सोमवार, 19 दिसंबर 2011

क्या सरकार ‘पेड न्यूज’ पर नियंत्रण पा सकेगी?





Monday, December 19th, 2011
 
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Published on August 12, 2010 by NEWS SOURCE   ·   No Comments  ·   Post Views  61 views
हाल में सूचना और प्रसारण मंत्राी श्रीमती अम्बिका सोनी ने एक बिजनेस दैनिक को एक व्यापक इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने कहा कि सरकार ‘पेड न्यूज’ पर नियंत्राण पाने का भरसक प्रयास कर रही है। उन्होंने यह माना कि ‘पेड न्यूज’ का बढ़ता शिकंजा भारत के लोकतंत्रा के स्वस्थ विकास के लिये बहुत बड़ा खतरा है।
ambika soni talking to media क्या सरकार ‘पेड न्यूज’ पर नियंत्रण पा सकेगी?
उन्होंने कहा कि पे्रस कौंसिल से यह आग्रह किया गया है कि ‘पेड न्यूज’ पर नियंत्राण पाने का वह सुझाव दे परंतु अभी तक उसकी रिपोर्ट नहीं आ पाई है। उन्होंने यह भी कहा कि समय आ गया है जब इलेक्ट्रानिक मीडिया के विभिन्न चैनल ‘पेड न्यूज’ पर नियंत्राण पाने का उपाय सोचें।
‘पेड न्यूज’ कोई नई बीमारी नहीं है। यह बीमारी 80 के दशक में एक हिन्दी भाषी राज्य से शुरू हुई थी जहां की सरकार पे्रस पर नियंत्राण पाने के लिये एक ‘पे्रस बिल’ लाई थी जिसमें यह प्रावधान था कि यदि राज्य सरकार के खिलाफ कोई खबर छपेगी तो राज्य सरकार को यह अधिकार होगा कि वह उस समाचार पत्र को बंद कर दे और जिस संवाददाता या पत्राकार ने वह खबर छपवाई है, उसे उचित दंड दिया जाएगा।
इस बिल का पूरे देश में भारी विरोध हुआ था। मामला तत्कालीन प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी तक गया और उन्होंने सम्बद्ध मुख्यमंत्राी को निर्देश दिया कि इस बिल को तुरंत वापस लिया जाए। लोगों की जनभावना को शांत करने के लिये उन्होंने उस राज्य के मुख्यमंत्राी को त्यागपत्रा देने के लिये बाध्य कर दिया था।
कई हिन्दी भाषी राज्यों में जब सरकारों ने यह देखा कि उनके पक्ष की खबरें समाचार पत्रों में नहीं छपती हैं तब उन्होंने एक नया तरीका निकाला। अपने पक्ष की खबरों को विज्ञापन के रूप में वे छापने लगीं। यह राज्य सरकारों के लिये भी और कतिपय समाचार पत्रों के लिये भी लाभप्रद था। समाचार पत्रों को विज्ञापन के रूप में ढेर सारा पैसा मिल जाता था और राज्य सरकारों का उद्देश्य पूरा हो जाता था। वे जो कहना चाहती थीं सब कुछ उस विज्ञापन में विस्तार से वर्णित रहता था।
इस तरह के विज्ञापन के नीचे अत्यंत ही महीन अक्षरों में ‘विज्ञापन’ लिखा जाता था। धीरे धीरे विज्ञापन शब्द भी हटा लिया गया। पहले तो विज्ञापन के रूप में राज्य सरकारों की जो खबरें छपती थी, उनका टाइप ‘फोंट’ अलग होता था जिससे लोग समझ सकें कि यह मूल समाचार से अलग है। धीरे धीरे एक ही टाइप ‘फोंट’ में ये समाचार छपने लगे। तब से आज तक किसी न किसी रूप में सरकारी और निजी विज्ञापन कई समाचार पत्रों में ‘पेड न्यूज’ के रूप में छप रहे हैं।
‘पेड न्यूज’ पर पूरे देश का ध्यान तब आकर्षित हुआ जब गत लोकसभा चुनाव में विभिन्न हिन्दी भाषी राज्यों से ये खबरें आने लगी कि कई समाचार पत्रों के संवाददाता और प्रबंधक प्रत्याशियों से मोटी रकम मांग रहे हैं। बदले में वे उन्हें आश्वासन दे रहे हैं कि वे उनके पक्ष में पूरे चुनाव प्रचार के दौरान ढेर सारी खबरें छापेंगे।
इन संवाददाताओं और प्रबंधकों ने प्रत्याशियों को यह भी कहकर डराया धमकाया कि यदि उन्होंने मोटी रकम ‘पेड न्यूज’ के लिये नहीं दी तो वे उनके खिलाफ समाचार छापेंगे और उनके प्रतिद्वंद्वी से मिलकर उनका ‘पेड न्यूज’ प्रकाशित करेंगे। यह साफ तौर से ब्लैकमेलिंग थी और कई प्रत्याशियों ने डर कर चुपचाप यह मोटी रकम दे दी और उनके पक्ष में समाचार छपने लगे। जबकि दूसरे योग्य और ईमानदार प्रत्याशियों के विरूद्ध प्रतिदिन मनगढ़ंत खबरें छपने लगी। इन प्रत्याशियों ने इन खबरों का खंडन भी किया परंतु उनका पक्ष या उनके द्वारा प्रसारित खंडन कभी प्रकाशित हुआ ही नहीं।
गत लोकसभा चुनाव में कई टीवी चैनलों ने भी ‘पेड न्यूज’ का कारोबार किया। आज तो टीवी चैनलों की भरमार है। देश में कई सौ टीवी चैनल चल रहे हैं। राज्यों में कई स्थानीय टीवी चैनल बड़े ही लोकप्रिय हैं।
अपनी लोकप्रियता का फायदा उठाकर कुछ टीवी चैनलों ने लोकसभा प्रत्याशियों से कहा कि यदि वे उन्हें मोटी रकम दे दें तो उनके पक्ष में दिन रात समाचार प्रकाशित करेंगे। जहां जहां वे सभा करेंगे उसका सचित्रा विस्तृत विवरण टेलीकास्ट किया जाएगा और उनके प्रतिद्वंद्वियों का न तो कोई समाचार प्रकाशित होगा और न उनकी सभाओं का कोई दृश्य दिखाया जाएगा। कुछ लोकसभा प्रत्याशी जो पैसे वाले थे, उन्होंने चुपचाप इन चैनलों को मोटी रकम दे दी जिसके बाद इन चैनलों पर उनका ‘पेड न्यूज’ दिखाया जाने लगा।
गत लोकसभा चुनाव के बाद ‘आल इंडिया न्यूजपेपर्स एडिटर्स कांफ्रेस’ ने ‘पेड न्यूज’ पर एक सेमिनार किया जिसमें पे्रस कांउसिल के चेयरमैन भी थे। संयोग से इन पंक्तियों के लेखक को भी उस सेमिनार में शामिल होने का मौका मिला था। उस सेमिनार में कई ऐसे लोकसभा प्रत्याशी थे जिनकी छवि जनता के बीच बहुत अच्छी थी। उन्होंने खुलकर कहा कि कई समाचार पत्रों के संवाददाताओं और प्रबंधकों ने ‘पेड न्यूज’ के लिये उनसे मोटी रकम मांगी थी। वे उनकी मांग पूरी नहीं कर सके, इसलिये उनके खिलाफ प्रतिदिन बे सिर पैर की खबरें प्रसारित होने लगी। शायद उनके हारने का यह भी एक कारण था।
उन्होंने ही यह रहस्योद्घाटन किया कि न केवल समाचार पत्रों ने बल्कि कुछ स्थानीय टीवी चैनलों ने भी ‘पेड न्यूज’ के लिये उनसे मोटी रकम मांगी थी। उन्हें आश्वस्त किया गया था कि यदि उन्होंने मोटी रकम दे दी तो उनके चैनलों पर दिन रात उनके क्षेत्रा के गिने चुने लोगों के इंटरव्यू दिखाये जाएंगे जिसमें उनकी भूरी भूरी प्रशंसा होगी। उनकी हर मीटिंग का व्यापक कवरेज होगा और यदि उन्होंने ‘पेड न्यूज’ के लिये पैसा नहीं दिया तो उनके खिलाफ समाचार दिन रात टेलीकास्ट होंगे। उनके क्षेत्रा के गिने चुने लोगों का इंटरव्यू प्रकाशित किया जाएगा जो कहेंगे कि आपने गत पांच वर्षों में कुछ नहीं किया। जो प्रत्याशी समाचार पत्रों और टीवी चैनलों को मोटी रकम नहीं दे सके, उनके खिलाफ कस कर दुष्प्रचार किया गया और वे चुनाव हार गये।
सूचना और प्रसारण मंत्राी ने यह भी कहा है कि ‘पेड न्यूज’ की बीमारी लोकतंत्रा के लिये बहुत खतरनाक है। इलेक्शन कमीशन इस बारे में पूर्णतः सचेष्ट है और ‘पिपुल्स रिपे्रेजंटेशन एक्ट’ में आवश्यक सुधार किया जा रहा है।
यहां यह याद रखना आवश्यक है कि देश की अधिकतर जनता गांव देहात में ही बसती है। हिन्दी भाषी राज्यांे में एक समाचार पत्रा की प्रति को 20-30 लोग पढ़ते हैं और आपस में फुर्सत के क्षणों में उन समाचारों पर व्यापक चर्चा करते हैं।
ग्रामीण जनता यह समझ ही नहीं पाती है कि कौन सी खबर असली है और कौन सी खबर विज्ञापन के रूप में, ‘पेड न्यूज’ के आकार मंे प्रकाशित हुई है, अतः एक तरफा प्रकाशित किये गये ‘पेड न्यूज’ को वह सच समझ लेती है और उसी तरह अपना मन बना लेती है। इससे निःसन्देह स्वच्छ छवि के गरीब प्रत्याशियों को भारी क्षति पहंुचती है।
अब तो जेनरेटर की मदद से गांव देहात में भी केबल टीवी पहंुच गया है। केबल टीवी पर स्थानीय चैनलों को देखने के लिये लोग बहुत अधिक उत्सुक रहते हंै। चुनाव के दिनों में यदि इन चैनलों पर किसी उम्मीदवार विशेष के पक्ष में दिन रात खबरें प्रकाशित होती हैं या इंटरव्यू प्रकाशित होते हैं और कुछ भाड़े के इने गिने लोग उस प्रत्याशी के पक्ष में बयान देते हैं तो भोली भाली जनता इस पर अनायास ही विश्वास कर बैठती है।
सूचना और प्रसारण मंत्राी ने कहा है कि इन चैनलों पर दिखाये जाने वाले कार्यक्रमों को नियंत्रित करने की सरकार की कोई इच्छा नहीं है। ये चैनल स्वयं अपने प्रसारित किये जाने वालें कार्यक्रमों को नियंत्रित करें।
प्रश्न यह है कि क्या ये टीवी चैनल ऐसा करेंगे? देखने में ‘पेड न्यूज’ की बीमारी साधारण सी लगती है परंतु यह एक ऐसा कैंसर है जिस पर यदि शीघ्र नियंत्राण नहीं पाया गया तो लोकतंत्रा की जड़ें खोखली हो जाएंगी। देश के हर जागरूक नागरिक को इस समस्या पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा।
  • —————–डा. गौरीशंकर राजहंस

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