गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

न्यूज चैनलों के पत्रकारों के हाल



Friday, August 05, 2011


दोनों सिरों से जल रही है न्यूज चैनलों के पत्रकारों के जीवन की मोमबत्ती


बदतर सेवाशर्तों और कामकाज की परिस्थितियों के कारण बीमार हो रहे हैं न्यूज चैनलों के पत्रकार  

तीसरी और आखिरी किस्त

यही नहीं, चैनलों में इन दबावों और तनावों के कारण पत्रकारों के स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है. अनिल चमडिया के नेतृत्व में मीडिया स्टडीज ग्रुप ने कोई दो साल पहले मीडिया में काम करनेवाले पत्रकारों के कामकाज की परिस्थितियों और उनके स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए सर्वेक्षण किया था जिसके नतीजे बहुत चौंकानेवाले थे. इस सर्वेक्षण के मुताबिक, करीब १२ फीसदी पत्रकार अपनी अनियमित दिनचर्या और काम के तनाव आदि के कारण डायबिटीज के शिकार हैं.

कंप्यूटर पर लगातार काम करने के कारण लगभग १४ फीसदी पत्रकार आर्थोपीडिक यानि पीठ दर्द और आर्थराइटिस आदि से पीड़ित हैं. करीब १२ फीसदी को आँखों की बिमारी है. करीब ६२ फीसदी पत्रकारों को खाने का समय या समय पर खाने का मौका नहीं मिलता है, इसके कारण १३ फीसदी को पाचन सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.


इस सर्वेक्षण के मुताबिक, लगभग ६२ फीसदी पत्रकारों को हर दिन आठ घंटे या उससे अधिक काम करना पड़ता है जिसका असर यह हुआ है कि उनमें से कोई ११ फीसदी मानसिक बिमारियों जैसे डिप्रेशन आदि का शिकार हो गए हैं. करीब १४ फीसदी को ह्रदय सम्बन्धी और बी.पी की समस्या से जूझना पड़ रहा है.

लेकिन सबसे अधिक तकलीफ की बात यह है कि उनमें से ४८ फीसदी पत्रकारों को इन बिमारियों के इलाज के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पता है. इसकी वजह छुट्टी न मिल पाना है. इस सर्वेक्षण के अनुसार, ११ फीसदी पत्रकारों को कोई साप्ताहिक अवकाश भी नहीं मिलता. केवल १७ फीसदी पत्रकारों को सप्ताह में दो दिन की छुट्टी का सौभाग्य मिलता है.

हालांकि यह सर्वेक्षण प्रिंट और टी.वी सहित सभी तरह के माध्यमों में काम करनेवाले पत्रकारों पर किया गया था. लेकिन टी.वी. न्यूज चैनलों के पत्रकारों से खुद की बातचीत के आधार पर कह सकता हूँ कि चैनलों में हालात और खराब हैं. मैं ऐसे कई टी.वी कर्मियों को जानता हूँ जो बहुत कम उम्र में बी.पी और डायबिटीज सहित स्पोंडीलाइटीस जैसी बिमारियों/समस्यायों के शिकार हो गए हैं.

इनमें से कई मेरे छात्र रहे हैं. कुछ को मजबूरी में नौकरियां तक छोड़नी पड़ी हैं. निश्चय ही, इसके लिए काफी हद तक चैनलों के अंदर की स्थितियां और कामकाज का माहौल जिम्मेदार है. कई बार ऐसा लगता है कि न्यूज चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों के जीवन की मोमबत्ती दोनों सिरों से जल रही है.

इसके बावजूद इसपर चर्चा करने के बजाय चैनलों के प्रबंधक और कई संपादक यह कहकर इसे ग्लैमराइज करने की कोशिश करते हैं कि न्यूज चैनलों में काम करने का दबाव और तनाव ही टी.वी पत्रकारिता का असली एक्साइटमेंट है. लेकिन यह एक्साइटमेंट अब जानलेवा होने लगा है.

जाहिर है कि यह न टी.वी कर्मियों के लिए अच्छा है और न चैनलों के लिए. अगर यह स्थिति सुधरी नहीं तो चैनलों के लिए योग्य और प्रतिभाशाली पत्रकारों को आकर्षित करना मुश्किल होने लगेगा. यही नहीं, इसका असर चैनलों के कंटेंट पर भी पड़ेगा. हम आम दर्शकों के लिए यह इसलिए भी गहरी चिंता का कारण होना चाहिए.

समय आ गया है जब इस मसले पर टी.वी पत्रकारों और न्यूज चैनलों के प्रबंधकों के बीच खुलकर बातचीत हो जिसमें सरकार और पत्रकार यूनियनों के लोग भी हिस्सा लें. सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती है. पहली बात तो यह है कि टी.वी पत्रकारों को भी श्रमजीवी पत्रकार कानून के दायरे में लाया जाए और उनकी तनख्वाहें भी अख़बारों के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन आयोग के द्वारा तय की जाएँ.

इसके अलावा चैनलों में पत्रकारों को अपनी यूनियन बनाने का अधिकार भी मिलना चाहिए. यह ठीक है कि आज अधिकांश पत्रकार संगठन और यूनियनें अप्रभावी हो चुकी हैं या प्रबंधन के हाथ की कठपुतली बन चुकी हैं लेकिन इसके बावजूद अधिकांश अख़बारी प्रतिष्ठानों में यूनियनें हैं.

लेकिन क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि किसी भी चैनल में पत्रकारों की कोई यूनियन नहीं है? सवाल है कि क्या चैनल श्रम कानूनों से ऊपर हैं? अगर नहीं तो उनमें सभी श्रम कानूनों और श्रमजीवी पत्रकार कानून की खिल्ली क्यों उडाई जा रही है? यहाँ यह कहना जरूरी है कि ये बहुत महत्वपूर्ण सवाल हैं. इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है.

मीडिया अगर लोकतंत्र का चौथा खम्भा है तो उसके अंदर क्या चल रहा है और उसके कर्मियों का क्या हाल है, यह हम सबकी चिंता का विषय होना चाहिए. यह चुप्पी अब टूटनी चाहिए क्योंकि अगर हमने खबर देनेवालों की खबर नहीं रखी तो उनकी खबर और कौन लेगा?

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चलते-चलते

ये डी.डी न्यूज में क्या हो रहा है?

 खबरें आ रही हैं कि सरकारी न्यूज चैनल डी.डी न्यूज के अस्थाई और संविदा पर नियुक्त पत्रकार कम वेतन और बदतर सेवाशर्तों के विरोध में पिछले तीन दिनों से काली पट्टी बांधकर अपना क्षोभ जता रहे हैं. आन्दोलनकारी पत्रकारों के मुताबिक, उनका वेतन बहुत कम है, यहाँ तक कि कुछ लोगों का वेतन छह हजार रूपये है. ऊपर से पिछले ढाई वर्षों से उनके वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई है. यही नहीं, पी.एफ-बीमा-चिकित्सा व्यय आदि की सुविधा नहीं है, छुट्टियों का कोई सिस्टम नहीं है और उनकी शिकायतों की कहीं कोई सुनवाई नहीं है. बताया जाता है कि ऐसे पत्रकारों की संख्या ४०० के आसपास है.  

निश्चय ही, यह बहुत चिंता और अफसोस की बात है. अगर सार्वजनिक प्रसारक ही पत्रकारों का शोषण करेगा तो निजी चैनलों में सुधार और बेहतरी की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में कहा है कि सरकार को एक अच्छे और आदर्श नियोक्ता के रूप में पेश आना चाहिए ताकि वह एक उदाहरण पेश कर सके. लेकिन डी.डी न्यूज के मामले में सरकार के रवैये से निराशा होती है कि वह आदर्श नहीं बल्कि बदतर नियोक्ता के रूप में निजी क्षेत्र को भी ऐसे ही व्यवहार के लिए प्रोत्साहित कर रही है.

क्या यह उम्मीद करें कि सरकार खासकर प्रसार भारती जल्दी से जल्दी अपने पत्रकारों के दुःख-दर्द को सुनेगी और स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए उपाय करेगी?   

('कथादेश' के अगस्त अंक में प्रकाशित स्तम्भ की तीसरी और आखिरी किस्त)

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