शनिवार, 17 दिसंबर 2011

फिल्म पत्रकारिता





चर्चित लेखिका चित्रा मुद्गल से मधु अरोड़ा की बातचीत [साक्षात्कार]

10 दिसम्बर, 1944 को चेन्नई में जन्मी चित्रा मुद्गल वर्तमान हिन्दी साहित्य में एक सम्मानित नाम हैं। मुंबई से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर चित्रा जी छात्र जीवन से ही ट्रेड यूनियन से जुड़ कर शोषितों के लिये कार्यरत रही हैं। अमृतलाल नागर और प्रेमचन्द से प्रभावित चित्रा जी को लिखने की प्रेरणा मैक्सिम गोर्की के प्रसिद्ध उपन्यास "माँ" को पढ़ने के बाद मिली। अब तक वे कई लघुकथायें और चार उपन्यास - "आवाँ", "गिलिगद्दू", "एक जमीन अपनी" व "माधवी कन्नगी" लिख चुकीं हैं। इसके अतिरिक्त उनके बाल-कथाओं के पाँच संग्रह भी प्रकाशित हैं। चित्रा मुद्गल को विभिन्न पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया है जिनमें "आवाँ" के लिये २००० का इंदु शर्मा कथा सम्मान तथा २००१-०२ का उत्तरप्रदेश साहित्य भूषण प्रमुख हैं। प्रस्तुत है लेखिका चित्रा मुद्गल से मधु अरोरा की बातचीत:-  आगे पढ़ें... →

सच्‍ची घटनाएं कभी अच्‍छी कहानियों का मसाला नहीं बनतीं [कहानी विधा पर एक विमर्श] - सूरजप्रकाश

प्रेम चंद नें कहानी के प्रमुख लक्षणों को बताते हुए लिखा है “कहानी एसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य होता है।उसके चरित्र, उसकी शैली तथा उसका कथाविन्यास सभी उसकी एक भाव को पुष्ट करते हैं। उपन्यास की भाँति उसमें मानव जीवन का संपूर्ण वृहत रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता न उसमें उपन्यास की भाँति सभी रसों का सम्मिश्रण होता है, वह एसा रमणीक उद्यान नहीं जिसमें भाँति भाँति के फूल-बेल बूटे सजे हुए हैं, बल्कि वह एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है। कहानी की मूलभूत विषेशता पर प्रेमचंद का कहना है कि आगे पढ़ें... →

चर्चित लेखिका चित्रा मुद्गल से मधु अरोड़ा की बातचीत [साक्षात्कार]

10 दिसम्बर, 1944 को चेन्नई में जन्मी चित्रा मुद्गल वर्तमान हिन्दी साहित्य में एक सम्मानित नाम हैं। मुंबई से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर चित्रा जी छात्र जीवन से ही ट्रेड यूनियन से जुड़ कर शोषितों के लिये कार्यरत रही हैं। अमृतलाल नागर और प्रेमचन्द से प्रभावित चित्रा जी को लिखने की प्रेरणा मैक्सिम गोर्की के प्रसिद्ध उपन्यास "माँ" को पढ़ने के बाद मिली। अब तक वे कई लघुकथायें और चार उपन्यास - "आवाँ", "गिलिगद्दू", "एक जमीन अपनी" व "माधवी कन्नगी" लिख चुकीं हैं। इसके अतिरिक्त उनके बाल-कथाओं के पाँच संग्रह भी प्रकाशित हैं। चित्रा मुद्गल को विभिन्न पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया है जिनमें "आवाँ" के लिये २००० का इंदु शर्मा कथा सम्मान तथा २००१-०२ का उत्तरप्रदेश साहित्य भूषण प्रमुख हैं। प्रस्तुत है लेखिका चित्रा मुद्गल से मधु अरोरा की बातचीत:-  आगे पढ़ें... →

सच्‍ची घटनाएं कभी अच्‍छी कहानियों का मसाला नहीं बनतीं [कहानी विधा पर एक विमर्श] - सूरजप्रकाश

प्रेम चंद नें कहानी के प्रमुख लक्षणों को बताते हुए लिखा है “कहानी एसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य होता है।उसके चरित्र, उसकी शैली तथा उसका कथाविन्यास सभी उसकी एक भाव को पुष्ट करते हैं। उपन्यास की भाँति उसमें मानव जीवन का संपूर्ण वृहत रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता न उसमें उपन्यास की भाँति सभी रसों का सम्मिश्रण होता है, वह एसा रमणीक उद्यान नहीं जिसमें भाँति भाँति के फूल-बेल बूटे सजे हुए हैं, बल्कि वह एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है। कहानी की मूलभूत विषेशता पर प्रेमचंद का कहना है कि ...  आगे पढ़ें... →

फिल्म पत्रकारिता का व्यावहारिक सच [श्याम माथुर से बातचीत] - अविनाश वाचस्पति


फिल्मों को समाज का दर्पण तो नहीं कहा जा सकता परन्तु वे समाज से पूरी तरह से कटी हुई भी नहीं होतीं। बहुतेरी बार फिल्मों के जरिए सामाजिक बदलाव के चौंकानेवाले तथ्य उभरकर सामने आते हैं, ऐसे में उन्हें सिर्फ मनोरंजन मानकर उपेक्षित नहीं किया जा सकता। जितना पुराना सिनेमा का इतिहास है उतना ही पुराना फिल्म पत्रकारिता का इतिहास भी है परन्तु विडम्बना यह भी है कि फिल्म पत्रकारिता अभी भी अभिनेत्रियों के ग्लेमर, उनकी निजी जिंदगी के बनते बिगड़ते रिश्ते, कलाकारों के आपसी टकराव, पार्टी मुहूर्त आदि से आगे बढ़ ही नहीं पायी है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं में फिल्मों के लिए बाकायदा प्रतिदिन के पृष्ठ निर्धारित हैं फिर भी फिल्म पत्रकारिता को अभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया है। ऐसे में फिल्म पत्रकारिता के गंभीर सरोकार लिए श्याम माथुर की हालिया प्रकाशित पुस्तक सिने पत्रकारिता बहुत कुछ सोचने को विवश करती है और विमर्श के नए रास्ते खोलती है। सिने पत्रकारिता की उबाऊ सैद्धान्तिक व्याख्या से इतर पुस्तक व्यावहारिक रूप में सिने पत्रकारिता की समझ विकसित करती है। संप्रेषण के स्तर पर पुस्तक में सिनेमा के इतिहास, सिने समीक्षा, आलोचना, सिने समाचार, सिनेमा की कलात्मकता, उसके गीत-संगीत पक्ष आदि की तमाम जानकारियां ऐसी हैं जो पाठक को इनके विश्लेषण की रचनात्मकता से स्वतः ही जोड़ती हैं। फिल्म पत्रकारिता से जुड़े लोगों के साथ ही पुस्तक सिनेमा में रूचि रखने वाले शोधकर्ताओं, अध्येताओं और सामान्य पाठकों के लिए भी बेहद उपयोगी है। राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर द्वारा प्रकाशित 240 पृष्ठों की इस पुस्तक में यथासंभव श्वेत-श्याम छायाचित्र भी दिए गए हैं। कीमत 120 रू. ऐसी है जो सहज ही इसे क्रय करने हेतु प्रेरित करती है।
इस पुस्तक को सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग ने भारतेंदु हरिशचंद्र पुरस्कारों के तहत प्रथम पुरस्कार के लिए चुना है, 6 जनवरी को नई दिल्ली में श्या म माथुर को यह पुरस्कार प्रदान किया जाएगा, इस अवसर पर हमने श्यायम माथुर से बातचीत की

इस पुस्तक का कलेवर किस प्रकार का है
पुस्तक सिने पत्रकारिता में सिनेमा की परम्परा, उसके जन्म, कथानक, भाषा और व्याकरण, संगीत, अन्य कलाओं से संबंध आदि गहराई से जानकारी देने की कोशिश की गई है और सिर्फ जानकारियां ही नहीं दी हैं बल्कि इनका विश्लेषण भी करने का प्रयास किया गया है। फिल्मों के बारे में मौलिक मान्यता के साथ उनकी रचना प्रक्रिया के विभिन्न आयामों पर पुस्तक में दी गयी टिप्पणियां न सिर्फ रोचक हैं बल्कि इनकी सहायता से फिल्म पत्रकारिता की तकनीक का संप्रेषण भी सहज होता है। विभिन्न दशकों में आयी फिल्मों, उनके निर्देशक, लेखक, गीतकार, संगीत निर्देशक, अभिनेता, अभिनेत्रियों की चर्चा के अंतर्गत पुस्तक में फिल्मों का एक प्रकार से समाजशास्त्रीय अध्ययन भी प्रस्तुत किया है। यह अध्ययन ऐसा है जिससे फिल्म पत्रकारिता के अंतर्गत महत्वपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

सिने पत्रकारिता पर पुस्तक लिखने की प्रेरणा आपको कैसे मिली
आम तौर पर सिने पत्रकारिता को बहुत ही हल्के तौर पर लिया जाता है और न सिर्फ मीडिया में बल्कि बाहर भी लोग यही मानते हैं कि सिने पत्रकारिता सबसे आसान और दिलचस्प है जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। सिनेमा को दुनिया की सबसे महान कला का दर्जा यूं ही नहीं मिल गया है। अनेकानेक कलाकारों और फिल्मकारों की अथक मेहनत के बाद सिनेमा कला को यह दर्जा मिला नहीं हासिल किया गया है। दुनिया में जितनी भी कलाएं मौजूद हैं उन सबका निचोड़ आपको सिने कला में मिलता है ऐसी सूरत में यह बेहद जरूरी है कि हम सिनेमा के प्रति अपने नजरिए को बदलें और इस माध्यम को पर्याप्त गंभीरता से लें इसी दिशा में मैंने अपनी तरफ से यह तुच्छ प्रयास किया है। आज मैं यह कह सकता हूं कि यह पुस्तक फिल्म पत्रकारिता के साथ ही फिल्मों में रूचि रखने वाले लोगों के लिए बेहद उपयोगी संदर्भ ग्रंथ साबित होगी।

सिनेमा संबंधी सामग्री को आपने गंभीर शैली के साथ पेश किया है अथवा आम सिने प्रेमी को ध्यान में रखा है
कुल 12 अध्यायों में विभक्त पुस्तक की खास बात यह है कि सामग्री हर स्तर के पाठकों के लिए गेय है। सिनेमा इतिहास के प्रथम फिल्म समीक्षक प्रख्यात रूसी कथाकार मैक्सिम गोर्की की समीक्षा शैली के बहाने सिने पत्रकारिता के आंतरिक आरंभिक आयामों पर जानकारी दी गई है। इस जानकारी में फ्रांसुआ त्रुफो, ज्यां लुक गोदार, जॉक रिबेका द्वारा फिल्मों के बारे में लिखे गए गंभीर लेखों को भी शामिल किया है और सिनेमा की प्रचलित धारणाओं को तोड़े जाने का प्रयास करते हुए फिल्म पत्रकारिता की गंभीरता के विषद् विमर्श के रास्ते भी खोलने की कोशिश की है।

आपकी यह पुस्तक फिल्म पत्रकारिता के इतिहास पर कितनी रोशनी डालती है
पुस्तक में फिल्म पत्रकारिता के इतिहास पर पर्याप्त सामग्री का समावेश किया गया है। तीस के दशक में प्रकाशित कुछेक फिल्म पत्रिकाओं यथा फिल्म लैण्ड, सिनेमा एन्युअल, द मूविंग पिक्चर, सिनेमा समाचार के बाद की फिल्म पत्रिकाओं रंगभूमि, चांदनी, बिजली, चित्रपट के साथ ही बाद की प्रकाशित सिने ब्लिट्ज, स्क्रिन, सचित्र रंगभूमि, फिल्मी कलियां, फिल्मी दुनिया, चित्रलेखा, आस-पास, पालकी, मेनका, फिल्म रेखा, फिल्म अप्सरा, स्टारडम आदि पत्र-पत्रिकाओं के बारे में प्रामाणिक सामग्री देने का प्रयास किया गया है। पुस्तक में फिल्म पत्रकारिता के बदलते आयामों पर भी गहराई से प्रकाश डाला गया है। पत्र-पत्रिकाओं में फिल्मों, अभिनेता-अभिनेत्री, गीत-संगीत पक्ष, निर्देशकीय पहलू, साउंड इफेक्ट आदि का विवरण देने के पीछे मंतव्य यह है कि पाठक सिनेमा को समग्र रूप में समझे।

मौजूदा दौर की सिने पत्रकारिता को पुस्तक किस रूप में देखती है
पुस्तक में स्वाधीनता से पहले और बाद के फिल्म पत्रकारिता के परिदृश्य का विश्लेषणात्मक खाका खींचा गया है, इससे फिल्मों का समाजगत अनुभव, अन्वेषण भी स्वतः ही होता है। इसी संदर्भ में पुस्तक में एक जगह टिप्पणी है-इक्कीसवीं सदी में आम फिल्मी पत्रिकाएं अपने सामर्य्च का प्रयोग इस सवाल का जवाब ढूंढने में कर रही हैं कि सैफ अली खान की जिंदगी में आने वाली तीसरी महिला करीना कपूर ने अपने प्रेमी शाहिद कपूर से आखिर क्यों किनारा कर लिया। इस टिप्पणी के क्रम में जब हम यह कहते हैं कि प्रारंभिक दौर से लेकर अब तक फिल्म पत्रकारिता में विशेष कोई अन्तर नहीं आया है तो इस कथन में अर्न्तननिहित सच को भी सहज ही समझा जा सकता है।

एक सिने समीक्षक की प्रतिबद्धता के बारे में आप क्या कहेंगे
आज हमें इस सच्चाई को तो स्वीकार करना होगा कि सिनेमा के बारे में गंभीर और विश्लेषणात्मक लेखन के प्रयास काफी कम हो रहे हैं। इसी लिहाज से समीक्षा के मानदंड और उसकी भाषा तथा लेखन के तेवर पर सामग्री जुटाने का प्रयास किया गया है। खास बात यह भी है कि ताराचंद बड़जात्या, ऋषिकेश मुखर्जी, एन.सी. सिप्पी जैसे फिल्मकारों के जरिए फिल्म समीक्षा और समालोचना के महीन फर्क को भी रेखांकित किया गया है; कुछेक फिल्मों की समीक्षा और समालोचना करते फिल्म गॉसिप, समाचार, इन्टरव्यू आदि विधाओं पर भी चर्चा की गई है। विशेष रूप से फिल्म पत्रकारिता में प्रवेश करने वाले युवाओं के लिए इसमें शॉट, सीन, सिक्वेंस, कैमरा मूवमेंट, एंगल, ट्रेकिंग, एडिटिंग, मोंटाज, साउंड जैसी शब्दावली के जरिए फिल्म पत्रकारिता के आधारभूत तत्वों की समझ का भी संप्रेषण किया गया है। इस तरह की चर्चा से फिल्म पत्रकारिता के गंभीर सरोकारों से पाठक का स्वतः ही सरोकार होने लगता है।

नए सिने पत्रकारों से आप क्या कहना चाहेंगे
यूं तो मैं भी अपने आपको सिनेमा का विद्यार्थी ही मानता हूं और इसी नाते फिल्म पत्रकारिता को अपनाने वाले विद्यार्थियों से यही अपेक्षा करता हूं कि वे सिनेमा जैसे प्रभावशाली माध्यम की महत्ता को समझें और इस माध्यम का सार्थक उपयोग करें। इस सच्चाई के मर्म को पहचानने की कोशिश भी करें कि आखिर परछाइयों के संसार में ऐसा क्या सम्मोहन है जो लोगों को यह कला अपने बेहद करीब नजर आती है, क्यों आज ज्यादातर लोगों के लिए सिनेमा जिंदगी को बेहद करीब से देखने का जरिया है, अगर इन सवालों के ठीक-ठीक जवाब हम तलाश पाएं तो हमें सिनेमा के मर्म को समझने में आसानी हो जाएगी।
***** 

14 टिप्पणियाँ:

  1. अविनाश वाचस्पति says
    प्रकाशन विभाग द्वारा आयोजित एक समारोह में मंगलवार 6 जनवरी 2008 को दोपहर 12 बजे सूचना एवं प्रसारण व विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा शास्‍त्री भवन में पहली मंजिल स्थित पत्र सूचना कार्यालय के प्रेस कांफ्रेस हॉल में भारतेन्‍दु हरिश्‍चन्‍द्र पुरस्‍कार प्रदान करेंगे। श्री श्‍याम माथुर को उनकी पुस्‍तक सिने पत्रकारिता के लिए प्रथम पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जा रहा है।
    इसके अतिरिक्‍त भी कई लेखकों को पुरस्‍कार प्रदान किए जायेंगे।


    इसी अवसर पर प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित वार्षिक संदर्भ ग्रंथ का लोकार्पण भी किया जायेगा।
    बेनामी says
    Nice interview.


    Alok Kataria
    नंदन says
    श्याम माथुर जी के विचार जान कर व यह फीचर पढ कर अच्छा लगा। अविनाश जी बधाई।
    रितु रंजन says
    सिने-पत्रकारिता पर उपयोगी जानकारी है। पुस्तक पढने की इच्छा जागृत हो गयी है।
    अभिषेक सागर says
    अच्छा आलेख व साक्षात्कार है। बधाई।
    निधि अग्रवाल says
    श्याम माथुर जी को बधाई एवं शुभकामनायें। अविनाश जी धन्यवाद इस प्रस्तुति के लिये।
    सुभाष नीरव says
    श्याम माथुर जी को बधाई ! अविनाश का इंटरव्यू अच्छा है।
    PRAN SHARMA says
    SHYAM MATHUR SE SHRI AVINASH
    VACHASPATI KAA SANVAAD BAHUT
    HEE ROCHAK AUR GYAANVARDHAK
    RAHA.BHARTENDU HARISH CHANDRA
    KA PRATHAM PURASKAAR PAANE KE
    LIYE SHRI SHYAM MATHUR KO BAHUT-
    BAHUT BADHAAEE.
    अविनाश वाचस्पति says
    पुस्‍तक प्राप्ति के लिए राजस्‍थान ग्रन्‍थ अकादमी, प्‍लाट नंबर 1, झालाना सांस्‍थानिक क्षेत्र, जयपुर 302 004 दूरभाष 2711129, 2710341 Website : www.rajhga.com से संपर्क किया जा सकता है। श्री श्‍याम माथुर का मोबाइल नंबर 09414305012 है


    श्‍याम माथुर का जो हैं विजेता।
    बोलकर भी दे सकते हो बधाई


    और लिखकर भी।
    उनका ई मेल पता है :-
    shyam.mathur@epatrika.com
    राजीव तनेजा says
    साक्षात्कार बहुत बढिया जमा है...लगे रहें
    मोहिन्दर कुमार says
    अविनाश जी का सूचना वह बढिया लेख के लिये आभार.
    Mangla says
    Shyam ji,
    Badhai ho,knowledge or anubhav ka khajana he aapki baato me.inte acche interview ke liye Avinash ji ko bhi badhai.
    Vijay Kumar Sappatti says
    main shyaam aur avinaash dono ko hi badhai deba chahta hoon ..


    shayaam ji , main kaafi pahle blitz padhta tha aur behar cinelekhan ko samajne ki koshish karta tha , par aajkal to cine patrkarita ke naam par kya padne ko milta hai ..sab jaante hai . aise mein aapki ye kitaab ,uchit margdarshan dengi ..




    bahut bahut badhai ..


    aapka
    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com/
    shalendra says
    Resoected Shyamji,
    Hai.
    It's proud foe me because YOU are pioneer of Film Journalism in Rajasthan.
    It is also importent that myself is learning from U.
    With Regards;
    Shalendra Upadhyay
    Doordarshan Jaipur
    skudoordarshan@yahoo.com
    skudoordarshan@gmail.com

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