शनिवार, 17 दिसंबर 2011

जनसंचार माध्यमों की दंतकथा (अखबार)







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अखबार, रेडियो, टेलीविजन और इंटरनेट। चार जनसंचार माध्यम। चार जरिए, जिससे आप जहां को जानते है। समझते है। पर क्या सचमुच। सवेरे सवेरे अखबार बांचने वालों में क्या पढ़ा जाता है, और क्या नहीं। ये सोचने वाला विषय हो चला है। खासकर जब सवेरे सवेरे मध्यम आकार के चटपटे अखबार बड़ी संख्या में बिकने लगे। मुंबई में मिड-डे है तो, दिल्ली में मेट्रो नाउ। जायका बदल रहा है। हार्डकोर न्यूज के सामने रसभरी खबरों को तरजीह दी जा रही है। ध्यान रखें कि ये आकलन शहरों का है। अखबारों की बड़ी कतार सड़क किनारे दुकानों पर दिखती है। अंग्रेजी में टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, पाएनियर, द हिंदु, स्टे्टसमैन, इकानामिक टाइम्स, मिंट आदि लुभावने अखबार है। समय के साथ चलते रहने और बदले में, आप इसे तारीफ न समझे, टीओआई ने बढ़त ली है। पहले जिस अखबार का संपादक प्रधानमंत्री के बाद सबसे ताकतवर शख्स होता था, आज उसी टीओआई में संपादक का पद खाली है। जरूरत नहीं है। उन्नीस सौ नब्बे में उदारीकरण के बाद ये अखबार बदलता ही रहा। कभी शहर दर शहर तस्वीरों से पटे पेज थ्री के जरिए, तो कभी संपादकीय को गैर जरूरी समझकऱ। वैसे जिस बयार में आपको भी न समझने लायक छोड़ा है, उसे फांसने में टाइम्स आफ इंडिया सबसे आगे रहा। नहीं है सहमत, तो मेट्रो नाउ देखिए। संवाददाता आपको अंतरंग वस्त्रों की दुकान पर सेल्स गर्ल बनकर अनुभव लिखती दिख जाएगी। खैर बयार में मौजूद रहने वालो अंग्रेजी अखबारों में एचटी ने भी अपने सप्लीमेटों के जरिए दखल बनाई हुई है। रही बात हिंदु, पायनियर, स्टेट्समैन की तो, वे बदस्तूर जारी है। अपनी भूली बिसरी पहचान और नोस्टालजिया के साथ। शायद वक्त बदले और दिन बहुरे।


गुलाबी अखबारों की क्या कहें। अलग पाठक, अलग खबर और टीवी पर इंसान को कुत्ता बनाने वाले विग्यापन। इक़ॉनामिक टाइम्स की रचनात्मकता आपको पिकासो की लगती है, तो मिंट का आकार ईटी के आगे छोटा लगता है। बहरहाल असरदार दोनों है। पर सीमित वर्ग के लिए।


हिंदी का अखबार बाजार अनोखा है। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, पंजाब केसरी, दौनिक जागरण, वीर अर्जुन और तमाम फुटपाथ पर सजे अलग अलग नामों के अखबार। नभाटा की साख थी। आज प्रचार ज्यादा है। जान और अब्राहम के नाम को मिलाइए औऱ इनाम पाइए। यही नभाटा बचा है। हिंदुस्तान में लेख है, पर व्याकरणीय गलती पांच क्लास का बच्चा पकड़ ले। औऱ रविवार का संपादकीय लेख साहित्याकार भी पढ़कर झल्ला जाए। यानि वक्त के साथ वो बदलाव नहीं है। रही बात पंजाब केसरी की तो अखबार पढना कहां से शुरू करें, ये तय करना मुश्किल है। पहले सिनेमा है या समाज, इस अखबार को देखकर समझा जा सकता है। रही बात दैनिक जागरण की तो राजधानी की छन्नी में उसकी विचारधारा छन जाती है। निकलकर आती है तो रंगरोगन भरे पन्ने। वीर अर्जुन, महामेघा और अन्य अखबार जारी है। वजूद की लड़ाई के साथ।


जाहिर है आप रोजाना दो से ज्यादा अखबार नहीं पढ़ सकते। भले ही आप पत्रकार हो। तो जो भी पढ़े, दिन भर के लिए क्या पढना है, ये तय करना जरूरी हो गया है। और तय करने के लिए आप जो भी पढ़े, उसका आपकी रूचि का होना। और जनाब आपकी रूचियां बदल चुकी है। यकीन नहीं होता। तो टीवी चलाकर देखिए। जो दिख रहा है, वो ही आपकी रूचि मानी जा रही है। खैर...बाकी जनसंचार माध्यमों पर जल्द ही...


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