रविवार, 18 दिसंबर 2011

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Sunday, March 28, 2010


माध्यम और सामाजिक सरोकार - पीटर गोल्डिंग



      तकनीकी क्षेत्र में तेजी से आ रहे परिवर्तनों ने परंपरित जीवनशैली पर इनके प्रभावों को लेकर काफी आलोचना और आशंका पैदा की। कोई आश्चर्य नहीं कि सर्वाधिक नए माध्यम को भी उसी भर्त्सनामूलक आलोचना के नजरिए से देखा गया। टेलीविजन के एक आरंभिक आलोचक ने अपना अनुभव इन शब्दों में लिखा है-
    ''आणविक बमों के बुखार से पीड़ित इस दुनिया में जो बहुत भयावह ढंग से शांति और युध्द के बीच संतुलन बनाए हुए है, एक नया ख़तरा पैदा हुआ है , टेलीविजन का ख़तरा-अणु के जेकिल और हाईड, एक ऐसी ताकत जो संस्कृति और मनोरंजन के क्षेत्र में क्रांति पैदा कर दे, जो एक ही साथ विनाश का दानव भी है और उसका निषेधक भी।''
      माध्यम के इस तकनीकी पक्ष के प्रति जागरुकता और भी ज्यादा गहराई से प्रसारण के साथ जुड़ी हुई है। यद्यपि तकनीक नएपन के प्रति लगाव सिनेमा के आरंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। शायद इसकी जड़ें और भी गहरी हैं, उदाहरण के लिए, औेद्योगीकरण के विरूध्द लोकप्रिय विद्रोहों के रूप में। नई तकनीक ने कार्य और अवकाश दोनों में बदलाव किया है लेकिन दोनों के बीच का संबंध बहुत महत्वपूर्ण है कम से कम दोनों में से किसी भी क्षेत्र में किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक अन्वेषण के प्रभाव के संबंध में तो हैं ही।


सरोकार का दूसरा क्षेत्र जनमाध्यमों की विचारों और विश्वासों को प्रभावित करने और व्यवहार को अपनी तरफ मोड़ने की संभावित क्षमता है। जनसंचार का कर्नेल मॉडल जिसमें कुछ लोग बहुसंख्यक को असीम शक्ति और दण्डमुक्ति के भाव से भरकर संबोधित करते हैं, ने इस तरह के शोधों को जन्म दिया है जिसमें फुसलानेवाले संचार के खतरे और प्रभावों पर जोर है। केन्द्रीय समस्या के रूप में प्रोपैगैण्डा और विज्ञापन को रखा गया। युद्ध के दौरान के अधिकतर शोध आक्रामक प्रोपैगैण्डा के प्रभावों की खोज और इससे लड़ने के बेहतर तरीकों के अन्वेषण में लगे हुए थे। इस तरह के शोधों ने विशेष तौर पर अमेरिका में, बाद के कामों पर दूरगामी प्रभाव डाला जबकि इस देश में भगवान 'हॉ-हॉ' की लोकस्मृतियों और माहौल में व्यापत 'जरूरत के समय में दोस्त' बनाने के चलन ने जिसे बी बी सी ने अपने युद्धकालीन प्रसारणों की नीति बना रखी थी , ने बहुत आगे चलकर प्रसारण के प्रभाव और खतरों की व्याख्या करनेवाले विमर्शों के ढर्रे को बदला।


इसी तरह से विज्ञापन उद्योग के विकास और इसके द्वारा माध्यमों के प्रयोग ने लोकप्रिय रवैय्ये में संभावित परिवर्तन को लेकर एक तनाव की स्थिति पैदा की। इनमें छद्म जरूरतों का निर्माण और भौतिकवाद, धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा और आम जनता के बड़े हिस्से में तुलनात्मक रूप से वंचित होने का बोध शामिल था। डेनीस थॉम्सन जो इस दृष्टिकोण के आरंभिक व्याख्याकार थे और जिन्होंने हाल के वर्षों में इसे बिना किसी घालमेल के फिर जोर देकर दोहराया-''विज्ञापन उपभोक्ताओं की समनुरूप संख्या के बारे में आश्वस्त करता है। ऐसा वह प्रेस और टी वी के ऊपर नियंत्रण के जरिए करता है। इसकी आचार संहिता बहुत जोरदार ढंग से संचार के समूचे तंत्र को आवृत्त करती है। यथास्थिति के सिध्दान्त के अनुकूल इसका लक्ष्य हमारे जीवन को नियंत्रित करना और हमें उपभोक्ता दौड़मशीन (कंज्युमर ट्रेडमिल) पर लगाए रखना है।''
     इस तरह की भावनाओं ने विज्ञापन ,उसकी आचार संहिता, उसकी कृत्रिमता पर किए जा रहे हमले को सीमित कर दिया। बजाए इसके कि माध्यमों में इसके बढ़ते प्रभाव को कम करके दिखाए। जहाँ तक प्रोपैगैण्डा का सवाल है इसके शोधों का उद्देश्य हमले का निशाना बन सकनेवाले 'खलनायकों' पर से ध्यान हटाकर 'पीड़ित' पर ध्यान केन्द्रित करना है।
     सांस्कृतिक आलोचना की लंबी परंपरा से निकलकर एक तीसरा बृहत्तर सरोकार उभरता है जिसका संबंध मैथ्यू अर्नाल्ड, टी एस इलियट और एफ आर लेविस के लेखन से जुड़ता है , जिनका भय यह था कि सांस्कृतिक मिलावट निश्चित रूप से स्तरहीनता को जन्म देगा, अवकाश के बढ़े अवसर तुच्छ जन मनोरंजन के द्वारा बर्बाद किए जा रहे हैं और अंग्रेजी संस्कृति के जरिए इन्हें रोका जा सकता था लेकिन नए माध्यम के द्वारा न केवल इनकी उपेक्षा की जा रही है बल्कि इनके लिए ख़तरा भी पैदा किया जा रहा है। शोध कार्यों का एक बड़ा हिस्सा इन प्रवृत्तियों से लड़ने के तरीके खोजने में लगा है जो इस बात की तसदीक करता है कि ये प्रवृत्तियाँ मौजूद रही हैं।


विश्वास की एक और बेचैन प्रक्रिया है जो माध्यमों के प्रभाव को लेकर सशंकित है। वैकल्पिक अवकाश के साधनों के अभाव में माध्यमों के समक्ष अधिकतम अरक्षण (एक्सपोजर) के कारण अथवा अज्ञानता या अपरिपक्वता के कारण या अस्वाभाविक असुरक्षा की वजह से इन समूहों को विशेष तौर पर संरक्षा की जरूरत है। बच्चे और कामगार वर्ग दोनों समूह इस भूमिका में आन्तरायिक भाव से अनुकूल बैठते हैं।
     बच्चों के लिए सरोकारों की झलक अमेरिका के फ्रेडरिक वर्थैम्स की महत्वपूर्ण शोध कृति 'द सेडक्शन ऑफ द इनोसेन्ट' में विस्तार क साथ दिखाई देती है। इन सरोकारों में नया कुछ नहीं है। जॉन टाबियस ने 19 वीं शती में बाल अपराधों के बारे में लिखते हुए कहा कि '' जैक शिफर्ड, डिक टर्पिन और अन्य अपराध नायकों का लोकप्रिय कल्पना पर प्रभाव ऐसा था कि वे लगभग 19 वीं शती तक अनुश्रुति का हिस्सा बन चुके थे। समसामयिकों ने पाया कि उनके नाम और दुस्साहसिक कारनामे अधिकतर बच्चों को मालूम थे जबकि उन्हें इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया का नाम नहीं पता था। ''
     एक जेल का प्रशासक इन छोटे बच्चों के अपराध के बारे में बिना किसी हिचक के कहता है ''ये उनके सिक्के के नंबर हैं जिनकी मैं गिनती करता हूँ, महोदय।''


न केवल बच्चों की गतिविधियों पर जनमाध्यमों के बढ़ते प्रभाव , उनके आपराधिक व्यवहार, स्कूल के काम, उनके अवकाश के समय पर माध्यमों का एकाधिकार आदि की तरफ ध्यान गया बल्कि सामान्यतया उनकी आस्थाओं , सेक्स के प्रति उनका रवैय्या, नैतिकता पर भी चर्चा हुई। 1960 के मध्य में 'राष्ट्रीय दर्शक और श्रोता' नाम से स्थापित संस्था जो अपने उत्साही सचिव मेरी व्हाइटहाउस के आलोचनात्मक दृष्टिकोण से खासा प्रभावित थी, ने हमेशा प्रसारण के बच्चों पर तथाकथित घातक प्रभावों को अपने प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। श्रीमती व्हाइटहाउस ने बारंबार दोहराया कि कैसे टेलीविजन के बच्चों के कामुक व्यवहार पर पड़नेवाले असर के संबंध में उनकी खोज ने उन्हें 'वाला' जैसी संस्था शुरु करने के लिए उत्प्रेरित किया।


इसी तरह की चिंता भोले, कम पढ़े और सुसंस्कृत माध्यम उपभोक्ताओं को लेकर माध्यम के व्यवहार में और बाद के शोधों में दिखाई देती है। लॉर्ड रीथ, बी बी सी का पहला महानिदेशक, माध्यमों को लोकप्रिय शिक्षण और नैतिक उत्थान के औजार के रूप में ,कम से कम कला के क्षेत्र में नहीं देखे जाने का असली व्याख्याकार बन गया। रीथ ने 1924 में लिखा, '' वर्षों से, सड़क का आदमी ऐसे संगीत से संतुष्ट होता रहा है जो आसानी से और तुरंत घुलमिल जाता है और इसीलिए हमेशा बेहतर नहीं होता।'' सेंसरशिप की भूमिका को लेकर तर्क-वितर्क कई बार सांस्कृतिक सुसभ्यता और जनसंचार की दुर्बलता के विपरीत संबंधों पर जोर देते हैं, सेंसरशिप को कीमत के स्तर पर औचित्यपूर्ण ठहराने अथवा बड़े पैमाने पर निष्क्रिय कर दी गई सामग्री के लिए एक सावधान नियंत्रण को बरतने की आवश्यकता के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।


( पुस्तक अंश- पुस्तक का नाम- जनमाध्यम, लेखक पीटर गोल्डिंग,अनुवाद-सुधा सिंह,प्रकाशक, ग्रंथ शिल्पी,बी-7,सरस्वती कामप्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मीनगर,दिल्ली-110092,मूल्य-325रुपये)

पत्रकारिता में पेशेवर रवैय्या आवश्यक है- पीटर गोल्डिंग

     जनमाध्यम से संबंधित हमारी जानकारी में एक बड़ी चूक संप्रेषक या संचारकर्ता के बारे में किसी भी किस्म की विस्तृत जानकारी का अभाव है; निर्माता, लेखक, सर्जक, प्रबंधक, तकनीकीविद्, पत्रकार और अन्य जिनके निर्णय और विचार जनमाध्यम की प्रस्तुति को आकार देते हैं, इनके बारे में हमें न्यूनतम जानकारी होती है। सांस्थानिक बौध्दिकों और मनोरंजनकर्ताओं आदि जो संचार उद्योग की कार्यशक्ति का निर्माण करते हैं, संख्या में तेजी से वृध्दि हुई है, लेकिन अभी भी सही आंकड़ों का आकलन कर पाना एक मुश्किल काम है। 
      जनगणना के आंकड़े अपर्याप्त लेकिन बुनियादी दिशानिर्देशक आंकड़े हैं। ये बताते हैं कि ' लेखकों, पत्रकारों , और अन्य कामों से जुड़े मजदूरों ' की संयुक्त संख्या में 1951 में 19,086 से 1966 में 31,950 वृध्दि हुई है। इनमें निश्चित तौर पर ज्यादा संख्या विभिन्न किस्म के पत्रकारों की थी जिनका कुल आंकड़ा 24,000 था। इनमें से केवल 3,500 राष्ट्रीय अखबारों में काम करते थे। इनमें से लेखकों की स्थिति ज्यादा सन्दिग्ध थी। अधिकांश लेखकों के पास सांस्थानिक आधार था, ये किसी न किसी पेशे से या ज्यादातर शिक्षाजगत से जुड़े हुए थे, जो ब्रैडबरी के शब्दों में ' साहित्यिक वेतनभोगी ' वर्ग का निर्माण करते हैं। फिन्डलेटर ने 1963 में इनकी संख्या का कुल अनुमान 6,500 और 7,000 के बीच लगाया था, यद्यपि 1972 में 40 प्रतिशत लेखकों की आय उनके लेखन से नहीं आ रही थी, और 56 प्रतिशत की लेखन से आमदनी 500 डॉलर सालाना से भी कम थी।[1] प्रसारणकर्ताओं की संख्या भी उसी तरह भ्रांतिमूलक थी, लेकिन अकेले बी बी सी के पास 1973 में 10,000 से ज्यादा कार्यक्रम निर्माण करनेवाले कर्मचारी थे ( जिसमें अभियांत्रिकी के कर्मचारी शामिल नहीं हैं )।




कर्मचारियों की माध्यमों के बीच दोलायमान होने के कारण यह तस्वीर और जटिल हो जाती है। बहुत से लोग पत्रकारिता और प्रसारण के बीच स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, अपनी प्रतिभा को जो भी माध्यम ज्यादा विकासशील दिखाई देता है और जिसमें काम की संभावना है उसमें नियोजित करते हैं अथवा सांस्थानिक संदर्भ में उपलब्ध अपने आधार का इस्तेमाल दूसरे के लिए उत्पादन में करते हैं। यानि जहाँ वे मूल रूप से काम करते हैं उस संस्थान द्वारा प्रदत्ता सुविधाओं का इस्तेमाल अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लेख लिखने में करते हैं। उदाहरण के लिए एक खेल पत्रकार एक फुटबॉल के खिलाड़ी के लिए आत्मकथा लिखता है और ' छाया लेखन ' करता है। माध्यमों के बीच की यह दोलायमान गतिशीलता किसी एक संस्था के लिए पेशेवर प्रतिबध्दता को तरल बनाता है और कला और पेशे के प्रति ज्यादा आम प्रतिबध्दता को प्रोत्साहित करता है, और शायद कैरियर के प्रति ज्यादा व्यक्तिवादी बनाता है। लेकिन माध्यमों के अंदर इस तरह के 'लचीलेपन' का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। विशिष्ट पत्रकारों का अध्ययन बताता है कि इनमें से एक तिहाई स्वतंत्र लेखन से सालाना 500 डॉलर से अधिक कमाते हैं जबकि उच्च पद वाले विशेषज्ञों के लिए अपनी मूल संस्था से अलग अपनी स्वायत्तता स्थापित करने के लिए इस तरह के कामों को हथियार बनाने की जरूरत नहीं है।
    एक पेशेवर समूह की कुल संख्या का जो आंकड़ा पेश किया जाता है वह वास्तव में उस माध्यम की गतिविधियों से गंभीरता से जुड़े हुए लोगों की वास्तविक संख्या को छिपाता है। उदाहरण के लिए, टेलीविजन और पटकथा लेखन से जुड़े लोगों के हितों को देखने वाली संस्था के कुल 1,600 सदस्य हैं। लेकिन संभवत: उनमें से केवल एक दहाई लोग ही कुल निर्मित पटकथा के 90 प्रतिशत का लेखन करते हैं।
     संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी होने के बावजूद भी सर्जनात्मक पेशों में नियुक्तियों की पध्दति बहुत ज्यादा परिवर्तित नहीं हुई है। बहुत बड़ी संख्या में उपलब्धि के बजाए सिफारिश प्रवेश के लिए बड़ी योग्यता मानी जाती है। लेखकों की पृष्ठभूमि से जुड़े तमाम अध्ययन बताते हैं कि वे ज्यादातर मध्यवर्ग से और पुरूष हैं यद्यपि इस तरह के ज्यादातर अध्ययन महत्वपूर्ण लेखकों के लेखन के संदर्भ में अपरिहार्य ऐतिहासिक संकेन्द्रण का शिकार हुए हैं। लारेन्सन ने सन् 1860 से लेकर 1910 के बीच जन्मे या मर गए 170 लेखकों के अध्ययन के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला कि उनमें से लगभग आधे ' आक्सब्रिज ' गए , बढ़ी संख्या में ये पेशेवर मध्यवर्ग से थे, और इनमें केवल एक चौथाई स्त्रियाँ थीं। आल्टिक ने कुछ ज्यादा बड़ी समयावधि लेते हुए 20वीं सदी के ह्रासोन्मुखी पेशेवर मध्यवर्ग की चर्चा की है जहाँ से अधिकांश लेखक आते हैं। उसने ' लेखकवर्ग और पाठकवर्ग के बीच बढ़ती दूरियों के जिक्र के साथ जो अध्ययन किया उसमें भी वह इसी तरह के विभाजन पर पहुँचा। '
    पत्रकार इस तरह के गौरवपूर्ण पृष्ठभूमि से अमूमन नहीं आते, छोटे-मोटे पेशों से आते हैं। 'टन्सटाल' के विशेषज्ञ पत्रकारों के पिता 'प्रशासन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण दर्जा रखनेवाले, शैक्षणिक और अन्य पेशों में नौकर थे, इनका उत्पादन या भारी उद्योगों से कोई लेना-देना नहीं था।' विशेषज्ञ अधिकांश पत्रकारों की तुलना में निश्चित रूप से औपचारिक शिक्षा को लेकर गर्व कर सकते थे, और ऐसे विशेषज्ञों का अनुपात जो उच्च शिक्षा तक पहुँचे एक तिहाई है और यह इस पेशे की समग्र स्थिति को देखते हुए बहुत ज्यादा है। पत्रकारिता को कला मानने की धारणा के कारण इस संबंध में किसी भी तरह की सामान्य शिक्षा या विशिष्ट प्रशिक्षण की तुलना में प्रशिक्षणमूलक कार्यक्रम (एप्रेन्टीशिप) की मांग ब्रिटेन के पत्रकारों के विश्वास का केन्द्रबिन्दु है; यद्यपि यह ऐसा विश्वास है जिस पर हाल के वर्षों में बहुत ज्यादा बहस चल रही है। सन् 1969 में प्रशिक्षु पत्रकारों के एक अध्ययन में ब्यॉड बैरेट ने पाया कि ' लगभग आधे विद्यार्थी निम्न मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग की प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से आए थे।' स्कूली पढ़ाई के दौरान लगभग आधे को विश्वविद्यालय में प्रवेश की न्यूनतम अर्हता हासिल थी। फिर भी यह संभव है कि आज का प्रशिक्षु समूह समग्रता में सभी पत्रकारों की तुलना में ज्यादा औपचारिक शिक्षा हासिल किए हुए है, यद्यपि जैसा कि अन्य माध्यम पेशों के साथ भी है बहुत कम आंकड़े उनकी पृष्ठभूमि के विषय में उपलब्ध हैं।
      प्रशिक्षण और प्रवेश के लिए आवश्यक अर्हता हासिल करने के आधार पर औपचारिक नियुक्तियाँ माध्यमगत पेशों में बढ़ते पेशेवराना अंदाज का सूचक है। उदाहरण के लिए नेशनल काउंसिल फॉर द ट्रेनिंग ऑफ जर्नलिस्ट ( 1955 से ) के द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों और फिल्मों और टेलीविजन पाठयक्रमों की विद्यालयों में बढ़ती संख्या इस बात की सूचक है कि माध्यम व्यवसाय में प्रवेश को पेशेवर शिक्षा उपयोगी ढंग से नियंत्रित कर सकती है। पर यह लक्ष्य इस आदर्श के साथ विरोधी मालूम होता है कि सर्जनात्मक पेशों में जिस गुणवत्ता की जरूरत होती है वह जन्मजात होती है या सर्वाधिक सटीक ढंग से 'काम के दौरान' सीखी जाती है। ज्यादा चमक-दमक वाले माध्यमों में प्रवेश की होड़ के साथ जुड़ कर इस विवाद ने प्रशिक्षण कार्यक्रमों के प्रभाव और शक्ति को कम किया है। नियुक्तियों में व्यक्तिगत विशेषीकृत धारणाएँ अभी भी हावी हैं। ब्यॉड बैरेट ने दर्ज किया है कि ' प्रवेश का दायित्व ज्यादातर आवेदनकर्ता के कंधों पर ही होता है- उसे स्वयं को -इस तरह की घोषणा के लिए किसी भी तरह के व्यवस्थित राह के अभाव में - योग्य घोषित करना पड़ता है-----बहुत से पेशेवर पत्रकार और संपादक व्यवस्था की इस कमी को फायदा समझते हैं। बी बी सी ने हाल के वर्षों में अपने निर्माण कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों में कटौती की है और यह कहा है कि ' एक व्यक्ति जो पेशेवर अनुभव प्राप्त करके बी बी सी में नियुक्त होता है उस व्यक्ति की तुलना में जो प्रशिक्षु के रूप में नियुक्त होता है नुकसान में नहीं रहता।'
      माध्यमों में कैरियर का ढाँचा उम्र, माध्यम के प्रकार और विकास की दर के अनुसार अलग-अलग होता है। यदि कोई माध्यम तेजी से विकास कर रहा है ( जैसाकि युध्द के समय बी बी सी ने किया अथवा प्रथम पाँच वर्षों में व्यवसायिक टेलीविजन ने किया) तो उसमें रोजगार और विकास की गति तीव्र होगी और सुरक्षा तथा स्थिरता होगी। ह्रासोन्मुखी माध्यम में , जैसे कि सिनेमा, कैरियर का ढाँचा अनिश्चित होगा और संभवत: इसमें काम करनेवाले एक माध्यम से ज्यादा में पाँव पसारेगें।


( पुस्तक अंश- पुस्तक का नाम- जनमाध्यम, लेखक पीटर गोल्डिंग,अनुवाद-सुधा सिंह,प्रकाशक, ग्रंथ शिल्पी,बी-7,सरस्वती कामप्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मीनगर,दिल्ली-110092,मूल्य-325रुपये)

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