गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

सरकार की पार्टनर मीडिया?



Friday, April 2, 2010



बॉलीवुड फिल्म रणसे लेकर माय नेम इज खानऔर गजनीसे लेकर थ्री इंडियट्स। कोई भी चर्चित फिल्म, जो बीते तीन-चार वर्षो में लोकप्रिय और हिट रही हो या फिर आने वाली हो, वो बिना मीडिया पार्टनर के आपको नजर नहीं आयेगी। पार्टनर बनने को लेकर होड़ भी कुछ इस तरह है कि राष्ट्रीय न्यूज चैनल चाहे वह हिन्दी के हो या अंग्रेजी के सभी पार्टनर बनना भी चाहते है। फिल्म वाले बनाना भी चाहते हैं। निश्चित तौर पर जब कोई न्यूज चैनल पार्टनर हो जायेगा तो फिल्म के बारे में बताने का उसका नजरिया भी बदल जायेगा और न्यूज चैनल के स्क्रीन पर फिल्म के कार्यक्रम से लेकर नायक-नायिका का इंटरव्यू भी फिल्म को हिट बनाने की दिशा में ही उठेगा।
जाहिर है न्यूज चैनल को पार्टनर बना कर अपने माल को बेचने का मतलब सीधा सा है कि उत्पाद की क्रेडेबिलिटी बने। वहीं इंफोटेनमेंट में बदलते न्यूज चैनलों के लिये आपसी प्रतिद्वन्दिता में बाजी मार लेने का खेल भी है। चैनल की इस पार्ट्नरशीप का विस्तार इतना हो चुका है कि देश में कोई भी कार्यक्रम हो या नया प्रोजेक्ट सभी के साथ मीडिया का कोई ना कोई समूह बतौर पार्टनर नजर आ सकता है। मीडिया की यह पार्टनरशीप किसी राजनीतिक दल से जुड़े किसी संगठन के कार्यक्रम से लेकर किसी बड़ी कंपनी के किसी नये उत्पाद को लांच करते वक्त भी नजर आ सकती है। यह वह परिस्थितियां हैं, जो मीडिया को लेकर समाज के भीतर चौथे खम्भे के होने का एहसास खत्म करती हैं। अगर हर जगह कोई न कोई न्यूज चैनल किसी ना किसी का पार्टनर होगा तो चौथे खम्भे को लेकर यह भ्रम तो टूटेगा ही कि मीडिया की निगरानी में सभी हैं। या फिर मीडिया का काम निगरानी का है। और अगर मीडिया समाज के भीतर धंधा करने वालों के साथ ही खड़ा है तो फिर धंधे की विश्वसनीयता चाहे मीडिया के आसरे बन जाये लेकिन मीडिया की अपनी विश्वसनीयता तो दांव पर लगेगी ही।
असल में चौथा खम्भा बने रहकर न्यूज चैनल चलाना यहीं से मुश्किल होता नजर आता है। बिकने और खरीदने का साथ मुनाफे का कोई भी रुप अपना लेने में न्यूज चैनलों को कोई परेशानी होती नहीं । क्योंकि आखिरी मापदंड जब मुनाफे की रकम का जुगाड़ होती है तो चाहे न्यूज चैनलों की कनैक्टिविटी का सवाल हो या विज्ञापन लाने का या फिर टीआरपी के जरीये चैनल को आगे बढ़ाने की होड़ का। पहले यह एकदूसरे के सहयोग पर टिकता है। फिर सभी एक सरीखा लगने लगता है। और आखिर में न्यूज चैनल के भीतर मास्टरवॉयस उसी की मानी जाती है जो सबसे ज्यादा खांटी नोटों के तौर पर मुनाफा दिलवा रहा हो।
इस परिस्थिति में खुद को बनाये या टिकाये रखने के लिये न्यूज चैनलों के भीतर बिना पार्टनर लिखे या बिना पार्टनर बताये पार्टनर बनने की शुरुआत होती है। और चूंकि राजनीति सबसे पावरफुल सत्ता है तो उसके साथ मूक सहमति की पार्टनरशीप की शुरुआत होती है। लेकिन मीडिया के मंचो से मुनाफा कमाने-बनाने के आगे सरकार के साथ पार्टनरशीप की भी शुरुआत हो चुकी है। यह सिर्फ चुनाव के वक्त पेड न्यूज से ही नहीं उभरा बल्कि कौन सी खबर कवर की जाये और कौन सी नहीं इससे भी उभरने लगा है। जिस तरह राष्ट्रीय और क्षेत्रीय न्यूज चैनलों का अपना अलग वजूद होता है वैसे ही राष्ट्रीय न्यूज चैनलों और क्षेत्रीय स्तर के मीडिया की पार्टनरशीप अलग अलग तरह से कहीं भी देखी समझी जा सकती है। मसलन शरद पवार को निशाना बनाने की मुहिम जब सरकार के भीतर शुरु हुई और कांग्रेस खुल कर महंगाई के लिये कृषि मंत्री को घेरने निकली तो जो बात राष्ट्रीय न्यूज चैनल कह रहे थे या कहें कि दिखा रहे थे वह महाराष्ट्र के न्यूज चैनलो में न तो दिखाया जा रहा था न बताया जा रहा था। पवार की राजनीति को महाराष्ट्र में टक्कर देना कांग्रेस के बूते अभी तक नहीं है और पवार के मुनाफे के घेरे में महाराष्ट्र के न्यूज चैनलों की समूची फेरहिस्त आती है। ऐसे में वहां की रिपोर्टिंग में कृषि मंत्री के साथ साथ समूची कैबिनेट और पीएम का जिक्र हर कोई कर रहा था लेकिन दिल्ली के न्यूज चैनलों में महंगाई को लेकर समूचा ठीकरा पवार पर ही फोड़ा गया।
वहीं इस दौर में महंगाई की असल वजह पर कोई रिपोर्टिंग किसी न्यूज चैनल ने नहीं की। पहली बार गन्ने को लेकर मायावती ने उत्तर प्रदेश में महाराष्ट्र में पवार की लॉबी से बडी लॉबी बना ली और चीनी के दामों पर अपनी नकेल कस डाली लेकिन इस पर कोई रिपोर्टिंग नजर नहीं आयी कि मुनाफाखोरी-जमाखोरी के साथ साथ उत्पादों पर कब्जा करने के लिये व्यापारियों का राजनीतिक वर्ग बनाने की भी नयी पहल सत्ता ने ही शुरु कर दी है। जो शेयर बाजार की तरह न सिर्फ कीमतो को अपने अनुसार ऊपर-नीचे कर सकते हैं बल्कि शेयर दलाल की तर्ज पर समूचे बाजार को भी राजनीतिक हित साधने से जोड़ सकते है। मीडिया की यह पार्टनरशीप खबरों को भी राजनीतिक सत्ता के मुताबिक परिभाषित कर सकती है। महिला आरक्षण से लेकर नरेन्द्र मोदी की एसआईटी के सामने पेशी इसका एक छोटा सा उदाहरण है। महिला आरक्षण राज्यसभा में तो लागू होना नहीं है और लोकसभा में सांसदो के सामने संकट आना है तो ऊपरी सदन में जल्दबाजी में पास होना और निचले सदन में अनिश्चितकाल के लिये रोकने की वजह के पीछे की कहानी कभी मीडिया में नहीं आयेगी। जबकि हर कोई जानता है कि आरक्षण के समर्थन में राजनीतिक दलों के सांसदों की संख्या दो तिहाई है। वहीं मोदी एसआईटी दफ्तर के बाहर जमा तमाम न्यूज चैनलों के लिये चाय नाश्ते की व्यवस्था भी कराते हैं और पूछताछ के बाद मीडिया से मजे भी लेते है कि कोई मसाला उन्हें मिला या नहीं। जबकि किसी न्यूज चैनल पर यह सवाल नहीं रेंगता कि गुलबर्ग कांड के 24 धंटे बाद भी एक भी पुलिसकर्मी या सुरक्षाकर्मी वहां क्यो नहीं पहुंचा और मोदी जब एसआईटी के दप्तर पहुंचे तो उनके निवास से एसआईटी दफ्तर के डेढ़ किलोमीटर की दूरी के बीच में सुरक्षा के लिये करीब नौ सौ पुलिस वालों की तैनाती की जरुरत क्यों थी।
असल में राजनीति या सरकार से यह पार्टनरशीप कोई सीधा लाभ किसी न्यूज चैनल को पहुंचाती हो ऐसा भी नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि सरकार या राजनीति के रुठने पर किसी न्यूज चैनल के सामने संकट के बादल मंडराने लगे। लेकिन पार्टनर होकर जिस तरह से सत्ता के भीतर सत्ता का घेरा हर संस्थान बना रहा है और उसमें शरीक होने के लिये मीडिया समूहो से जुड़ा उच्च तबका बैचेन है, उससे कई सवाल खुद-ब-खुद निकल पड़े हैं। क्या व्यवस्था का खाका ही संस्थानो की सहमति के आधार पर बन रहा है। सहमति और पार्टनर होकर मुश्किलों को ना सिर्फ टाला जा सकता है बल्कि ज्यादा बड़ी सत्ता के लिये कॉकस भी बनाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात तो यही है कि क्या पदों पर बैठे लोगों को इसका एहसास हो चुका है कि जिस तेजी से देश की अर्थव्यवस्था कुलाचे मार रही है अगर उसमें मुनाफा बनाते हुये टिके रहना है तो पार्टनर बन कर जीया जा सकता है। जिसके लिये लोकतंत्र के सारे खम्भे ढहा ही क्यों ना दिये जायें। क्योंकि नया लोकतंत्र जनता या सरोकार में नहीं बाजार और मुनाफे पर टिका है, और फिलहाल उसका पार्टनर मीडिया है। तो आवाज कौन उठायेगा?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें