शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

टीवी पत्रकारिता, एक विश्लेषण





प्रियदर्शन
टीवी पत्रकारों के बारे में जस्टिस मार्कंडेय काटजू की राय पर हो रहा बवाल बताता है कि टीवी पत्रकारिता सच दिखाने को ही नहीं, सच सुनने को भी तैयार नहीं है. जस्टिस काटजू का लहजा जैसा भी हो, लेकिन उन्होंने जो बातें कही हैं उनमें ज्यादातर – दुर्भाग्य से सत्य हैं. जस्टिस काटजू की मूलतः तीन शिकायतें हैं- एक तो यह कि मीडिया अक्सर वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाता है. दूसरी यह कि मीडिया मनोरंजन के नाम पर परोसे जा रहे कूड़े को सबसे ज्यादा जगह देता है. और तीसरी यह कि मीडिया अंधविश्वास को बढ़ावा देता है. इन सबके बीच एक बड़ी शिकायत की अंतर्ध्वनि यह निकलती है कि मीडिया कई तरह के गर्हित गठजोड़ों और समझौतों का शिकार है जिसके तहत खबरों को तोड़ा-मरोड़ा और मनमाने ढंग से पेश किया जाता है.



इसके अलावा काटजू ने पत्रकारों के सामान्य ज्ञान पर भी कुछ टिप्पणियां की हैं- यह भी जोड़ा है कि टीवी पत्रकारों को न साहित्य की समझ है न इतिहास की और न दर्शन शास्त्र या किन्हीं दूसरे विषयों की. लेकिन काटजू टीवी पत्रकार से इतना पढ़ा-लिखा होने की अपेक्षा क्यों करते हैं?

जाहिर है, इसलिए कि काटजू शायद खबर को साबुन-तेल और टीवी-फ्रिज की तरह महज एक उत्पाद नहीं, उससे ज्यादा कुछ समझते हैं. इसीलिए वे किसी दुकानदार से पढ़ने-लिखने की, इतिहास-साहित्य और दर्शन की समझ होने की अपेक्षा नहीं रखते, पत्रकार से रखते हैं. वे पत्रकारिता को एक गंभीर काम मानते हैं. लेकिन पत्रकार हैं जो इसी अपेक्षा पर सवाल उठा रहे हैं. जाहिर है, अपनी खबर या पेशे की गुरुता और गंभीरता का एहसास उनके भीतर उतना नहीं है जितना जस्टिस मार्कंडेय काटजू के भीतर है. शायद इसलिए भी पत्रकारिता की मौजूदा सूरत काटजू को इस कदर नाराज करती है कि वे बहुत निर्मम लहजे में पत्रकारिता की आलोचना करते हैं और इसके विरुद्ध सख्त कानून का प्रस्ताव कर डालते हैं.

लेकिन काटजू जज रहे हैं पत्रकार नहीं, इसलिए वे कुछ व्याधियों को ठीक से पहचानते तो हैं लेकिन उनके समाजशास्त्रीय संदर्भ को समझने की जगह उनका कानूनी उपचार खोजने या करने में जुट जाते हैं. वे जैसे तथ्यों को बिलकुल ठोस और उपलब्ध सबूतों के आधार पर जांचते हुए फैसला सुनाते हैं और उन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को समझने की कोशिश नहीं करते जिनकी वजह से पत्रकारिता का यह हाल हुआ है.

दरअसल यह देखना और कहना बहुत आसान है कि टीवी पत्रकारिता असली मुद्दों से ध्यान भटकाती है, मनोरंजन को तमाशे की तरह बेचती है और अंधविश्वासों पर यकीन करती है. इतनी भर टिप्पणी के लिए जस्टिस काटजू होने की जरूरत भी नहीं. सैकड़ों की संख्या में टीवी चैनल 24 घंटे ये काम करते हैं और इन आरोपों के प्रमाण सुलभ कराते रहते हैं.

सवाल है, वे ऐसा क्यों करते हैं? इस सवाल के कई जवाब हैं. पहला जवाब तो पत्रकारिता की तरफ से ही आना चाहिए. 24 घंटे के टीवी चैनलों की यह जरूरत और मांग है कि उसकी खपत के लिए खबर को नये सिरे से परिभाषित किया जाए. लेकिन यह काम कौन करेगा? मीडिया में ऐसे बड़े संपादक नहीं दिखते जिनकी अभिरुचियों का दायरा समाज, संस्कृति, शिक्षा, भाषा और संप्रेषण के बारीक रेशों तक जाता हो. वे राजनीति की मोटी खबरों के बाद सिनेमा, क्रिकेट या दूसरे तमाशों की तरफ मुड़ जाते हैं. यह काम भी वे इतने सतही ढंग से करते हैं कि मीडिया अचानक अपनी उपयोगिता जैसे खो देता है.

एक लिहाज से यह अपनी नाकाबिली है जिसे छिपाने के लिए मीडिया टीआरपी की होड़ की दलील देता है. निश्चय ही टीआरपी की एक होड़ है और हर बुधवार टीवी चैनलों के भीतर अलग-अलग कार्यक्रमों के जिम्मेदार लोग ऐसे बच्चों की तरह सहमे बैठे होते हैं जिनका रिजल्ट निकलना हो. लेकिन यह दबाव दरअसल इसलिए बड़ा हो गया है कि माध्यम में वह संजीदगी नहीं बची है जो अपने प्रतिबद्ध दर्शक बनाए या दूसरों को बताए कि असली खबर असल में दिखाए जाने वाले तमाशों से बाहर है.

लेकिन यह मीडिया के ट्रिवियलाइजेशन- क्षुद्रीकरण- की पहली वजह है, अंतिम नहीं. दरअसल यह अयोग्यता मीडिया को जिस तरह टीआरपी की होड़ में ले जाती है, उसी तरह उसे दूसरे दबावों का आसान शिकार बना डालती है. अचानक इसी मोड़ पर ऐसे बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं जो पूंजी और सत्ता के हितों के रखवालों की तरह काम करते हैं. सत्ता और पूंजी को भी यह खेल रास आता है इसलिए वह अपने चैनल शुरू करने से लेकर दूसरों के चैनलों में घुसपैठ करने तक का काम बड़ी आसानी से करती है. इसी के बाद मीडिया अचानक गैरजिम्मेदार भी दिखने लगता है, गैरभरोसेमंद भी- वह किसी की तरफ से खेलता नजर आता है और किसी की तरफ से बोलता, वह किसी को बचाता और किसी को पीटता दिखाई पड़ता है. जब इन सबका वक्त नहीं रहता तो वह फिर सिनेमा, क्रिकेट और अंधविश्वास के अपने जाने-पहचाने शगल में लग जाता है और जस्टिस काटजू जैसे विद्वतजनों की फटकार सुनता है.

लेकिन जस्टिस काटजू फटकार कर संतुष्ट नहीं हैं, उन्हें कानून का चाबुक भी चाहिए. वे मानते हैं कि मीडिया पर कोई नियंत्रण नहीं है और वह अपने विशेषाधिकारों का दुरुपयोग कर रहा है. मगर क्या ये दोनों बातें सच हैं? हकीकत इसके ठीक उलट है. देश में मीडिया के लिए अलग से कोई कानून नहीं है, न उसे कोई अलग अधिकार हासिल है. अभिव्यक्ति की आजादी का जो और जितना अधिकार इस देश के किसी भी नागरिक को हासिल है, उतना ही मीडिया को भी है. यह अधिकार भी बिल्कुल निरंकुश नहीं है. मीडिया को नियंत्रण में रखने के लिए मानहानि से लेकर अपशब्द कहने के खिलाफ और अश्लीलता विरोधी कई कानून हैं. सरकारी गोपनीयता कानून भी इसी मीडिया नियंत्रण का हिस्सा है. इन कानूनों का इस्तेमाल भी खूब होता रहा है.

सवाल है, फिर नया कानून क्यों चाहिए और किसे चाहिए? मीडिया ऐसे कौन-से नये अपराध कर रहा है जिसे पुराने कानूनों के तहत रोका न जा सकता हो? अगर सरकार को लगता है कि समाचार चैनल समाचार का लाइसेंस लेकर कुछ और दिखा रहे हैं तो उसे पूरा हक है कि वह इन चैनलों के लाइसेंस रद्द कर दे. लेकिन वह ऐसा नहीं करती क्योंकि उसे कुछ और दिखाने वाले चैनलों से नहीं, असल में समाचार दिखाने वाले चैनलों से परेशानी है.

दरअसल मीडिया को कानून से कोई छूट या रियायत सबसे ज्यादा वे लोग देते या देना चाहते हैं जो मीडिया का सम्मान नहीं, उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं. मीडिया में जो भ्रष्टाचार आता है वह भ्रष्ट राजनीति और भ्रष्ट पूंजी के गठजोड़ से आता है. हम सबको मालूम है कि इस पूंजी ने अपनी तरफ से मीडिया का वर्ग चरित्र बदलने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. कुछ इस वजह से भी सत्ता, पूंजी और मीडिया का यह गठजोड़ पहले से आसान हुआ है. लेकिन मुश्किल यह है कि हर दूसरे माध्यम की तरह मीडिया भी अपना एक स्वायत्त ‘स्पेस’ बनाता है जहां उसके अपने नियम और दबाव काम करते हैं. इसलिए कोई गठजोड़ एक सीमा से आगे नहीं चलता. यह भारत में लोकतांत्रिक चेतना के विकास का नतीजा है कि अंततः असली खबर लोगों तक पहुंच जाती है- चाहे वह छत्तीसगढ़ में पिट रहे नक्सलियों की तकलीफ हो या जंतर-मंतर पर चल रहा अण्णा का आंदोलन. मीडिया चाहे जितने तमाशे करे, जब खबर की घड़ी आती है तो वह खबर के साथ खड़ा हो जाता है- यह उसे उसकी परंपरा ने सिखाया है जिसमें यह समझ भी शामिल है कि लोगों को इस असली खबर का इंतजार होगा.

दिलचस्प यह है कि ऐसे ही मौकों पर सत्ता और पूंजी को मीडिया का गैरजिम्मेदार चेहरा याद आता है. सरकार को हाल के दिनों में मीडिया को नियंत्रित करने वाले कानून की याद तब आई जब अण्णा हज़ारे के आंदोलन को मीडिया की मदद मिली. जाहिर है, मीडिया के खिलाफ अगर कोई कानून बनेगा तो उसका इस्तेमाल असली गुनहगारों के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता पर शिकंजा कसने के लिए होगा जो व्यवस्था को आईना दिखा रही होगी, उसके लिए असुविधाजनक स्थितियां और सवाल खड़े कर रही होगी.

जस्टिस काटजू की अदालत में मीडिया की बेईमानी तो पहुंचती है, उसके पहले सत्ता के अंतःकक्षों में चलने और पलने वाला वह गठजोड़ नहीं दिखता जो दरअसल मीडिया के मूल और प्रतिरोधमूलक चरित्र को बदलना चाहता है. निश्चय ही यह गठजोड़ टूटना चाहिए, लेकिन वह कड़े कानूनों से नहीं तोड़ा जा सकता- उसकी लड़ाई और बड़ी है. दरअसल यह अनुभव बहुत स्पष्ट हो चुका है कि कड़े कानून ज्यादातर सत्ता को निरंकुश बनाते हैं. एएफएसपीए यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून कश्मीर में आतंकियों को नहीं, आम लोगों को डराता है. टाडा और पोटा से आतंकवाद नहीं मिटा, उनकी वजह से पकड़े गए बेकसूर लोगों से भरी जेलें आतंकवाद की नयी पौधशालाओं में बदल गईं.

लेकिन अब लोग मीडिया को नियंत्रित करने के लिए नये कानून चाहते हैं और इसकी प्रस्तावना इस झूठ के साथ लिखी जा रही है कि मीडिया को रोकने के लिए तो कोई कानून ही नहीं है. जाहिर है, यह झूठ मीडिया को कमजोर करने के लिए बोला जा रहा है. जहां तक मीडिया की अपनी गलतियों का सवाल है, वे काफी बड़ी हैं, लेकिन उन्हें अंततः अंदर से ही साफ करने का रास्ता निकालना होगा. कानून के नाम पर इसकी शल्य क्रिया करने वाले असल में हाथ में नश्तर नहीं, खंजर लेकर खड़े हैं और उनकी निगाह शरीर में पल रहे किसी जख्म पर नहीं, उस गर्दन पर है जो सारे घावों के बाद फिर भी तनी हुई है. लेकिन यह गर्दन तनी रहे और पत्रकारिता सबसे आंख मिलाने लायक बनी रहे, इसके लिए हमें कुछ काटजू को भी सुनना होगा, और वे जैसा सोचते हैं वैसा पत्रकार बनना होगा. (मूलतः तहलका पत्रिका में प्रकाशित. तहलका से साभार)
(लेखक वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार हैं और एनडीटीवी इंडिया में कार्यरत हैं)

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