शनिवार, 3 दिसंबर 2011

क्‍या मीडिया में ग्रुपबाजी ना करना गुनाह है?


: मुझे धमकी मिली, किसी पत्रकार संगठन ने साथ नहीं दिया : यशवंतजी, नमस्कार. क्या मेरा कसूर इतना है कि मैं उत्तराखंड की मीडिया में राजनीति नहीं करता. आप के पास तक इन खबरों की कटिंग को पहुंचाने का सिर्फ एक ही मकसद है कि मेरे साथ अब तक इंसाफ नहीं हुआ है. मुझे जान से मारने की धमकी देने की घटना 27 नवम्‍बर को हुई थी, तब से ही मैं डरा हुआ हूं. पुलिस को कई बार अवगत कराया जा चुका है लेकिन अभी तक कार्रवाई ना होने से मैं क्षुब्‍ध हूं.
शायद किसी ने सही कहा था कि एक पत्रकार खुद अपनी पैरवी नहीं कर सकता शायद मैं इसलिए अपने मामले को सुलझा नहीं पाया. मुझे लगा था कि जिनके साथ मैं कदम से कदम मिला कर चल रहा था, वो मेरा साथ देंगे लेकिन मुझे क्या पता कि देहरादून की मीडिया में ग्रुपबाजी और राजनीति के दायरों में मैं पिस जाऊंगा.
एक महाशय के सामने जब मैंने अपनी बात रखी तो उन्होंने मुझे अपनी पत्रकार यूनियन का ना होने की वजह से यह कह कर चुप कर दिया कि अगर तुम हमारी यूनियन के मेम्बर होते तो अभी तक हम इस बात को लेकर बबाल कर देते. यशवंतजी मुझे ऐसा लगा कि शायद पत्रकार होना यानी किसी ना ग्रुप का मेम्बर होना जरुरी होता है. अगर आप किसी भी यूनियन या ग्रुप में नहीं है तो आप पत्रकारिता के ग्रुप की भीड़ से एकदम अलग है. तारीफ करनी होगी मुज़फ्फरनगर के मीडिया की, जिसने मेरा साथ देते हुए अपने अपने न्यूज़ पेपर में खबर को प्राथमिकता से छापा और मेरा साथ दिया, जिसका एहसान में शायद कभी नहीं उतार पाऊँगा. इन लोगों ने अपनापन दिखाते हुए मेरा हौसला भी बढ़ाया.



दीपक शर्मा
पत्रकार, देहरादून

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