गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

सामुदायिक रेडियो : बदलाव का सशक्त माध्यम


22 वर्षीय मंजुला पिछले वर्ष एक दिन अगस्त माह में रेडियो स्टेशन जा पहुंची और सुबह 5 बजे सुनामी के लिए सावधान रहने की घोषणा प्रसारित करने लगी. सवेरे रेडियो के श्रोता सकते में आ गए, क्योंकि वे इतने सवेरे तो आठ बजे से पहले शुरू होने वाले कलंजियम वानोली सामुदायिक रेडियो स्टेशन के प्रसारण सुनने के ही आदी थे. सुबह-सुबह ही तमिलनाडु और उसके आसपास के इलाक़े नागपत्तिनम में ज़िला प्रशासन ने सब कुछ ठीक-ठाक है अर्थात ऑल क्लीयर की सूचना प्रसारित की थी, लेकिन उस दिन मंजुला ने अपना काम असरदार ढंग से और बख़ूबी तौर पर कर दिया था. धन प्रतिष्ठान के सहयोग से यह सामुदायिक रेडियो स्टेशन 2009 में नागपत्तिनम ज़िले के कीलैयूर ब्लॉक के एक छोटे से गांव विलुंतमवड़ी में शुरू किया गया था. यह गांव उस स्थान से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर है जहां 2004 में सुनामी ने ज़बरदस्त तबाही मचाई थी.
सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त शैक्षिक संस्थाओं से इतर संगठनों के  लिए आवेदन की प्रक्रिया बहुत जटिल है और उनके लिए आवश्यक है कि वे सामुदायिक रेडियो स्टेशन को ऑपरेशन बनाने से पहले कई मंत्रालयों की स्वीकृति प्राप्त करें. कुछ हद तक यह भी एक कारण है कि नीति की घोषणा के चार वर्षों के बाद भी सौ में से एक तिहाई रेडियो स्टेशन ही भारत में ज़मीन से जुड़े संगठनों द्वारा चलाए जा रहे हैं और शेष कैंपस रेडियो हैं.
मध्य प्रदेश के ओरछा क़स्बे से हज़ारों किलोमीटर दूर अनुजा शुक्ला और उसके सहयोगी रेडियो बुंदेलखंड चलाते हैं. यह रेडियो 2008 से स्थानीय संदर्भों के अनुरूप सूचना और मनोरंजन का ज़बरदस्त मिलाजुला कार्यक्रम बुंदेली भाषा में प्रसारित कर रहा है. विकास अल्टरनेटिव्स द्वारा समर्थित सामुदायिक रेडियो स्टेशन बीस किलोमीटर के अर्धव्यास के दायरे में श्रोताओं तक पहुंचता है. इस प्रसारण में महिलाओं, युवाओं और सीमांत वर्ग के लोगों को विशेष रूप से संबोधित किया जाता है. एक नवोन्मेषकारी अभियान के दौरान इस स्टेशन ने बुंदेली में स्थानीय शौक़िया कलाकारों की मदद से स्थानीय आइडल नाम के एक शो के माध्यम से हज़ार से अधिक गीत रिकॉर्ड किए थे. यह शो अमेरिकन/इंडियन आइडल शो नाम के लोकप्रिय रियलिटी टी.वी. शो का बुंदेली संस्करण था.
सामुदायिक रेडियो स्टेशन और आंध्र प्रदेश के मेदक ज़िले में डक्कन विकास संघ द्वारा शुरू किए गए संघम रेडियो भारत के मीडिया परिदृश्य को फिर से परिभाषित कर रहे हैं. भारत में हवाई तरंगों की यह आंधी 2005 में एक सशक्त स्वर के रूप में उस समय उभरकर सामने आई, जब एफएम रेडियो की यह क्रांति महानगरों से आगे बढ़कर अनवरत बजने वाले फिल्मी गीतों और अक्सर होने वाली बकवास और गपशप के साथ लोगों की मीडिया उपभोग की आदतों पर दस्तक देने लगी. हालांकि इस स्थिति के कारण मल्टीपल आउटपुट और उपभोक्ता की पसंद के उदारवादी पूंजीवादी शब्दाडंबर के साथ अनायास ही कुछ प्रेक्षक उभर आए हैं, जिनके कारण बीस के दशक का बेर्टोल्ट ब्रेख्त का विलाप फिर से दोहराया जाने लगा है कि रेडियो एकाउस्टिकल डिपार्टमेंटल स्टोर के रूप में केवल वितरण प्रणाली बनकर रह गया है.
यह सामुदायिक रेडियो स्टेशन और आंध्र प्रदेश के मेदक ज़िले में डक्कन विकास संघ द्वारा शुरू किए गए संघम रेडियो भारत के मीडिया परिदृश्य को फिर से परिभाषित कर रहे हैं. भारत में हवाई तरंगों की यह आंधी 2005 में एक सशक्त स्वर के रूप में उस समय उभरकर सामने आई, जब एफएम रेडियो की यह क्रांति महानगरों से आगे बढ़कर अनवरत बजने वाले फिल्मी गीतों और अक्सर होने वाली बकवास और गपशप के साथ लोगों की मीडिया उपभोग की आदतों पर दस्तक देने लगी. हालांकि इस स्थिति के कारण मल्टीपल आउटपुट और उपभोक्ता की पसंद के उदारवादी पूंजीवादी शब्दाडंबर के साथ अनायास ही कुछ प्रेक्षक उभर आए हैं, जिनके कारण बीस के दशक का बेर्टोल्ट ब्रेख्त का विलाप फिर से दोहराया जाने लगा है कि रेडियो एकाउस्टिकल डिपार्टमेंटल स्टोर के रूप में केवल वितरण प्रणाली बनकर रह गया है. उन्होंने रेडियो को दोतऱफा संवाद का माध्यम बनाने के लिए सचमुच कुछ लोकतांत्रिक बनाने की वकालत की, ताकि इससे सार्वजनिक मामलों में नागरिकों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जा सके. भारत में सामुदायिक रेडियो के लिए संघर्ष का इतिहास इसी ब्रेख्तियन सिद्धांत को मूर्त रूप देने का एक प्रयास है, जिसकी परिणति नवंबर, 2006 में भारत सरकार की इस नई नीति में हुई कि देश में सुदृढ़ नागरिक समाज के निर्माण के साधन के रूप में सामुदायिक रेडियो का उपयोग किया जा सकता है.
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मीडिया उद्योगों के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं ने विषयवस्तु के समांगीकरण, सत्ता और नियंत्रण के केंद्रीकरण और ग़रीबों के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों को हाशिए पर लाने के प्रयासों को बढ़ाने और मुख्यधारा के मीडिया को डिसफ्रेंचाइज़ करने से संबंधित सरोकारों को बढ़ा दिया है. रेडियो के स्पैक्ट्रम को मुक्त करने की लड़ाई प्रमुख मीडिया के लिए विकल्प प्रदान करने और सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से सत्ता से च्युत सामाजिक कारकों के व्यापक स्पैक्ट्रम को अभिव्यक्ति के साधनों के रूप में विकसित करने के लिए रही है. अन्य लोकतांत्रिक देशों के अनुभवों और नीतिगत उदाहरणों को देखते हुए सामुदायिक रेडियो के कार्यकर्ताओं ने अपील की है कि भारत में प्रसारण सार्वभौमिक पहुंच, संसाधनों के समान वितरण, संचार के लोकतंत्रीकरण और समाज के ऐतिहासिक दृष्टि से नुक़सान में रहे वर्गों के सशक्तीकरण के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए.
फरवरी, 1995 में भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में यह व्यवस्था दी थी कि हवाई लहरें सार्वजनिक संपत्ति हैं और इनका उपयोग आम लोगों की भलाई के लिए होना चाहिए. इस निर्णय में यह भी कहा गया था कि प्रसारण मीडिया को समग्र रूप में अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करना चाहिए. इसलिए आवश्यक है कि प्रसारण मीडिया को सरकारी एकाधिकार से मुक्त होना चाहिए और इसके विषय का नियंत्रण सार्वजनिक निकाय के विनियमों के अधीन होना चाहिए. इस निर्णय के बाद ही भारतीय सामुदायिक रेडियो के प्रचारकों ने स्थानीय लोगों द्वारा खास तौर पर ग्रामीण इलाक़ों में स्वाधिकृत और चलाए जाने वाले लाभकारी रेडियो स्टेशनों के नए रूप के निर्माण के लिए लगभग एक दशक तक संघर्ष किया, ताकि हाशिए पर आए समुदायों के सामाजिक परिवर्तन, सामंजस्य और समावेश के लिए तथा रचनात्मक व सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए अवसर जुटाए जा सकें. सामाजिक क्षेत्र में सामुदायिक रेडियो के प्रसारण के लिए इस तरह की वकालत के सघन प्रयासों और गरमा-गरम बहस की परिणति 2006 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा समावेशी सामुदायिक रेडियो नीति के अनुमोदन के रूप में हुई.
जब 1999 में एफएम रेडियो की फ्रीक्वेंसियों को सबसे ऊंची बोली बोलने वालों को नीलाम करने से संबंधित हवाई तरंगों का एकाधिकार समाप्त करने की नीति कार्यान्वित की गई तो इस अभियान के प्रचारकों को उच्चतम न्यायालय के निर्णय की भारत सरकार की ओरवेलियन व्याख्या पर ही संतोष करना पड़ा. इस अपरिहार्य प्रक्रिया के माध्यम से सरकार ने हवाई तरंगों को भारत के शहरी परिदृश्य में व्यवसायिक खिलाड़ियों के लिए बेहद सरल और संभव बना दिया. जैसे ही हवाई तरंगें सरकारी नियंत्रण से मुक्तहुईं, वैसे ही भारत के रेडियो में अनेक प्रकार के परिवर्तन होने लगे. परंतु सामाजिक क्षेत्र सूना ही रह गया और अपने रेडियो का सपना देखने वाले ग्रामीण क्षेत्र की आवाज़ को सुनने में किसी को दिलचस्पी न रही. देश में तीन स्तरीय स्वतंत्र और अलाभकारी प्रसारण की एक अरसे से चली आ रही मांगों के फलस्वरूप आरंभ में 2003 की पहली तिमाही में सामुदायिक रेडियो का सीमित कैंपस अवतार सामने आया.
इसके कारण प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं ने एफएम ट्रांसमीटर लगाना और रेडियो स्टेशन चलाना शुरू कर दिया. इस निर्णय के कारण राज्य की चौधराहट कुछ हद तक कम हुई और रेडियो पर मार्केटिंग शुरू हुई. लेकिन शहरी और शिक्षित भद्रलोक के लिए ऐसे इलाक़े में जहां मीडिया पहले से ही जमा हुआ हो, प्रसारण क्षेत्र के खुलने से सामुदायिक रेडियो अभियान की मूल भावना को ही क्षति पहुंची. सरकार बहुत समय तक इस अनावश्यक आशंका के कारण कि अलगाववादी, आतंकवादी और विनाशक तत्व इस माध्यम का दुरुपयोग कर सकते हैं, इस क्षेत्र में प्रसारण क्षेत्र खोलने के प्रस्ताव को टालती रही, कांग्रेसनीत यूपीए की केंद्र सरकार ने सूचना अधिकार अधिनियम और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी (मनरेगा) अधिनियम जैसी ग़रीब समर्थक नीतियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाने के लिए सामुदायिक रेडियो की वास्तविक मांग को अंततः मान लिया. 2006 से नई विस्तारित नीति के कारण पहले से भली-भांति सामुदायिक विकास कार्यों में संलग्न ग़ैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को रेडियो स्टेशन स्थापित करने की अनुमति दे दी गई. इस समुदाय को स्वामित्व और प्रबंधन का अधिकार देने के साथ-साथ नीति में यह व्यवस्था भी की गई कि कम से कम 50 प्रतिशत विषयवस्तु स्थानीय भाषा में उनके समुदाय की सहभागिता के साथ होनी चाहिए. नई नीति के मौजूदा ढांचे में सामुदायिक रेडियो स्टेशनों को समाचार और सामयिक विषयों को प्रसारित करने की अनुमति नहीं दी गई.
सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त शैक्षिक संस्थाओं से इतर संगठनों के लिए आवेदन की प्रक्रिया बहुत जटिल है और उनके लिए आवश्यक है कि वे सामुदायिक रेडियो स्टेशन को ऑपरेशन बनाने से पहले कई मंत्रालयों की स्वीकृति प्राप्त करें. कुछ हद तक यह भी एक कारण है कि नीति की घोषणा के चार वर्षों के बाद भी सौ में से एक तिहाई रेडियो स्टेशन ही भारत में ज़मीन से जुड़े संगठनों द्वारा चलाए जा रहे हैं और शेष कैंपस रेडियो हैं. इस उदीयमान क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सामुदायिक रेडियो मंच जैसे समूह अधिक उदार लाइसेंसिंग कार्याविधि के लिए सामुदायिक रेडियो सहायता निधि द्वारा सार्वजनिक वित्त के सृजन की प्रक्रिया चलाने के लिए सूचना व प्रसारण मंत्रालय के साथ काम कर रहा है.
इस बीच जनरल नरसम्मा और उनकी सहयोग एल्गोल नरसम्मा नाम की दो दलित महिलाएं, जो संघम रेडियो चलाती हैं, अपने यरंदला मुचातलु नाम के तेलुगू शो से दर्शकों का मनोरंजन करती हैं. इस शो में दो ननदों के गपशप भरे संवादों की मिमिक्री के माध्यम से वे अपने समुदाय में सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण मुद्दे उठाती हैं.
(लेखक सरोजिनी नायडू स्कूल ऑफ आट्‌र्स एंड कम्युनिकेशंस के डीन और भारतीय सामुदायिक रेडियो मंच के अध्यक्ष हैं.) 

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