शनिवार, 3 दिसंबर 2011

राजेन्द्र यादव- हंस 25 year

निसंदेह उमेश जी हंस का लगातार
by anamisharanbabal - 08/02/2011 - 14:48

निसंदेह उमेश जी हंस का लगातार प्रकाशित होना एक चमत्कार से कम नहीं है। राजेन्द्र यादव को लेकर एक हजार गप्प और दो हजार रोमांचत ( इसे रोमांटिक) भी कह सकते है। खरा खरा बोलने में यकीन ( मगर हर जगह और हर समय तो कतई नहीं) रखने वाले यादव हिन्दी को खुशवंत सिंह है। ये अश्लीलता और सेक्स पुराण में तो खुशवंत के भी बाप ( क्षमा करना यादव जी खुशवंत का बाप तो गद्दार था, मगर यहां पर केवल मुहाबरे का यूज कर रहा हूं) ) साबित हो सकते हैं। खुशवंत से तुलना करना मैं समझता हूं कि इससे उसको ज्यादा सम्मान देना है। जबकि दूसरो के घरों में और कंचूकी में ताक झांक करने के सिवा खुशवंत ने किया क्या है। खैर दारू पीने तो आप दोनें एक समान है। फिर भी खुशवंत से बेहतर हैं आप यादव जी। दारू पीना और बुरा मानो या भला ( यह अलग बात है कि इसी एक कालम से वो इतना कमा लेते हैं जितने से हंस का बेड़ा पार हो जाता) लेखन के सिवा । मगर आपने भले कहानी उपन्यास इस दौरान नहीं लिखा, मगर कथा साहित्य को तो अमीर किया ही है। हंस के चलते बहुत नए कथाकार बने(ज्यादातर लेखिकाएं) । आपने भी 8-10 पेजू संपादकीय के बहाने लिटरेचत की खूब नेतागिरी की। कभी कभी मैं सोचता हूं यादव जी कि हंस ने आपको जीवनदान दिया। अभी तक नौजवान और कामुक (रसिक तो हो ही) बने या बनाए रखने में भी हंस ने अश्वगंधा या शिलाजीत सा काम किया। आपकेो मन में खुशलंत बनने की हसरत हो सकती है, क्योंकि (तमाम बुराईयों के बाद भी आज वो सर्वमान्यतो है ही, एक गद्दार के संतान होने के बाद भी) हंस से केवल एक ही आदमी ने फायदा उठाया और वो है आप। प्रेमचंद बाबू तो आटा मशाला के चक्कर में ही खप गए। हंस को एक विरासत के रूप में भी नहीं संजो सके, मगर हंसराज कालेज की पत्रिका हंस को राजेन्द्र यादव ने बड़ी चालाकी से प्रेमचंद की पत्रिका बना कर पिछले 25 साल से प्रेमचंद के नाम पर दाल रोटी( अब तो एक दिन में दो दो बार जहाज से उड़कर सेमिनार में यादव जी बोलते हुए अपनी जेब गरम करते है। खा रहे है। खुशवंत ने जिंदगी मे नारियों का खूब रसास्वादन लिया या किया, इस मुकाबले में भी आप थोड़ा बहुत ही पीछे हो (आगे भी हो सकते हैं वो अंग्रेजी लेखक है ना तो सबकुछ दिखता है, मगर है, हम हिन्दी वाले छिपकर बहुत कुछ हंगामा कर जाते हैं और दूसरों को पता भी नहीं लग पाता। खैर कुछ बात लंबी हो गई, मगर सहीं हात तो यह है कि तमाम हरामजादगियों और बदमाशियों के बाद भी भले ही लोरप्रियता में आप खुशवंत के नाक कान ना काट पाए, मगर सकारात्मक और सार्थक काम में आप खुशवंत से लाखो किलोमीटर आगे है। आपसे कई मुलाकात और बातचीत का मौका मिला, मगर मैं लेखन से दूर अनाड़ी आदमी हूं। हंस देख लेता था(अभी भी कभी कभार) मगर यह 500 प्रतिशत सही है कि आपने हंस को 25साल खसीट दिया । यह कमाल भी सचिन के 50 शतक से कम हैरतअंगेज नहीं है। इसके लिए नोबल ला सही मगर एक बड़ा पुरस्कार तो दिया ही जाना चाहिए कि जो काम बिरला टाटा अबानी डालमिया तक नहीं कर सके वो काम बड़ी खूबी के साथ यादव जी ने कर दिखाया। हिन्दी की लाज बचाने के लिए तो कोई सम्मान होना ही चाहिए। जुबानी (बक....) करने वाले तो नामवग या खुशवंत जैसे हर गली मोहल्ले में मिल जाएंगे, मगर 25 साल से हंस को जीवित रखने का दम केवल यादव में ही था जो दिखाया वो भी 80 सील की उम्र मे। (इस तारीफ से फूल कर कूप्पा ना होना यादव जी क्योंकि मैं वास्तव में आपका चारण नहीं करने वाला।

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