के १५ दिसंबर'११ के अंक में प्रकाशित स्तम्भ)

Saturday, December 03, 2011


खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा के बीच नूराकुश्ती हो रही है

राजनीति की कमान लोगों के हाथ में नहीं, बड़ी पूंजी के हाथ में है  








ऐसा लगता है कि यू.पी.ए सरकार की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ राजनीति पर से भी पकड़ छूटती जा रही है. इसका सबूत यह है कि राजनीति में उसकी टाइमिंग का सेंस न सिर्फ गड़बड़ा गया है बल्कि उसके फैसले उल्टे पड़ रहे हैं.


अगर ऐसा नहीं होता तो भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में उलझी और आसमान छूती महंगाई को काबू करने में नाकाम रही यू.पी.ए सरकार आग में घी डालने की तरह खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी विदेशी पूंजी की इजाजत देने का फैसला करने से पहले कई बार सोचती. उसके राजनीतिक नतीजों के बारे में चिंता करती.


लेकिन बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करने की जल्दबाजी में उसने एक तरह से राजनीतिक आत्महत्या का रास्ता चुन लिया है. यह ठीक है कि खुदरा व्यापार को बड़ी विदेशी पूंजी के लिए खोलने को लेकर यू.पी.ए सरकार पर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कारपोरेट समूहों का जबरदस्त दबाव था.


इसके लिए बड़े देशी कारपोरेट समूहों से लेकर वालमार्ट जैसी बड़ी विदेशी कम्पनियाँ काफी दिनों से लाबीइंग कर रही थीं. यहाँ तक कि पिछले साल भारत दौरे पर आए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी घरेलू खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का दबाव डाला था.


यह भी किसी से छुपा नहीं है कि रिलायंस, भारती, गोयनका, बिरला और टाटा जैसे कई बड़े देशी कारपोरेट समूहों ने भी खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने की पैरवी कर रहे थे. इनमें से कई ने पहले से ही खुदरा व्यापार के क्षेत्र में दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ समझौता कर रखा है.


ये सभी बेचैन थे और सरकार पर जल्दी फैसला करने का दबाव बनाए हुए थे. इनकी बेचैनी का कारण यह था कि २००९ में दोबारा सत्ता में आई यू.पी.ए सरकार से उनकी उम्मीदें बहुत बढ़ गईं थीं. बड़े कारपोरेट समूहों को उम्मीद थी कि वामपंथी दलों के दबाव से मुक्त यू.पी.ए सरकार दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाएगी.


लेकिन हुआ यह कि पिछले दो-ढाई सालों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों, सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के बीच आपसी तनातनी, कांग्रेस पार्टी और सरकार में खींचतान और अन्ना हजारे और जन लोकपाल आंदोलन जैसी नई राजनीतिक चुनौतियों ने मनमोहन सिंह सरकार को ऐसा उलझाया कि वह चाहकर भी बड़े कारपोरेट समूहों की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाई.


जाहिर है कि इससे देशी-विदेशी बड़ी पूंजी की सरकार से नाराजगी बढ़ती जा रही थी. गुलाबी अखबारों से लेकर औद्योगिक-वाणिज्यिक संगठनों की बैठकों में सरकार पर ‘नीतिगत पक्षाघात’ के आरोप लगने लगे थे. यहाँ तक कि आमतौर पर सरकार की खुली आलोचना से बचनेवाले बड़े उद्योगपति जैसे टाटा, मुकेश अम्बानी, अजीम प्रेमजी, नारायणमूर्ति और सुनील मित्तल आदि हाल के महीनों में खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर करने लगे थे.


कहने का अर्थ यह कि सरकार भारी दबाव में थी. वह अपने ऊपर लग रहे ‘नीतिगत पक्षाघात’ के आरोपों से पीछा छुड़ाना चाह रही थी. इसके बावजूद सरकार ने जिस जल्दबाजी और झटके के साथ खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का फैसला किया है, उससे ऐसा लगता है कि उसे बड़े कारपोरेट समूहों की ओर से नोटिस मिल गई थी.


उसे यह भय सता रहा था कि बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कारपोरेट समूहों को नाराज करके सत्ता में टिके रहना मुश्किल होगा. हाल के महीनों में कई बड़े कारपोरेटों ने जिस तरह से भाजपा के नरेन्द्र मोदी की वाहवाही शुरू की है, उससे भी कांग्रेस में बेचैनी थी.


ऐसा लगता है कि इसी हताशा और हड़बड़ी में उसने बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए यह राजनीतिक जोखिम उठाने का फैसला कर लिया. कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए सरकार का यह फैसला बड़ी पूंजी का खोया हुआ भरोसा जीतने की कोशिश है.


लेकिन बड़ी पूंजी के प्रति वफादारी निभाने के चक्कर में सरकार खासकर कांग्रेस ने राजनीतिक आत्मघात का रास्ता चुन लिया है. खासकर भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों से घिरी सरकार ने अपने लिए एक और गड्ढा खोद लिया है.


यही नहीं, उत्तर प्रदेश सहित राजनीतिक रूप से संवेदनशील कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और संसद सत्र के ठीक पहले इस फैसले का औचित्य समझ से बाहर है.


साफ़ है कि सरकार बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. लेकिन इससे विपक्ष खासकर भाजपा को सरकार को घेरने का न सिर्फ एक और बड़ा मुद्दा मिल गया है बल्कि अपने वोट बैंक को कंसोलिडेट करने का अवसर भी हाथ आ गया है. क्या यू.पी.ए खासकर कांग्रेस को इस खतरे का अनुमान नहीं है?


सच यह है कि सरकार और कांग्रेस नेतृत्व को इस फैसले के राजनीतिक जोखिम का अंदाज़ा भले न हो लेकिन आम कांग्रेसियों की बेचैनी से जाहिर है कि उन्हें अच्छी तरह पता है कि यह राजनीतिक रूप से बहुत ज्वलनशील मुद्दा है. सिर्फ छोटे-बड़े दुकानदार ही नहीं, गरीब रेहडी-पटरी वाले भी विरोध कर रहे हैं.


इसके बावजूद सरकार ने यह फैसला किया है तो इसका एक ही अर्थ है कि राजनीति की कमान बड़ी पूंजी के हाथों में है. उसमें लोगों की इच्छाओं और आकांक्षाओं के लिए जगह नहीं रह गई है. असल में, नव उदारवादी अर्थनीति की यह सबसे बड़ी पहचान हो गई है.


मार्क्स ने ठीक कहा था कि ‘राजनीति, अर्थनीति का ही संकेंद्रित रूप है.’ आश्चर्य नहीं कि भारतीय राजनीति की मुख्यधारा की सभी पार्टियां बड़ी देशी-विदेशी पूंजी द्वारा जोर-शोर से आगे बढ़ाई गई नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और सुधारों का खुलकर समर्थन करती रही हैं.


भाजपा भी इसकी अपवाद नहीं है. सच यह है कि वह अपने को नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और सुधारों का असली चैम्पियन मानती है. आडवाणी ने बहुत पहले शिकायत की थी कि नव उदारवादी अर्थनीति मूलतः भाजपा(जनसंघ) की अर्थनीति है जिसे १९९१ में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने चुरा लिया था.


हैरानी की बात नहीं है कि भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए सरकार के कार्यकाल में आर्थिक सुधारों को जोर-शोर से आगे बढ़ाया गया और स्वदेशी को हाशिए पर डाल दिया गया था. मजे की बात यह है कि आज खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के विरोध में आसमान उठाये भाजपा तब इसकी घोषित समर्थक थी.


तथ्य यह है कि अगर २००४ के चुनावों में एन.डी.ए की हार नहीं होती तो चुनावों के तुरंत बाद वाजपेयी सरकार खुदरा व्यापार में कम से कम २६ फीसदी विदेशी पूंजी की इजाजत दे चुकी होती. भाजपा ने २००४ के चुनावों से पहले जारी विजन डाक्यूमेंट में इसका वायदा किया था.


तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने कई अखबारों को दिए इंटरव्यू में भी इस वायदे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी. यही नहीं, इससे पहले २००२ में एन.डी.ए सरकार के तत्कालीन वाणिज्य मंत्री मुरासोली मारन ने खुदरा व्यापार में १०० फीसदी विदेशी पूंजी का प्रस्ताव किया था जिसपर सरकार के एक जी.ओ.एम में विचार चल रहा था.


दूर क्यों जाएं, पिछले साल इस मुद्दे पर अपनी राय देते हुए भाजपा शासित गुजरात और पंजाब की राज्य सरकारों ने खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने का समर्थन किया था. यही नहीं, कई भाजपा शासित राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और पंजाब में भारती-वालमार्ट ने कैश और कैरी स्टोर्स खोल रखे हैं.


साफ है कि भाजपा खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की सिद्धांततः विरोधी नहीं है. हो भी नहीं सकती है. अगर आप नव उदारवादी अर्थनीति के पैरोकार हैं तो आप खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के विरोधी नहीं हो सकते हैं क्योंकि यह फैसला इस अर्थनीति का ही तार्किक विस्तार है.


भाजपा ही क्यों, इस मुद्दे पर विरोध में बोल रहे तृणमूल, डी.एम.के और कुछ हद तक वाम पार्टियां भी अवसरवादी रुख अपनाती रही है. इनमें से अधिकतर नव उदारवादी अर्थनीति की समर्थक रही है. सच यह है कि या तो आप नव उदारवादी अर्थनीति के साथ हैं या फिर विरोधी हैं, किसी बीच की और ‘किन्तु-परन्तु’ के लिए जगह नहीं है.


इसलिए भाजपा का मौजूदा विरोध उसकी मौकापरस्ती की राजनीति का ही एक और उदाहरण है. असल में, इस विरोध के जरिये वह खुदरा व्यापार सहित अन्य मुद्दों पर सरकार के खिलाफ बन रहे जनमत को भुनाने की कोशिश कर रही है. एक मायने में विरोध का नाटक करके भाजपा यू.पी.ए सरकार के खिलाफ उठ रहे वास्तविक विरोध को हड़पने की कोशिश कर रही है.


लेकिन यह भाजपा भी जानती है कि बड़ी पूंजी के हितों को नजरंदाज करते हुए इस विरोध को बहुत आगे नहीं ले जा सकती है. आश्चर्य नहीं होगा अगर अगले कुछ दिनों में खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा बीच का रास्ता निकाल लें, जिससे भाजपा और कांग्रेस दोनों ‘देशहित’ में राजनीतिक जीत का दावा कर सकें.


लेकिन सब जानते हैं कि उत्तर उदारीकरण-भूमंडलीकरण दौर में ‘देशहित’ का असली मतलब बड़ी देशी-विदेशी पूंजी का हित हो गया है. इसलिए खुदरा व्यापार के मुद्दे पर भी इस नूराकुश्ती में जीत अंततः राजनीति की नहीं, बड़ी पूंजी की ही होगी.


('राष्ट्रीय सहारा' के ३ दिसम्बर'११ अंक में हस्तक्षेप में प्रकाशित लेख का पूरा संस्करण)

Friday, December 02, 2011


मीडिया का सांप्रदायिक पूर्वाग्रह साफ़ दिखता है

न्यूजरूम में मुसलमान पत्रकारों की कमी सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को मजबूत करती है  


तीसरी और आखिरी किस्त






निश्चय ही, यह मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की पूर्वाग्रहग्रस्त रिपोर्टिंग का नतीजा है. इसी पूर्वाग्रह का विस्तार आम मुस्लिम मामलों, समस्याओं और मुद्दों की मीडिया और चैनलों में रिपोर्टिंग और कवरेज में भी दिखाई देती है. कभी गौर से देखिए कि चैनलों में मुस्लिम समुदाय से जुड़ी किस तरह की खबरों को सबसे ज्यादा कवरेज मिलती है?


यही नहीं, मुस्लिम मुद्दों पर समुदाय की राय पेश करने के लिए किन्हें अतिथि के बतौर बुलाया जाता है? आप पाएंगे कि मुस्लिम समुदाय के मुद्दों और समस्याओं के बतौर तलाक और शादी जैसे पर्सनल मामलों, मौलानाओं और मौलवियों द्वारा विभिन्न मामलों पर दिए जानेवाले फतवों, मस्जिद-कब्रिस्तान के झगडों आदि को ही उछाला जाता है.




इन रिपोर्टों से ऐसा लगता है जैसे मुसलमानों में सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अन्य बुनियादी जरूरतों की कोई समस्या ही नहीं है. ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों पर कभी रिपोर्ट नहीं आती है लेकिन ऐसी यथार्थपूर्ण रिपोर्टों और गढ़ी हुई अतिरेकपूर्ण रिपोर्टों के बीच का अनुपात ०५:९५ का है. यानी ९५ फीसदी रिपोर्टें एक खास पूर्वाग्रह और सोच के साथ लिखी और पेश की जाती है जो मुस्लिम समुदाय की स्टीरियोटाइप छवियों को ही और मजबूत करती है.


इस पूर्वाग्रह के पीछे एक बड़ा कारण यह माना जाता रहा है कि चैनलों के न्यूज रूम में पर्याप्त मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं है. इस कारण चैनलों की रिपोर्टिंग में वह सेंसिटिविटी नहीं दिखाई पड़ती है.


इसमें कोई शक नहीं है कि चैनलों के न्यूजरूम में मुस्लिम पत्रकारों की संख्या देश की आबादी में उनकी संख्या की तुलना में नगण्य है. निश्चित तौर पर इसका असर चैनलों की रिपोर्टिंग, उसके टोन और एंगल और दृष्टिकोण पर पड़ता है.


यही नहीं, चैनलों में जो मुस्लिम पत्रकार हैं भी, वे नीति निर्णय में प्रभावशाली पदों पर नहीं हैं. जो इक्का-दुक्का मुस्लिम पत्रकार संपादक हैं भी वे मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ने के डर से अपने चैनलों में कुछ भी अलग नहीं करते हैं.


यह सचमुच अफसोस की बात है कि हिंदी के जिन दो प्रमुख चैनलों में समाचार निदेशक और संपादक के पदों पर मुस्लिम पत्रकार हैं, उन चैनलों में भी आतंकवादी हमलों/बम विस्फोटों की रिपोर्टिंग और कवरेज उतनी ही पूर्वाग्रहग्रस्त, गैर जिम्मेदार, अतिरेकपूर्ण, सनसनीखेज और सांप्रदायिक होती है जितनी अन्य चैनलों की.


लब्बोलुआब यह कि मीडिया और न्यूज चैनलों में गहराई से बैठे सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों और द्वेष के कारण मीडिया में मुस्लिम समुदाय और इस्लाम की ऐसी एकांगी छवि गढ़ी गई है जिसके कारण पूरा समुदाय और इस्लाम धर्म न सिर्फ निशाने पर है बल्कि अपने को अलग-थलग महसूस करने लगा है.


('कथादेश' के दिसंबर'११ अंक में प्रकाशित स्तम्भ की तीसरी और आखिरी किस्त)



Watermar

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