शनिवार, 17 दिसंबर 2011

इतिहास रचनेवाली खबरें




1990-फादर टेटे हत्याकांड
यह बहुत कम लोगों की जानकारी में होगा कि ज्ञानरंजन ने प्रभात खबर को पहले हिंदी और फ़िर बाद में 1988-89 में, अंगरेजी भाषा, दोनों में शुरू किया था. ऊषा मार्टिन के.ग्रहण (1989) के समय अंगरेजी प्रभात खबर का प्रकाशन जारी था. लेकिन यह अंगरेजी अखबार के मापदंडों को कहीं से पूरा नहीं कर पा रहा था. अंगरेजी प्रभात खबर के संपादक उदय सिन्हा हुआ करते थे. 1991 में तत्कालीन प्रबंध ने इसे बंद करने का निर्णय लिया. संसाधनों की कमी इसके बंद होने की एक अहम वजह रही. लेकिन अंगरेजी प्रभात खबर को एक महत्वपूर्ण समाचार के प्रकाशन के लिए हमेशा याद किया जायेगा. प्रभात खबर (हिंदी) को इसने एक ऐसी खबर दी, जिससे यह अखबार पहली बार पाठकों की नजर नजर में आया. वह खबर थी जीईएल चर्च के प्रापर्टी विभाग के अधिकारी फादर टेटे की हत्या.
फादर टेटे की मौत को महीने भर तक स्वाभाविक मृत्यु माना जाता रहा. लेकिन प्रभात खबर ने इसे संदिग्ध मौत मानते हुए हत्या करार दिया था. मामले में नया मोड़ तब आया, जब प्रभात खबर ने ही जाली मृत्यु प्रमाण पत्र की फोटो प्रति छापी. पुलिस ने मामले को जिस तरह से उठाया था, उससें और भी विवाद पैदा हो गया. कोलकाता के सबसे बड़े पांच सितारा होटल में उनकी मौत हुई थी. प्रभात खबर की टीम ने मामले की पड़ताल शुरू की. और महीनों इसकी रपटें छपती रहीं. इधर नंबर वन रांची एक्‍सप्रेस समेत सभी अन्य दैनिक रोज ही प्रभात खबर की खबरों को काउंटर करते.
इस पूरे विवाद का कारण था हत्या के आरोपी रोशनलाल भाटिया का कदावर कांग्रेसी नेता होना. भाटिया ने इसे राजनीतिक. साजिश बताते हुए प्रभात खबर पर भी पक्षपात का आरोप लगाया. भाटिया की पकड़ का अनुमान इसी से लगाया जा सकता था कि. तत्कालिन झारखंड पार्टी के अध्यक्ष और कद्दावर नेता एनइ होरो, जो जीईएल चर्च के एक मजबूत स्तंभ थे, खुल कर भाटिया की वकालत कर रहे थे. प्रकरण में नाम छपते ही भाटिया ने एक करोड़ का मानहानि का मुकदमा राजधानी पटना की अदालत में कर दिया. प्रभात खबर पर कर दिया. केस लड़ने के लिए तब के बिहार के सबसे अच्छे वकील को भाटिया ने अनुबंधित किया.
हत्या के केंद्र में निर्माणाधीन वह एयर कंडीशन शॉपिंग कांप्लेक्‍स था, जो जीईएल चर्च की प्रापर्टी था. और जिसका निर्माण चर्च के ही निकट किया जा रहा था. रोशन लाल भाटिया इस कांप्लेक्‍स के ठेकेदार थे. बहरहाल प्रभात खबर अपने स्टैंड पर कायम रहा. मामले को सीबीआइ के सुपुर्द करना पड़ा. और एक महीने बाद फादरटेटे की कब्र से लाश को निकाल कर पुनः पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया.
इस कांड की रिपोर्टिग बेहद जोखिम भरी थी. क्‍योंकि यह मामला ईसाई समुदाय से जुड़ा हुआ था, जो कि अखबार का संभावित सबसे बड़ा पाठक वर्ग था. दूसरी बात, एनई होरो जैसे वरिष्ठ आंदोलनकारी व झारखंडी नेता, जिनकी ईसाई समुदाय पर पकड़ थी- के भी विरुद्ध जाकर तथ्यों को सामने रखना था. अंततः सत्य की विजय हुई. रोशनलाल भटिया को जेल जाना पड़ा और प्रभात खबर ने सत्य के. साथ खड़ा होने की दिशा में पहली पहचान बनायी.
कांग्रेसी लेबल से निकल कर प्रभात खबर घर-घर तक पहुंचा. यह किसी उपहार योजना का मार्केटिंग रणनीति के तहत नहीं- सामाजिक सरोकार से जुड़ने के. कारण संभव हो पाया. यह बात अलग है कि इस रिपोर्टिग के लिए पत्रकारों के साथ मारपीट की गयी. संवाददाता अनिल श्रीवास्तव और छायाकार मानिक, रोशन लाल भाटिया के शिकार बने. दोनों ने भाटिया के खिलाफ थाने में रपट भी दर्ज करायी थी. मगर यह काफी नहीं था. प्रभात खबर पर एक करोड़ का मानहानि का मुकदमा हुआ. मगर तब तक मामला राष्टीय स्तरपर सुर्खियां बन चुका था. इंडिया टुडे, संडे ऑब्जर्वर और द वीक सभी ने इसे फिर कवरेज दिया.
मिसेज धवन प्रकरण
टेटे हत्याकांड के बाद, 90 में ही, जब प्रभात खबर नये प्रयोग कर रहा था, रांची के हवाई नगर नामक स्थान में एक घर में डकैती हुई. उस समय लोकसभा के चुनाव होनेवाले थे. अखबार के पन्ने नेताओं की बयानबाजी और राष्‍ट्रीय खबरों से भरे जा रहे थे. जो चुनाव के माहौल में अक्‍सर होता है. प्रभात खबर ने इस डकैती को प्रथम लीड बनाते हुए रांची में कानून व्यवस्था का मुद्दा बुलंद किया. तब रांची में शाम छह बजे के बाद अपराध के कारण सड़कें सुनसान होने लगती थीं. यह डकैती एक ऐसे घर में हुई थी, जहां एक विधवा महिला मिसेज धवन, अपनी दो बेटियों के साथ रहती थीं. यह साहसिक प्रयोग था. लेकिन अखबार की दुनिया में इसे नकारत्मक पहल का नाम दिया गया. पर इसके बाद लोकसभा के प्रत्याशी रांची में कानून व्यवस्था के मुद्दे पर ही फिर वोट मांगते देखे गये. इस घटना और अखबार की पहल ने दक्षिण बिहार के. अन्य शहरों में भी कानून-व्यवस्था को चुनावी मुद्दा बनाया. हरिवंश जी स्वयं इस घटना को याद करते हुए कहते हैं-हम उन दिनों लोकल हुए. जब इसकी आहट अखबारों में नहीं थी. आज यही काम देश के बड़े अखबार कर रहे हैं. स्थानीय खबरों और मानवीय घटनाओं को लीड की परंपरा अब चली है. जबकि हमारी शुरुआत ही इस परंपरा से हुई. इस दौर में प्रथम पृष्ठ का लीड बड़ी घटनाएं, बड़े लोग बनते थे. प्रभात खबर ने यह स्थान मामूली और साधारण लोगों को दिया. खूब आलोचना हुई. लेकिन प्रभात खबर की टीम ने तय कर रखा था कि आलोचनाओं पर ध्यान नहीं देना है.
अयोध्या मामला
ये वे दिन थे, जब अखबार अफवाहों को सुर्खियां बना कर देश भर में तनाव फैला रहे थे. ऐसे में रांची या झारखंड क्‍यों पीछे रहता. बाजार का समीकरण भी यही कहता था. दूसरी तरफ. प्रभात खबर की प्रतिबद्ध टीम थी, जिसने सच से समझौता न करने का संकल्प ले रखा था. शहर में कर्फ्यू जैसा माहौल था. प्रभात खबर इस पूरी राजनीति और अफवाह आधारित पत्रकारिता के खिलाफ खड़ा हुआ. छह अक्‍टूबर 1990 को अयोध्या में कितने लोग मारे गये- इसकी अधिकतम संख्या छापने की होड़ थी. एक अखबार ने लिखा- सरयू का पानी रामभूमि के खून से लाल हो गया. रांची के एक अखबार के तीन संस्करण में क्रमशः 200, 400और 800 लोगों के मरने की खबर छपी. मगर प्रभात खबर का लीड सिर्फ छह लोगों के मरने का बना. तत्कालिन निर्देशक डीएस शर्मा ने सूचना दी कि बाजार में अखबार की मांग नहीं है. हॉकर अखबार नहीं उठा रहे हैं. लोग इसे मुसलमानों का अखबार कह रहे हैं. ऐसा इसलिए कहा गया था क्‍योंकि प्रभात खबर नें कुछ माह पूर्व भागलपुर दंगे को रपट तसवीरों के साथ प्रकाशित की थी. इसके खिलाफ में परचे बांटे गये थे. लेकिन बाद में साबित हो गया कि प्रभात खबर की सूचना ही सही थी. यह सूचना बीबीसी लंदन के लिए लखनऊ से रिपोर्टिंग करनेवाली टीम और लखनऊ, नवभारत टाइम्स के मित्रों से ली गयी थी.
प्रभात खबर में इस स्थिति पर खास बैठक. हुई. खुद हरिवंश जी ने डायरेक्‍टर शर्मा से कहा कि हमें चुनना है कि हम सच के साथ रहेंगे या अफवाहों के साथ उस समय भी, उस पूरी टीम ने सच के साथ रहने का निर्णय लिया. उन दिनों जो अखबार लाखों प्रतियां झूठी खबरें छाप कर बेच रहे थे, आज दम तोड़ने की स्थिति में हैं. जो प्रभात खबर 500 बिकता था- उसके. आज 14.29 लाख (आइआरएस- 2007) पाठक हैं. यह किसी अकेले प्रभात खबर की ताकत नहीं, सत्य और तथ्य पर होनेवाली पत्रकारिता की ताकत थी. इसी तरह अफवाहों की पत्रकारिता पर, उन्हीं दिनों प्रभात खबर ने एक दूसरी खबर पर भी अपना स्टैंड लिया. अयोध्या प्रकरण से पहले कुछ असामाजिक तत्वों ने ईसाई मिशनरियों के कुछ लोगों पर गुमला में कुआं में जहर घोलने का झूठा प्रचार किया. इसके खिलाफ भी प्रभात खबर ने मुहिम चलायी. सही तथ्यों को सामने रखा. और इलाके को तनाव से हिंसा की ओर जाने से बचाया.
इस क्रम में कई ऐसे मामले आये जब अखबार पर मुकदमे हुए. दर्जनों बार जमानत लेनी पड़ी. पत्रकारों और संपादक तक को मिलनेवाली धमकियों का तो जिक्र ही यहां व्यर्थ है.
जब अखबार की भूमिका से दंगा फैला
छठ पूजा का झारखंड व बिहार में खास महत्व है. हिंदू धर्मनुयाइयों की आस्था का सर्वाधिक शुद्धतम रूप शायद इसी मौके पर देखने को मिलता है, जब 48 घंटे के उपवास की स्थिति में लोग घाट पर अघ्र्य अर्पित करने के लिए सूर्योदय के पहले से ही इकट्ठा होने लगते हैं. उपवास और समय के अनुसार इस पूजा में शामिल लोगों की मानसिक स्थिति का अनुमान सहज लगाया जा सकता है. इस मौके पर घटी छोटी से छोटी घटना भी चिंगारी बनकर माहौल को अशांत कर सकती है. 90 के आसपास ही, जब अयोध्या का मामला गर्म था, रांची में इसी छठ पूजा के अवसर पर एक अखबार की भ्रामक सूचनाओं के कारण शहर में दंगा फैल गया. झूठी खबर छापकर घाट पर जाकर इस अखबार की प्रतियां बांटी गयीं. प्रभात खबर ने उस अखबार की भूमिका के बारे में लिखा. प्रेस काउंसिल से शिकायत की. प्रेस काउंसिल की टीम जस्टिस सरकारिया के नेतृत्व में रांची आयी खुली सुनवाई हुई और प्रेस काउंसिल ने हिंदी अखबारों की दंगाई भूमिका पर ऐतिहासिक. रिपोर्ट दी. इस टीम में देश के मूर्धन्य पत्रकार-साहित्यकार रघुवीर सहाय भी थे. उन्होंने प्रभात खबर की भूमिका की सराहना की और अखबार में स्तंभ लिखने का अनुरोध भी स्वीकार किया.
रांची महिला कॉलेज का रैगिंग मामला 1991
देश में रैगिंग के मामले नये नहीं है. इस से संबंधित राष्‍ट्रीय बहस और कानून की जरुरत है. यह बातें सभी जानते हैं. समझते हैं. लेकिन इसमें एक अखबार क्‍या भूमिका निभा सकता है- इसकी भी संभावनाएं तलाश करने की जरूरत है. बल्कि रैगिंग ही क्‍यों, ऐसी हर छोटी बड़ी घटना- जिसमें कहीं से बदलाव के बीज अंकुरित होते हों- मीडिया को चाहिए कि उस बीज को खाद-पानी दे. मगर प्रायः ऐसे मामले भी राजनीति, जाति, वर्ग और फिर अंततः स्वार्थ से जाकर जुड़ जाते हैं. और अखबारी भाषा में कहें तो कभी-कभी यह मामला प्रत्यक्ष रूप से विज्ञापन से जुड़ जाता है. मगर प्रभात खबर ने इन स्वार्थो की अनदेखी करते हुए हमेशा ऐसे मामलों-मुद्दों को न सिर्फ रेखांकित किया बल्कि बदलाव की एक छोटी से छोटी पहल को भी व्यापकता प्रदान की. उसे अंतिम मुकाम तक पहुंचाया. इस संदर्भ में 1991 में रांची महिला कॉलेज की एक छात्रा की रैगिंग के मामले का जिक्र यहां प्रासंगिक होगा. नवंबर में 1991 में आशा नाम की गर्भवती छात्रा के साथ रैगिंग हुआ. वह दलित थी. यह पहचान उजागर होते ही ऊंची जाति की छात्राओं ने उसे रैगिंग के बहाने प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. उससे कई अनुचित सवाल पूछे गये. नहीं बताने पर उसे कॉलेज की सीढ़ियों पर तब तक. चढ़ते उतरते रहने को कहा गया जब तक कि दूसरा आदेश न मिले. आशा ने छात्राओं को बताया कि वह गर्भवती है और डॉटर ने उसे सीढ़ियां चढ़ने से मना किया है. मगर उद्दंड छात्राएं फ़िर भी नहीं मानी. अंतत वह घायल हुई और उसे गर्भपात कराना पड़ा. कॉलेज की प्रिंसिपल विनोदिनी तर्वे ने बजाए दोषी छात्राओं को दंडित करने के आशा पर ही खामोश रहने का दबाव डाला. आशा के घर वालों ने प्रिंसिपल तर्वे को लिखित शिकायत दी. तर्वे ने तब घटना की जानकारी से ही इंकार किया. इससे छात्राओं का विरोध बढ़ता गया. कॉलेज की अन्य छात्राओं के साथ महिला संगठनों ने भी कॉलेज प्रशासन और तर्वे के विरुद्ध आवाज उठायी. प्रभात खबर ने इस घटना पर बारीक नजर रखते हुए प्रतिदिन रिपोर्ट छापा. इससे आंदोलन को ताकत मिली और यह पूरे शहर में फ़ैल गया. दूसरे अखबार लाभ-हानि का समीकरण बैठाने में व्यस्त रहे.
बहरहाल कुलाधिपति के निर्देश पर चार सदस्यी कमेटी बनी और दोषी छात्रा को दो वर्ष के लिए कॉलेज से निष्कासित किया गया. कानून बना. देखने में यह घटना मामूली लगती है लेकिन उस समय के झारखंड क्षेत्र, यानी दक्षिण बिहार की सामाजिक.,राजनीतिक. अवस्था का भी जिक्र यहां जरूरी है. राज्य उस समय बंटा नहीं था और दक्षिण बिहार मुख्यतः आदि‍वासी, पिछड़ापन राजनीतिक चेतना से वंचित और अशिक्षित क्षेत्र रहा है. आज की तरह उस समय क्षेत्र में न फ़ेमिनिस्टों का उदय हो पाया था, न नारीवादी चेतना प्रचार-प्रसार. ऐसे वातावरण में महिला से जुड़ी इस घटना को जिस व्यापकता के साथ प्रभात खबर ने आंदोलन का रूप दिया वह महत्वपूर्ण है. प्रभात खबर की इस भूमिका को आज भी याद किया जाता है. अंग्रेजी पत्रिका इकोनोमिक एंड पोलटिकल वीकली ने तब इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा- रांची जैसे छोटे शहर में नारीवादी चेतना का यह उभार कई मायने में महत्वपूर्ण है. और इसमें प्रभात खबर के रोल को अलग से सराहा जाना चाहिए. और आगे इसने लिखा, पिछले वर्ष यानी 1990 में ही दिल्ली विश्‍विद्यालय के रामजस कॉलेज की एक छात्रा के साथ भी इसी तरह की घिनौनी रैगिंग की गयी. यहां भी ऊंची जाति की कुछ छात्राओं ने एक छात्रा को हॉस्टल में वस्त्रहीन किया. स्वभाविक रूप से मामले ने तूल पकड़ा. मगर दिल्ली जो कि देश की राजधानी है, न्याय का केंद्र है, बड़े-बड़े फ़ेमिनिस्ट और नारी संगठन यहां सक्रिय हैं- यह सब मिलकर भी पीड़ित छात्रा को न्याय नहीं दिला सके सिर्फ यह हुआ कि दोषी छात्राओं को 200 रुपये का दंड भुगतान करने का आदेश दिया गया. मगर रांची जैसे पिछड़े इलाके में दोषी को न सिर्फ उचित सजा मिली बल्कि कॉलेज प्रशासन को कानून भी पारित करना पड़ा. निसंदेह इसके पीछे एक अखबार और उसकी दृष्टि की आहम भूमिका है.
चारा घोटाला अब तक सुनाई दे रही है प्रतिध्वनि
लगभग प्रत्येक महीने, दो महीने में, डेढ़ दशक पुराने पड़ चुके चारा घोटाले के दोषियों पर कार्रवाई-सुनवाई का सिलसिला अब भी जारी है. अपने समय का यह सबसे बड़ा घोटाला (लगभग 900 करोड़ से अधिक) था. इसके पर्दाफ़ाश का श्रेय प्रभात खबर को जाता है. देश और फ़िर विदेश तक इस घोटाले की चर्चा हई. कारण था तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद का नाम इस घोटाले के साथ जुड़ना. ऐसा भी नहीं है कि इस घोटाले की चर्चा प्रभात खबर में छपने से पूर्व नहीं थी. मगर इससे जुड़े हए नाम इतने प्रभावशाली और कद्दावर थे कि इसे छापना तो दूर खुले जबान से इसकी चर्चा करने तक से मीडिया जगत के लोग कतराते थे. इस बारे में ट्रिब्यून में वरिष्ठ पत्रकार अजित भट्टाचार्य ने बाद में लिखा- मैं इस समय स्थानीय पत्रकारों के साथ एक मीटिंग में भाग लेने के लिए रांची में था. सीबीआइ लालू प्रसाद के खिलाफ़ चार्जशीट दाखिल करने पर विचार कर रही थी. तब अनुमान था कि मामला लगभग 50-60 करोड़ का है. पिछले 8-10 वर्षों से रांची में इस घोटाले को लेकरअफ़वाहों का बाजार गर्म था. इसमें नेताओं और नौकरशाही की संलग्नता की जानकारी भी लोगों को थी. नौकरशाही और राजनीतिज्ञों के गंठबंधन को देखते हए यह अनुमान लगाया जा रहा था कि किसी भी जांच को आगे बढ़ने नहीं दिया जायेगा. लोगों की यही धारणा बनी रहती अगर प्रभात खबर ने इसे प्रकाशित करने का साहस नहीं किया होता. 1993 में चारा घोटाले से संबंधित पहला समाचार छपा और अगले 12 माह में 70 रिपोर्टे चारा घोटाले पर छपे. उस समय इस घाटोले की अनुमानित राशि सिर्फ़ आठ करोड़ की थी. संवाददाता और संपादक को धमकियां मिलीं. मगर घोटाले की सूचना जनता तक पहंचाने का अभियान जारी रहा. राष्ट्रीय अखबारों ने काफ़ी देर से इस घोटाले को महत्व देना आरंभ किया. इस कारण पूरे देश ने इस घोटाले को 96 में जाना. बाद में टेलीग्राफ़, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और इकोनॉमिक्स टाइम्स जैसे अखबारों ने इसे लीड बनाया. चारा घोटाले की रिपोर्टिग का श्रेय हरिवंश किसलय को देते हैं. स्वयं किसलय इस रिपोर्टिग के बारे में कहते हैं- जो दस्तावेज मेरे हाथ लगे थे उसे लेकर हरिवंश जी के चेंबर में दाखिल होते हए मेरे पांव लड़खड़ा रहे थे. कारण जोखिम के बीच से हासिल किये गये इस दस्तावेज में उल्लेखित नाम राजनीतिक रूप से इतने भारी-भरकम थे कि इनकी चर्चा दबी जुबान से होती तो थी, लेकिन लोग कुछ लिखने से कतराते थे. हरिवंश जी ने दस्तावेजों को ध्यान से देखा और फ़िर कहा- आप रिपोर्ट बना कर फ़ाइल कीजिए. आज सोचता हूं उस कुरसी पर कोई दूसरा संपादक होता, तो क्या होता? बहरहाल बाद की कहानी पूरा देश जानता है.
घोटाले से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
1993 में प्रभात खबर ने चारा घोटाला के बारे में पहली रपट प्रकाशित की. 900 करोड़ रुपये (वर्तमान अनुमानित राशि) के इस घोटाले ने पूरे देश में सनसनी फ़ैला दी. आरंभ में इस घोटाले की राशि आठ करोड़ आंकी गयी, पर जैसे-जैसे रिपोर्टिग आगे बढ़ती गयी यह राशि भी बढ़ती गयी. हालांकि 1990 में राज्यसतर्कता विभाग ने इस मामले में एफ़आइआर दर्ज कर रखा था. मगर सत्ता और नौकरशाही के दिग्गजों की ओर संकेत होने के कारण जांच रुकी पड़ी थी. इस घोटाले की चर्चा भी आम थी. मगर इसे छापने का साहस किसी में नहीं था. प्रभात खबर ने 12 माह में इस घोटाले की 70 रपटें छापीं और चार रिपोर्टर इसके लिए बहाल किया. खमियाजा- धमकियां, दबाव और विज्ञापन में भारी कटौती. दूसरी ओर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को कुरसी छोड़नी पड़ी. यह अपनी तरह का अलग घोटाला था. पशुधन के विकास के लिए ब्लड बैंक से पैसे लिये गये थे. यह पैसा बेहतर श्रेणी के चारा के लिए लिया गया था. चारे की आपूर्ति भी हो रही थी. मगर सब कागज पर. इसमें एक रोचक मोड़ कुछ महीनों बाद आया. इनकम टैक्स के कुछ अधिकारियों ने रांची एयरपोर्ट जाकर दिल्ली जानेवाले एक हवाई जहाज को रोकने का प्रयास किया. इसमें नगद डेढ़ करोड़ रुपये ले जाये जा रहे थे. यह रकम जांच में लगे अधिकारियों के तबादले के लिए रिक्‍त के रूप में दिल्ली ले जायी जा रही थी. पर प्रभात खबर के रिपोर्टर हवाई अड्डे पर पहले से उपस्थित थे. दूसरे दिन, जब यह खबर अखबार में छपी, हॉकरों से अखबार के बंडल के बंडल खरीदे गये, जिससे समाचार को फ़ैलने से रोका जा सके. राजनीतिक लॉबी के बाद इस घोटाले में नौकरशाहों की प्रभावशाली भूमिका का अनुमान लगाना भी तब कल्पनातीत था. इसमें दर्जनों आइएएस और आइपीएस अफ़सरों की भागीदारी थी. इस लॉबी ने दो राज्य सरकारों को प्रभावित किया. बहुतों की सजा होने के बावजूद आज भी बहुत सारे आरोपी मुक्त हैं. बिहार और झारखंड में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अभी भी कमजोर अवस्था में है. इससे अखबार की भूमिका और चुनौतीपूर्ण हो जाती है. लेकिन चारा घोटाला के खिलाफ़ कैंपन अभी भी जारी है. धमकियों के बारे में हरिवंश कहते हैं- अगर आप राजनीतिज्ञों को ब्लैकमेल नहीं करते तो आपको कोई खतरा नहीं.
पारा बैंकिंग घोटाला
उदारीकरण यानी 1990 के बाद देश में बिजनेस पत्रकारिता बहुत तेजी से परवान चढ़ी है. इसी के साथ यह भी सत्य है कि उदारीकरण के बाद ही एक से बढ़ कर आर्थि‍क घोटाले भी हुए. देखा जाये तो वाणिज्य पत्रकारिता के विकास से इन आर्थि‍क घोटालों को भी जनता के सामने आना चाहिए था. पर ऐसा हुआ नहीं. इस मामले में पत्रकारिता भी लूट का मुखौटा साबित हई. यह भी अजब संयोग है कि इसी दौर में एक नयी तरह की पत्रकारिता एडवरटोरियल- यानी संपादकीय आयोजित विज्ञापन का जन्म हुआ. विज्ञापन संपादकीय शक्ल में छपने लगे. बाजार का दबाव तो बदस्तूर अपनी जगह कायम था. इस समय प्रभात खबर की टॉप टीम (हरिवंश, केके गोयनका और आरके दत्ता) ने तय किया कि जहां बड़े मुद्दे होंगे, लाखों जनता के हितों का सवाल होगा, हम वहां विज्ञापन को दरकिनार कर जनता के बुनियादी सवालों को चुनेंगे. इसी नीति के तहत जनता को ठगनेवाली नॉन बैंकिंग कंपनियां, जेवीजी, हेलियस, कुबेर वगैरह के विरुद्ध सामग्री छापी गयी. तब छोटे-बड़े सभी अखबार इन कंपनियों के पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छापते और उनकी प्रशंसा में संपादकीय लिखे जाते. सब जानते थे कि जनता के साथ धोखा किया जा रहा है.
प्रभात खबर ने तब सीरिज में इन चीजों के बारे में छापा. इन पारा बैंकिंग कंपनियों ने मुकदमा कर दिया. लाखों लाख का विज्ञापन गंवाया. केंद्र और राज्य सरकार का कोपभाजन बना प्रभात खबर. पर जनता ने जाना कि इन नॉनबैंकिंग कंपनियों के दलाल हेलीकॉप्टर से मोबाइलीजेशन की मीटिंग करते थे. इन हेलीकॉप्टरों में इन दलालों के साथ घूमनेवाले तत्कालिन केंद्रीय मंत्री-मुख्यमंत्री के साथ होने की खबर अखबार ने छापी. हालांकि वे मंच पर साथ नहीं आते थे. ऐसी तमाम कंपनियां जनता को सपना दिखा कर करोड़ों रुपया ठग कर ऐसे चंपत हई कि उनका आज तक पता नहीं चला है. इसी तरह, बैंकों की बैड एंड नान पर्फ़ामिंग राशि का मामला अखबार ने छापा. यहां प्रभात खबर की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो जाती है, इसे समझने के लिए उस समय से, यानी 2005 से अब तक की कुछ घटनाओं और उन पर दूसरे मीडिया घरानों के स्टैंड को जानना जरूरी है. इस संदर्भ में यह जानना यह त्रासद है कि लगभग एक लाख करोड़ रुपयों की राशि (2005 तक) केंद्र सरकार द्वारा राइट ऑफ़ की जा चुकी है. यह राशि किन बड़े घरानों को दी गयी, किन ताकतवर लोगों ने बैंकों में जमा सार्वजनिक पैसे बतौर ऋण लिए और चंपत हो गये, इसकी जानकारी मीडिया ने आम जनता तक पहुंचाने की जरूरत नहीं समझी. कुछ वर्ष पहले इंडियन एक्‍सप्रेस ने इस पर सीरीज चलायी. हिंदी में इन मुद्दों पर प्रभात खबर ने बड़े पैमाने पर सामग्री प्रकाशित कर अभियान चलाया. लेकिन इस प्रकार के राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे अन्य अखबारों, चैनलों पर नजरतक नहीं आये. इसी प्रकार, एनडीए के कार्यकाल में खबर आयी कि अंबानी समूह के दिल्ली स्थित प्रतिनिधि के घर सीबीआइ ने छापा मार कर ऐसे क्‍लासीफ़ाइड डाक्‍यूमेंट्स जब्त किये, जो काफ़ी गोपनीय और संवेदनशील प्रकृति के थे, लेकिन इस मामले को रफ़ा दफ़ा कर दिया गया. कोई नहीं जानता कि यह पूरा मामला क्‍या था और इतने गंभीर मामले के दोषी लोगों पर क्‍या कार्रवाई हुई या हो रही है. किसी सामान्य आदमी के पास ऐसे दस्तावेज मिलते तो वह जेल में चक्की पीस रहा होता. लेकिन देश के ताकतवर औद्योगिक घराने के खिलाफ़ केंद्र सरकार जैसी प्रभुत्वशाली संस्था असमर्थ नजर आयी और मीडिया भी मौन रहा.
इन्हीं दिनों ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि एक साल के भीतर देश के नेताओं-नौकरशाहों ने बहुराष्टीय कंपनियों, कारपोरेट घरानों और दूसरी बड़ी संस्थाओं से कमीशन के बतौर 32000 करोड़ रुपये लिये हैं. यह पैसे सरकार की नीतियों में बदलाव लाने, या किसी तरह के टेंडर हासिल करने के लिए दिये गये थे. लेकिन इतना बड़ा मामला न ता संसद में उठा, न तो मीडिया में इसे मुद्दा बनाया गया. किसी ने इसके जड़ में जाने की कोशिश नहीं की. इंडियन एक्सप्रेस में एचडी शौरी ने इस पर तीन किश्तों में लंबे लेख लिखकर देश को इसकी गंभीरता से अवगत कराया. इसके बावजूद मीडिया का एक बड़ा हिस्सा संवेदनहीन ही बना रहा. इस तरह के अनगिनत ऐसे सवाल हैं, जिनसे पता चलता है कि मीडिया अपेक्षाएं पूरा करने में कामयाब नहीं हो पा रहा है. इसकी एक बड़ी वजह है. देश के प्रमुख निजी और औद्योगिक. घराने आम तौर पर मीडिया के भी स्वामी-संचालक हैं. बैंको से बार-बार ऋण लेकर उसे डुबानेवाले या उस राशि के एनपीए की श्रेणी में डालनेवालों में भी कई ऐसे अविश्वसनीय घराने हैं, जो मीडिया के संचालक हैं. तो भला अपने ही कारनामों को उजागर करने में मीडिया को दिलचस्पी क्यों होगी.
पलामू की भूख
अतीत के अनुभव को अभियान में बदलने की कथा
देश भर से, शोधकर्मी और दूसरे अखबारों की टीम प्रभात खबर की सफलता का रहस्य जानने के लिए आते रहते हैं. कि इस अखबार में ऐसा क्‍या है, जो बेहद कम संसाधनों के बावजूद और कांग्रेसी लेबल (जब तक ज्ञानरंजन इसके मालिक रहे) चस्पां होने के बावजूद इस अंचल में सर्वाधिक प्रसारवाला अखबार बन पाया. जब हरिवंश इसके संपादक बन कर कोलकाता से आये, तो भी दूर-दूर तक इस सफलता की कल्पना नहीं थी. एक समय ऐसा भी आया जब प्रबंधन की ओर से बतौर सलाहकार रखे गये देश के एक जानेमाने मीडियाप्रबंधन के निदेशक ने ही कह दिया कि यह अखबार नही चलनेवाला. दरअसल तब पत्रकारिता जगत का हाल ही ऐसा ही था. बाजार पर रांची एक्‍सप्रेस, आज, आवाज और उदितवाणी जैसे अखबारों का कब्जा था. इन सबके बीच पूंजी का दबाव अपनी जगह पर था. लेकिन प्रभात खबर ने इस निष्कर्ष को न सिर्फ़ गलत साबित किया बल्कि मूल्यों की पत्रकारिता के नये दौर का आगाज भी किया. गहराई से आकलन करें तो इसका श्रेय उस संपादकीय टीम को जाता है, जिसके पास एक दृष्टि संपन्न युवा संपादकीय टीम और युवा प्रबंधन टीम थी. जबतक संपादक और उसकी टीम के पास यह दृष्टि नहीं होगी- तमाम साधनों और पूंजी के बावजूद पत्रकारिता न अभियान (मिशन) में बदल सकती है, न आप पत्रकारिता से जुड़े सामाजिक व राजनीतिक दायित्वों का ऋण ही चुका सकते हैं. यही वजह है कि जब पलामू में भूख से मरने की खबर प्रभात खबर को मिली, तो हरिवंशजी ने इसकी गंभीरता को ऐतिहासिक आइने में समझा. इसे प्रमुखता से छापना शुरू किया. अलग से वहां संवाददाता भेजा, खुद गये. खुद रिपोर्टिग की और राहत कार्य के लिए अपने स्तर से एक कमेटी का गठन किया. भूख से हुई मौतों को सरकार ने पहले (यह 2001 की घटना है, जब झारखंड 2000 में बना ही था) बीमारी से हुई मौत कह कर अखबार पर झूठ छापने का इल्जाम लगाया. दूसरे अखबारों ने भी सच जानने की कोशिश नहीं की. वे नेताओं की बयानबाजी छापने में ही उलझे रहे. आखि‍र इल्जाम झूठा साबित हुआ और सरकार नेमाना कि मौत भूख से हुई है. 50 करोड़ के पैकेज की घोषणा की गयी. सरकार तो झुकी लेकिन इसका खमियाजा प्रभात खबर को भुगतना पड़ा. विज्ञापन कम कर दिये गये.
इस पूरी मुहिम के पीछे क्या था? कौन-सी चेतना, दृष्टि और समझ थी, जो यह संभव हो पाया? यह जानना आज पत्रकारिता के किसी भी छात्र के लिए आवश्यक है. इसके जवाब में हरिवंश अमर्त्य सेन के उस आलेख का जिक्र करते हैं, जिसे उन्होंने 2004 में वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे, 3 मई के अवसर पर वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स के लिए लिखा था. इस लेख में 1943 के बंगाल अकाल और 1958-61 के मशहूर चीनी अकाल की बात कही गयी है. सेन ने यहां समझाने का प्रयास किया है कि यदि प्रेस स्वतंत्र होता, तो इन दोनों अकालों में इतनी बर्बादी नहीं होती. बंगाल के अकाल में हजारों लोग भूख से मारे गये. तब देश गुलाम था और प्रेस को आजादी नहीं थी. इसलिए घटना की भयावहता का जब तक पता चलता, यह विकराल रूप धारण कर चुकी थी. प्रेस को आजादी होती तो निश्चित तौर पर जान-माल का इतना नुकसान नहीं होता. वह सकारात्मक भूमिका निभा सकता था. इसी तरह 1958 में चीन में अकाल पड़ा. आकलन है कि इसमें दो-तीन करोड़ लोग मारे गये. यह वह समय था जब चुनाव में सुधार कार्यक्रम बहुत तेजी से लागू किये जा रहे थे. लोगों को गांवों की ओर भेजा जा रहा था और कृषकों की स्थिति मजबूत बनाने वाली योजनाएं लागू की जा रही थीं. इतना सब होने के बावजूद प्रेस स्वतंत्र नहीं था. जिस कारण अकाल के समाचार सामने नहीं आ सके. आये भी तो आंशिक तौर पर. खामियाजा दो-तीन करोड़ जनता की भूख से मौत. और जब पलामू में अकाल पड़ा तो प्रभात खबर की टीम ने अतीत के इन्हीं अध्यायों से सीख लेते हुए अकाल की घटना को मुहिम में तब्दील कर दिया. लेकिन यह इतना आसान भी नहीं था.
हरिवंश बताते हैं, झारखंड बनते ही वर्ष 2001 में डालटनगंज-पलामू इलाके में सूखा पड़ा. यह अंचल रेन शैडो (जहां वर्षा कम होती है) इलाके में है. 1967में यहां अकाल पड़ा, तो जयप्रकाश नारायण आकर रहे. बिहार रिलीफ़ कमेटी बनी. उस वक्त इस जिले के उपायुक्त कुमार सुरेश सिंह (दुनिया के जाने-माने एंथ्रोपलॉजिस्ट) थे. उन्होंने जिस बेहतर तरीके से उस सूखे की स्थिति से निबटने की प्रशासनिक तैयारी की, वह कुशल प्रबंध कौशल का एक अध्याय बन गया. जेपी ने तारीफ़ की. जेपी ने खुद रिलीफ़ कामों की कमान संभाली. तब संचार-आवागमन की स्थिति खराब थी.पलामू-डालटनगंज के जंगलों में पहंचना कठिन था. उन दिनों इस अकाल की रिपोर्टिग के लिए अज्ञेय, रघुवीर सहाय, जीतेंद्र सिंह और फ़णीश्‍वरनाथ रेणु, पलामू के जंगलों-पहाड़ों में भटके. दिनमान, धर्मयुग और टाइम्स ऑफ़ इंडिया में तब इस अकाल की मार्मिक और दुनिया की यादगार रपटें छपीं. रेणु, अज्ञेय और जीतेंद्र बाबू(टाइम्स ऑफ़ इंडिया के विशेष संवाददाता, अत्यंत मेधावी और निष्ठावान पत्रकार, जेपी के मित्र.) 1967के सूखे, पलायन और अकाल पर (पलामू के संदर्भ में) जो क्लासिक रपटें लिखीं, आज वे रपटें किसी भी भाषा की सर्वश्रेष्ठ रपटों या धरोहरों में से एक हैं. हिंदी पत्रकारिता की अनमोल धरोहर. आज वह पूरा अंचल नक्सल आंदोलन से प्रभावित है. सच तो यह है कि पलामू के ग्रामीण इलाकों में नक्सली संगठन ही राज चला रहे हैं. प्रशासन और सरकार, नगरों तक सिमट गये है. इस अंचल में कई सरकारी अधिकारी-पुलिस अधिकारी, पुलिस के जवान, नक्सली समूहों द्वारा मारे जा चुके हैं. 1967 के अकाल की रिपोर्टिग के लिए दिल्ली-पटना से बड़े पत्रकार-लेखक इन जंगलों में आये. तब यानी 1991 में वहां की स्थिति 67 से कम खराब नहीं थी, पर रांची के पत्रकार भी भूले भटके चार घंटे की यात्रा कर इस इलाके के गांवों में जाने से बचते थे. यह पत्रकारिता के सरोकार में आया बदलाव है. सन् 2000 में झारखंड गठन के वर्ष भर के अंदर इसी डालटनगंज में फ़िर सूखे का प्रकोप हआ.
झारखंड विधानसभा में मामला उठा. राजग की सरकार ने इस इलाके को सूखाग्रस्त घोषित किया. सरकार द्वारा सूखाग्रस्त अंचल घोषित होने के साथ ही कानूनन जो राहत काम (राहत अनाज देने, जन वितरण प्रणालीदुरुस्त करने, रोजगार सृजन के काम आदि‍) शुरू होने चाहिए थे, नहीं हए. छह माह तक कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं हई. न अखबारों में, न सरकारी फ़ाइलों में. डालटनगंज जिला अदालत में एक वकील ने पांकी ब्लाक के एक गांव कुसुमाटांड़ के बारे में शपथपत्र(एफ़ीडेविट) दायर किया. कहा इस गांव में भूख से तीन लोग मरे हैं. इस खबर को प्रभात खबर ने प्रमुखता से छापा. खबर छपने के दूसरे दिन राज्य सरकार के मंत्री उस गांव में हेलिकॉप्टर से पहुंचे. सरकारी अफ़सरों का काफ़िला गया. शाम तक सरकार का स्टैंडर्ड जवाब आ गया. लोग भूख से नहीं, बीमारी से मरे हैं. पर सरकार ने माना कि अकालग्रस्त घोषित होने के बावजूद यहां राहत काम शुरू नहीं हए हैं. कुसुमाटांड़ के दौरे से अफ़सरों को पता चला कि कैसे गांव तक पहंचने के लिए सड़क नहीं है. वर्षों पहले बिहार राज्य में बिजली के खंभें गाड़े गये और सिर्फ़ एक दिन पंद्रह मिनट के लिए बिजली आयी. अब बिजली-खंभों के अवशेष हैं. बिजली तार गायब हैं. पिछले 16 वर्षों से उस गांव में न बिजली है, न सड़क. इसी गांव से सटा पांकी ब्लाक मुख्यालय है, जहां कुछ ही महीनों पहले उग्रवादियों ने एक बीडीओ की हत्या कर दी थी.
आम तौर से गांवों के अविकास, पलायन, सूखे वगैरह की खबरें अखबारों के लिए महत्वहीन हैं. इसलिए लगभग सभी अखबारों ने (एक अपवाद छोड़ कर) सरकारी पक्ष को उजागर करना शुरू किया. किसी ने यह जरूरत नहीं समझी कि एक संवाददाता उस गांव (कुसुमाटांड़) में भेज कर सच का पता लगाया जाये. 67 में आवागमन की असुविधा के बावजूद दिल्ली-पटना-कलकत्ता से अज्ञेय, रेणु, रघुवीर सहाय, महाश्‍वेता देवी,जीतेंद्र बाबू पलामू के जंगलों में पहुंचे, पर बमुश्किल रांची से 4-5 घंटे की यात्रा कर रांची से कोई खबरनवीस इन गांवों में नहीं गया. प्रभात खबर ने मौत की खबर (अदालत में दायर शपथपत्र के आधार पर) छापी, अपने एक संवाददाता को दस दिनों के लिए उस क्षेत्र में भेजा. उस संवाददाता की रपटों से उस पूरे अंचल की कुव्यवस्था, भ्रष्टाचार, पलायन, शासकीय उदासी स्पष्ट करने वाली तथ्यपरक खबरें छपीं. सीरिज में प्रशासनिक अकर्मण्यता और सरकारी भ्रष्टाचार उजागर हुए. अंततः राज्य सरकार के मंत्रिमंडलीय सचिव-राहत आयुक्त ने अखबार को लिखित रूप से कार्रवाई की धमकी दी. हालांकि इस संबंध में आनेवाले सभी सरकारी बयान भी प्रमुखता से अखबार में छप रहे थे. इस धमकी के पीछे झारखंड सरकार की प्रमुख राजनीतिक हस्तियां-मंत्री थे. उस अंचल से कई ताकतवर मंत्री झारखंड सरकार में थे, जिनके राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण उस इलाके के भ्रष्टाचार-अविकास के तथ्य अखबार में सामने आ रहे थे.
इस कुसुमाटांड़ गांव में सूखे की कहानी की सूचना ज्यां द्रेज (जानेमाने अर्थशास्त्री, अमर्त्यसेन के साथ कई पुस्तकों के लेखक) को मिली. वह दिल्ली से रांची आये. अखबार के कार्यालय में पहुंचे. इस विषय पर छपी सभी खबरों को मांगा. पढ़ा और साथ ले गये. जयां द्रेज विदेशी मूल के (अब भारतीय नागरिक हो गये हैं. अमर्त्य सेन के साथ मिलकर कई पुस्तकें लिखीं है.) हैं. अर्थशास्त्री हैं, पर ऐसी खबरों को पढ़ने, जमीनी हकीकत जानने के लिए उन्होंने हिंदी सीखी-पढ़ी है. वह उस पहाड़ी-जंगल इलाके में खुद गये. बस से सारी स्थिति प्रत्यक्ष देखी. फ़िर दिल्ली लौटे.
पुनः पंद्रह दिनों बाद वह उस कुसुमाटांड़ गांव में आये. चार दिनों तक ठहरे. जनसुनवाई आयोजित की. उस जनसुनवाई में पटना से टेलिविजन चैनल के लोग आये. गांव के लोगों ने राशन वितरण से लेकर विकास कार्यों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य बताये. स्पष्ट हआ कि भ्रष्टाचार के कारण प्रशासन-सरकार का इकबाल खत्म हो गया है. इसलिए हर गांवों में नक्सली पांव पसार रहे हैं. पीने के पानी को ज्यां द्रेज ने बोतल में बंद कर प्रदर्शन करने के लिए रखा था. जिस तरह के अनाज गांववाले खाते थे, उसे रखवाया था. जिन पौधों की जड़ें गांव वाले उबाल कर खाते थे, उन जड़ों को वहां रखा गया था. ये चीजें स्वतः भूख, अकाल और गांव की कहानी कहती थीं.
टीवी मीडिया ने जब उस मुद्दे को उछाला, तब अन्य अखबारों की नींद टूटी. ज्यां द्रेज ने फ्रंटलाइन में कुसुमाटांड की इस स्थिति-अनुभव के बारे में मार्मिक लेख लिखा. अनेक अंग्रेजी अखबारों में इस सवाल को उठाया. जयां द्रेज ने प्रभात खबर में छपी रपटों और सरकार द्वारा प्रभात खबर को परेशानीवाली गतिविधियों का उल्लेख अपनी रपट में किया. दिल्ली-कोलकाता से प्रकाशित अखबारों में भूख-अकाल की खबरें आनी शुरू हईं, तब झारखंड सरकार ने बार-बार राहत काम तेज करने की बात की. विधानसभा में मामला उठा. पर जो अखबार अकेले तीन-चार महीनों तक इस मामले को उठाता रहा, कुछ महीनों के लिए उसके विज्ञापन घटा दिये गये. यहां अलग से नोट करनेवाली बात यह है कि जिस झारखंड राज्य के गठन के आंदोलन में प्रभात खबर की अग्रिम भूमिका रही, और आंदोलन के साथ ही राज्य का मुख्य बौद्धिक मंच यह अखबार बना उसे, अलग राज्य के गठन के तत्काल बाद भूख का सवाल उठाने की कीमत उसे चुकानी पड़ी. विज्ञापन घटाने से लेकर विज्ञापन की दर कम करने और राजसत्ता की धमकियों तक का खामियाजा प्रभात खबर को भरना पड़ा.
ज्यां द्रेज की सक्रियता के बाद झारखंड में भूख का यह मामला उच्‍चतम न्यायालय पहुंचा. उच्‍चतम न्यायालय ने जाने माने आइएएस (रिटायर्ड) एनसी सक्सेना को कमिश्नर नियुक्त किया. उच्‍चतम न्यायालय के सुझाव-आदेश के अनुसार श्री सक्सेना झारखंड आते रहे. राज्य के बड़े अफ़सरों (मुख्य सचिव, विकासआयुक्त, रिलीफ़ कमिश्नर, संबंधित उपायुक्त वगैरह) के साथ वह लगातार बैठकें करते रहे. जन वितरण प्रणाली से लेकर राहत कामों को खुद देखा. सुदूर पहाड़ी इलाकों और गांवों में वह खुद गये. प्रशासन तंत्र का स्वरूप देखा. इसके बाद उन्होंने उच्‍चतम न्यायालय को अपनी रपट दी. श्री सक्सेना की वह रपट किसी भी अखबार-पत्रकार के लिए विस्फ़ोटक दस्तावेज है. दो तरह से पहला, खबर की दृष्टि से इस रिपोर्ट में पूरे प्रशासनतंत्र की कार्यशैली का वर्णन है. अकाल-पलायन प्रभावित इलाकों में हो रहे कामकाज का ब्योरा है. दूसरा, गवनबस कोलैप्स (बिखरने) का उल्लेख है. रांची यानी झारखंड की राजधानी में आला सरकारी अफ़सर कैसे गंभीर सवालों के प्रति अगंभीर हैं, इसका तथ्यात्मक विवरण है. सप्रमाण.
झारखंड से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार ने इस रिपोर्ट पर आधारित एक खबर छापी. प्रभात खबर ने (जिसने भूख के सवाल को शुरू से मुद्दा मान कर उठाया था.) भी सक्सेना की इस रिपोर्ट (मूल रिपोर्ट अंग्रेजी में है.) का हिंदी अनुवाद कराया और किस्तों में छापा. हिंदी में इस रिपोर्ट के प्रकाशन से सरकार-नौकरशाही बहुत नाराज हई. इस रिपोर्ट में सरकार की एक-एक कल्याणकारी-विकास से संबंधित योजनाओं और उनमें हो रही गड़बड़ियों का तथ्यात्मक वर्णन है.
इस रिपोर्ट के प्रकाशन से झारखंड की पूरी व्यवस्था तिलमिला गयी. इस रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद संबंधित हिंदी अखबार ने श्री सक्सेना से इस मुद्दे पर लंबी बातचीत की. बहुत साफ़ शब्दों में श्री सक्सेना ने कहा कि झारखंड के नेता-अफ़सर चोर हैं. उन्होंने कहा कि दिल्ली से चला 100पैसा झारखंड के गांवों में पहुंचते-पहुंचते छह पैसा रह जाता है. श्री सक्सेना के द्वारा उठाये गये सवालों के बारे में झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री से प्रभात खबर ने लंबी बातचीत की. सरकार का उत्तर रक्षात्मक था. पुनः सरकार के अफ़सरों ने श्री सक्सेना द्वारा उठाये गये मुद्दों का जवाब भेजा. वह भी छपा. इसके बाद श्री सक्सेना द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दी गयी सरकारी योजनाओं के झारखंड द्वारा वर्षवार इस्तेमाल के आंकड़े छपे, कैसे अनेक कल्याणकारी मदों में पैसे बिना खर्च लौट गये (सरेंडर), ग्रामीण योजनाओं के हाल के तथ्यात्मक ब्योरे छपे. झारखंड सरकार के किन जिलों ने किस वित्तीय वर्ष में कितने अनाज उठाये, इसके तथ्य छपे, तो सरकार चुप हो गयी. क्योंकि प्रतिउत्तर में कहने को कुछ नहीं था. बहरहाल श्री सक्सेना के इंटरव्यू का गहरा असर हआ. इस इंटरव्यू के छपते ही तत्कालीन मुख्य सचिव के आदेश पर अखबार के विज्ञापनों में भारी कटौती की गयी. मुख्य सचिव ने श्री सक्सेना को फ़ोन पर कहा कि क्या उक्त अखबार से आपकी बातचीत हई है? श्रीसक्सेना ने कहा कि उस अखबार में मेरी बातचीत छपी है. अब सरकार के पास कार्रवाई का प्रत्यक्ष कारण नहीं था. विज्ञापन घटाने के बारे में संबंधित सरकारी विभाग से पूछा गया कि झारखंड में सबसे अधिक बिकनेवाले अखबार को सबसे कम बिकनेवाले अखबार से भी कम विज्ञापन क्यों मिल रहे हैं? संबंधित विभाग के अफ़सरों का सहानुभूतिपूर्ण उत्तर था, ऊपर से आदेश है. झारखंड सरकार बनने के बाद प्रभात खबर को विज्ञापन बिल्कुल बंद कर देने या लगभग बंद कर देने की यह दूसरी घटना थी.
देवघर में भूखः फिर झुकी सरकार
जन मुद्दों के साथ ईमानदारी से आत्मसात होने से पत्रकारिता को जो खरी, चमक और गरिमा और बाजार की भाषा में कहें, तो प्रसार मिलता है- वह लाखों के गिफ्ट बांटने, प्रचार और बड़ी पूंजी से नहीं मिल सकती. यदि यह सत्य नहीं होता, तो बड़ी पूंजी के अखबार बंद नहीं होते. पत्रकारिता का यह इतिहास बहुत पुराना नहीं है, जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह (नवभारत टाइम्स), अंबानी (संडे ऑब्जर्बर) और थापर (स्वतंत्र भारत) के अखबार बंद हो गये.
प्रभात खबर ने इसे बार-बार अपने अभियान सरीखे रिपोर्टिग से सच सिद्ध किया है. सच सिद्ध करने का जोखिम उठाया है. इस संबंध में अगली कड़ी के रूप में 2004 में संथाल परगना में भूख से हुई मौतों की रिपोर्टिग का जिक्र किया जा सकता है. यह वह समय था जब संथाल परगना का एक बड़ा इलाका पाकुड़, गोड्डा, सारठ और देवघर के कई गांव भूख और भयंकर बीमारी से जूझ रहे थे. लोग मर रहे थे और प्रशासन चुप था. प्रभात खबर ने इससे लड़ने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी. प्रभात खबर के देवघर संस्करण में प्रकाशित इन समाचारों का शीर्षक यहां काफी होगा- मरने के कगार पर सातर गांव के मछुआरे, हड्डी का ढांचा भर है कापरी की बेटी, भीख मांग कर गुजारा करनेवाली मां मृत्यु शय्या पर, पूरे परिवार पर सूखे की काली छाया, पूरागांव बहरा, अस्पताल विकलांग, इलाज के लिए जमीन जायदाद बेच रहे हैं आदि‍. ऐसे ही समाचारों का क्रम महीनों जारी रहा. हद यह थी कि अधिकारी भूख से मरनेवाले लोगों के संबंधियों पर यह बोलने के लिए दबाव बना रहे थे कि यह मौतें भूख से नहीं बीमारी से हुईं. सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड में भूख से हुई मौत के बारे में छप रही खबरों को गंभीरता से लेते हुए संज्ञान ले लिया. इस बारे में झारखंड सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव से शपथ पत्र दायर कर भूख के बारे में छप रही खबरों के बारे में विस्तृत प्रतिवेदन पेश करने को कहा गया. इस संबंध में मुख्य सचिव ने सभी प्रमंडलीय आयुक्तों को पत्र लिखकर कहा कि सभी जिले से विस्तृत रिपोर्ट अविलंब पेश करें. तदनुसार झारखंड सरकार की ओर से प्रमंडलीय आयुक्त के जरिये उपायुक्तों को निर्देश दिये गये कि भूख से हुई मौत से संबंधित छपी तमाम खबरों को संकलित कर विस्तृत रिपोर्ट 23 सितंबर तक मुख्यसचिव झारखंड सरकार को भेजें ताकि उस रिपोर्ट के आधार पर मुख्य सचिव सुप्रीम कोर्ट में इस आशय का शपथ पत्र दायर कर सकें. पत्रकारिता के इतिहास में खबर को आंदोलन में बदलने के ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं.
नकली दवा कांड
मार्च 1992, प्रभात खबर टेटे हत्याकांड, पलामू का अकाल और अयोध्या प्रकरण की सटीक रिपोर्टिग के बाद जनता के बीच अपनी साख बना चुका था. ठीक उसी समय रांची में नकली दवा बनानेवाले एक पूरे रैकेट कापर्दाफाश प्रभात खबर ने किया. आरंभ में नकली दवा बनानेवाले इन अपराधियों के कद का अनुमान न पुलिस लगा पायी न अखबार. पर जैसे-जैसे संवाददाता इसकी गहराई में उतरे- एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश हुआ. इस प्रकरण की तथ्यपरक रिपोर्टिग से प्रभात खबर को बड़े पैमाने पर लोकप्रियता मिली. शहर में इस मामले में, पहली बार बरियातू की एक दवा दुकान पर पुलिस का छापा पड़ा. छापामारी के दौरान पुलिस के हाथ आये सुरागों के आधार पर कई अन्य स्थानों पर छापामारी की गयी. इससे राज्य भर में होनेवाले नकली दवा के व्यापार का भंडाफोड़ हुआ. नकली दवाओं के साथ, लेबुल और कैप्सूल बनाने की मशीन पायी गयी. कई गोदाम और घरों में छापामारी हुई. गिरोह के सरगना और गिरोह को संरक्षण प्रदान करनेवाले राजनीतिज्ञों के बारे में भी दस्तावेजी सबूत मिले. जांच के दायरे बढ़ते ही जांच को प्रभावित करने की प्रक्रिया भी शुरू हुई. प्रभात खबर, जो लागातार मामले को तरजीह दे रहा था- पर भी दबाव पड़े. इस मामले को रोकने के लिए राजनीतिक दबाव का आकलन इसी से लगाया जा सकता है कि मामले की जांच में लगे आरक्षी अधीक्षक का तबादलाकर दिया गया. उनके बाद आये जांच अधिकारी को भी मामले से अलग करने के अनेक प्रयास हुए और उन्हें विरमित कर दिया गया. मामले के सार्वजनिक होने के बाद से ही इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि गिरोह की राजनीतिक पहुंच काफी ऊपर तक है और सफ़ेदपोश यह कतई नहीं चाहते थे कि जांच पूरी हो. खबर छपने के बाद लगातार पड़नेवाले राजनीतिक दबाव का ही नतीजा रहा कि पुलिस गिराह के सरगना और मुख्यअभियुक्त को गिरफ्तार नहीं कर पायी. जिसका लाभ उठाकर वह महीनों जमानत के प्रयास करता रहा. पुलिस की ओर से चुप्पी साध लेने के बाद यह खबर भी छपी कि नकली दवा का कारोबार मुख्य रूप से राज्यभर के सरकारी अस्पतालों में फ़ैला है. जहां से मुख्य रूप से इसकी चपेट में गरीब तबके के लोग आ रहे थे. प्रभात खबर ने इन सबकी पड़ताल करते हुए यह छापा कि क्यों इस कांड से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों को दंडित करने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है. करोड़ों रुपये की नकली दवाओं की आपूर्ति अस्पतालों में की गयी, जिन्हें खाकर सैकड़ों लोग जान दे चुके थे.
पुलिस बहाली में धांधली का मामला
जिस पुलिस महकमे से न्याय की उम्मीद की जाती है, उसी में बहाली की ऐसी प्रक्रिया देखी गयी कि आज भी हैरत होती है. यह घटना 1994 अक्तूबर की है. दक्षिण बिहार (झारखंड) के चार जिलों के लिए 201 जवानों की जरूरत थी. इसमें जम कर अनियमितता हुई. आवेदन लेने की तारीख से सफल उम्मीदवारों की सूची जारी होने तक- कहीं कोई पारदर्शिता नहीं रखी गयी. 201 के स्थान पर 289 लोगों की सूची कर दी गयी. और तो और शायद यह देश में अपनी तरह का पहला मामला था, जब पुलिस बहाली के लिए महिलाओं को पुरुष की तरह दौड़ाया गया. वह भी तब, जब महिलाओं के लिए कोई पद रिक्त भी नहीं था. बहरहाल प्रभात खबर ने मामले को गंभीरता से उठाया. पुलिस विभाग अंत तक नहीं बता पाया कि कुल कितने सिपाहियों को बहाल किया जाना है. चयन प्रक्रिया में उत्तीर्ण होनेवाले उम्मीदवार महीनों अपना परीक्षाफल भी नहीं जान पाये. (हालांकि पुलिस विभाग की तब से बदतर स्थिति अब है). सफल उम्मीदवारों की सूची बदल-बदल कर जारी की गयी. ये सूचियां भी बिना किसी अधिकारी के हस्ताक्षर के जारी हो रही थीं. महीनों इस प्रकरण की रिपोर्टिग हुई. अखबार पर दबाव भी बनाने की कोशिश हुई. मगर यह मामला राज्य के हजारों बेरोजगार युवाओंसे जुड़ा हुआ था. प्रभात खबर ने उनके प्रति अपने अखबारी दायित्वों का निर्वहन किया.
हजारीबाग में महिलाओं का आंदोलन
किसी छोटी अथवा व्यक्तिगत पहल को एक कोई अखबार किस तरह जन आंदोलन में बदल सकता है- इसका बेहतरीन उदाहरण है 2005 की यह घटना. होली का समय. हजारीबाग जिले का मुकुंदगंज. एक आदि‍वासीगांव. अधिकांश गरीबी रेखा से नीचे के परिवार. विकास की किरणों से दूर. राजनीतिक चेतना से भी महरूम. मगर झारखंड के ऐसे हजारों गांवों की तरह यहां भी शराब की भट्ठियां आम हैं. युवा और अधेड़ के साथ किशोर भी शराब के शिकार. इस कारण बीमारी और आपसी झगड़े रोज की दिनचर्या. होली के अवसर पर यह शराब कुछ अधिक पी जाती है. लेकिन 2005 की होली के समय अचानक मुकुंदंगज की दो-चार महिलाओं ने अपने शराबी पतियों के विरोध में स्वर बुलंद किया था तो यह सामान्य दिनों की तरह का सामान्य विरोध. जिसे शराब माफिया हमें हमेशा किसी न किसी तरह से कुचलने में कामयाब हो जाते थे. मगर महिलाओं की इस बार की पहल को प्रभात खबर ने प्रमुखता से प्रथम पृष्ठ पर फोटो सहित छापा. यह सिलसिला महीनों चला. महिलाएं एकत्र होतीं, शराब की भट्ठियों को तोड़तीं और नारे लगातीं. और प्रभात खबर इन खबरों को लीड बनाता. परिणाम यह हुआ कि एक गांव की कुछ महिलाओं का यह स्वतः स्फ़ूर्त मामूली आंदोलन लगभग कईं गांवों में जा फ़ैला और एक बड़े आंदोलन का स्वरूप बन गया. शराब माफिया और उनका साथ देनेवाली पुलिस भी इस आंदोलन को नहीं रोक सके. एक टीम लेकर खुद हरिवंश ने उन गांवों का दौरा किया. 100 गांव की महिलाओं ने बाद में एक सम्मेलन किया और शराब भट्ठियों के सफाये का संकल्प लिया.
झारखंड से आदि‍वासी बालाओं की ट्रैफिकिंग
कथित विवाह रचाकर और नौकरी का लालच देकर झारखंडी युवतियों को दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तरप्रदेश ले जाया जाता है. इसमें गांव के ही दलाल मुख्य भूमिका निभाते हैं. प्रभात खबर ने आरंभ से ही इन खबरों को विशेष एटेंशन के साथ छापता रहा है. इस सिलसिले में वासवी द्वारा 10 जुलाई 2002 को पूरे पृष्ठ की ऐतिहासिक रपट का जिक्र आज भी किया जाता है. कि कैसे झारखंडी लड़कियों का मानसिक व शारीरिक शोषण विभिन्न तरह के लालच देकर किया जाता है. फिर जब दिल्ली में प्रभात खबर का ब्यूरो कार्यालय खोला गया तो ट्रैफिकिंग की रपटों पर बारीकी से ध्यान रखने का निर्देश कार्यालय को दिया गया. इसके बहुत ही सकारात्मक परिणाम निकले. कई लड़कियों को इन खबरों को आधार बना कर मुक्त कर वापस झारखंड लाया गया. इसमें स्वयं सेवी संस्था प्रयास (दिल्ली), यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट फ़ंट फॉर वूमन (यूनिसेफ.), ऑल इंडिया एंटी ट्रैफिकिंग एंड सेक्सुअल एक्सप्लाटेशन ऑफ चिल्डेन इन इंडिया (एटसैट) जैसी संस्थाओंने बढ़-चढ़ कर रुचि दिखायी. ट्रैफिकिंग पर ही लगातार विशेष रिपोर्टिग के लिए दिल्ली में प्रभात खबर के पत्रकार प्रमोद कुमार सुमन को पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
बंद के विरुद्ध गोलबंदी किसी खबर को मुद्दा बनाना, जितना आसान है, उतना ही कठिन किसी मुद्दे को खबर बनाना. इसमें पहली समस्या मुद्दे की पहचान की आती है. 1993 में राज्य (विशेष कर झारखंड का भाग) की जनता को लगातार होते बंद और चक्का जाम के विरोध में गोलबंद करने का काम प्रभात खबर ने किया. अखबार ने बताया कि 1992 में राजनीतिक दलों और अन्य संगठनों ने अपनी जायज-नाजायज मांगों के लिए 365 दिन में 92 दिनबलात बंद आयोजित किये. करोड़ों का प्रतिदिन का व्यवसाय प्रभावित हुआ, स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई ठप, रोज काम कर खानेवाले मजदूरों की स्थिति भूख मरने की- प्रभात खबर ने इन मुद्दों पर विशेष कवरेज किया. खबरों के प्रकाशन के साथ पाठक मंच का कालम आरंभ किया और अलग से सप्लीमेंट छापे.
बिहार का कोदरिया बलात्कार कांड़
80 के दशक तक बिहार जातीय दंगों को लेकर हमेशा से सुर्खियों में रहा. दर्जनों नक्सली संगठन इन्हीं जातीय दंगों और सामाजिक विषमता की ऊपज हैं. इसकी कड़ी कीमत बिहार का दलित वर्ग चुकाता रहा है. सत्ता में बैठे लोग और मीडिया अपना नफा-नुकसान तौल कर ऐसे मामलों में अपना स्टैंड लेते हैं. कभी-कभी तो यह स्टैंड भी विरोधाभास भरा होता है. ऐसे वातावरण में मीडिया की भूमिका और अहम हो जाती है. प्रभात खबर ने अपने लाभ को खतरे में डाल कर ऐसे मामलों की निष्पक्ष रिपोर्टिग का न सिर्फ. बीड़ा उठाया, बल्कि उसे मुहिम का रूप भी दिया. इस सिलसिले में बिहार के मजफ्फरपुर जिले के कोदरिया गांव में हुए सामूहिक बलात्कार की रिपोर्टिग का जिक्र यहां आवश्यक है, जिसे प्रभात खबर ने उठाया और बाद में यह राष्‍ट्रीय हिंदी-अंगरेजी अखबारों की सुर्खी बना. बिहार के तत्कालीन राजद नेता और पुनर्वास मंत्री के समर्थक लठैतों ने रंगदारी न देने के एवज में गांव की छह महिलाओं को नंगा करके घूमाया और फिर बलात्कार किया. तब राज्य की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी थी.
यह 97 का वर्ष था, जब प्रभात खबर लास-फ़िनांस से निकलने के लिए कसमसा रहा था. प्रबंधन से आर्थि‍क मदद लेना मुश्किल हो रहा था. ऐसी कठिन परिस्थित में अखबार को अपना स्टैंड साफ करना था. अखबार ने वही किया जो एक गरिमामयी पत्रकारिता कर सकती है. प्रतिदिन मामले की रिपोर्टिग छपती रही. अंततः राष्‍ट्रीय महिला आयोग को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा. उसकी टीम गांव आयी. महिलाओं से मिली. आयोग ने अपनी रपट में बताया कि इस जघन्य कांड के प्रति पूरा राज्य प्रशासन निष्क्रिय, निर्दयी और उदासीन है. यह न सिर्फ स्तब्ध करनेवाली बात है बल्कि ऐसा कृत है, जिसे माफ नहीं किया जा सकता. आयोग ने पीड़ित महिलाओं से मुलाकात भी की. आयोग की लालबत्तीवाली गाड़ी देख कर पहले वे डर गयीं. उन्हें लगा कि बाहुबली मंत्री ने आतंकित करने के लिए लठैतों को दोबारा भेजा है. इस जांच दल ने पाया कि छह महिलाओं को शारीरिक प्रताड़ना देने के साथ सुनैना के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ. यह भी चौंकानेवाला तथ्य था कि बिहार महिला आयोग के अध्यक्ष और योजना, विकास व कल्याणमंत्री तुलसी सिंह को राष्‍ट्रीय महिला आयोग ने इस मामले में नोटिस जारी किया. और बताया कि राज्य महिला आयोग मुजफ्फरपुर में महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार रोकने में विफल रहा है. गौरतलब है कि तत्कालीन बिहार राज्य महिला आयोग के सभी सदस्य पुरुष थे. इस रिपोर्टिग के बाद प्रभात खबर का विज्ञापन घटा और संवाददाता को जान से मारने की धमकियां मिलीं. टाइम्स ऑफ इंडिया और जनसत्ता ने इस मामले को प्रमुखता से छापा.

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