शुक्रवार, 21 मार्च 2014

एक साथ ढेरो इंटरव्यू पढ़े , देखे









Category: साक्षात्कार

वैज्ञानिक सोच से ही आगे बढ़ेगा समाज : देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी
देवेंद्र मेवाड़ी
वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी विगत लगभग 45 वर्षों से विभिन्न संचार माध्यमों से विविध विधाओं में विज्ञान लेखन करके समाज में वैज्ञानिक जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे देश में विज्ञान लेखन की स्थिति और वैज्ञानिक सोच पर अनुराग की अंतरंग बातचीत-
सदियां बीत गईं लेकिन विज्ञान के इस युग में भारत में अभी भी अंधविश्‍वास चरम पर है। लोग अपने बच्‍चे की बलि तक दे देते हैं। इसका क्‍या कारण मानते हैं आप?
दे.मे. :  मेरे विचार से इसकी वजह यह है कि लोगों को विज्ञान की जानकारी कम है। अगर उन्‍हें विज्ञान की जानकारी मिलती और सच का पता होता तो उन्‍हें विश्‍वास होता कि यह सब फरेब है। इस पर हमें विश्‍वास नहीं करना चाहिए।
हमारे देश में लोगों तक विज्ञान की जानकारी पहुँचाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बाद भी लोगों के पास तक जानकारी क्‍यों नहीं पहुंच रही है, इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। लोगों तक विज्ञान पहुँचाने की जो योजनाएं बनाई जाती हैं, वे लक्ष्य-वेध से क्यों चूक रही हैं- यह एक विचारणीय विषय है। ऐसी योजनाओं का ‘पीयर रिव्यू’ यानी मूल्याँकन जरूर होना चाहिए ताकि पता लग सके कि योजनाएं लक्ष्य वेध रही हैं या नहीं। यदि नहीं तो उन्हें अधिक कारगर बनाने का रास्ता खोजा  जाना चाहिए। इस प्रयास में सबसे बड़ा नुकसान जो कर रहे हैं, और समाज को कम से कम पाँच सौ साल या हजार साल पीछे धकेल रहे हैं,  वे हैं इलेक्‍ट्रानिक चैनल और हिंदी फिल्में। इनके माध्‍यम से भूत-प्रेत, पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्‍वासों पर आधारित कार्यक्रम करोड़ों लोगों तक पहुँचाए जा रहे हैं। यह बहुत गलत है। इन फिल्मों और चैनलों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। कई सामाजिक मुद्दों पर उन्होंने सराहनीय भूमिका निभाई भी है। उन्हें अंधविश्‍वास को दूर करने का बीड़ा भी उठाना चाहिए।
भारत में विज्ञान लेखन की क्‍या स्थिति है?
दे.मे. :  विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में, विशेषकर हिंदी में विज्ञान लेखन की स्थिति बहुत अच्‍छी है। 1884 के आसपास विज्ञान की बातें भारतीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। और, जो कुछ पश्चिम में विज्ञान का विकास हो रहा था या हमारे यहाँ विज्ञान का जो काम हो रहा था, उस पर तत्‍कालीन सम्‍पादकों व लेखकों की नजर थी। वे लेखक विज्ञान लेखक नहीं कहलाते थे, वे साहित्‍यकार थे। वे साहित्‍य और विज्ञान पर समान रूप से लिखते थे। 1900 में सरस्‍वती शुरू हुई। सरस्‍वती ने साहित्‍य के साथ-साथ विज्ञान को अधिक से अधिक छाप कर बड़ी भूमिका अदा की। उसमें हिंदी के जाने-माने साहित्‍यकारों ने भी विज्ञान की रचनाएं लिखीं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी, हरिवंश राय बच्‍चन, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और बहुत से साहित्‍यकारों ने लिखा। विज्ञान से जो बदलाव आ रहा था, उस पर प्रेमंचद ने भी अपने संपादकि‍यों में लिखा।   
हिंदी में विज्ञान लेखन की शताब्‍दी पूरी हो चुकी है। जो यह कहा जाता है कि हिंदी में विज्ञान की पुस्‍तकें नहीं हैं तो यह झूठ है। विज्ञान के लगभग सभी विषयों पर हिंदी में सैकड़ों पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं। धीरे-धीरे विज्ञान शब्‍दावली का भी विकास हुआ। भारत सरकार के शब्‍दावली आयोग ने पारिभाषिक शब्‍दावलियां छापी हैं। इनमें वैज्ञानिक शब्‍दों की कमी नहीं है। हालाँकि उनमें कई शब्‍द कारखाने में बने शब्‍द जैसे हैं। उन्हें आम भाषा के शब्‍दों से बदला जा सकता है। लोक में जो शब्‍द प्रचलित हैं, उन्‍हें अधिक लेना चाहिए ताकि हर  व्‍यक्ति उन्हें समझ सके।
विज्ञान के प्रचार-प्रसार में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के साथ ही संस्‍थाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि विज्ञान परिषद, प्रयाग के मार्च, 2013 में सौ वर्ष पूरे हो गए। देश में ऐसी कोई दूसरी संस्‍था नहीं है जो 100 वर्षों से विज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रही हो और जिसने सौ साल पूरे कर लिए हों। इस परिषद की स्थापना पं. गंगानाथ झा, रामदास गौड़, प्रो. सालिग्राम भार्गव और प्रो. हमीदुदीन साहब जैसे विद्वानों ने की थी। इसके सभापति और उपसभापति पं. मदन मोहन मालवीय, श्रीमती एनी बेसेंट, सर सी.वाई. चिंतामणि जैसे विद्वान रहे हैं। आचार्य जगदीश चंद्र बसु, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय, मेघनाद साहा, डा. के.एस. कृष्णन और डा. आत्माराम जैसे वैज्ञानिक इसके सदस्य रहे हैं। यह परिषद 1915 से ‘विज्ञान’ मासिक पत्रिका का निरंतर प्रकाशन कर रही है जिसके लक्ष्य के बारे में पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने दोहा लिखा था।
इसके अलावा विज्ञान लोक आगरा से और विज्ञान जगत इलाहाबाद से प्रकाशित हुईं जो विशेष रूप से विज्ञान की पत्रिकाएं थीं और काफी लोकप्रिय भी हुईं। इनके माध्यम से आम लोगों के लिए विज्ञान सामने आया। इसी तरह मराठी, बांग्‍ला, तमिल, असमी आदि तमाम भारतीय भाषाओं में विज्ञान खूब लिखा गया है और लिखा जा रहा है। लेकिन, आम लोगों तक पूरी बात क्‍यों नहीं पहुँच पा रही है, यह बहुत जटिल सवाल है। इसका एक कारण तो मुझे यह लगता है कि बचपन से ही विज्ञान को कठिन और जटिल बता दिया जाता है। जबकि, ऐसा है नहीं। अगर विज्ञान को प्रकृति और जीवन से जोड़ कर समझाया जाए तो वह किस्से-कहानियों-सा रोचक लगेगा। कौन नहीं जानना चाहेगा कि सूरज क्या है, तारे क्या हैं, बादल कहाँ से आते हैं, वर्षा क्यों होती है, अन्न कहाँ से आया, फूल क्यों खिलते हैं, बीमारियाँ क्यों होती हैं, धातुएं कहाँ से आईं, कंप्यूटर क्या है, मोबाइल क्या है और यह भी कि हमारा शरीर क्या है? ये बातें रोचक तरीके से बताई जाएं तो सभी समझना चाहेंगे।  विज्ञान को आम आदमी तक पहुँचना ही चाहिए।                                       
आज इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में भी  हम कितना अंधविश्‍वास देख रहे हैं। डायनों की बात सुन रहे हैं, भूत-प्रेतों की बात सुन रहे हैं। एक छोटी-सी खबर जंगल की आग की तरह फैला दी जाती है कि गणेश जी दूध पी रहे हैं। अफवाह फैलती है कि रात को सोए तो पुतले बन जाएंगे, मूर्तियाँ बन जाएंगे तो लोग सारी रात जागते हैं। दीवारों पर हथेलियों की छाप लगा कर भूत-प्रेतों से बचने का उपाय किया जाता है। इतना भी तर्क नहीं करते कि यह सम्‍भव नहीं है। हम इतनी मामूली सी  विज्ञान की समझ भी लोगों में क्‍यों नहीं डाल पाए। उनमें वैज्ञानिक चेतना और जागरूकता क्‍यों नहीं फैला पाए हैं, इसका पता लगाया जाना चाहिए और इस कमी को दूर होना चाहिए।  
विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए क्‍या किया जाना चाहिए ?
दे.मे. :  विज्ञान के सच को फैलाने के लिए हर सम्‍भव माध्‍यम का उपयोग किया जाना चाहिए। इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यमों से जिस तरह अंधविश्‍वासों को फैलाया जा रहा है, इस पर सरकार को पाबंदी लगानी चाहिए। यह देखना चाहिए कि इससे समाज में अविज्ञान फैल रहा है, अंधविश्‍वास फैल रहा है। जब विज्ञान का सच मालूम होता है तो लोगों में जागरूकता आती है। इसका एक उदाहरण देना चाहता हूँ। 1980 में मैं पंतनगर में था। जब पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो पूरे पंतनगर विश्‍वविद्यालय क्षेत्र में जहाँ पूरा वैज्ञानिक माहौल था, लोग घरों में बंद रहे। सड़कें खाली थीं। बाहर कोई दिखाई नहीं देता था। ग्रहण का इतना भय था। लेकिन, 1995 में पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो देश में काफी लोगों ने उसे सुरक्षित तरीके से देखा। तब इतनी जागरूकता आ चुकी थी कि सूर्यग्रहण एक प्राकृतिक घटना है और इससे कोई दुष्‍प्रभाव नहीं पड़ेगा। पिछला सूर्यग्रहण 22 जुलाई 2011 को लगा। इसमें लाखों लोगों ने सूर्यग्रहण को देखा। ये लाखों लोग इसलिए सूर्यग्रहण को देखने के लिए तैयार हुए क्‍योंकि उन्‍हें ग्रहण का सच मालूम हो गया था
लेकिन, अगर हम मास मीडिया के माध्‍यम से इनके खिलाफ अंधविश्‍वास फैलाते हैं तो मुश्किल होगी। खगोलीय और अन्य प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या तक के लिए टीवी चैनल ज्‍योतिषियों, टैरो कार्ड और न्‍यूमरोलॉजी वालों को बुला रहे हैं। अखबारों में भविष्‍य फल बाँचा जा रहा है। यह सब निराधार है। इसका कोई परीक्षण और प्रयोग नहीं किया गया है, बस आस्था के नाम पर चल रहा है। इसको महसूस किया जाना चाहिए और इसमें कमी लानी चाहिए। कुँडली मिला कर विवाह करने के बावजूद बहू-बेटियों का जीवन संकट में पड़ रहा है क्योंकि कुँडली सुखद जीवन की गारंटी नहीं है। इसके लिए तो आपसी प्रेम और समझ जरूरी है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात सबसे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थी। उन्होंने देश में वैज्ञानिक वातावरण के विकास के लिए 1958 में ससंद में ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति’ प्रस्तुत की जिसे संसद ने पारित किया। संसद में विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति पारित करने वाला भारत विश्व का पहला देश है। नेहरू ने देश में आधुनिक विकास के लिए राष्ट्रीय विज्ञान प्रयोगशालाओं की नींव रखी। वे मानते थे कि प्राचीन रुढ़िवादी सोच को बदलने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है।
आम धारणा है कि विज्ञान बहुत क्लि‍ष्‍ट विषय है। किताबें भी जटिल भाषा में लिखी गई हैं। दूसरे, विज्ञान का संबंध केवल पाठ्यक्रम तक सीमित है। क्‍या लोगों तक विज्ञान नहीं पहुँचने  का यह बड़ा कारण नहीं है ?
दे.मे. :  यह बहुत बड़ा कारण है। मैं इस बात पर जोर देना चाहूँगा कि पाठ्य-पुस्‍तकों में जो विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके लिए जो सहायक पुस्तकें हैं यानी उस विषय को समझने लायक जो लोकप्रिय शैली में लिखी गईं किताबें हैं, उन्‍हें निश्चित रूप से विद्यार्थियों को दिया जाना चाहिए। पाठ्य पुस्‍तकों के साथ ही उस विषय में लिखी रचनाओं के बारे में उसी पुस्‍तक में सूची दी जानी चाहिए। मान लीजिए कोई अंतरिक्ष के बारे में किताब है या सौरमंडल के बारे में किताब है, उसके साथ-साथ उन लोकप्रिय शैली में लिखी गई पुस्‍तकों का भी उसमें जिक्र किया जाना चाहिए कि बच्‍चो ये पुस्‍तकें हैं, इन्‍हें संदर्भ के रूप में पढ़ सकते हो। इससे उन्हें विषय को समझने में आसानी होगी। इसके अलावा रोचक व्‍याख्‍यान, पुस्तक प्रदशर्नियों, विज्ञापनों आदि और ऐसे ही अन्‍य कार्यक्रमों के माध्‍यम से भी विज्ञान की जानकारी उन तक पहुँचाई जानी चाहिए।
रेडियो पर विज्ञान के तमाम सीरियल आ रहे हैं। टेलीविजन पर भी कुछेक कार्यक्रम दिए जा रहे हैं, लेकिन ये नगण्‍य हैं। उनकी तुलना में अवैज्ञानिक कार्यक्रम कहीं ज्‍यादा दिए जा रहे हैं। इस समय देश की बड़ी जरूरत है कि सरकार की ओर से एक विज्ञान का चैनल चलाया जाना चाहिए, जो विज्ञान का प्रचार-प्रसार करे। उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि वह केवल सरकारी चैनल बनकर न रह जाए। वह भी नेशनल ज्‍योग्राफी या डिस्‍कवरी की तरह रोचक और ज्ञानवर्धक सामग्री देने वाला चैनल बने। उसमें बच्चों, आम लोगों, विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों की भागीदारी हो। उसका समय-समय पर मूल्‍याँकन किया जाना चाहिए कि किस कार्यक्रम को दर्शकों ने अधिक देखा। किसको कितनी टीआरपी मिल रही है।
वैज्ञानिकों और विशेषतौर पर भारतीय वैज्ञानिकों की जीवनियाँ बच्‍चों को बहुत प्रेरित कर सकती हैं। उन्‍हें जिंदगी में अपने सपने पूरा करने की राह दिखा सकती हैं। प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक मेघनाथ साहा जब इं‍टर की कक्षा में पढ़ते थे, तब भी नंगे पैर स्‍कूल जाते थे। एक बार स्‍कूल में अंग्रेज गवर्नर आया। मेघनाथ को जूता न पहनने के जुर्म में स्कूल से निकाल दिया गया। इसे गर्वनर के प्रति असम्‍मान माना गया। लेकिन, मेघनाथ के पास तो जूता था ही नहीं, वे कहाँ से पहनते। वे तैर कर नदी पार अपने गाँव जाते थे क्‍योंकि नाव के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे हालतों में भी वे हमारे देश की ही नहीं विश्व  की वैज्ञानिक विभूति बने। ऐसे वैज्ञानिकों की जीवनी बच्चों को पढ़ने को मिले जिन्होंने कठिनाइयों में भी कभी हार नहीं मानी।
यह सरकार और हम सबकी जिम्‍मेदारी है कि विज्ञान की जानकारी का प्रसार करें। हम लोगों को समझाएं कि मनुष्य सिर्फ मनुष्य है। उसमें जाति, धर्म का कोई भेद नहीं है। विज्ञान की इतनी सी बात हम अभी तक लोगों को नहीं समझा पाए हैं। बार-बार राजनीतिक कारणों से जाति और धर्म के भेद को फैलाया जा रहा है। हमें मनुष्य के बजाए जातियों में बाँटा जा रहा है ताकि जाति को वोट दें। सच यह है कि मनुष्य की केवल एक जाति है- होमो सेपिएंस।
क्या हिंदी में विज्ञान की शिक्षा देना कठिन है?
दे.मे. :  कतई नहीं। विज्ञान की शिक्षा हिंदी माध्यम से देने के लिए केवल कड़े संकल्‍प की जरूरत है। जैसे, 1968 में पंतनगर विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉक्‍टर ध्यानपाल सिंह ने निश्‍चय किया कि उन्हें अपने विश्‍वविद्यालय में कृषि की शिक्षा हिंदी माध्‍यम से देनी है। इसके लिए उन्‍होंने हिंदी के विज्ञान लेखकों को पत्र लिखे कि हमें पुस्तकें तैयार करने के लिए आप जैसे विज्ञान लेखकों की आवश्‍यकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय में अनुवाद एवं प्रकाशन निदेशालय खोला। पहले अंग्रेजी पाठ्य पुस्तकों का अनुवाद कराया गया ताकि निर्धारित तिथि से हिंदी माध्यम से उच्च शिक्षा दी जा सके। विभिन्न  विषयों की पुस्तकें तैयार हुईं। मैंने भी वहाँ पादप प्रजनन की प्रमुख पाठ्य पुस्तक ‘एशियाई फसलों का प्रजनन’ का अनुवाद किया।
विश्‍वविद्यालय की क्षमता उतनी पुस्तकों के प्रकाशन की नहीं थी। इसके लिए नई मशीनें लगवाई गईं। पुस्‍तकों का प्रकाशन भी विश्‍वविद्यालय ने शुरू किया। हिंदी में किताबें विद्यार्थियों को उपलब्‍ध हो गईं।  इसके साथ ही हमें निर्देश दिया कि हम वैज्ञानिकों से मिलें। उन्‍हें प्रेरित करें कि वे हिंदी में पुस्‍तकें लिखें। हम उन्‍हें विभिन्‍न विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। इस तरह किसानों तक कृषि विज्ञान की नई जानकारी पहुँचाने के लिए हिंदी में किसान भारती पत्रिका प्रकाशित की गई। उसकी शुरुआत प्रसिद्ध हिंदी विज्ञान लेखक श्री रमेश दत्त शर्मा ने की। बाद में 13 साल तक मैंने उसका सम्‍पादन किया। कृषि, पशुपालन, पशु चिकित्‍सा आदि की हिंदी में अनूदित और मौलिक पुस्‍तकें आ गईं और हिंदी शिक्षा का माध्‍यम लागू कर दिया गया। आज विश्‍वविद्यालय के पास हिंदी में सैकड़ों किताबें हैं। कुलपति डॉ. ध्‍यान पाल सिंह का कहना था कि कौन-सा ऐसा भारतीय किसान है जो अंग्रेजी की पुस्‍तकें पढ़कर खेत में हल चला रहा है। कौन-सा ऐसा ग्रामीण परिवार है, जो अंग्रेजी में जानकारी लेकर खेतों में उसका उपयोग कर रहा है। उनको तो हमारी आबोहवा में, हमारी फसलों, हमारे पशुओं से संबंधित जानकारी दी जानी चाहिए।
क्‍या आपको नहीं लगता कि हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए यदि कुछ पुरस्‍कार घोषित किए जाएं तो विज्ञान के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मिलेगा ?
दे.मे. : विज्ञान लेखन के लिए कई पुरस्‍कार पहले से ही हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत राष्‍ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद का राष्ट्रीय पुरस्‍कार है। चार-पांच वर्गों में पुरस्‍कार दिए जाते हैं लेकिन इनका समुचित प्रचार नहीं होता। इनके बारे में समाचारपत्र-पत्रिकाओं में कोई नहीं लिखता। हर साल 28 फरवरी को विज्ञान दिवस पर ये पुरस्‍कार दिए जाते हैं, लेकिन कहीं कोई खबर नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए राजीव गांधी ज्ञान-विज्ञान पुरस्कार दिया जाता है। यह एक बड़ा पुरस्कार है। आपने सुना कभी इसके बारे में? वे पुरस्कृत पुस्तकें कहाँ हैं? हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की ओर से आत्माराम पुरस्कारदिया जाता है। यह पुरस्कार राष्ट्रपति के कर-कमलों से दिया जाता है इसलिए समाचारपत्रों में थोड़ी-बहुत चर्चा हो जाती है। इसके अलावा भी विज्ञान लेखन के लिए विभिन्न मंत्रालय पुरस्कार देते हैं।
समाज को बदलने में वैज्ञानिक सोच का क्‍या महत्‍व है।
दे.मे. : वैज्ञानिक सोच सच का पक्षधर है। इसलिए यह समाज को जागरूक बनाता है, उसे आगे बढ़ाता है। जबकि, रूढ़िवादिता और अंधविश्वास प्रतिगामी सोच को बढ़ाते हैं और समाज को पीछे ढकेलते हैं। अगर हम देश-काल पर नजर डालें तो साफ दिखाई देगा कि आज हम जहाँ खड़े हैं वहाँ तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर पहुँचे हैं। अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हो या दूध क्रांति, चिकित्सा की नई तकनीकें या अंतरिक्ष में उड़ते हमारे संचार व मौसम उपग्रह अथवा चाँद पर दस्तक देने वाला चंद्रयान-1, ये सभी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की देन हैं। तंत्र-मंत्र और ज्योतिष से आज तक न कोई अंतरिक्षयान बना है, न फसलों की पैदावार बढ़ी है और न चिकित्सा विज्ञान के चमत्कार सामने आए हैं। इसलिए हमें वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अंधविश्वासों को आँख मूंद कर अपनाने के बजाय तर्क करना चाहिए कि क्या ऐसा हो सकता है? वैज्ञानिक सोच हमें प्रगति की राह पर आगे बढ़ाता है।
आप व्यक्तिगत जीवन में अंधविश्वासों और अवैज्ञानिकता का कैसे विरोध करते हैं?
दे.मे. : मैं और मेरा परिवार तर्क का सहारा लेते हैं और ऐसी धारणाओं को नहीं मानते। बिल्ली के रास्ता काटने पर हम तुरंत आगे बढ़ते हैं ताकि आसपास के लोग समझ सकें कि इससे कुछ नहीं होता। हम सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को सुरक्षित विधि से देखते हैं और उस दौरान खाते-पीते रहते हैं ताकि साबित हो सके कि यह एक शानदार खगोलीय घटना है। इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। हम दिन, वार, दिशा के फलाफल नहीं मानते। हमने अपनी मानसिकता ऐसी बना ली है इसलिए इन वहमों और अंधविश्वासों में नहीं फँसते।
आपने लेखने के लिए विज्ञान क्यों चुना?
दे.मे. :  क्योंकि मैं बचपन से ही जिज्ञासु था और हर बच्चे की तरह अपने चारों ओर की हर चीज के बारे में जानना चाहता था- सूर्य, चंद्रमा और तारों के बारे में, पेड़-पौधों, फूलों, तितलियों, जीव-जंतुओं, बादल, वर्षा और हर उस चीज के बारे में जो दिखाई देती थी। फिर, विज्ञान की पढ़ाई शुरू की और धीरे-धीरे विज्ञान की बातों का पता लगता गया। मुझे पता लगता गया तो मेरा मन दूसरों को बताने के लिए बैचेन हुआ। और,  मैंने वे बातें साथियों को बताईं, बच्चों को बताईं। लोगों को बताने के लिए हिंदी में विज्ञान के लेख लिखने लगा। पहला लेख लिखा ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’, दूसरा ‘शीत निष्क्रियता’, तीसरा ‘कुमायूं और शंकुधारी’। पहले दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ को भेजे। तीसरा ‘विज्ञान’ को। ‘विज्ञान जगत’ के संम्‍पादक प्रोफेसर आर.डी. विद्यार्थी का उत्तर मिला, “लिखते रहना, कौन जाने कल तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” इस एक पंक्ति ने मेरे भीतर विज्ञान लेखन की लौ जगा दी। अप्रैल 1965 में मेरा पहला लेख ‘विज्ञान’ मासिक में छप गया और दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ के मई-जून 1965 संयुक्तांक में। इस तरह मेरे विज्ञान लेखन की शुरुआत हो गई हालाँकि तब तक मैं हिंदी में कहानियाँ भी लिख रहा था जो ‘कहानी’, ‘माध्यम’, ‘नई कहानियां’, ‘उत्कर्ष’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।
शुरुआती दौर में आपको विज्ञान लेखन में किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा और किन लोगों ने आपको इसके लिए प्रेरित किया?
दे.मे. :  शुरुआती दौर में कोई विशेष मुश्किलें सामने नहीं आईं क्योंकि विज्ञान की जो बातें में पढ़ता था, जो जानकारी मिलती थी उसे अपनी भाषा में, अपने ढंग से लिख देता था। लेकिन, दीक्षा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’ और ‘नवनीत’ जैसी पत्रिकाओं के विद्वान सम्‍पादकों, मतलब मनोहर श्याम जोशी, डा. धर्मवीर भारती और नारायणदत्त जी से ली जिनके द्वारा सम्‍पादित लेख पढ़ कर सरल भाषा-शैली में लिखने का क ख ग सीखा। रमेश दत्त शर्मा, गुणाकर मुले और रमेश वर्मा जैसे अग्रज विज्ञान लेखकों की रचनाएं पढ़ कर निरंतर लिखने की प्रेरणा मिलती रही। निरंतर लिखना ही नई ऊर्जा देता रहा। आपको बताऊँ, मैंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टिट्यूट), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और पंजाब नेशनल बैंक में दीर्घकाल तक नौकरी की लेकिन हर व्यस्तता के बावजूद विज्ञान लेखन करता रहा। कई बड़ी स्टोरीज हिंदी में पहली बार मैंने दीं जैसे- कृषि वैज्ञानिक डा. नार्मेन बोरलाग को नोबेल शांति पुरस्कार, दक्षिणी ध्रुव में एक भारतीय वैज्ञानिक और सिरोही बिंदु, विश्व के पहले परखनली शिशु का जन्म आदि।
आपने विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं?
दे.मे. :  जी हाँ, मेरी पहली वैज्ञानिक उपन्यासिका ‘सभ्यता की खोज’ 1979 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद कई विज्ञान कथाएं लिखीं जो मेरे तीन कथा संग्रहों में संकलित हैं। विज्ञान कथा लेखन में मेरी विशेष रुचि रही है और मैं इसके राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य का अध्ययन करता रहता हूँ। हिंदी साहित्य में इस विधा की रचनाओं की भारी कमी है, हालाँकि हिंदी में लगभग 1884 से विज्ञान कथा साहित्य रचा जा रहा है। इस क्षेत्र में राहुल सांकृत्यायन, डा. संपूर्णानंद, आचार्य चतुर सेन जैसे साहित्यकारों ने भी अपना योगदान दिया है। नई पीढ़ी के कई विज्ञान कथाकार इस विधा को समृद्ध कर रहे हैं। असल में विज्ञान कथा लेखन एक कठिन कार्य है जिसमें कहानी की समझ और विज्ञान के तंतुओं से कथा बुनने की कला आना जरूरी है। एक बात और, विज्ञान कथाओं से जनमानस तक विज्ञान को आसानी से पहुँचाया जा सकता है।

कवि‍ता जि‍न्‍दगी की ओर ले जाती है : पवि‍त्रन तीकूनी


पवि‍त्रन तीकूनी
केरल के तीकूनी में जन्मे युवा मलयालम कवि‍ पवि‍त्रन तीकूनी के दस काव्य  संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्‍हें कई पुरस्‍कारों से सम्‍मानि‍त कि‍या जा गया है। केरल दिवस के दौरान विशाखपटणम पहुँचे पवित्रन तीकूनी से हिन्‍दी एवं मलयालम कवि व बहुभाषी अनुवादक संतोष अलेक्स द्वारा लिया गया साक्षात्कार-
संतोषः आपने कवितायें लिखना कब शुरू किया ? पहली कवि‍ता कब और कहाँ प्रकाशित हुई ?
पवित्रन: मैं अस्सी के अंतिम दौर में कवितायें लिखने लगा। मेरी पहली कविता ‘चंद्रिका’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। कविता का शीर्षक था- ‘रोसापूवूम मेषुकुतिरियुम़’ (गुलाब का फूल व मोमबत्ती)।
संतोष: ‘मुरीवकलुडे वसंतम’ (घावों का वसंत) से ‘कुरीदिक्कु मुनपु’ (हत्या से पहले) तक की यात्रा को आप कैसे आँकते हैं ?
पवि‍त्रन: मेरा जीवन बहुत ही कठिनाइयों से गुजरा। पिताजी की मानसिक हालत खराब थी, जिसके चलते माँ ने दूसरी शादी की। घर में कमानेवाला कोई नहीं था इसलिये मैं चौथी कक्षा में पढ़ते वक्त घर छोड़कर भाग कर कण्णूर पहुँचा। वहाँ एक होटल में काम करने लगा।
एक नवम्बर की बात है। वहीं पास के एक स्कूल में बाल दिवस पर प्रतियोगितायें हो रही थीं। मैंने भी प्रतियोगिता में भाग लिया और मुझे पुरस्कार मिला। पुरस्कार देते समय मुझसे मेरे स्कूल का नाम पूछा तो मैं चुप रहा। तो मन में फिर से पढ़ने की इच्छा जागी।
मैं घर वापस आ गया। घर के पास स्थित स्कूल में पढ़ने लगा। ‍पि‍ताजी स्कूल जाते हुए बच्चों पर पत्थर फेंकते और गाली-गलोच करते। पिताजी की इस हरकत से तंग आकर मैं घर से बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित वटटोली हाई स्कूल में पढ़ने लगा। दसवीं कक्षा पहली श्रेणी में पास हुआ। फिर मुंगेरी सरकारी कॉलेज में इंटरमीडिएट के लिये दाखिल हुआ और पहली श्रेणी में पास हुआ।
इस बीच फिर से पिताजी के कारण मुझे घर छोड़कर भागना पडा़। इस बार मैं वयनाड जिले में पहुँचा। वहाँ एक नाई के घर आश्रय मिला। उनके साथ रहकर नाई का काम सीखा। इस बीच माही के सरकारी कॉलेज में बी.ए. में एडमि‍शन मिला। लेकिन मेरा नसीब ठीक नहीं था। मेरी बहन की शादी करवानी थी। घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। इसलिये बीस साल की उम्र में मुझे शादी करनी पडी़। मुझे जो कुछ मि‍ला उसे बहन को देकर उसकी शादी करवा दी।
मुसीबत फिर भी नहीं टली। दो साल बाद बहन अपने बच्चे को लेकर वापस घर आ गयी। मैं पूरी तरह टूट गया और अपनी बीवी और दो बच्चों को लेकर अलेप्पी पहुँचा। वहाँ पर अपनी बेटी को नोचकर, रुलाकर भीख मांगी ताकि पापी पेट को पाला जाय।ऐसे में एक दिन भीख मांगते समय मुझे एक आदमी ने पुकारा। वह मुझे समीप के एक कार्यालय में ले गया। वहाँ पर राजन कैलाश नामक कवि ने मुझे गले लगाकर पूछा, ‘‘आप पवित्रन तीकूनी हैं न?’’ मैं अवाक रह गया। उन्होंने मुझे मेरा एक काव्य सग्रंह दिखाया और कहा, ‘‘तुम कवितायें लिखना मत छोडो़। तुम्हारी कविताओं में जिन्दगी है।’’ तब से आज तक मैंने जीने के लिये कई काम किये, लेकिन कविता का सहारा नहीं छोडा़।
आज मैं जो भी हूँ वह कविता के कारण ही है। कविता को जानने से पहले मैंने कविता लिखना शुरू किया। जैसे-जैसे मैं कवितायें लिखता गया, वे प्रकाशित होती गईं। अब मैं कविताओं को जानकर लिख रहा हूँ।
संतोषः आपने किन-किन कवियों को पढा़ है और किन-किन कवियों ने आपको प्रभावित किया है ?
पवित्रन: जैसे मैंने आपको बताया जिन्‍दगी की आपाधापी में मुझे पढ़ने का समय नहीं मिला। इंटरमीडिएट की पढा़ई के बाद अन्य कवियों को पढ़ने लगा। के. सच्चिदानंदन, अयप्प पणिकर, बालचंद्रन चुल्लकाड, कुरीपुषा श्रीकुमार आदि की कवितायें मुझे अच्छी लगती हैं लेकि‍न किसी का खास प्रभाव मुझ पर नहीं है।
संताषः 1990 से 2000 के साल केरल की कविता के इतिहास में अनोखे हैं। इस दौरान आपको मिलाकर ग्यारह कवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। वरिष्ठ कवि श्री आटूर रविवर्मा ने इन दस कवियों पर ‘पुदुमोषीवषिकल’ (नये रास्ते) नामक किताब का सम्‍पादन करते हुए इन कवियों को साहित्यिक जगत से परिचित करवाया। इस किताब में आपको शामिल नहीं किया गया। कोई खास वजह?
पवित्रनः मुझे इसका कोई गम नहीं है। मैं किसी भी कवि द्वारा चलाये जी रही संस्थाओं में अपने को शामिल नहीं करता। तब भी और आज भी मैं जि‍न्‍दगी के एक छोटे से रास्ते से गुजर रहा हूँ। मेरा विश्‍वास है कि कविता मृत्यु की ओेर नहीं, बल्कि जिन्‍दगी की ओर ले चलती है।
मैंने और कवि मित्र एस. जोसफ ने ऐसी कवितायें लिखीं जो पहले किसी ने नहीं लिखीं। मछली बाजार, वहाँ का माहौल आदि पर हमने कवितायें लिखीं। कविता के लिये जो जगह मना थी, हम वहाँ चले गये और उन अवस्थाओं पर कवितायें कीं क्योंकि हमारा विश्‍वास था कि वहाँ भी जिन्‍दगी है और वहाँ भी लोग रहते हैं।
इसलिये आपके द्वारा बताए संग्रह में शामिल कवियों की अपेक्षा मेरी कविताओं को पाठकों ने पहचाना और सराहा है। इसके लिये मैं पाठकों का आभारी हूँ। अब तक मेरे नौ काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सब मिलाकर मैंने अब तक 600 कवितायें लिखी हैं।
संतोषः आपकी कविताओं में मार्क्सवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। आपको नहीं लगता कि आज मार्क्सवाद अपनी प्रासंगिकता खो चुका है?
पवित्रनः यह सही है कि मेरी कविताओं में मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव है। मेरी राय में मार्क्सवाद दुनिया का सबसे उत्कृष्ठ सिद्धान्त है। लेकिन खेद की बात है कि इसको सही मायने में न समझा गया और न ही अमल किया गया। आज मार्क्सवाद अपने सिद्धान्तों से कोसों दूर है।
संतोषः तेलुगु के महाकवि श्री श्री ने इस प्रकार बताया है, ‘कुछ भी कविता बनने में अक्षम नहीं है, लेकिन शिल्प पक्ष मुख्य है।’ आपकी राय में अच्छी कविता क्या है?
पवित्रनः हाँ, यह सही है कि कविता में शिल्प पक्ष महत्वपूर्ण है लेकिन केवल शिल्प पक्ष पर ध्यान देने से कविता नहीं बनती। कविता पढ़ने के बाद पाठक यदि मेरी पक्तियों में अपनी जिन्‍दगी के किन्ही क्षणों या अवस्थाओं से अपने को जोड़ पाये तो मैं अपने को कृतार्थ महसूस करूँगा। मेरी राय में कविता में आप जिन्‍दगी को पढ़ पायें तो वही अच्छी कविता है।
संतोषः आपने कई विषयों पर कवितायें लिखी हैं।आपकी शैली में एकरूपता आती जा रही है। आपके समकालीन कवियों में भी यह समस्या है। क्या आपको नहीं लगता कि इससे बच निकलना है?
पवित्रनः हाँ, मैं यह मानता हूँ, मेरे लिये कविता एक प्रवाह है। मैंने अब तक जो कवितायें लिखी हैं, उनमें से कोई भी कविता जबरदस्ती नहीं लिखी गई है। अपनी शैली से हटना आसान नहीं है। ‘वीटीलेकुल्ला वषीकल’ (घर की ओर का रास्ता) कविता में मैंने एक अलग शैली में कविता लिखी है। यह सही है कि मेरे समकालीनों की शैली में भी एकरूपता है। बदलाव जरूरी है। मेरा विश्‍वास है कि मेरे मित्र भी इससे छुटकारा पाने की कोशिश करेंगे।
संतोषः ‘सौजन्यम’ (मुफ्त), ‘पटटम’ (पंतग) आदि कविताओं में आपने गाँधीजी का जि‍क्र कि‍या है। क्‍या आप मानते हैं कि‍ गाँधी जी आज भी प्रासंगिक हैं?
पवित्रनः गाँधी जी युग पुरुष थे। सत्‍य और अहिंसा के उपासक थे। उनका कहना था कि यदि आपको कोई एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा गाल भी दि‍खायें। मैं इससे सहमत नहीं हूँ। क्‍योंकि‍ आज के समय में व्‍यक्‍ति‍ इतना वि‍नयशील बनें, यह सम्‍भव नहीं होता। अहिंसा का मार्ग अच्‍छा है लेकि‍न सहने की भी तो एक हद होती है।
संतोष : आज साहि‍त्‍य, राजनीति‍ और धर्म अपने लक्ष्‍यों से हट गये हैं। इसके प्रति‍ आपकी क्‍या प्रति‍क्रि‍या है?
पवि‍त्रन: आज व्‍यक्‍ति‍ अपने स्‍वार्थ के लि‍ये कि‍सी भी राजनीति‍क दल, संस्‍था से जुड़ जाता है। जब कोई दल सत्‍ता में है तो वह कई समस्‍याओं को स्‍वीकारता है, वही दल जब वि‍पक्ष में बैठता है तो उन्‍हीं बातों को नकारता है। आज राजनीति‍ मौकापरस्‍त ज्‍यादा व समाज सेवा कम करती है। जहाँ तक साहि‍त्‍य की बात है, यहाँ भी राजनीति‍ हावी होने लगती है। यही बात धर्म की भी है। राजनीति‍ का हस्‍तक्षेप धर्म और साहि‍त्‍य में नहीं होना चाहि‍ये।
संतोष : आपकी कवि‍ताओं का अनुवाद हि‍न्‍दी, अंग्रेजी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में हुआ है। क्‍या कवि‍ता का अनुवाद न्‍यायोचि‍त है ?
पवि‍त्रन: मैंने अनुवाद पढ़ा है। तमि‍ल कवयि‍त्रि‍यों तथा स्‍पेन की एक हजार साल पुरानी कवि‍ताओं का मलयालम अनुवाद पढ़ा है। उसी प्रकार हि‍न्‍दी में केदारनाथ सिंह और एकांत श्रीवास्‍तव की कवि‍ताओं को अनुवाद के माध्‍यम से पढ़ा। कवि‍ताओं का अनुवाद बहुत ही कठि‍न काम है। एक पौधे को उसकी मि‍ट्टी से उखाड़ कर दूसरी मि‍ट्टी में लगाना अनुवाद है। अगर यह ध्‍यान से नहीं कि‍या गया तो नतीजा बुरा हो सकता है। आप अनुवाद के क्षेत्र में सराहनीय काम कर रहे हैं। साहि‍त्‍य जगत को आप जैसे अनुवादक की जरूरत है जो बडे़ लगन और नि‍ष्‍ठा से अनुवाद के क्षेत्र में कार्यरत हैं। अनुवादक की बदौलत ही एक भाषा का रचनाकार को दूसरी भाषा से परि‍चि‍त हो पाता है।
संतोष : मछली बेचना आपका पेशा है। क्‍या आपको लगता है कि‍ कहीं-न-कहीं एक कवि‍ की छवि‍ को इससे ठेस पहुँची है?
पवि‍त्रन : पाठकों से मेरा अनुरोध है कि‍ मेरी कवि‍ताओं को स्‍वीकारें, न कि‍ मेरे पेशे पर जायें। पापी पेट को पालने के लि‍ये मैं बाजार में मछली बेचता हूँ। हाँ, कभी-कभी साहि‍त्‍यि‍क खेमों में मुझे अपने पेशे के कारण वह आदर नहीं मि‍लता जो मुझे मि‍लना चाहिये।
लेकि‍न यह बताते हुए मुझे गर्व महसूस होता है कि‍ केरल में खासकर मलबार इलाके के कई प्रसि‍द्ध कॉलेजों में मुझे मुख्‍य अति‍थि‍ के रूप में आमंत्रि‍त कि‍या गया। मुझे कई साहि‍त्‍यि‍क कार्यक्रमों का उद्घाटन करने का सौभाग्‍य मि‍ला। यह सब इस बात का सबूत है कि‍ लोग मेरे पेशा नहीं, बल्‍कि‍ मेरी कवि‍ताओं को चाहते हैं। यही नहीं केरल में इंटरमीडि‍एट और बी.ए. मलयालम के लि‍ये मेरी कवि‍ताओं को चुना गया है। इससे ज्‍यादा खुशी मेरे लि‍ये क्‍या हो सकती है।
संतोष : आपको अब तक प्राप्‍त पुरस्‍कारों के बारे में कुछ बताएं?
पवि‍त्रन: मुझे अब तक लगभग बारह पुरस्‍कार मि‍ल चुके हैं। उनमें प्रमुख हैं- कनक श्री पुरस्‍कार, इंडि‍यन जेसीस पुरस्‍कार, आशान पुरस्‍कार, रहीम एचेरी पुरस्‍कार, पंतजलि‍ पुरस्‍कार और कैरली पुरस्‍कार।
संतोष : आपकी नई योजनाएं क्‍या हैं? कोई नया काव्‍य संग्रह नि‍कट भवि‍ष्‍य में प्रकाशि‍त होने वाला है?
पवि‍त्रन : डी.सी. बुक्‍स की ओर से मेरा नया कवि‍ता संग्रह प्रकाशि‍त होने वाला है। पहली बार एक उपन्‍यास लि‍ख रहा हूँ। इस यात्रा (आंध्र प्रदेश की यात्रा) के आधार पर आंध्र प्रदेश के स्‍कैचस शीर्षक से कुछ नई कवि‍तायें लि‍खी हैं और कुछ वापस जाकर लि‍खूँगा।
संतोष : आशा करता हूँ कि‍ आप ज्‍यादा कवि‍तायें लि‍खें और आपको ज्‍यादा कामयाबी मि‍ले। आपने समय दि‍या इसके लि‍ये आभारी हूँ।
पवि‍त्रन : धन्‍यवाद आपको भी। अनुवाद के क्षेत्र में आप और भी नये रचनाकारों को परि‍चि‍त करायें।

भाषा हमारे अस्तित्व का मूल : नोम चोम्‍स्‍की


नोम चोम्‍स्‍की
वि‍श्‍व वि‍ख्‍यात भाषावैज्ञानि‍क, दार्शनि‍क, वामपंथी लेखक नोम चोम्‍स्‍की ने भाषाविज्ञान संबंधी कई क्रान्‍ति‍कारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। भाषा और भाषा के वि‍कास को लेकर उनका यह साक्षात्‍कार वि‍ज्ञान पत्रि‍का ‘डि‍स्‍कवर’ में 29 नवम्‍बर, 2011 को प्रकाशि‍त हुआ था। उनसे यह बातचीत ‘डिस्कवर’ के संवाददाता वेलरी रॉस ने की थी। इसका अनुवाद वरि‍ष्‍ठ लेखक-पत्रकार आशुतोष उपाध्‍याय ने कि‍या है-
सदियों से विशेषज्ञ यह मानते रहे कि हर भाषा अनूठी होती है। फिर एक दिन 1956 में भाषाविज्ञान के एक युवा प्रोफेसर ने शीर्ष अमेरिकी शिक्षा संस्थान एमआईटी में सूचना सिद्धांत पर आयोजित एक गोष्ठी में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होंने तर्क दिया कि प्रत्येक अर्थपूर्ण वाक्य न सिर्फ अपनी भाषा के नियमों का, बल्कि सभी भाषाओं पर लागू होने वाले वैश्‍वि‍क व्याकरण का भी पालन करता है। यही नहीं, बच्चे बड़ों की बातचीत की नकलकर या अपने बाहरी परिवेश से भाषा सीखने के बजाय भाषा में महारत प्राप्त करने की अंदरूनी क्षमता से परिपूर्ण होते हैं। यह एक ऐसी शक्ति है जो जैविक विकास ने सिर्फ हम मनुष्यों को सौंपी है। युवा प्रोफेसर के इस क्रान्‍ति‍कारी विचार ने रातोंरात भाषाविदों की सोच को बदलने की शुरुआत कर दी।
एवराम नोम चोम्स्की का जन्म 7 दिसंबर, 1928 को अमेरिकी नगर फिलाडेल्फिया में हुआ था। उनके पिता विलियम चोम्स्की हिब्रू भाषा के विद्वान थे और माँ एल्सी सिमोनोफ्स्की भी विदुषी व बाल पुस्तकों की लेखिका थीं। नोम ने बचपन में ही मध्यकालीन हिब्रू व्याकरण पर अपने पिता द्वारा लिखी पांडुलिपि पढ़ डाली, जिसने उनके भविष्य के काम की जमीन तैयार की। सन् 1955 तक वह एमआईटी में भाषाविज्ञान पढ़ाने लगे। यहाँ रहकर उन्होंने अपने भाषाविज्ञान संबंधी क्रान्‍ति‍कारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। चोम्स्की उस नजरिए को चुनौती देते हैं, जिससे हम आज भी खुद को देखते हैं। वह कहते हैं, ‘भाषा हमारे अस्तित्व का मूल है। हम हर वक्त भाषा में लीन रहते हैं। जब हम सड़क पर चल रहे होते हैं तो खुद से अपनी बातचीत को रोकने के लिए जबर्दस्त इच्छाशक्ति की जरूरत पड़ती है। क्योंकि खुद के साथ हमारी बातचीत निरंतर चलती रहती है।’
चोम्स्की ने राजनीति से दूरी बनाए रखने की वैज्ञानिकों की परम्‍परा के विपरीत सक्रिय राजनीति में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। वह वियतनाम में अमेरिकी आक्रमण के मुखर विरोधी थे और उन्होंने 1967 के प्रसिद्ध पेंटागन विरोधी मार्च के आयोजन में भी मदद दी। जब इस आंदोलन के नेता गिरफ्तार कर लिये गये तो उन्हें जेल में नॉर्मन मेलर के साथ रखा गया। मेलर ने अपनी पुस्तक ‘आर्मीज ऑफ द नाइट’ में चोम्स्की को, ‘दुबला-पतला, तीखे नाक-नक्श और खास लहजे वाला ऐसा शख्स बताया, जिसकी सोहबत में भलमनसाहत व दृढ़ नैतिक बल की महक आती है।’
चोम्स्की के साथ यहाँ पेश की जा रही बातचीत कनेक्टीकट की पत्रकार मैरिऑन लांग के साथ कई तयशुदा बैठकों के निरस्त होने के बाद की गई। लॉग बताती हैं, ‘वह चोम्स्की के लिये बहुत मुश्किल समय था। पत्नी गम्‍भीर रूप से बीमार थीं और वह उनकी सेवा में जुटे थे। इस बातचीत के महज 10 दिन पहले वह गुजर गईं। इस हादसे के बाद चोम्स्की का यह पहला साक्षात्कार होना था लेकिन वह इसके लिये राजी हो गए।’ बाद में उन्होंने ‘डिस्कवर’ संवाददाता वेलरी रॉस को कई सवालों के जवाब दिये।
आप इंसानी भाषा को अनोखा गुण बताते हैं। कौन सी बात इसे खास बनाती है?
मनुष्य दूसरे प्राणियों से फर्क हैं और इस लिहाज से हर मनुष्य मूलत: एक जैसे होते हैं। अगर अमेजन के शिकार-संग्राहक आदिवासी समुदाय के किसी बच्चे को बोस्टन में पाला-पोसा जाये तो वह भाषाई क्षमता के मामले में यहाँ पल-बढ़ रहे मेरे बच्चों से जरा भी फर्क नहीं होगा। इससे उलटी परिस्थिति में भी यही होगा। यानी बोस्टन का कोई बच्चा अमेजन आदिवासियों के बीच पले-बढ़े तो उनकी भाषा-बोली सजह ढंग से बोलने लगेगा। यह अनोखा इंसानी खजाना, जो हम सब के पास है, हमारी संस्कृति व हमारे कल्पनाशील बौद्धिक जीवन के बड़े हिस्से का बुनियादी तत्व है। इसी वजह से हम योजनाएँ बना पाते हैं, सृजनात्मक कलाकर्म करते हैं और जटिल समाजों का निर्माण कर लेते हैं।
भाषा की इस ताकत का जन्म कब और कैसे हुआ?
अगर आप पुरातात्विक अभिलेखों को देखें तो करीब डेढ़ लाख से 75 हजार वर्ष पूर्व समय की एक छोटी सी खिड़की में रचनात्मक विस्फोट होता दिखाई पड़ता है। इस काल में अचानक जटिल हस्तशिल्प, प्रतीकात्मक निरूपण, आकाशीय घटनाओं का मापन तथा जटिल सामाजिक संरचनाओं जैसी सृजनात्मक गतिविधियों का विस्फोट देखने को मिलता है। प्रागैतिहासिक काल का लगभग हर विशेषज्ञ इस घटना को भाषा से औचक उद्भव के साथ जोड़ता है। ऐसा नहीं लगता कि इस घटना का मानव के शारीरिक बदलावों से कोई संबंध है; आज के इंसान के बोलने व सुनने के तंत्र बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे छह लाख साल पहले के मनुष्य के थे। मगर मनुष्य में अभूतपूर्व संज्ञानात्मक बदलाव आया है। कोई नहीं जानता क्यों?
इंसानी भाषा में आपकी दिलचस्पी कब शुरू हुई?
बहुत छोटी उम्र में मुझे अपने पिता से आधुनिक हिब्रू साहित्य व दूसरी पाठ्य सामग्री पढ़ने को मिली। 1940 के आसपास उन्हें फिलाडेल्फिया की एक हिब्रू संस्था ड्रॉप्सी कॉलेज से पीएच.डी. की डिग्री मिली। वह सीमेटिक थे और मध्यकालीन हिब्रू व्याकरण पर काम करते थे। मुझे याद नहीं कि मैंने अपने पिता की किताब के आधिकारिक तौर पर प्रूफ पढ़े थे या नहीं, लेकिन मैंने उसे पढ़ा जरूर था। कुछ हद तक व्याकरण संबंधी आम समझ मुझे इसी किताब से मिली। लेकिन इससे पीछे जाएँ तो व्याकरण के अध्ययन का मतलब था, ध्वनियों को व्यवस्थित करना, कालों को देखना,  इन चीजों को सूचीबद्ध करना और यह देखना कि ये एक-दूसरे के साथ कैसे जुड़ती हैं।
भाषाविद् ऐतिहासिक व्याकरण और विवरणात्मक व्याकरण में फर्क करते हैं। इन दोनों में क्या अंतर है?
ऐतिहासिक व्याकरण कुछ इस तरह का अध्ययन है- जैसे, किस तरह आधुनिक अंग्रेजी का मध्यकालीन अंग्रेजी से विकास हुआ। किस तरह मध्यकालीन, प्रारम्‍भि‍क व पुरानी अंग्रेजी से निकली और किस तरह वह जर्मेनिक से और जर्मेनिक उस भाषा स्रोत से विकसित हुई जिसे हम प्रोटो-इंडो-यूरोपियन कहते हैं और जिसे कोई नहीं बोलता इसलिए इसे फिर से गढ़ना पड़ता है। भाषाएं समय के साथ कैसे विकसित होती हैं, यह इस बात को पुनर्निर्मित करने का एक प्रयास है। आप इसे जैविक उद्वि‍कास (बायोलॉजिकल इवोल्यूशन) के अध्ययन के समकक्ष मान सकते हैं। विवरणात्मक व्यापकरण किसी समाज या व्यक्ति विशेष के लिये मौजूदा भाषाई व्यवस्था को जानने का प्रयास है। आप इस अंतर को जैविक विकास और मनोविज्ञान के बीच फर्क की तरह देख सकते हैं।
और आपके पिता के जमाने के भाषाविद्, वे क्या करते थे?
वे वास्तविक धरातल पर इस्तेमाल की जा रही भाषाई विधियों पर काम करते थे। उदाहरण के लिये अगर आप चेरोकी के व्याकरण पर काम करना चाहते हैं तो आप उस समुदाय के बीच जायेंगे। और स्थानीय बोलने वालों से सूचनाएं इकट्ठा करेंगे।
ये भाषाविद् किस तरह के सवाल पूछते थे?
मान लीजिये आप चीन से आये मानवशास्त्रीय भाषाविद् हैं और मेरी भाषा का अध्ययन करना चाहते हैं। पहली बात आप यह जानना चाहेंगे कि मैं किस तरह की ध्वनियों का इस्तेमाल करता हूँ। और फिर आप पूछेंगे कि ये ध्वनियाँ एक साथ कैसे जुड़ती हैं। उदाहरण के लिये मैं ‘ब्निक’ न बोल कर ‘ब्लिक’ क्यों बोलता हूँ और इन ध्वनियों को कैसे व्यवस्थित किया जाता है? उन्हें किस तरह जोड़ा जाता है? अगर आप उस ढंग को देखें, जिसके मुताबिक शब्द के ढाँचे को व्यवस्थित किया जाता है,  तो क्या किसी क्रिया में भूतकाल भी होता है? अगर होता है तो क्या यह क्रिया के बाद होता है या इसके पहले? या यह किसी और तरह की चीज है? और आप इसी तरह के कई और सवाल पूछते चले जाते हैं?
लेकिन आप तो इस नजरिए से सहमत नहीं थे. क्यों?
मैं उस वक्‍त पेन यूनिवर्सिटी में था और मेरी ग्रेजुएट थीसिस का शीर्षक था- बोलचाल की हिब्रू का आधुनिक व्याकरण। इस भाषा की मेरी समझ खासी अच्छी थी। मैंने भी इस पर ठीक उसी तरह काम करना शुरू किया, जैसा हमें उस वक्‍त पढ़ाया जाता था। मुझे एक हिब्रूभाषी सूचनादाता मिला,  जिससे मैंने सवाल पूछने शुरू किए और मुझे
आँकड़े मिलने लगे। एक मौका ऐसा आया कि अचानक मुझे लगा: क्या बेहूदगी है! मैं ऐसे सवाल पूछ रहा हूँ, जिनके जवाब मैं पहले से ही जानता हूँ।
जल्द ही आपने भाषाविज्ञान में अपने शोध की निहायत नई विधि विकसित कर ली। ये विचार कैसे जन्मे?
इससे पहले 1950 में, जब मैं हारवर्ड में स्नातक छात्र था, यह आम धारणा थी कि अन्य मानवीय गतिविधियों की तरह भाषा भी सीखी जाने वाली आदतों का एक संग्रह है। यह उसी तरह सीखी जाती है जैसे पालतू जानवर प्रशिक्षित किये जाते हैं। यानी प्रबलीकरण के जरिये। उन दिनों यह धारणा एक तरह से अंधविश्‍वास की तरह व्याप्त थी। लेकिन हम दो या तीन लोग ऐसे थे, जो इस बात से सहमत नहीं थे और हमने चीजों को बिल्कुल अलग तरह से देखना शुरू किया।
खासतौर पर, हमने कुछ बुनियादी तथ्यों पर गौर किया: प्रत्येक भाषा अनगिनत सुव्यवस्थित अभिव्यक्तियों को गढ़ने और प्रकट करने का एक माध्यम है, जिसमें हर अभिव्यक्ति की एक अर्थगत व्याख्या और ध्वन्यात्मक रूप है। इसलिए यहाँ ऐसी चीज है जिसे हम जेनरेटिव प्रोसीजर कहते हैं, अनगिनत वाक्यों या अभिव्यक्तियों को पैदा करने और उन्हें अपने विचार व स्नायुतंत्र से जोड़ने की क्षमता। हमें हर बार इस केन्‍द्रीय गुण को ध्यान में रखकर शुरुआत करनी होती है। व्यवस्थित अभिव्यक्तियों और उनके अर्थ के बेरोकटोक उत्पादन का गुण। हमारे ये विचार बाद में उस सिद्धांत के रूप में घनीभूत हुये जिसे आज हम बायोलिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क कहते हैं। यह सिद्धांत भाषा को मानव जीवविज्ञान के एक तत्व के रूप में देखता है, ठीक वैसे ही जैसे हमारा दृष्टि तंत्र है।
आपका सिद्धांत है कि सभी मनुष्यों का एक वैश्‍वि‍क व्याकरण होता है। इस बात का क्या अर्थ है?
इसका मतलब इंसानी भाषा संकाय की आनुवांशिक जड़ों से है। उदाहरण के लिये आप अपने अंतिम वाक्य पर गौर करें। यह ध्वनियों का बेतरतीब क्रम नहीं है। आपने शब्दों का अत्यंत सुनिश्‍चि‍त ढाँचा खड़ा किया है और इसका अत्यंत विशिष्ट भाषाई अर्थ है। इसका एक खास मतलब है,  कोई दूसरा मतलब नहीं और इसकी एक खास ध्वनि है, दूसरी नहीं। बताइए, आपने यह किया कैसे? यहाँ दो संभावनाएँ हो सकती हैं। एक,  इसे एक चमत्कार मान लिया जाय। या दूसरी,  आपके पास नियमों की एक आंतरिक व्यवस्था है जो शब्दों के ढाँचे और उसके अर्थ को निर्धारित करती है। मैं नहीं समझता यह एक चमत्कार की देन है।
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आपके भाषावैज्ञानिक विचारों पर शुरुआत में कैसी प्रतिक्रियाएं हुईं?
शुरू-शुरू में ज्यादातर लोगों ने हमारे विचारों को खारिज किया या इनकी उपेक्षा की। यह बिहेवियरल साइंस का दौर था, मानव क्रियाओं और व्यवहार का अध्ययन,  जिसमें व्यवहार का नियंत्रण तथा रूपांतरण भी शामिल किया जाता है। बिहेवियरिज्म कहता है कि आप किसी व्यक्ति को मनचाहे रूप में बदल सकते हैं,  बशर्ते आप उसके परिवेश व प्रशिक्षण पद्धति को ठीक से व्यवस्थित कर सकें। मनुष्य के रूपांतरण में आनुवांशिक घटक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इस विचार को अजनबी बताकर हल्के में लिया गया।
बाद में मेरे इस विधर्मी विचार को ‘इन्नेटनेस हाइपोथीसिस’ का नाम दे दिया गया और इसकी भर्त्‍सना में रचे गये साहित्य का ढेर लग गया। आज भी आप प्रमुख शोध पत्रिकाओं में ऐसे सूत्रवाक्य पढ़ सकते हैं कि भाषा सिर्फ संस्कृति, परिवेश तथा प्रशिक्षण का परिणाम है। एक तरह से यह धारण हमारे सहजबोध का हिस्सा बना दी गई है। हम सब भाषा सीखते हैं, चाहे वह कितनी भी मुश्किल क्यों न हो। हम पाते हैं कि परिवेश भी अपना असर छोड़ता है।
इंग्लैंड में पलने-बढ़ने वाले लोग अंग्रेजी बोलते हैं, स्वाहिली नहीं। और वास्तविक सिद्धांत- वे हमारी चेतना तक नहीं पहुँच पाते। हम अपने भीतर झाँककर उन छुपे हुए सिद्धांतों को नहीं देख सकते जो हमारे भाषाई व्यवहार को निर्धारित करते हैं। और हम उन सिद्धांतों को भी नहीं देख सकते जो हमें अपने शरीर को हिलाने की इजाजत देते हैं। यह भीतर ही भीतर होता रहता है।
भाषा वैज्ञानिक इन छुपे हुए सिद्धांतों की खोज कैसे कर लेते हैं?
आप आँकड़ों को संग्रहकर किसी भाषा के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। मसलन- मेरी भाषा का अध्ययन कर रहा चीनी भाषाविद् इस बारे में मुझे से सवाल पूछकर जवाब इकट्ठा कर सकता है। यह एक तरह का संग्रह होगा। दूसरे तरह का संग्रह यह हो सकता है कि लगातार तीन दिन तक जो कुछ मैं बोलूँ उसे वह टेप करता रहे। और किसी भाषा को सीखते और इस्तेमाल करते वक्‍त लोगों के दिमाग में जो कुछ चल रहा है, उसका अध्ययन कर आप भाषा के बारे में जाँच-पड़ताल कर सकते हैं। आज के भाषाविदों को चाहिए कि वे उन नियमों व सिद्धांतों पर ध्यान देने का प्रयास करें जिन्हें,  उदाहरण के लिए, आप ठीक इस वक्त मेरे द्वारा गढ़े जा रहे वाक्यों का अर्थ निकालने और उन्हें समझने या फिर अपने वाक्यों को बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
क्या यह व्याकरण की उस पुरानी व्यवस्था जैसा नहीं, जिसे आप पहले ही खारिज कर चुके हैं?
नहीं। व्याकरण के परम्‍परागत अध्ययन में आप ध्वनियों व शब्द रचना पर ध्यान देते हैं और शायद थोड़ा बहुत वाक्य विन्यास पर। पिछले 50 वर्षों के उत्पादक भाषाविज्ञान (जेनरेटिव लिंग्विस्टिक्स) में आप, मसलन, यह पूछ रहे हैं कि प्रत्येक भाषा के लिए नियमों व सिद्धांतों का वह कौन सा तंत्र है जो व्यवस्थित अभिव्यक्तियों की अनगिनत शृंखलाओं को तय करता है?  इसके बाद आप उन्हें एक निश्‍चि‍त व्याख्या से जोड़ते हैं।
हमारी भाषाई समझ के साथ क्या मस्तिष्क छवियाँ जुड़ी हुई हैं?
मिलान के एक ग्रुप ने हाल ही में भाषा के साथ होने वाली मस्तिष्क की क्रियाशीलता संबंधी एक दिलचस्प अध्ययन किया है। उन्होंने अपने शोधपात्रों को निरर्थक भाषाओं वाली दो तरह की लिखित सामग्री दी। इनमें एक प्रतीकात्मक भाषा थी, जिसे इतावली भाषा के नियमों के आधार पर गढ़ा गया था, हालाँकि शोधपात्र इसे नहीं जानते थे। दूसरी को वैश्‍वि‍क व्याकरण के नियमों का उल्लंघन कर तैयार किया गया था। एक खास मामले में, माना आप किसी वाक्य का निषेध करना चाहते हैं, ‘जॉन यहाँ था, जॉन वहाँ नहीं था।’ कुछ निश्‍चि‍त चीजें हैं जिन्हें करने की इजाजत भाषाओं में आपको दी जाती है। आप ‘नहीं’ शब्द को कुछ स्थानों में रख सकते हैं लेकिन कुछ अन्य स्थानों में नहीं रख सकते। इसलिए पहली मनगढ़ंत भाषा में आप निषेधकारी तत्व को किसी स्वीकार्य जगह पर रखते हैं, जबकि दूसरे में आप इसे अस्वीकार्य जगह पर रख देते हैं। मिलान ग्रुप ने पाया कि स्वीकार्य निरर्थक वाक्य के साथ मस्तिष्क के भाषाई क्षेत्र में सक्रियता दिखाई देती है लेकिन अस्वीकार्य वाक्य- वे जो वैश्‍वि‍क व्याकरण के नियमों का उल्लंघन करते हैं- मस्तिष्क में कोई सक्रियता पैदा नहीं करते। इसका मतलब यह हुआ कि लोग अस्वीकार्य वाक्यों के साथ भाषा की तरह नहीं बल्कि पहेली की तरह खेल रहे थे। यह एक शुरुआती परिणाम है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि भाषाओं की पड़ताल से निकलने वाले भाषाई सिद्धांतों का दिमागी क्रियाशीलता के साथ गहरा रिश्ता है, जैसी कि किसी को उम्मीद और अपेक्षा हो सकती है।
हाल के आनुवांशिक अध्ययन भी भाषा के बारे में कुछ इसी तरह के संकेत देते हैं. क्या यह सही है?
हाल के वर्षों में एक जीन की खोज हुई है, जिसका नाम है- फॉक्सपी2। यह जीन खासतौर पर दिलचस्प है, क्योंकि इसमें किसी किस्म का उलटफेर (म्युटेशन) होने पर भाषाई इस्तेमाल संबंधी कमजोरियाँ सामने आने लगती हैं। इस जीन को उस क्रिया से जोड़ा जाता है जिसे हम ऑरोफेशियल एक्टीवेशन कहते हैं,  यानी बोलते वक्त हम अपने मुँह, अपने चेहरे और जीभ को किस प्रकार नियंत्रित करते हैं। इसलिये फॉक्सपी2 का संभवत: भाषा के इस्तेमाल के साथ कोई रिश्ता है। यह जीन सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं, बल्कि कई अन्य प्राणियों में भी पाई जाती है और अलग-अलग प्रजातियों में अलग-अलग ढंग से काम करती है। ये जीन कोई एक काम नहीं करतीं। लेकिन इस खोज को भाषा के कुछ पहलुओं के आनुवांशिक आधार की मौजूदगी की पुष्टि की दिशा में एक दिलचस्प शुरुआती कदम माना जा सकता है।
आप कहते हैं कि जन्मजात भाषाई क्षमता मनुष्यों की विशिष्टता है, मगर फॉक्सपी2 की सततता कई प्रजातियों में देखी गई है। क्या ये दोनों बातें परस्पर विरोधाभासी नहीं हैं?
यह बात लगभग अर्थहीन है कि इसमें प्रजातिगत सततता है। इसमें किसी को संदेह नहीं कि मनुष्य का भाषाई तंत्र जीन, तंत्रिका तंत्र आदि पर आधारित है। भाषा के प्रयोग, समझ, अधिग्रहण और निर्माण में शामिल पद्धतियाँ एक स्तर तक सम्‍पूर्ण जंतु जगत में दिखाई देती हैं। और सच कहें तो सम्पूर्ण जीव जगत में दिखाई देती हैं। कुछेक को तो आप जीवाणुओं में भी देख सकते हैं। लेकिन यह बात इसके उद्विकास या समान मूल से पैदा होने का शायद ही कोई संकेत देती हैं। भाषा उत्पन्न करने जैसे विशिष्ट मामले में कोई प्रजाति अगर मनुष्य के सबसे ज्यादा नजदीक कही जा सकती है, तो वह हैं पक्षी। लेकिन इसकी वजह समान उद्गम नहीं है। यह एक अलग परिघटना है, जिसे हम कनवर्जेंस कहते हैं- लगभग एक जैसी व्यवस्थाओं का अलग-अलग स्वतंत्र रूप से विकास। फॉक्सपी2 खासी दिलचस्प है मगर यह ज्यादातर भाषा के हाशिए पर रहने वाले हिस्सों का निर्धारण करती है, जैसे भाषा का (भौतिक) उत्पादन। इसके बारे में जो कुछ भी खोजा जा रहा है, उसका भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों पर प्रभाव पड़ने की सम्‍भावना बहुत कम है। पिछले 20 वर्षों से आप भाषा की ‘सरलतम’ (मिनिमलिस्ट) समझ पर काम कर रहे हैं। इसकी क्या जरूरतें हैं?
मान लीजिए भाषा बर्फ के एक फाहे की तरह है। यह प्रकृति के नियम के मुताबिक आकार ग्रहण करती,  इस शर्त के साथ कि यह बाहरी निर्धारकों को संतुष्ट करती है। भाषा की खोज के बारे में इस नजरिए को मिनिमलिस्ट प्रोग्राम कहा जाता है। मैं समझता हूँ,  इसने कुछ महत्वपूर्ण परिणाम दिये हैं। इसने दिखाया है कि भाषा यकीनन कुछ शब्दार्थ संबंधी अभिव्यक्तियों का आदर्श हल है लेकिन स्पष्ट अभिव्यक्त के लिहाज से बहुत खराब तरीके से डिजाइन है। एक विशिष्ट आवाज निकाल कर आप ‘बेसबॉल’ कहते हैं, इसके लिये ‘पेड़’ नहीं कहते।
भाषाविज्ञान में सामने बड़े सवाल कौन से हैं?
अब भी कई अनुत्तरित रिक्त स्थान हैं। कुछ सवाल ‘क्या’ से शुरू होने वाले हैं। जैसे- भाषा क्या है? इस वक्त आप और मैं जो कुछ कर रहे हैं, उसके नियम और सिद्धांत क्या हैं? कुछ और सवाल ‘कैसे’ से शुरू होते हैं: आपने और मैंने इस क्षमता को कैसे हासिल किया। हमारे आनुवांशिक भंडार व अनुभवों में और प्रकृति के नियमों में आखिर क्या छुपा हुआ है? और इसके बाद ‘क्यों’ से शुरू होने वाले सवाल हैं, जो सबसे कठिन हैं: भाषा के नियम ऐसे ही क्यों है, कुछ और तरह के क्यों नहीं? किस हद तक यह सही है कि भाषा का बुनियादी डिजाइन उन बाहरी शर्तों के अनुकूल हल पेश करता है, जिन्हें भाषा अपरिहार्य रूप से पूरा करती है? यह एक बड़ी समस्या है। भाषा की प्रकृति के बार में जो कुछ हम जानते हैं उसे हम किस हद तक मस्तिष्क में होने वाली क्रियाओं से जोड़कर देख सकते हैं? और अंतत: क्या भाषा के आनुवांशिक आधार के बारे में कोई गम्‍भीर पड़ताल हुई है? इस सभी बिंदुओं पर बेशक प्रगति दिखाई देती है लेकिन बड़े रिक्त स्थान अब भी बने हुए हैं।
हर माता-पिता इस बात पर हैरान होते हैं कि किस तरह बच्चे भाषा सीखते हैं। यह बात सहसा अविश्वसनीय लगती है कि इस प्रक्रिया के बारे में हम अब भी बहुत कम जानते हैं।
आज हम जानते हैं कि जन्म के समय एक शिशु को अपनी माँ की भाषा के बारे में बहुत थोड़ी जानकारी होती है। अगर कोई दो भाषाएँ जानने वाली कोई महिला उसके सामने बोले तो वह अपनी मातृभाषा और दूसरी भाषा के बीच फर्क समझ सकता है। उसके परिवेश में तमाम तरह की चीजें घट रही होती हैं, जिसे विलियम जेम्स ‘बढ़ता, उभरता विभ्रम’ कहते हैं। मगर शिशु किसी तरह इस जटिल परिवेश से खुद ब खुद उन आँकड़ों को छाँट लेता है, जो भाषा से संबंध रखते हैं। कोई भी दूसरा प्राणी ऐसा नहीं कर पाता। एक चिम्पांजी ऐसा नहीं कर पाता। और बहुत जल्दी व स्वत: ढंग से शिशु एक आंतरिक तंत्र हासिल करने की दिशा में बढ़ जाता है। यह तंत्र अंतत: उस क्षमता के रूप में प्रकट होता है, जिसका इस्तेमाल हम इस वक्त कर रहे हैं। शिशु के दिमाग में क्या चल रहा है? मानव जीनोम के कौन से तत्व इस प्रक्रिया में योगदान कर रहे हैं? ये चीजें कैसे विकसित होती हैं? इन बातों को ठीक से समझना अभी बाकी है।
उच्चतर स्तर पर अर्थ के बारे में क्या कहेंगे? जो महान गाथाएँ लोग पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाते आए हैं, उनके विषय बार-बार दोहराए जाते हैं। क्या यह दोहराव मनुष्य की जन्मजात भाषा के बारे में कुछ संकेत देता है?
जानी-पहचानी परीकथाओं में से एक कहानी एक खूबसूरत राजकुमार की है, जिसे कोई दुष्ट जादूगरनी मेढक में बदल देती है। कहानी के अंत में एक सुन्‍दर राजकुमारी आकर मेढक को चूमती है और वह फिर से राजकुमार में बदल जाता है। हर बच्चा इस बात को जानता है कि वह मेढक दरअसल राजकुमार है, लेकिन उन्हें यह कैसे पता चलता है? वह अपने प्रत्येक शारीरिक गुण के हिसाब से मेढक है। कौन सी बात उसे राजकुमार बनाती है? यह पता चलता है कि यहाँ एक नियम काम करता है: लोगों व जन्तुओं तथा अन्य जीवित प्राणियों को हम उनके एक गुण से पहचानते हैं, जिसे मनोवैज्ञानिक सततता (साइकिक कंटीन्युइटी) कहा जाता है। बच्चे उसकी पहचान एक तरह के दिमाग या आत्मा या एक ऐसे अंदरूनी तत्व के रूप में करते हैं जो उनके भौतिक गुणों से स्वतंत्र है। वैज्ञानिक इस बात पर विश्‍वास नहीं करते लेकिन हर बच्चा करता है और हर मनुष्य जानता है कि इस तरह दुनिया की व्याख्या कैसे की जाती है।
आपकी बातों से ऐसा लगता है जैसे भाषाविज्ञान का विज्ञान बस शुरू ही हुआ है।
भाषा के बारे में कई ऐसे सरल विवरणात्मक तथ्य हैं, जिन्हें समझा नहीं गया है: वाक्य किस तरह अपना अर्थ हासिल करते हैं? उनकी आवाज कैसे बनती है? किस प्रकार दूसरे लोग उन्हें समझ लेते हैं? भाषा संगणना (कंप्यूटेशन) में एक-रेखीयता (लीनियर ऑडर) का पालन क्यों नहीं करती? उदाहरण के लिए एक सरल वाक्य लीजिए, जैसे ‘क्या उड़ रहे गिद्ध तैरते हैं?’ आप इसे समझते हैं, हर कोई इसे समझता है। एक बच्चा इसे इस प्रश्‍न के रूप में लेता है कि क्या गिद्ध तैर सकते हैं। सवाल में यह नहीं पूछा जा रहा है कि क्या वे उड़ सकते हैं। आप कह सकते हैं, ‘क्या जो गिद्ध उड़ रहे हैं तैरते हैं?’ मतलब क्या इसे यह माना जाए कि गिद्ध जो उड़ रहे हैं तैरते हैं? ये वे नियम हैं, जिन्हें हर कोई जानता है, बिना सोचे-समझे जान लेता है। लेकिन क्यों? यह अब भी एक रहस्य है। और इन नियमों के स्रोत मूतल: अनजान हैं।

दुनिया नाक रगड़ कर हिंदी के पास आएगी : अरविंद कुमार


पेंगुइन वाले कोश के विमोचन पर बोलते अरविंद कुमार
ऐसे सौभाग्यशाली लोग बहुत ही कम होते हैं जिन्हें अपने सपने साकार करने में पूरे परिवार का निरंतर सहयोग मिले। विशेषकर ऐसे जोख़िमभरे सपने जिस में स्वप्नद्रष्टा को अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़नी हो, अनुदान तो दूर की बात है, कहीं से कैसी भी आर्थिक सहायता न मिलने वाली हो, जिनका पूरा होना भी अनिश्चित हो। इतना ही नहीं, जिसके रास्ते में एक के बाद एक भारी से भारी अड़चन आती रहे, फिर भी किसी का मनोबल न टूटे, ऐसी मिसालें दुनिया में कुछ कम ही हैं। अरविंद कुमार ऐसे ही सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं। प्रस्तुत हैं उनसे अनुराग की बातचीत के कुछ अंश-
आपको शलाका सम्‍मान प्रदान किया गया। आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है?
कभी सपने में भी कल्पना नहीं थी कि मेरे साथ ऐसा कुछ होगा। ग़ालिब के शब्दों में इतना ही कह सकता हूं– बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। हिंदी अकादेमी के उपाध्यक्ष श्री अशोक चक्रधर और उनके चयन मंडल ने मुझे इस योग्‍य समझा—चमत्कृत हूं और बहुत प्रसन्न।
आपको यह नहीं लगता कि भाषा के क्षेत्र में जितना काम किया है, उस हिसाब से आपको समुचित मान-सम्‍मान नहीं मिला ?
काम करने वाले का काम है काम करना, मान-सम्मान करने वाले का काम है मान-सम्मान करना। उनके बारे में मियाँ ग़ालिब के ही अल्फ़ाज़ हैं– चाहिए अच्छों को जितना चाहिए, वे अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए। इसका संदर्भ तो बिल्कुल दूसरा है, पर सम्मान देने वालों पर भी चस्पाँ होता है।
जब पंद्रह साल की उमर में बालश्रमिक के रूप में छापेख़ाने में दाख़िल हुआ, तभी से मेरे लिए काम, अपने आप में सम्‍पूर्ण आत्मसम्मान रहा है। कभी किसी से कोई गिला नहीं किया। सन् 45 में ही मैं करोलबाग़, दिल्ली के कांग्रेस सेवादल और आज़ादी के दीवाने एक उग्र दल ‘लालक़िला ग्रुप’ का सदस्य बन गया था। सन् 47 में देश आज़ाद हुआ तो मुझ जैसे कुछ दोस्तों ने देशभक्ति की एक परिभाषा गढ़ी। वह यह कि हर काम मेहनत से करना, ईमानदारी से करना ही 47 के बाद देशभक्ति का पैमाना है। मैं अभी तक उस पर क़ायम हूँ—हर नारेबाज़ी से दूर, जितना कर सकता हूँ, करता हूँ। दूसरों की बात दूसरे जानें।
समांतर कोश’, ‘द पेंगुइन इंग्लिश हिंदी/हिंदी इंग्लिश थिसारस एंड डिक्‍शनरीऔर अब अरविंद लैक्सिकन। क्‍या इन सबके लिए आपको किसी संस्‍थान या सरकार से आर्थिक सहायता या अन्‍य तरह की मदद मिली ? आपने इसके लिए कभी कोशिश की ? इसे लेकर आपको किस तरह के अनुभव हुए।
शुरू में, यानी 1973-74 में कई जगह कोशिश की। किसी-न-किसी बहाने टाल दिया गया। हिंदी के किसी काम के लिए कुछ माँगना सब से बड़ी ज़लालत है। अगर कोई कुछ देता भी है तो पहले सारे काम का श्रेय लेना चाहता है, फिर किसी-न-किसी बहाने टालता रहता है। सहायता के पीछे भागते-भागते न जाने कितना समय निकल जाता। मैंने सोचा, चलो समुद्र में कूद पड़ते हैं, जो होगा देखा जाएगा। एक सहारा बिल्कुल अपना था। दिल्ली के मॉडल टाउन में अपना मकान था। रहन-सहन सादा था। मुंबई में ‘माधुरी’ के संपादन काल की थोड़ी-बहुत बचत थी। सोचा था कि दो साल में थिसारस बनाने का काम पूरा हो जाएगा।
पर ऐसा हुआ नहीं। कहावत है सिर मुँडाते ही ओले पड़े। मुझ पर ओले नहीं पड़े, बारिश पड़ी। 1978 की 21 मई को दिल्ली पहुँचे थे। कुछ ही महीने बीते थे। 4 सितंबर को यमुना की मैनमेड भारी बाढ़ ने हमारे घर को सात फ़ुट तक ग़र्क़ कर दिया। मुंबई का जो भी थोड़ा-बहुत अच्छा सामान था, यमुना में बह गया। घर माँ-बाप और भाई और उसकी पत्नी के लिए छोटा था। बस, यही हमारा तारनहारा बना। ‘समांतर कोश’ का काम हम कार्डोँ पर कर रहे थे। मकान में ऊपर ज़ीने के रास्ते में छः फ़ुट ऊँची, गरमी में आँवे जैसी तपती मियानी थी। वहीं कार्ड जमाए थे। यमुना मैया वहाँ तक नहीं गईं। हमारा भविष्य बच गया। वहीं पूरा टब्बर पाँच दिन टंगा रहा। चारों ओर पानी था। हम बिना किसी ख़र्चे के वैनिस में रहने का मज़ा उठाते रहे। चारों तरफ़ कामचलाऊ किश्तियाँ चलती देखते रहे।
मेरा विश्वास है कि ‘समांतर कोश’ ने अपने होने का संकल्प कर लिया था। वह अपने को तो बचाता रहा, और इसके लिए हर क़दम पर मेरी रक्षा करता रहा।
हिंदी की व्यापारिकता और हिंदी के नाम पर सरकारी तंत्रोँ की कृपणता कई बार दयनीय लगती है। स्वयं हिंदी वाले इसमें आगे बढ़ कर हिस्सा लेते हैं, और हिंदीवालों के शोषण में सहभागी बनते हैं। एक कारण यह है कि हम हिंदी वाले अपना अवमूल्यन आप करते हैँ। हिंदी को इंग्लिश से हीनतर समझने की आदत हमें पड़ गई है। अपने 65 साल के प्रिंटमीडिया और अब कंप्यूटर पर काम के बल पर मैँ कह सकता हूँ कि हम अंगरेजी वालोँ से कहीँ आगे और बढ़ कर हैं।
जब ‘समांतर कोश’ प्रकाशित हुआ तो DOE नाम की एक सरकारी संस्था की ओर से मुझे फ़ोन मिला। फ़ोन पर ही उसे इंटरनेट पर डालने की अनुमति तत्काल चाहते थे। मैंने पछा, ‘बीस-पच्चीस साल के तनदेही के बदले मुझे क्या मिलेगा।’ जवाब मिला, ‘कुछ नहीं। आप यह कोश जनहित में सरकार को दे दीजिए!’ मैँ हक्का बक्का रह गया। फिर एक पल बाद मैंने हिंदी के उन लाभभोक्ता से पूछा कि ‘क्या आप महान जनहित वाली नौकरी अवैतनिक कर रहे हैं। चलिए नहीं, तो भी क्या आप भविष्य में पगार लेना बंद कर देंगे। यदि हाँ तो मैं जनहित के लिए यह कोश सरकार को देने के लिए तत्पर हूँ।’ उधर से फ़ोन काट दिया गया।
इसी प्रकार अब मेरे ई-कोश के लिए मेरी बेटी ने उस विभाग से संपर्क किया। अब भी वही उत्तर था ‘अरविंद लैक्सिकन आप हमें जनहित में दे दीजिए…’

अरविंद कुमार का परिवार– ऊपर बाएं पुत्र सुमीत कुमार, बेटी मीता लाल, दामाद अतुल बिहारी लाल। नीचे बीच में अरविंद कुमार और कुसुम कुमार, बाएँ धेवती तन्वी, दाहिने धेवता अक्षय
जो काम कोई संस्था नहीँ कर सकी, आप ने कर दिखाया। कैसे इतना बड़ा काम कर सके ?
किसी संस्था ने यह काम नहीं किया तो कारण यह था कि किसी संस्था ने ऐसा करने का विचार नहीं किया। भारत सरकार ने कोश निर्माण के लिए कई संस्थाएँ बनाई थीं। जहाँ तक मुझे पता है, किसी के पास ऐसा कार्यक्रम नहीं था। अगर कोई संस्था इसमें लगती तो जो होता वह मैंने जापान में देखा है। 1997 में मुझे वहाँ की भाषा संस्था के निमंत्रण पर विश्‍व में थिसारसों की विशाल गोष्ठी में जाना पड़ा। उस संस्था ने 200 लोगों के स्टाफ़ के साथ लगभग बीस साल में जो थिसारस बनाया था, वह समांतर कोश के सामने पिद्दी-सा था। मेरे पास उनका थिसारस है। शायद अब दस-बारह साल में वह कुछ बड़ा हो गया हो।
आपकी दिनचर्या क्‍या है?
आज जब डाटा का काम एक तरह से पूरा हो चुका है, उसमेँ एक-एक अभिव्यक्ति संस्करणानुसार क्रमांकित हो चुकी, तो भी काम को पूरी तरह पूरा नहीं माना जा सकता। मूल डाटा में शब्दकोशोँ जैसी परिभाषाएँ नहीँ थीँ। आख़िर हम तो थिसारस बना रहे थे, न कि शब्दार्थ कोश। पर अब मुझे लगा कि सभी मुखशब्दों या शीर्षशब्दोँ की हिंदी और इंग्लिश परिभाषाएँ जोड़ दी जाएँ तो ‘अरविंद लैक्सिकन’ और भी उपयोगी हो जाएगा। यह काम अब धीरे-धीरे चल रहा है। लगभग 15 प्रतिशत काम हो गया है। शेष भी कालांतर में हो जाएगा। ऑनलाइन संस्करण का सबसे बड़ा लाभ ही यह है कि इसकी सामग्री जब चाहे परिष्कृत होकर सभी उपभोक्ताओँ को मिल जाती है।
आज भी अकसर मैं सुबह सबेरे पाँच बजे उठ जाता हूँ। आचमन आदि से निवृत्त होकर कंप्यूटर के सामने आ बैठता हूँ। बीच-बीच मेँ नहाने के लिए, नाश्ते के लिए, खाने के लिए ब्रेक लेता रहता हूँ। इससे काम की ऊब से आराम मिल जाता है।
शाम के समय, सात बजते-बजते टीवी के सामने जा बैठता हूँ, तथाकथित सस्ते सोप आपेरा यानी सीरियल सपत्नीक देखता हूँ। इसी बीच शाम का खाना भी हो जाता है।
और हाँ, जब से हमारे इलाक़े में बहुत सारे मल्टीप्लैक्स सिनेमा खुल गए हैँ, तो जब भी मन करता है फ़िल्म देख आते हैं। हर तरह की, अच्छी हो या बुरी– इससे कोई मतलब नहीँ होता। घर से निकलने का बहाना भर होता है। जब तब कोई रंगमंचीय नाटक। या कोई साहित्यिक गोष्ठी- यह बहुत ही कम।
थिसारस की रचना प्रक्रिया क्‍या है। मसलन आप शब्‍दों को कहां-कहां से और कैसे ढूंढते हैं। उनसे जुडे़ शब्‍दों को कैसे ढूंढते हैं। शब्‍दों के बीच के संबंध को ध्‍यान में रखकर उन्‍हें कैसे क्रम देते हैं ?
पहले हमें थिसारस और शब्दकोश का अंतर समझना चाहिए।
थिसारस को हम शब्द सूची भी कह सकते हैं। बस, फ़र्क़ यह है कि इसमें शब्दों का संकलन संदर्भ क्रम से किया जाता है। यह संदर्भ क्या हो, यह तय करना बड़ी टेढ़ी खीर है। अपने अनुभव से बताता हूँ। मूर्खतावश मैंने जब दो साल मेँ हिंदी का थिसारस बना डालने की बात सोची थी, तो रोजेट के थिसारस के आधार पर। मुझे लगा था कि उसका संदर्भ क्रम तो बना बनाया है, उसी के खाँचों में हिंदी के शब्द डालने ही तो हैं। पर बाबा रे, ऐसा संभव नहीं था।
हमने हिंदी कोशोँ के ‘अ’ से शब्द खोजने शुरू किए और उन्हें रोजेट के खाँचों में डालना चाहा तो पता चला कि वहाँ उनके उपयुक्त आर्थी कोटियाँ थीं ही नहीं। वे संदर्भ, वे भाव ही वहाँ नहीं थे। भारत के लिए वह मॉडल बेकार था। हमारे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
उसका थिसारस 1852 में बना था। 20वीं सदी का साठादिक दशक आते-आते उसके बृहद संस्करण बनने लगे। तब तक रोजेट का क्रम अधूरा मालूम पड़ने लगा था। मूल में कुल छः मुख्य विभाग थे। उनमें दो और जोड़े गए। खेद की बात यह है कि इन बृहद् तथाकथित अंतरराष्ट्रीय संस्करणोँ की रचना रोजेट के उत्तराधिकारियोँ से फ़्रैंचाइज़ लेकर कई प्रकाशकों द्वारा संपादक नियुक्त करवा के की गई। इन लोगों ने ऊपरी टीमटाम मात्र की। इधर-उधर किसी ऐंट्री की क्रम संख्या बदल दी गई– किसी अन्य प्रकाशक का कापीराइट ब्रेक करने भर के लिए। मूल आधार रोजेट का वही पुराना संदर्भ क्रम रहा।
रोजेट वैज्ञानिक थे, और उनका वर्गीकरण विज्ञान पर आधारित था। पर मानव मन वैज्ञानिक वर्गीकरण थोड़े ही जानता है! आम आदमी के लिए गेहूँ का संबंध अनाजों से है। विज्ञान में गेहूँ एक घास है। अतः रोजेट में गेहूँ, केला और घास एक साथ हैं। यह क्रम आम आदमी के काम का हो ही नहीँ सकता। हम स्टील या इस्पात की बात करते हैं, दिमाग़ में लोहा भी आता है। पर रोजेट में इन दोनों में कोई रिश्ता नहीं है। लोहा धातुओं में है,  इस्पात एलौय के अंतर्गत। शेर बिल्ली के साथ है,  रीछ आदि वन्य पशुओं के साथ नहीं।
जब यह आधार छिन गया, तो हमने सोचा कि कोई बात नहीं। हमारा अपना छठी सदी का सुप्रसिद्ध ‘अमर कोश’ तो है ही। उसी को मॉडल बना लेते हैं। यह विचार और भी लचर निकला। कहाँ छठी सदी का वर्णाश्रम से ग्रस्त समाज और कहाँ आज का भारत। ‘अमर कोश’ में संगीत तो नैसर्गिक गतिविधि निकली, गायक शूद्र। कैसे संबंध बैठाएँ, कैसे कहाँ जोड़ें!
आपने अभी बताया कि रोजेट का खाँचा काम नहीं आया और न ही अमर कोश का। ऐसे में आपने कौन-सा तरीका अपनाया?
हम तो एक तरह से मर ही गए थे। कहाँ दो साल में काम पूरा करने की बात सोची थी, कहाँ कामचलाऊ क्रम की तलाश में ही चौदह साल निकल गए। बस,  इतना था कि हमने शब्दों का संकलन एक दिन के लिए भी नहीं रोका। हर विषय और उसके उपविषय के कार्ड एक स्वतंत्र ट्रे में रखते गए। ट्रे हमने अपनी ज़रूरत के हिसाब से बनवाई थीं, और कार्ड भी अपने काम के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए थे। संदर्भ क्रम बदलना होता तो ट्रेओं का क्रम बदल देते। इसे ही मैँ अपनी शब्दोँ को कोई क्रम देने की तलाश की प्रक्रिया कह सकता हूँ। यह आसान सा तरीक़ा ही हमारे काम आया।
थिसारस का विचार आपके मन में कब आया और आपको यह काम इतना महत्‍वपूर्ण क्‍यों लगा कि आपने जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी और अपना जीवन थिसारस को समर्पित कर दिया।
मैं आपको 22-23 साल के एक लड़के से मिलवाता हूँ। इससे पहले वह ‘सरिता’ पत्रिका में उपसंपादक था। शाम के समय सांध्य कॉलेज में पढ़ रहा था। बीए में पहुँचा, और मालिक तथा संपादक विश्‍वनाथ जी ने उसकी इंग्लिश के साथ-साथ विश्‍व साहित्य में रुचि देखी तो ‘कैरेवान’ (CARAVAN) में उप संपादक बना दिया। सबसे पहला काम था- सरिता की हिंदी कहानियों का इंग्लिश अनुवाद। साथ-साथ प्रकाशनार्थ आई इंग्लिश रचनाओं को पढ़ना, लेखकों से वांछित विषयों पर लिखवाना, और छपने के लिए तैयार करना। वह ठहरा नौसिखिया! बहुत से शब्द तो वह जानता ही नहीं था। हिंदी से अनुवाद करना हो या किसी इंग्लिश शब्द को बदल कर बेहतर करना हो, तो शब्द संपदा समृद्ध चाहिए। तभी किसी ने उससे रोजेट का थिसारस ख़रीदने को कहा। वह मगन हो गया, उसका दीवाना हो गया। जब वह ‘सरिता’ में था तो इंग्लिश से हिंदी अनुवाद भी करता था। तब हिंदी शब्द नहीं मिलते थे। इसीलिए रोजेट देखते ही वह सोचने लगा कि ऐसी कोई किताब हिंदी में होनी चाहिए।
लेकिन वह जो लड़का था, जिससे मैंने आपको अभी मिलवाया, वह लड़का मैं था। मैं यह हिमाक़त सोच ही नहीं सकता था कि मैं वैसी कोई किताब बनाऊँ। मैं तो यही सोचता था, सोचता क्या था, मुझे पूरा भरोसा था कि तब (बीसवीं सदी के पचासादि दशक में) हिंदी शब्दावली बनाने के जो ताबड़तोड़ प्रयास हो रहे थे, उन्हीं में से हिंदी का थिसारस भी कभी-न-कभी निकलेगा ही। मैं तो अपने काम को बेहतर करने में लगा रहा। मेहनत कर रहा था, तो तरक्क़ी भी होती रही। लेकिन कभी इतना भी नहीं सोचा था कि मैं उस समूह की सभी पत्रिकाओं का एग्ज़क्टिव सहायक संपादक बन जाऊँगा। इस सैंस में मेरी कोई महत्वाकांक्षा कभी नहीं रही। अगर भविष्य की कोई तस्वीर मन में थी थी तो बस यही कभी-न-कभी कंपोज़िंग विभाग का फ़ोरमैन बन पाऊँगा। बस, काम करता रहा, बढ़ता गया, बढ़ता क्या गया, बढ़ाया जाता रहा।
1973 तक वह लड़का 43 साल का अधेड़ हो चुका था। ‘माधुरी’ जैसी यशस्वी और लोकप्रिय पत्रिका का प्रथम संपादक बन चुका था। लेकिन दस साल वहाँ रह कर ऊब चुका था। बार-बार वह सोचता कि क्या इसीलिए पैदा हुआ हूँ। क्या यही उस की नियति है। और तब फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध भरी पार्टियों से परेशान थका-हारा वह 25-26 दिसंबर की रात देर रात तक सो नहीं पा रहा था। न जाने किसने उस रात में उसे याद दिलाया–
‘बीस साल पहले जो तेरी चाहत थी, हिंदी थिसारस की, वह अभी तक अधूरी है। तुझे जो तलाश है जीवन में कुछ करने की, तो उस चाहत को पूरा कर। इच्छा तेरी थी, सपना तेरा था। बस, उसे पूरा करने में जुट जा।’
तब तक मेरे जीवन का कोई सुनिश्चित उद्देश्य नहीँ था। अगली सुबह (26 दिसंबर 1973 की सुबह) मलाबार हिल पर सैर करते करते कुसुम और मैंने मिल कर संकल्प कर लिया चाहे जो हो, हम हिंदी को थिसारस देंगे।

विवाह की स्वर्ण जयंती पर अरविंद कुमार को केक खिलातीं कुसुम कमार
आपके परिवार ने आपकी किस तरह मदद की।
उस सुबह से ही मैं और कुसुम पति-पत्नी से बढ़ कर सहकर्मी हो गए। बच्चे छोटे थे। सुमीत 13 साल का था, मीता 8 की। सबसे पहला काम था महाप्रयास के लिए अपने को तैयार करना। हर तरह के संदर्भ ग्रंथ ख़रीदे—अधिकतर हिंदी और इंग्लिश कोश थे। इंग्लिश के दसियों थिसारस भी ख़रीद डाले। यह भी पता था कि नौकरी छोड़ने के बाद जेब हल्की होगी। काफ़ी कपड़े भी बना लिए। साथ-साथ प्रोविडेंट फ़ंड बचत की दर बढ़ा दी। घर का ख़र्च कम से कम कर दिया।
19 अप्रैल, 1976 को नासिक में गोदावरी स्नान के बाद हमने किताब को पहला कार्ड बनाया। उस पर हम चारोँ के दस्तख़त हैं। सुमीत और मीता थे तो बच्चे, लेकिन उनके मन में सहभागिता की बात कहीँ अड़ी रही होगी। जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, हमारे काम के सक्रिय भागीदार बनते गए। कोई 1988 से सुमीत ने हमारे काम के लिए कंप्यूटर की आवश्यकता पर बल देना शुरू किया। बाद में उसने कार्डों के कंप्यूटराइजेशन की प्रक्रिया सँभाली। मीता ने इंग्लिश डाटा की आधारशिला तैयार की।
समाज के लिए कोश ग्रंथों की क्या उपयोगिता है ? या कहें की जीवंत समाज के लिए शब्दकोश क्यों ज़रूरी हैं ?
शब्द मानव की महानतम उपलब्धि हैं। शब्दों ने ही ज्ञान-विज्ञान को जन्म दिया, एक पीढ़ी से दूसरी तक, एक देश से दूसरे तक पहुँचाया, मानवों में संप्रेषण सहज बनाया। यही कारण है कि भाषा के जन्म के साथ ही थिसारस (शब्द सूचियाँ) और शब्दार्थ कोश बनने लगे थे। सबसे पहले सटीक थिसारस और शब्दकोश भारत में बने। निघंटु था तो कुल 1,800 शब्दों की सूची, लेकिन तत्‍कालीन समाज ने उसके निर्माता कश्यप को प्रजापति कह कर सम्माना। और फिर महर्षि यास्क ने निघंटु की व्याख्या के रूप में संसार को सबसे पहला शब्दार्थ कोश और ऐनसाइक्लोपीडिया दिया- निरुक्त। ये दोनों अभी तक पूरे सम्मान के भागी हैं।
शब्दकोश एक आदमी से दूसरे तक पहुँचे शब्द को प्रमाणित करते हैं, ताकि ग़लतफ़हमी की गुंजाइश न रहे। थिसारस हमें अपनी बात कहने के लिए सही शब्दावली देता है। शब्दकोश और थिसारस एक दूसरे के पूरक हैं, लेकिन दो अलग तरह की चीज़ें हैं।
हिंदी का भविष्य क्या है ? वैश्‍वीकरण के दौर में क्या हिंदी सिमट कर रह जाएगी?

हिंदी को कई निराशावादी लोग एक मरती हुई ज़बान समझते और कहते फिर रहे हैं। वे उसी तरह के लोग हैं जो इस्लाम ख़तरे में, हिंदुत्व संकट में जैसे नारे लगाते रहते हैं। हिंदी में इंग्लिश शब्दों के बढ़ते चलन को देख कई बार उनकी बात सही लग सकती है, लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। बदलते समाज, बदलती तकनीक के साथ हिंदी का बदलना ज़रूरी है। यह बात हर भाषा पर लागू होती है। आज हिंदी वह नहीं है जो ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ के ज़माने में थी, न ही वह जो भारतेंदु जी के युग में थी। और सन् 2050 में वह नहीं होगी, जो आज है। वह हर जगह से शब्द लेगी, विचार लेगी। नए मुहावरे आएँगे। नए लोग नई शैलियाँ लाएँगे। वे लोग नई वर्तनी भी ला सकते हैं। तब हिंदी संसार में शायद सबसे अधिक प्रचलित भाषाओं में बहुत ऊपर होगी।
आप देख रहे हैं, हिंदी के समाचार पत्र प्रसार संख्या में सबसे आगे हैं, और उनकी गुणवत्ता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। हिंदी के टीवी चैनल संसार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनलों में गिने जाते हैं। हमारी फ़िल्में पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय हो चुकी हैं। तो डर कैसा, डर किससे। आप यह बात समझ लीजिए कि हिंदी बोलने वाले संख्या में इतने अधिक हैं और आज हिंदी वाले संसार में एक बहुत बड़ा ग्राहक समूह हैं। उन तक माल पहुँचाने और बेचने के लिए दुनिया को नाक रगड़ कर उनके पास आना होगा। हिंदी ही क्योँ, दुनिया को भोजपुरी, ब्रजभाषा, गढ़वाली—सब के पास आना होगा।
आज विश्‍व की कई भाषाएँ मरणासन्न हैं। क्या उन्हें बचाया जा सकता है ?
जिन भाषाओं के बोलने वाले कम हैं, या कम होते जा रहे हैं, वे म्यूज़ियम पीस बन कर ही बची रह सकती हैं। यही बात शब्दों की भी है। मेरे बचपन के वे सब शब्द मर चुके हैं, जो उन चीज़ों के थे जो तब काम आती थीं, या उन रीतिरिवाज़ों के हैं जो तब चलते थे। दमड़ी, छदाम, कौड़ी, अधन्ना, इकन्नी कुछ ऐसे ही शब्द हैं। कुछ ही दिनों में चवन्नी शब्द भी भुला दिया जाएगा। यह होना अवश्यंभावी है।
अब आप की क्या योजनाएँ हैं ? हिंदी-इंग्लिश के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के कोश भी बनाएँगे क्या ?
हमारे सपने बहुत बड़े हैं। और योजनाएँ भी बहुत बड़ी हैं। अरविंद लैक्सिकन से जो पैसा आएगा, उसका बहुत बड़ा भाग हमारे डाटा में नई भाषाएँ जोड़ने में काम आएगा। तमिल और चीनी भाषाएँ हमारी प्राथमिकता हैं।
इसके पीछे जो राष्ट्रीय और देशभक्ति से भरा विचार है, आप वह समझने की कोशिश करें। भारत की आर्थिक और राजनीतिक सामर्थ्य बढ़ रही है, बढ़ेगी। जिस तरह इंग्लिश भाषी समाजों ने दुनिया भर के देशों से उनकी भाषाओं के कोश बनाए, जैसे इंग्लिश-हिंदी-इंग्लिश या इंग्लिश-चीनी-इंग्लिश, इंग्लिश-जापानी-इंग्लिश, उसी तरह हमारे देश को करना होगा- हिंदी-इंग्लिश-हिंदी, हिंदी-चीनी-हिंदी, हिंदी-जापानी-हिंदी… । सरकार तो इस तरफ़ कुछ करती नज़र नहीं आ रही। इतनी दूरदृष्टि भी उनके पास कभी नहीं रही है। सरकार न ही करे तो ठीक ही है। इंग्लिश में भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के साथ अनेक निजी प्रकाशकों ने यह काम किया।
आपने बाहरी आर्थिक सहायता की बात शुरू में ही पूछी थी। तब मेरे पास अपने को सुपात्र सिद्ध करने का कोई साधन नहीं था। क्या था मैं ? एक महत्वाकांक्षी कोशकार तो था, पर था तो कोरा फ़िल्म पत्रकार ही। लेकिन अब तो मैं अपने को सिद्ध कर चुका हूँ। फिर भी मैं जानता हूँ कि मुझे या मेरे समूह को कहीं से कैसी भी सहायता नहीं मिलेगी। शायद मुझे माँगने की कला ही नहीं आती। लेकिन अब एक हद तक मैं और मेरे साथी आत्मनिर्भर हैं। हम समर्थ हैं, हमारे पास इरादा है। हम न सिर्फ़ तमिल और चीनी शब्द सँजोएँगे, हम जापानी, अरबी, फ़्रैंच, जरमन, स्पेनी—सभी भाषाएँ समाहित करेंगे। बरसों लगेंगे, शायद पीढ़ियाँ, लेकिन जो काम शुरू होता है, या होना चाहता है वह अपना कारिंदा भी चुन लेता है और उसके कंधे पर सवार होकर उसे धकेलता रहता है। इस काम ने हमें चुन लिया है।
‘अरविंद लैक्सिकन’ में आपने रोमन लिपि को भी शामिल किया है। इसकी ख़ास वज़ह क्या है ?
रोमन लिपि शामिल करने के पीछे एक सीधी सी समझ थी। कितने लोग हैं जो हिंदी में टाइपिंग कर सकते हैं ? कितने सारे अ-हिंदी भारतीय हैं, जैसे, लदाखी, बंगाली, तमिल, कन्नड़ जो हिंदी तो समझते हैं पर पढ़ना नहीँ जानते या समझना चाहते हैं पर देवनागरी न जानने के कारण पढ़ नहीं सकते, उनके लिए किसी कोश में हिंदी शब्दों की खोज के लिए रोमन लिपि होनी चाहिए। मेरे छोटे भाई विनोद अमरीका में रहते हैं। उनका बेटा रोहित बड़ा अफ़सर है, पर हिंदी नहीं जानता। विदेशों में बसे भारतीय परिवारोँ की दूसरी पीढ़ी का यही हाल है। पर उनका भारत प्रेम या हिंदी से लगाव कम नहीं हुआ है। अगर रोमन लिपि के साथ-साथ वे लोग वही शब्द देवनागरी में लिखा देखेंगे तो हिंदी का रंगरूप उनकी समझ में आने लगेगा।
अरविंद लैक्सिकन 24 जून से उपलब्ध हो गया है। उसे http://arvindlexicon.com पर देखा जा सकता है। हो सकता है कुछ कमियाँ हों, हमारे सर्वर अभी उतने समर्थ न हों। पर हम और सर्वरों पर ख़र्च करने के संसाधन जुटा रहे हैं। मैं समझता हूँ उस साइट पर उपलब्ध अरविंद लैक्सिकन का नि:शुल्‍क संस्करण आम हिंदी भाषी परिवार की दैनिक शब्दावली की सारी आवश्यकताएं पूरी कर देगा। हिंदी और इंग्लिश के ढेर सारे पर्याय और एक भाषा से दूसरी भाषा के लिए शब्दों की तलाश यहाँ पूरी होगी। लेकिन इसके लिए साइट पर रजिस्टर कराना– अरविंद परिवार का सदस्य बनना ज़रूरी है। आवश्यक फ़ार्म या प्रपत्र साइट पर ही मिलता है।
प्रेस में बाल श्रमिक के रूप में आपने करियर की शुरूआत की। बाद में वहाँ की सभी पत्रिकाओं के प्रभारी सहायक संपादक बने। ‘माधुरी’ और ‘सर्वोत्तम’ जैसी पत्रिकाओं के प्रथम संपादक बने। आपकी सफलता का राज़ क्या है ?
तीन राज़ हैं— मेहनत, लगन, ईमानदारी।
आपका जन्‍म मेरठ में हुआ। बचपन के कुछ वर्षों को छोड़कर आप मेरठ में नहीं रहे। दुनिया भर में घूमे। क्‍या मेरठ याद आता है ?
मेरठ शहर में जन्मा और वहाँ रहा बंदा मेरठ को कभी भूल ही नहीं सकता। नौचंदी उसे हमेशा याद आती रहेगी, वहाँ की रेवड़ी गज़क़ हमेशा मुँह में लार लाती रहेगी।
एक बार टाइम्स संस्थान की कर्ताधर्ता श्रीमती रमा जैन ने मुझ से पूछा था कि आपकी क्या महत्वाकांक्षा है। मेरा जवाब था,  गुज़ारे लायक़ आमदनी और मेरठ में वास। उन्होंने कहा था कि गुज़ारे लायक़ आमदनी की बात समझ में आती है, मेरठ में रहना क्यों ? जवाब में मैंने पूछा था– आपने कभी मेरठ की चाट खाई है। वह हँस पड़ी थीं, और बोली थीं- मैं समझ गई।
आपको बताऊँ कि हम मेरठ वाले चटोरे होते हैं। सुबह नाश्ते में हलवाई की बेड़वीं के साथ जलेबी पर रखा हलवा, तीसरे पहर चाट पकौड़ी। चाट की बात यह है, कभी समोसा, कभी आलू का लच्छा, आलू का भल्ला (टिकिया, कटलेट), दही सौंठ वाली पकौड़ियाँ, गोलगप्पे (पानी पूरी) तो खाते ही हैं, वहाँ शादी-ब्याह में जो ख़ास तरह की कचौरी बनती है, वह कहीं और नहीं मिलती। बाहर हम उसके लिए तरसते रहते हैँ। यह और बात है कि अब न तो वैसा स्वास्थ्य है, न वैसा हाज़मा कि ये लज्जत पूरी तरह उठा सकें।
और एक बात। मेरठ खड़ी बोली का जन्म स्थान माना जाता है। लेकिन वहाँ की बोली वह नहीं है, जो आज की लिखत की हिंदी है। वहाँ के कुछ अजीब मुहावरे हैं। जैसे: अजी, हुआ बहुत! इस का मतलब होता है कि होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे कितने ही मुहावरे मैं गिनाता रह सकता हूँ। काश कोई उनका कोश बनाए।

‘जनता के समर्थन से ही इस व्यावसायीकरण को रोका जा सकता है : डॉक्‍टर अनूप सराया


विश्‍व बैंक लगातार तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों को सामाजिक क्षेत्र में वित्तीय कटौती की सलाह देता रहा है और यहां की दलाल सरकारें इन नीतियों को लागू करने में जुटी हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों से इस बात की लगातार कोशिश की जा रही है कि एम्स में अब तक जो सुविधाएं उपलब्ध हैं उनके बदले मरीजों से पैसे लिए जायं जो बाजार की दर पर हों। इसके लिए सरकार की ओर से तरह-तरह के सुझाव पेश किये जा रहे हैं। सारा प्रयास एम्स के बुनियादी चरित्र को बदलने का है। इसी क्रम में वेलियाथन कमेटी का गठन हुआ और प्रधानमंत्री कार्यालय इस कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जोर दे रहा है। ‘प्रोग्रेसिव मेडिकोज ऐंड साइंटिस्ट फोरम’ के सक्रिय सदस्य और एम्स के गैस्ट्राइटिस विभाग में प्रोफेसर डॉ. अनूप सराया का कहना है कि एम्स ऐक्ट के मुताबिक एम्स के कामकाज में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं हो सकता- प्रधनमंत्री भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसके स्वरूप में कोई भी बुनियादी तब्दीली संसद में बहस के बिना नहीं की जा सकती है। डॉ. सराया का यह भी कहना है कि  उन संस्थाओं के लिए जो जनता की सेवा के लिए हैं वित्तीय आधर पर स्वायत्‍तता  की अवधरणा ही गलत है। इसके पीछे असली मकसद एम्स को आम जनता की पहुंच से दूर करना है… प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-
आखिर सरकार एम्स के चरित्र में बदलाव क्यों चाहती है ?
दरअसल स्वास्थ्य संबंधी नीति में भूमंडलीकरण के बाद जो आमूल परिवर्तन आया है उसी का यह असर है। आज ये लोग रेवेन्यू पैदा करने के मॉडल की ओर जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक के स्ट्रक्चरल ऐडजस्टमेंट प्रोग्राम के तहत सामाजिक सुरक्षा में कटौती की नीति जब से बनी है तो स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में भी कटौती की योजना बनी। राजस्व पैदा करने के मॉडल पर ये लोग चलना चाहते हैं और कह रहे हैं कि हम उन लोगों को जिनके लिए बहुत जरूरी है और जो बीपीएल कार्ड होल्डर हैं उनको फ्री कर देंगे। अब सवाल ये है कि बीपीएल कार्ड कौन हासिल कर सकता है। अगर राज्य कहता है कि हमारे यहां गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या ज्यादा है तो केंद्र इस पर सवाल खड़े करता है। बीपीएल के साथ दिक्कत यह भी है कि अगर यह दूसरे राज्य का है तो हो सकता है दिल्ली में इसे स्वीकार न किया जाय। मसलन इंस्टीट्यूट ऑफ बिलिअरी साइंसेज जैसी कुछ संस्थाएं ऐसी हैं जिसमें केवल दिल्ली का बीपीएल कार्ड होल्डर ही फायदा ले सकता है। अगर दूसरे राज्य से कोई इलाज कराने आ गया और बीपीएल कार्ड उसके पास नहीं है तो क्या आप उसका इलाज नहीं करेंगे?
जो लोग बीपीएल से ऊपर हैं उनमें से भी तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनको यहां इलाज कराने की जरूरत पड़ती है।
बिलकुल ठीक कह रहे हैं। जो लोग गरीबी रेखा से ऊपर हैं उनकी भी हैसियत ऐसी नहीं है कि वे अच्छी चिकित्सा के लिए पैसे खर्च कर सकें। अब ये लोग नयी नीति के तहत बहुत सारे लोगों को इलाज से वंचित कर रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने (इन्क्ल्यूजन) की बजाय अब ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे दूर करने (एक्सक्ल्यूजन) की नीति पर ये लोग चल रहे हैं। इसके अलावा लगातार व्यावसायीकरण की एक मुहिम चल रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्‍व बैंक के नुस्खे के बाद आप देखेंगे कि स्वास्थ्य के बजट में बढ़ोत्तरी नहीं हुई। यूपीए ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में कहा था कि इसे तीन प्रतिशत करेंगे जो आज भी डेढ़ प्रतिशत से नीचे ही है। भारत जैसे एक गरीब देश में जहां बड़ी तादाद में लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, जहां 77 प्रतिशत लोग 20 रुपये से कम की दैनिक आय पर गुजारा करते हैं वहां अगर आप चिकित्सा को महंगी कर देंगे तो लोगों की क्या हालत होगी। एन सी सक्सेना कमीशन की रिपोर्ट हो या योजना आयोग की ढेर सारी रपटों को अगर आप देखें तो साफ पता चलता है कि इस देश में कितनी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो चिकित्सा पर पैसा नहीं खर्च कर सकते। हालांकि उन रिपार्टों में भी जो उन्होंने प्रति व्यक्ति कैलोरी का मानदंड रखा है वह आईसीएमआर की गाइड लाइंस को अगर देखें या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन की गाइड लाइन देखें तो वह कैलोरी इनटेक भी कम है। यानी अगर आप उसे भी उपयुक्त कैलोरी पर ले आयें तो यह संख्या और भी ज्यादा बढ़ जाएगी। तो ऐसी हालत में भारत जैसे देश में स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार की हो जाती है। लेकिन सरकार अपना पल्ला झाड़ रही है और कह रही है कि वह महज प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करेगी। यानी प्राथमिक से ऊपर की जरूरत है तो वह खरीदकर उसका लाभ उठायें। जहां पहले ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ की बात होती थी अब एफोर्डेबुल हेल्थ पर बात होने लगी है। इतना ही नहीं सरकारी अस्पताल में भी बहुत सारी सेवाएं अब आउट सोर्स की जाने लगी हैं। धीरे-धीरे सरकार अब अपने हाथ खींचने लगी है। नियुक्तियों में भी अगर आप देखें तो मनमाने ढंग से काम हो रहा है। सरकार धीरे-धीरे अपनी संस्थाओं को तबाह करके प्राइवेट संस्थाओं को मदद करने में लगी है।
क्या पिछले 10 वर्षों में एम्स में इसकी कोई झलक मिली है ?
पिछले 10 वर्षों से लगातार इस दिशा में सरकार काम कर रही है। यहां एम्स में पहले 1992-93 में यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की गयी। उसके बाद 1996-97 में उसका विरोध कर हमने उसे रुकवाया। इसी वर्ष के आस पास इन्सेंटिव स्कीम लागू करने की कोशिश की गयी कि जो आय होगी उसका एक हिस्सा डॉक्टरों में बांटा जाएगा। उसको भी हम लोगों ने रुकवाया। हमने कहा कि हमारा सबसे बड़ा इन्सेंटिव यही है कि हमारा मरीज सही सलामत ठीक होकर यहां से चला जाय। हमने कहा कि आप जो भी इन्सेंटिव देंगे वह पैसा गरीब आदमी की जेब से ही निकलकर आयेगा इसलिए हमें उसकी जरूरत नहीं है। हां, आप अगर इन्सेंटिव देना ही चाहते हैं तो सरकार अपने किसी मद से इसकी व्यवस्था कर दे। आप किस तरह का इन्सेंटिव देना चाहते हैं। हमने कहा कि यह तो लूट में हिस्सेदारी होगी जो हमें नहीं चाहिए। फि‍र इन्होंने 2002 में कुछ यूजर्स चार्जेज लगाने की कोशिश की। फि‍र उसका विरोध हुआ। मेन इंस्टीट्यूट में तो नहीं लगा लेकिन जहां-जहां सेंटर बन गये हैं,  जैसे कार्डियो-न्यूरो सेंटर में- वहां लगा दिया। मेन इंस्‍टीट्यूट में वही जांच निःशुल्क होती है लेकिन इस सेंटर में उसके पैसे देने पड़ते हैं, जबकि वह भी इंस्टीट्यूट का ही हिस्सा है। यह लगभग सन् 2000 से शुरू हुआ। फि‍र इन्होंने 2005 में बाकायदा ‘रेश्‍नलाइजेशन ऑफ चार्जेज’ के नाम पर (जिसे मैं कामर्शियलाइजेशन ऑपफ हेल्थ केयर कहता हूं) हर जांच के,  हर ऑपरेशन के, हर चीज के पैसे लगा दिये। ये शुरू भी हो गया। सितंबर, 2005 से यह लागू हुआ जिसका फि‍र हम लोगों ने लगातार विरोध किया। इसके लिए हम लोगों ने लिखने से लेकर धरना-प्रदर्शन सब कुछ किया। लगातार सांसदों से मिलकर इस मुहिम को चलाया। अंततः आठ महीने बाद उस आदेश को वापस लिया गया। यह भूमंडलीकरण के दौर में हमारी एक बड़ी जीत थी। अब फि‍र से उसको किसी न किसी तरीके से लागू करना चाहते हैं। पहले फैकल्टी का कोई भी व्यक्ति छूट दे सकता था जिसे अब विभागाध्यक्ष तक सीमित कर दिया गया है। इनकी कोशिश है कि किसी तरह फि‍र से पैसा वसूला जाय लेकिन हम लोग लगातार इसका विरोध कर रहे हैं।
इसका मतलब यहां के डॉक्टरों में एक तरह की चेतना है?
हम लोग लगातार इन मुद्दों पर लड़ते रहे हैं इसलिए कुछ चीजों को रोक पाते हैं।
अच्छा ये बताइए कि वेलियाथन कमेटी का गठन किस मकसद से किया गया?
पहली चीज तो यह समझ लीजिए कि वेलियाथन साहब हैं कौन। वेलियाथन साहब जब श्री चित्रा इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थे तो वहां उन्होंने एक रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल लागू किया था। उसके बाद उन्होंने अवकाश ग्रहण करने के बाद मनीपाल ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल के लिए प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के खोलने का काम शुरू किया। तो इस प्रकार वेलियाथन साहब इंडस्ट्री के मददगार और रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल की वकालत करने वाले डॉक्टर हैं। इसलिए मनमोहन सिंह और मंटेक सिंह अहलूवालिया की सोच के साथ उनका तालमेल पूरी तरह बैठ गया और उनकी अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी गयी। पहली बार जब यहां रेवेन्यू जेनरेशन प्रोग्राम लागू करने की कोशिश की गयी थी उसमें मुंह की खानी पड़ी। दूसरी बार मई, 2006 में यह कोशिश हुई। वह एम्स में आरक्षण विरोधी आंदोलन का दौर था और आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ एम्स में अराजकता का माहौल बन गया। यहां के डायरेक्टर पूरी तरह आरक्षण विरोधि‍यों को समर्थन दे रहे थे। और कांग्रेस में भी एक बड़ा सेक्शन था जो आरक्षण विरोधि‍यों के साथ खड़ा था। अब देखिए कि प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह प्रोटोकोल तोड़ कर हड़ताली डॉक्टरों से दो बार मिले, जबकि कोई भी प्रधनमंत्री यही कहता कि पहले आप हड़ताल समाप्त करिए फि‍र बात करिए। वह हड़ताल अदालत के आदेश का उल्लंघन करके चल रही थी। उसमें न कोर्ट हस्तक्षेप कर रहा था और न स्थानीय प्रशासन। डॉक्टरों को हड़ताल के लिए टेंट लगवाये जा रहे थे, कूलर लगवाये जा रहे थे और सारी व्यवस्था की जा रही थी। तो पूरी तरह से अराजकता का माहौल था। उसमें यह कमेटी बनायी गयी थी जो इसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के तरीकों का सुझाव दे सके। लेकिन उसने उन कारणों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जिसकी वजह से अराजकता पैदा हुई थी। हां, उसने यह जरूर बताया कि एम्स को किस तरह बड़े उद्योगों के लिए उपलब्ध कराया जाय। यह रिपोर्ट तैयार हो गयी। इसमें भी एक बात ध्यान देने की है। कमेटी की रिपोर्ट को इंस्टीट्यूट के निकाय ने स्वीकृति नहीं दी। उस सूरत में इसकी कोई वैधता नहीं थी। तब भी पीएमओ यह बार बार लिख रहा है कि वेलियाथन की सि‍फारिशों को लागू करिए। कैबिनेट मीटिंग में प्रधनमंत्री ने इंस्टीट्यूट को तीन महीने का समय दिया था कि इसे लागू कर दिया जाय। इस प्रकार हम देखते हैं कि जो रिपोर्ट तैयार की गयी है वह इंस्टीट्यूट के कामकाज के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि इंस्टीट्यूट को इंडस्ट्री के लिए कैसे उपलब्ध कराया जाय। उसका इरादा ही कुछ और है।
तो अगर एम्स पर यह लागू हो जायेगा तो जितने पीजीआई हैं उन पर भी यह लागू होगा ?
देखिए, यह कमेटी इंस्टीट्यूट के लिए बनायी गयी थी। लेकिन सरकार अपनी नीयत साफ कर चुकी है। प्लानिंग कमीशन की मीटिंग के बाद मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने साफ कहा है कि एम्स जैसी संस्थाओं को पीपीपी मोड पर डाल दिया जाय- प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन। लिहाजा जितनी और संस्थायें हैं या बनेंगी वे सभी प्राइवेट-पब्लिक पार्टीसिपेशन के तरीके पर ही चलेंगी। अभी तो तमाम कमियों के बावजूद गरीब से गरीब आदमी को भी यहां से राहत मिल जाती है, लेकिन अब यह जो आखिरी उम्मीद है वह भी खत्म हो जायेगी। इसका चरित्र ही बदल जायेगा। गौर करिये कि इस इंस्टीट्यूट को किस लिए बनाया गया था। जब नेहरू मंत्रिमंडल में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अमृतकौर ने संसद में इसका बिल पेश किया तो उसमें कहा गया था कि इसका मकसद गरीब से गरीब आदमी को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करना, राष्ट्र के हित में शोध करना,  चिकित्सा के लिए लोगों को प्रशिक्षित करना और अध्यापन के नये तरीके विकसित करना है। इसका मतलब अनुसंधान और मरीजों की देखभाल पर मुख्य जोर था।
अब जब आप इंडस्ट्री के साथ जुड़ेंगे तो इसका इस्तेमाल इंडस्ट्री करेगी, जो कंसल्टेंट हैं वे इंडस्ट्री के लिए काम करेंगे, पढ़ाई पर बुरा असर पड़ेगा, मरीजों की स्वास्थ्य सुविधा पर बुरा असर पड़ेगा और अगर आप इसका व्यावसायीकरण करेंगे तो गरीब से गरीब आदमी को आप इलाज नहीं दे सकेंगे। इसका जो मुख्य उद्देश्य है उससे आप दूर हो जायेंगे। इसलिए बुनियादी चरित्र में कोई भी परिवर्तन अगर आप लाना चाहते हैं तो उसके लिए संसद में बहस की जानी चाहिए।
अभी आपको इसका भविष्य कैसा दिखायी दे रहा है? क्या आप लोग इस बदलाव को रोक पायेंगे?
हम लोग तो इसको रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमको जनता से जितना ही अधि‍क समर्थन मिलेगा और राजनीतिक क्षेत्रों से जो समर्थन मिलेगा उतना ही हम इसे रोक पायेंगे। लेकिन राजनीतिक दलों से कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि अगर वे इसके प्रति गंभीर होते तो काफी पहले ही इसे रोकने की दिशा में कुछ करते। जहां तक मीडिया का सवाल है, जो मेनस्ट्रीम अखबार हैं और नयी आर्थिक नीति का समर्थन करते हैं, वे हर क्षेत्र की तरह स्वास्थ्य सेवाओं के भी निजीकरण और व्यावसायीकरण के ही समर्थन में आमतौर पर दिखायी देते हैं। इसलिए उन अखबारों में ये खबरें जगह नहीं पातीं।0
क्या स्वतंत्रा रूप से डॉक्टरों का ऐसा कोई समूह है जो आम जनता के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हो और उसकी तरफ से कोई सामूहिक प्रयास किया जा रहा हो?
जब तक हम लोग रेजिडेंट डॉक्टर थे, यह कोशिश हमारी लगातार चलती रही। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का अंतिम अधि‍वेशन 1987 में हुआ। उसमें इस तरह के तमाम मुद्दे हमने उठाये थे और इस पर प्रस्ताव पारित किये थे। इसमें स्वास्थ्य नीति से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट बढ़ाने तक की बातें शामिल थीं। हम लोगों ने मेडिकल संस्थाओं में कैपिटेशन फी का विरोध किया था। आज मानव संसाध्न मंत्रालय, यूजीसी और मेडिकल काउंसिल ये सभी डॉक्टरी की पढ़ाई के निजीकरण और व्यावसायीकरण के पक्ष में हैं। जितने कॉलेज सरकारी सेक्टर में खुले हैं उससे ज्यादा प्राइवेट सेक्टर में हैं। प्रतिभा के इन सारे पुजारियों को उस समय मेरिट की याद आ जाती है जब हम लोग जाति आधरित आरक्षण की बात करते हैं। उन मेडिकल कॉलेजों में जहां सिर्फ पैसे से एडमिशन दिया जाता है वहां इन्हें मेरिट की चिंता नहीं होती। दरअसल जो सुविधाप्राप्त वर्ग है उसने अपने लिए कुछ अपने संस्थान खोल लिए हैं और सरकार अब उन्हीं को मदद करना चाहती है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि यूजीसी ने हाल में एक निर्णय लिया है कि वे लोग जो प्राइवेट विश्वविद्यालयों या प्राइवेट कालेजों में भी हैं वे भी रिसर्च ग्रांट के लिए हकदार हैं और आवेदन कर सकते हैं। अब अगर आपने इसकी अनुमति दे दी तो आप देखेंगे कि प्राइवेट संस्थानों के लोगों को ही सारी फेलोशिप जायेगी। इनके निहितार्थों पर गौर करिए। वे लोग जो अभी मेडिकल एजुकेशन की सीट्स के लिए एक एक करोड़ तक दे रहे हैं वो फि‍र धीरे-धीरे यूजीसी से टाईअप करके कुछ फेलोशिप्स भी अपने यहां रख लेंगे। वे कहेंगे आप इतना दे दीजिए हम आपको फेलोशिप दे देंगे। तो जो पैसा अभी रेजीडेंसी का देना पड़ता है वे भी ये संस्थान नहीं देंगे। रेजीडेंसी की जो तनख्वाह देनी पड़ती वे भी न देकर वे फेलोशिप दे देंगे। तो यह सब एक सुनियोजित ढंग से लूट की साजिश चल रही है। प्राइवेट कैपिटल के लिए सब कुछ है, आम जनता के लिए कुछ नहीं। यही निदेशक सिद्धांत बन गया है।
वेलियाथन कमेटी रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है या इसकी कुछ सिफारिशों को स्वीकार किया जा सकता है ?
यह जिस भावना से लिखी गयी है उसमें ही यह बात निहित है कि इसका पूरा मकसद बहुसंख्यक गरीब जनता के खिलाफ और सुविधासंपन्न वर्ग तथा उद्योगों के हित में है। इसलिए इसे तो पूरी तरह खारिज करने की जरूरत है। इसमें सब कुछ आउटसोर्सिंग पर आधरित है। अब इसकी अनुसंधान परिषद (रिसर्च काउंसिल) के ढांचे की परिकल्पना देखिए जिसमें कहा गया है कि उद्योग क्षेत्र से दो लोग होंगे और एक विख्यात वैज्ञानिक होगा। यह वैज्ञानिक भी किसी फर्मास्यूटिकल उद्योग का नामांकित व्यक्ति होगा। इसमें अनुसंधान और शोध को भी उद्योगों के हित के लिए बताया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि एम्स ऐक्ट में संशोध्न कर दिया जाय और इसके निकायों में जिन लोगों को रखा जाय उनमें उद्योग के लोग हों, सीआईआई और पिफक्की से लोग लिए जायं। इंस्टीट्यूट के काम काज के बारे में इन्होंने जिनसे राय मांगी वे सभी उद्योग क्षेत्र से आते हैं। इसमें रिसर्च इंसेंटिव देने की बात कही गयी है जिसके खिलाफ हम 150 लोगों ने हस्ताक्षर करके भेजा कि हमें यह नहीं चाहिए क्योंकि इससे हमारा पूरा ओरिएंटेशन गड़बड़ हो जायेगा, फर्जी रिसर्च किए जाएंगे और फि‍लहाल उसे रोक दिया गया है।
(डॉक्‍टर सराया से यह बातचीत समकालीन तीसरी दुनि‍या के संपादक और वरि‍ष्‍ठ पत्रकार आनन्‍द स्‍वरूप वर्मा ने की है। समकालीन तीसरी दुनि‍या, जनवरी-2011 से साभार)

कोई सोचे कि साहित्य खत्म हो जाएगा तो बेवकूफी है : रामवि‍लास शर्मा


प्रख्यात आलोचक डा. रामविलास शर्मा को 1991 में व्‍यास सम्‍मान प्रदान कि‍या था। इस अवसर पर कथाकार प्रकाश मनु ने उनसे अंतरंग बातचीत की थी-
डॉ. रामविलास शर्मा (1912-2000) हिंदी आलोचना के शीर्षपुरुष थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा को आगे बढ़ाने और उसे सामाजिक विकास की चेतना और पक्षधरता से जोडऩे वालों में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। उनका जीवन एक आलोचक की निरंतर विकास और संघर्ष-यात्रा का पर्याय कहा जा सकता है और एक कडिय़ल आलोचक और चिंतक का आदर्श उनमें देखा जा सकता है। निराला पर उनका काम किसी रचनाकार को संपूर्णता से थाहने के लिहाज से आज भी हमें उतना ही बड़ा, उतना ही चुनौतीभरा लगता है—करीब-करीब अतुलनीय! यह रामविलास जी के काम करने के ढंग और प्रकृति को बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। निराला की तरह उन्हें भी एक साथ कई मोरचों पर लडऩा पड़ा। साथ ही परंपरा की पहचान के लिए विचार और भाषा की जड़ों तक जाने का गंभीर काम उन्होंने किया। और भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान का तो अभी तक मूल्यांकन होना बाकी है। उन्होंने एक साथ दस आलोचकों के बराबर काम कर दिखाया और बड़े ही चुपचाप, इसलिए कि उनके यहाँ दिखावा या ‘पोस्चर’ सबसे कम है—और पश्‍चि‍म से चार अक्षर उधार लेकर उछलने वाली कलाबाजी तो बिलकुल नहीं है। उनके आग्रह कभी-कभी दुराग्रह भले ही लगते रहे हों, पर वे उन आलोचकों की तरह नहीं थे जो सुबह कुछ कहते हैं, शाम को कुछ और! आलोचना में इस तरह की हलकी नेतागिरी की जगह रामविलास जी ने अलग रहकर चुपचाप ठोस काम करना बेहतर समझा और उम्र के आखिरी चरण में भी किसी जवान आदमी के जोश के साथ अपने काम में जुटे रहे।
उन्हें व्यास सम्मान दिए जाने के अवसर पर उनके जीवन और कामों को लेकर लंबी बातचीत करने का मन था। मैं उनसे मिलने गया, तो वे अपनी छड़ी लिए घूमने जाने के लिए करीब-करीब तैयार थे। मैंने साथ चलने की इच्छा प्रकट की, तो वे खुशी से राजी हो गए। पूरे रास्ते वह प्रफुल्ल उत्साह के साथ बतियाते, तेज-तेज चलते रहे (वैसे भी पुराने दिनों और मित्रों की याद उनके चेहरे पर जैसी मुलायमियत भरी मुसकराहट ले आती है, उसे देख पाना खुद में एक अनुभव है।) और लौटे तो फिर वैसे ही बातचीत के लिए तैयार! एक आलोचक के सुदीर्घ जीवन के अनुभवों और मुश्किलों से शुरू हुई यह बातचीत करीब-करीब बहस की शक्ल लेती हुई प्रगतिशील आंदोलन के उतार-चढ़ाव, नई कविता के आत्मसंघर्ष, हिंदी-उर्दू के झगड़े और भाषा की समस्याओं तक को अपनी गिरफ्त में लेती है और रामविलास जी के व्यक्‍ति‍गत जीवन के संवेदनों को बार-बार छू जाती है। बीच में दो-एक बार वह उत्तेजित भी हुए, पर ज्यादातर उनकी मुद्रा ‘बड़े भाई’ की तरी शांत व्याख्याकार की रही। बीच-बीच में अतीत में लौटने का सुख उनकी आँखों में चमक भर जाता।
करीब ढाई घंटे बाद जब मैं उठा, तो चेहरे पर उतर आई हलकी थकान के बावजूद उनका उत्साह चकित कर देने वाला था! अलबत्ता बीच में चाय पीते समय मैंने देखा, प्याला उठाते समय उनके हाथ काँपते हैं। और एकाएक कडिय़ल आलोचक के रूप में उनकी लंबी संघर्ष-यात्रा मेरी आँखों के आगे घूम गई।
यहाँ अनेक मोड़ों और पड़ावों से गुजरी इस लंबी, विचारोत्तेजक बातचीत के कुछ अंश दिए जा रहे हैं-
डॉक्टर साहब, एक लेखकखासकर आलोचक के रूप में लंबी यात्रा तय की है आपने। तो क्या आप बताएँगे कि एक आलोचक के रूप में आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या हैऔर सबसे बड़ी तकलीफ क्या है?
(हँसते हुए) भई, मुझे तो आलोचना में मजा आता है। अलबत्ता तकलीफ दूसरों को हो सकती है। बेहतर होता, अगर आप पूछते कि मजा क्या आता है आलोचना में…?
ठीक है, यही बताइए…!
आलोचना में जो सबसे बड़ा काम हम करते हैं, वह है किसी साहित्यिक कृति या अनेक साहित्यिक कृतियों और प्रवृत्तियों के आपसी संबंधों को पहचानना। कभी-कभी यह एक लेखक और उसकी युग के दूसरे लेखकों के बीच होता है और कभी अनेक युगों के लेखकों के बीच। अब उदाहरण दूँ आपको! तुलसी और निराला तो एक युग के नहीं हैं, लेकिन तुलसी और निराला में जब मैं साम्य देख लेता हूँ तो मुझे खूब मजा आता है। इसी तरह महावीरप्रसाद द्विवेदी और निराला को लोक एक-दूसरे का विरोधी मानते हैं, पर मैंने खोज की तो पता चला कि ऐसा नहीं है। निराला तो महावीरप्रसाद द्विवेदी की परंपरा का ही विकास कर रहे हैं, उनके सच्चे उत्तराधिकारी हैं…
लेकिन कहा तो यह जाता है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी ने जूही की कली सरस्वती के मंदिर से लौटा दी थी…
(दृढ़ता के साथ) नहीं, यह ठीक नहीं है…!
तो क्या यह बात गलत प्रचारित है कि द्विवेदी जी मुक्त छंद से चिढ़ते थे, इसलिए जूही की कली उन्होंने लौटा दी थी…?
बिलकुल। इसलिए कि अगर ऐसा होता तो निराला ‘अनामिका’ में महावीरप्रसाद द्विवेदी के लिए ऐसे सम्मानसूचक शब्द न लिखते! और फिर द्विवेदी जी ने निराला की मुक्त छंद में लिखी कविताओं की प्रशंसा की थी…
और डॉक्टर साहब, एक आलोचक के रूप में आपकी सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?
सारी सामग्री की समेटकर, उसे व्यवस्थित करके, विश्‍लेषि‍त करके सही निष्कर्ष तक ले जाना! इसमें काफी समय और भारी परिश्रम लगता है।
आपकी आलोचना-पद्धति पर आरोप भी लगते रहे कि उसमें लचीलापन कम है, कट्टरता है। कुछ न उसे कठमुल्लापन कहा! आपने खुद भी शायद कहीं लिखा है कि आप इस मारधाड़ वाली आलोचना से ऊब गए हैं और अब कुछ और करना चाहते हैं।
मारधाड़ वाली आलोचना मैंने नहीं कहा, मेरे मित्र अमृतलाल नागर ने एक दफा कहा था। मुझसे छोटे थे, पर अकसर बड़ों जैसी बात कहते थे, बेबाक राय देते थे।
उन दिनों मैं प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ा हुआ था। तो प्रगतिशील साहित्य पर जो आक्रमण होते, उनका मैं जवाब दिया करता था। वैसे भी अगर कोई रचना मुझे लगता कि सामाजिक विकास की चेतना में रुकावट खड़ी करने वाली है, तो मैं उस पर जमकर प्रहार करता! उसे देखकर उन्हीं दिनों नागर जी ने लिखा था, ”क्या हर कुत्ता जो तुम्हारे घर आकर भौंकता है, उसे देखकर तुम लाठी लेकर मारने दौड़ोगे? तब तो तुम्हारी बहुत सी ताकत इसी में जाया हो जाएगी। कोई ठोस काम क्यों नहीं करते?’’ तो मैंने फिर इस तरह की चीजें छोड़ दीं सन् 52 में। ऐसा लेखन सन् 43 से 52 तक ही ज्यादा मिलेगा, जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ का नेता था। उसके बाद यह कम, बहुत कम हो गया। ऐसा नहीं कि मैंने आरोपों के जवाब नहीं दिए। जहाँ बहुत जरूरी लगा, वहाँ दिए भी। जैने ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’ में कहीं-कहीं बहुत सख्ती से नामवर सिंह की खबर ली है। लेकिन अब यह नहीं है कि मैं हर किसी के बारे में लिखूँ- या यही देखता रहूँ कि कौन मेरे खिलाफ लिख रहा है…
तो आप मानते हैं कि एक दौर था, जब आपकी आलोचना में कट्टरता ज्यादा थी…?
ज्यादा थी, लेकिन वह समय की जरूरत भी थी। वैसे लोग भूल जाते हैं कि मैंने मारा है तो मार खाई भी खूब है। अब इस बात का क्या किया जाए कि मेरा लिखा तो लोगों को याद रहता है, जबकि दूसरों का लिखा वे भूल जाते हैं! (हँसते हैं)
आपको शायद याद नहीं, रांगेय राघव ने मेरी तीखी आलोचना की थी, यशपाल ने, पंत जी ने भी! मैंने सन् 48 में लिखा था पंत जी पर, जब वह ‘ग्राम्य’ की जमीन को छोड़कर स्वर्णशिखरों पर चढ़ाई करने लगे थे…
किस पत्र में?  ‘हंस में क्या…?
जी हाँ, ‘हंस’ में। वही हमारा मुखपत्र था। और फिर पंत जी ने भी उसका जवाब दिया था। एक बार मिले तो उन्होंने खुद बताया, ”रामविलास जी, मैंने आपकी बातों का जवाब दिया है अपनी पुस्तक की भूमिका में।’’
कई बार ऐसा नहीं लगता कि ऐसी आलोचना व्यक्तिगत उठापटक में खर्च हो जाती है और साहित्य या साहित्यिक चेतना के विकास में इससे कोई मदद नहीं मिलती?
देखिए, कोई रचना मेरे सामने हो तो सबसे पहले मैं यह देखूँगा कि उसके पीछे लेखक की दृष्टि क्या है। वह सामाजिक विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है या उसमें रोड़े खड़े करती है। इस लिहाज से उपयोगी हुई तो मैं उसकी विशेषताएँ बताऊँगा और अगर समाज को अस्वस्थ करने वाली चीज हुई तो मैं पूरे जोर से उस पर आक्रमण करूँगा। और उसमें दो-एक खासियतें भी हों तो उनकी चर्चा की मुझे जरूरत नहीं लगती। जैसे अगर मान लीजिए, आज कोई नायिका-भेद की कविता लिखे और उसमें सुंदर-सुंदर शब्द, कल्पनाएँ ले आए तो आज जमाना तो है नहीं नायिका-भेद का, इसलिए उसमें कैसी कलात्मक खासियतें हैं, यह चर्चा करने की मैं जरूरत नहीं समझता।
नहीं, मैं एक और बात कह रहा था। जैसे निराला की आप चर्चा करते हैं निराला का साहित्य साधना में तो बड़ी सहानुभूति से उनकी तकलीफों और संघर्षों को देखते हैं और यह भी कि उनके साहित्य में ये चीजें कैसे आती हैं, लेकिन मुक्तिबोध को देखते हैं तो यह सहानुभूति गायब हो जाती है। आप उनके संघर्षों को भूल जाते हैं और कमजोरियों को फैला-फैलाकर दिखाने लगते हैं।
देखिए, मुक्तिबोध शुरू में ऐसे नहीं थे, बाद में चलकर हुए। सन् 46 के आसपास! और सिर्फ वही नहीं, पूरा का पूरा दृश्य ही बदल रहा था उन दिनों। वे तमाम लोग जो घोषित मार्क्‍सवादी थे, वे अब टूटने, झुकने लगे थे। सन् 46 के आसपास एक बड़ा बदलाव आपको दिखाई देगा। उसमें अज्ञेय ही नहीं, भारतभूषण अग्रवाल, नेमिचंद जैन, मुक्तिबोध, दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन सब बदले नजर आएँगे। यह मोटे तौर से अमरीकी प्रभाव था जो अस्तित्ववाद की शक्ल में समाने आया था। अस्तित्ववाद को अमरीका हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा था हमारे मनोबल को तोडऩे के लिए। इसी समय भारतभूषण अग्रवाल और नेमिचंद्र जैन जैसे घोषित मार्क्‍सवादी रातोंरात बदल गए। बालकृष्ण शर्मा नवीन संघर्ष पथ छोड़कर ‘क्वासि’ लिखने लग गए। पूरे देश में कम्युनिस्टों की धरपकड़ हो रही थी और पंत ‘स्वर्ण किरण’ और ‘स्वर्णधूलि’ लिख रहे थे।
पर यह जरूरी तो नहीं कि अस्तित्ववाद अमरीकी हथियार ही हो! वह एक विचारधारा है और किसी भी विचारधारा की सीमाएँ हो सकती हैं, लेकिन यह आप कैसे कहते हैं कि…?
भई, देखना तो यह होगा कि किस चीज पर कौन जोर दे रहा है और किस मकसद से? अमरीका इनका पूरा समर्थन कर रहा था और भारत में मार्क्‍सवाद की जगह अस्तित्ववाद नजर आए, इसमें उसकी पूरी दिलचस्पी थी। और अज्ञेय पूरी तरह अमेरिकी गिरफ्त में थे ही। उनके आसपास धर्मवीर भारती, सर्वेश्‍वरदयाल सक्सेना, लक्ष्मीकांत वर्मा, ये सारे जो लोहियावादी घिर आए थे, इन्हीं को लेकर उन्होंने प्रयोगवाद चलाया और आगे चलकर नई कविता भी! दोनों में बुनियादी रूप में ज्यादा फर्क नहीं था और अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक सब उसमें शामिल थे।
लेकिन आप अज्ञेय और मुक्तिबोध को एक साथ कैसे रख सकते हैं? अज्ञेय ने इतने समझौते किए और मुक्तिबोध जीवन भर अपने आप से झगड़ते रहे—’ब्रह्मराक्षस’ जैसा आत्मसंघर्ष और कहाँ है?
लेकिन एक बात में दोनों समान हैं—विघटन और अवसाद।
यों देखें डॉ. साहब, तो अवसाद तो छायावाद में भी है, बल्कि यों कहें कि विषाद और नैराश्य उसकी मूल वृत्ति है।
विषाद है, लेकिन उससे उबरकर उल्लास की ओर जाने वाला भाव भी है।
तो क्या छायावाद में कम पलायन है। वे तो एक दूसरी दुनिया ही बसा लेते हैं जिसका कहीं अस्तित्व नहीं है, भागकर वहाँ छिप जाते हैं?
(खीजकर) भई, पीड़ा है, लेकिन संघर्ष भी तो साथ ही चलता है। निराला के यहाँ है यह संघर्ष।
निराला को छोड़ दें डॉक्टर साहब, क्योंकि छायावाद में उनकी स्थिति ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’ है। बाकी महादेवी, प्रसाद, पंत के यहाँ कहाँ है संघर्ष?
भई, आपको पता नहीं, प्रसाद ने केवल रोमानी कविताएँ ही नहीं लिखीं, कुछ आशा जगाने वाली कविताएँ भी हैं। उनके नाटकों में संघर्ष है।
लेकिन डॉक्टर साहब, कविता की ही बात करें तो?
कुछ कविताएँ उनकी हैं, महादेवी के यहाँ भी मिल जाएगा ‘जाग तुझको दूर जाना…’
एक बात बताएँ डॉक्टर साहब, इनमें वह समय कहाँ है जिसमें ये लिखी जा रही थींगुलामी की पीड़ा, आम आदमी की यातनाएँ, विवशता, दारिद्र्य, यह सब कहाँ है महादेवी के गीतों में! वे तो सौ साल पहले लिखी जाती या बाद में, ऐसी ही होतीं…!
तकलीफें हैं, लेकिन इस बारे में मेरी और आपकी दृष्टि में फर्क है शायद…
और जो छायावाद का पलायन है, ‘ले चल मुझे भुलावा देकर…’ यह शराब पीकर गम भुलाना नहीं है क्या?
यह फिर भी बेहतर है क्योंकि इसमें पीड़ा से दूर जाने की इच्छा तो है, पीड़ा को मूल्य तो नहीं बना दिया गया नई कविता की तरह?
यानी पीड़ा का चित्रण और पीड़ा को मूल्य बना देना, इसमें बारीक सा अंतर है। वह समझाएँगे आप?
बारीक सा नहीं, काफी बड़ा अंतर है।
तो वह पता कैसे चले? कसौटी क्या होगी उसकी?
बताया न, कोई रचना कुल मिलाकर सामाजिक चेतना को आगे बढ़ाती है या नहीं, इस आधार पर हम निर्णय करेंगे।
डॉक्टर साहब, आलोचना में क्यों कभी-कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्तिगत संबंध रचना के मूल्यांकन में प्रभाव डालें। मसलन निराला को आप निकट से जानते हैं तो आपने उन पर जो लिखा, उसमें उनके व्यक्तित्व की एक-एक रेखा बोलती है, लेकिन उन्हीं स्थितियों से गुजरे और भी लोग थे और भी बड़े लेखक, वे आपको नजर नहीं आए?
अगर आपका यह कहना है कि मैं व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर निर्णय करता हूँ तो यह सही नहीं है। मैं इसका खंडन करता हूँ। निराला जी को मैं जानता था, इसीलिए उन पर ऐसा लिखा हो, यह जरूरी नहीं। न जानता होता तो भी यही लिखता। इसी तरह तुलसीदास से तो मैं कभी नहीं मिला, लेकिन उन्हें मैं बड़ा कवि मानता हूँ। निराला से भी बड़ा। रांगेय राघव, यशपाल मेरे निकट थे, लेकिन उन पर मैंने बहुत तीखी आलोचनाएँ लिखीं। यशपाल पर लिखा लेख तो मैं उन्हें दिखाने ले गया था। उन्हें सुनाया भी और उन्हें खूब बुरा लगा, लेकिन मैंने वह कभी छपने नहीं दिया। वह आज तक नहीं छपा। हाँ, मैंने उन्हें बता दिया कि तुम्हारे बारे में मेरी राय क्या है। तो मैं इस बात का खंडन करता हूँ कि व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर मैं रचना को अच्छी-बुरी ठहाराता हूँ।
नहीं, मैं सायास प्रभाव की बात नहीं कर रहा, लेकिन किसी से किसी कारण सहानुभूति है तो उसका गुप्त प्रभाव पड़ता होगा। जैसे निराला की हीनताओं और विभाजित व्यक्तित्व की आप सहानुभूति से परख करते हैं और कविता में चमरौधा जूता आपको दुस्साहसिक प्रयोग लगता है, लेकिन मुक्तिबोध की परेशानियाँ, यहाँ तक कि बीड़ी की तलब पर आप व्यंग्य करते हैं। ऐसे ही साही हैं। आप जैसा साबित करना है, वैसे कुटेशंस ढूँढ़ लेते हैं। तो यह कैसे होता है कि…?
(थोड़ा उत्तेजित होकर…) इस पर बहस करें तो मेरा ख्याल है सारा समय इसी में चला जाएगा। बेहतर है कि हम लोग कविता के अलावा किसी और विषय पर आएँ।
डॉक्टर साहब, हमारे विश्वविद्यालय हिंदी साहित्य में क्या कुछ बना या बिगाड़ रहे हैं, इस पर कुछ कहेंगे?
देखिए, हमारे समय में तो विश्वविद्यालयों में रामचंद्र शुक्ल, श्यामसुंदर दास जैसे लोग होते थे जो अपने-अपने क्षेत्र के विद्वान थे। आजकल तो पता नहीं। मैं लगभग बीस वर्षों से साहित्य से कटा हुआ हूँ। ज्यादा पढ़ नहीं पा रहा।
विश्वविद्यालयों में जो हिंदी पढ़ाई जाती है, वह इतनी कृत्रिम और आडंबर भरी है, बोलचाल की भाषा से इतनी दूर है कि ताज्जुब होता है कि अगर यह हिंदी है तो वह क्या है! यह स्थिति क्या परेशान करने वाली नहीं है?
अगर ऐसा है, तब तो ठीक नहीं है। इतना फर्क बोलने और लिखने की भाषा में होना नहीं चाहिए। मराठी में बंगला में ऐसा फर्क आपको नहीं मिलेगा।
अपने देश में हिंदी और उर्दू का झगड़ा खामखा बना और बढ़ा दिया गया है और कुछ लोग इसे लगातार उकसाते हैं, जबकि आम आदमी के सामने यह मुश्किल नहीं है। वह जो भाषा बोलता है, उसमें हिंदी, उर्दू दोनों सहज ही मिल जाती हैं। तो इस झगड़े का क्या हो जो हम पर खामखा थोप दिया गया है?
मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। हिंदी-उर्दू में तो उतना फासला भी नहीं है जितना हिंदी और उसकी बोलियों में है। और विरोध तो कतई नहीं है! दोनों ने क्रिया-पद मिलते हैं जबकि हिंदी और भोजपुरी या हिंदी और मैथिली के क्रिया-पद एक नहीं हैं। मुझे लगता है, उर्दू का जो भी साहित्य है, वह सारा देवनागरी लिपि में आए, यह जरूरी है। और फिर आप जैसे लोगों को इस क्षेत्र में खूब काम करना चाहिए। गाँव-गाँव कस्बे-कस्बे में जाकर लोगों को यह बात बतानी चाहिए कि सच्चाई क्या है।
लेकिन डॉक्टर साहब, जब तक राजनीति इस मामले में जहर घोलती रहेगी, तब तक ये रचनात्मक काम कुछ सफल होंगे? यकीन है आपको?
तो राजनीतिक प्रोपगैंडा का राजनीतिक तौर से ही मुकाबला किया जाना चाहिए।
राजनीतिक यानी…समझाएँगे!
देखिए, प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ मुस्लिम कवियों की बड़ी अटूट परपंरा है। लोगों को उसके बारे में बताया ही नहीं जाता। अगर ये सारी बातें सामने आएँ तो लोगों का नजरिया बदल सकता है। नवयुवकों को इस काम के लिए दूर-दराज के इलाकों में जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह इस क्षेत्र में काम करने वालों को वजीफे दे। इससे बेरोजगारी मिटेगी और देश के निर्माण में कुछ ठोस काम होगा जिसका असर अगले बीस वर्षों में दिखाई देगा।
लेकिन डॉक्टर साहब, पूरी दुनिया में जो उथल-पुथल पिछले कुछ वषों में हुई है, उसके बारे में क्या सोचते हैं आप? लगता नहीं कि सोवियत संघ के पतन से पूरी दुनिया में समाजवादी आंदोलन को धक्का पहुँचा है?
समाजवादी देश ही नहीं, जो पूंजीवादी देश अपना स्वतंत्र विकास करना चाहते हैं, उन्हें भी धक्का पहुँचा है। यह अमरीकी साम्राज्यवाद की बहुत बड़ी विजय है।…अच्छा, मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। बगैर विदेशी कर्ज के आप काम चला सकते हैं कि नहीं चला सकते? मेरा दावा है कि चला सकते हैं। वही हालत सोवियत संघ में थी। जब उसने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ जीतीं, तब तो कर्ज नहीं लिया। फिर अब कर्ज लेने की क्या जरूरत थी?… फिर जो कर्ज देगा, वह अपनी शर्तें भी रखेगा और मनवाएगा। आपकी स्वतंत्रता फिर कहाँ रही? सिर्फ पिछलग्गू बन सकते हैं आप!
हमारे देश में आम आदमी के लिए जीने के रास्ते लगातार तंग होते जा रहे हैं। विषमता बढ़ी है और लोगों का यह विश्वास बुरी तरह हिला है कि सच्चाई और ईमानदारी से भी कुछ पाया जा सकता है। तो अब रास्ता क्या हो?
यही कि लोगों को संगठित होकर अपनी आवाज उठानी होगी। उसमें पढ़े-लिखे, अनपढ़, बुद्धिजीवी, किसान, मजदूर सब शामिल हों। और केवल भारत में ही क्यों? सभी देश मिलकर हल खोजें। बल्कि अब तो मुझे लगता है कि पाकिस्तान और पूरे एशिया भर के लोग भी इसी तरह इकट्ठे हो सकते हैं और दुनिया का नक्शा बदलते देर नहीं लगेगी…
आपके खयाल से अकादमियाँ और साहित्यिक संस्थाएँ कुछ भला कर रही हैं साहित्य का…या कर सकती हैं?
ज्यादातर तो अकादमियाँ हों या यूनिवर्सिटियाँ, सभी रिपीट कर रही हैं कुछ कामों को…दोहराव बहुत ज्यादा है, जैसे-तैसे लीक पीट दी जती है। उदाहरण के लिए शोध को लीजिए, उन्हीं घिसे-पिटे विषयों पर घिसे-पिटे ढंग से होते हैं। कोई समझ में नहीं आता कि अकादमियाँ कर क्या रही हैं? नई से नई योजनाएँ बनाकर काम हो, तो बहुत सारा काम हो सकता है। अकादमियाँ मिलकर तय करें कि भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए वे क्या कर सकती हैं। एक अकादमी तमिल सिखाने की व्यवस्था करे, दूसरी तेलुगु, मलयालम। इससे आप देखेंगे कि एक वातावरण बनेगा, दूरियाँ कम होंगी और एक मजबूत देश की छवि बनेगी।…
साहित्यिक पुरस्कारों के पक्ष और विपक्ष में काफी कहा जाता है। आपके खयाल से सही भूमिका क्या हो सकती है पुरस्कारों की?
पुरस्कार लेखक की साहित्य-साधना का सम्मान करने के लिए हो, इसमें तो कोई हर्ज नहीं। लेकिन अकसर होता यह है कि पुरस्कार बड़ा होता है उसके साथ जुड़ी हुई बड़ी राशि से। जितनी बड़ी राशि, उतना बड़ा पुरस्कार…! मैं कई बार कल्पना करता हूँ कि क्या दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, लेखक मिलकर कोई ऐसी बॉडी नहीं बना सकते जो अच्छे वैज्ञानिकों, लेखकों को सिर्फ सर्टिफिकेट दे। क्या यह सर्टिफिकेट बड़े से बड़े पुरस्कार से कम होगा? और कुछ नहीं तो कम से कम हम भारत में तो यह कर सकते हैं।…वैसे में चाहता हूँ, कुछ समय के लिए अकादमियाँ, साहित्यिक संस्थाएँ, के.के. बिड़ला फाउंडेशन भी पुरस्कार देना बंद कर दे और जो पुरस्कार की राशि हो, वह हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगाई जाए। साक्षर लोग ज्यादा होंगे तो साहित्य के पाठकों की भी कमी नहीं रहेगी।
प्रगतिशील आंदोलन की विफलता के लिए आप किन कारणों को जिम्मेदार समझते हैं?
नहीं, विफल कहाँ? नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल ये सब लिख तो रहे हैं।
नहीं, मैं इधर की पीढ़ी की बात कर रहा हूँ। नागार्जुन, केदार के बाद वाली…?
वह मैं नहीं बता सकता, क्योंकि मैं आजकल पढ़ नहीं पा रहा हूँ। साहित्य से कुछ दूर चला आया हूँ। मेरी कुछ योजनाएँ हैं, उन्हीं पर काम में जुटा हूँ।
अच्छा, यह जो समीक्षकों का विचार है कि प्रगतिशील आंदोलन तो आगे नहीं चला, लेकिन नई कविता की एक धारा ने ही प्रगतिशील कविता की भूमिका निभाई, इस बारे में आपका क्या कहना है?
नहीं, यह ठीक नहीं। नई कविता पूरी तरह प्रगतिवाद के विरोध में खड़ी थी।
बहुत से प्रगतिशील लेखक इसलिए भी प्रगतिवादी आंदोलन से कट गए कि उसमें सपाटता बहुत आ गई थी और अंतर्विरोधों पर खुलकर बहस नहीं होती थी। क्या आपको नहीं लगता ऐसा?
आप मुझे बताइए, किस दौर में साहित्य ऐसा लिख गया जिसमें सपाटता बिलकुल न हो। अगर कमियाँ हैं, अंतर्विरोध है तो उनको दूर कीजिए। यह तो नहीं कि आप खुद दूर आ गए। मैं जब प्रगतिशील लेखक संघ में सक्रिय था तो ऐसे बहुत से मामलों पर मैंने बहसें चलाईं। भाषा को लेकर लंबी बहस चली। मैं कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा-नीति से असहमत था और जो कुछ लिखता था वह कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र में छपा करता था। आप इससे अंदाजा लगाइए हमारी स्वतंद्धता का।
एक और बात! यह जो प्रतिशीलता का एक संकुचित अर्थ बन गया है कि उसमें मजदूर-किसान और क्रांति के गाने गाए जाएँगे, इससे भी लोग बिदके होंगे! क्योंकि लोग वास्तविक जीवन में तो इनके निकट थे नहीं, तो बड़ी बनावटी रचनाएँ आतीं थी। साठोत्तरी लघु पत्रिकाओं का मुझे पता है। उनमें बहुतेरी लाल क्रांति का परचम फहराती थीं। वे कविता-कहानियाँ कहाँ गईं, आज पता नहीं चलता?
प्रगतिशील की यह परिभाषा गलत है और ऐसी बातें विरोधियों ने हमें बदनाम करने के लिए उड़ाई हैं। हाँ, इतना जरूर है कि हमें आम जनता के निकट आना होगा। उनकी मुश्किलें समझकर उनसे जुड़कर लिखें।
केदारनाथ अग्रवाल ने अपनी प्रगतिशीलता को पार्टीवाद से अलग घोषित कियाकि यानी पार्टीवाद या पार्टी दखल से वे भी परेशान हैं?
लेकिन पार्टी तो कभी नहीं कहती कि यह लिखो वह लिखो, कहेगा तो कोई लेखक ही न?
तो भी एक तरह का सेंसरशिप तो लगता है?
देखिए, पार्टी क्या है—एक तरह की विचारधारा है और विचाराधारा का प्रभाव तो होगा ही। जैसे गाँधी जी की विचारधारा का प्रभाव था, वैसे ही कम्युनिस्ट विचारधारा का। लेकिन विचारधारा से तो कोई लेखक मैच्योर ही बनता है।
लेकिन यह सेंसरशिप स्वत:स्फूर्त रचना में बाधक भी तो बनती है?
मेरा मानना है कि कोई रचना पूरी तरह स्वत:स्‍फूर्त नहीं होती। लेकिन इतनी तो जरूर होती है कि अगर हम यह सोचकर बैठ जाएँ कि अच्छी रचना ही लिखनी है तो वह नहीं लिखी जाती और कभी वह ऐसे ही बन जाती है।
तब भी लेखक कुछ शब्दों को चुनता है, कुछ को रिजेक्ट करता है—यानी वह अपना आलोचक खुद होता है। इस रूप में रचना स्वत:स्फूर्त कभी नहीं होती।
अच्छाअब एक अलग तरह का सवाल! जो आलोचना आप लिखते हैं या आपके लिखे पर जो आलोचना होती है, उससे कई बार क्षोभ और गुस्सा भी तो आता होगा। उससे आपके व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन पर भी कोई प्रभाव पड़ता है?
नहीं, मुझ पर तो कभी नहीं। जिन पर मैंने लिखा, उनका कह नहीं सकता। (हँसी)
कई बार आलोचना सिर्फ दूसरों की कमजोरियाँ तलाशने का धँधा बन जाती है। इसे एकांगी आलोचना नहीं कहेंगे?
कवि‍ता के नए प्रतिमान पर लिखे गए लेखों में आपने नामवर के अंतर्विरोधों को खोला है, लेकिन उनकी तारीफ में एक शब्द भी नहीं है?
‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिह कुल मिलाकर प्रगतिवाद के विरोध में खड़े हैं, इसीलिए इतनी सख्त आलोचना की जरूरत पड़ी।
इस तरह की आलोचना से आपने काफी दुश्मन भी बना लिए होंगे?
नहीं, मेरे मन में तो ऐसी कोई बात नहीं है। हाँ, लोगों ने वैसा किया हो, तो कह नहीं सकता। वैसे तो मेरा खयाल है ऐसा नहीं हुआ। नामवर सिंह पर मैंने सबसे सख्त लिखा है, पर हम लोग खूब अच्छे मित्र हैं और सम्मान करते हैं एक-दूसरे का। रांगेय राघव को मुझ पर कुछ लिखना होता था तो किताबें मुझसे ही माँगकर ले जाते थे और आपको शायद मालूम हो, मेरी बहुत कटु आलोचना की है उन्होंने। भगवतीचरण वर्मा के ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ पर मैंने बहुत तीखा लेख लिखा था, हालाँकि हम मित्र थे, बाद में भी रहे।…उस उपन्यास के जवाब में रांगेय राघव ने ‘सीधा सादा रास्ता’ लिखा तो मेरे घर आए। बोले—मैं आपके लेख को भूमिका के रूप में देना चाहता हूँ। मैंने कहा, ठीक है खुशी से छापो।
अपने जीवन-संघर्ष के किसी कमजोर क्षण में मार्क्‍सवाद से क्या कभी मोहभंग नहीं हुआ आपका?
देखिए, मार्क्‍सवाद सिखाता है कि हर चीज पर डाउट करो। तो मैं मार्क्‍सवाद को भी आलोचनात्मक नजरिए से देखता हूँ। मैं यह नहीं मानता कि मार्क्‍स कोई गलती नहीं कर सकता।
इतने लंबे आलोचक जीवन में आपने तमाम लोगों पर तमाम तरह की चीजें लिखीं। क्या आपको कभी कनफेस करने की भी जरूरत पड़ी?
यह तो काल्पनिक प्रश्न हुआ, उदाहरण देकर बताए।
वहीं पंत जी वाला लेख, जिसमें लघु-लघु की गिनती होता है या वे लेख जिन्हें नागर जी ने मारधाड़ वाले लेख कहा ?
सच तो यह है मेरे पास समय नहीं, नहीं तो मैं तो और लिखूँ! पंत जी ने ‘स्वर्ण किरण’, ‘स्वर्णधूलि’ वाले ढोंग का विरोध करना जरूरी था। एक बात बताऊँ आपको, पंत जी आध्यात्मवादी कभी थे ही नहीं। यह अध्यात्म सिर्फ उन्होंने ओढ़ रखा था। निराला जी से प्रतिद्वंद्विता…
आपका मतलब है, पंत जी आतंकित थे निराला जी से?
इनके संबंध बड़े अद्भुत थे। निराला बहुत प्यार करते थे पंत जी से। उन्हें अच्छा कवि भी मानते थे। पंत मन ही मन आतंकित थे निराला जी से। समझते थे कि वह बहुत बड़े कवि हैं, लेकिन यह बात स्वीकार कभी नहीं करते थे।
क्या आपको लगता है, निराला से मिलने के बाद आपमें एक व्यक्तित्वांतर हुआ। यानी उनसे न मिले होते तो ठीक-ठीक ऐसे न होते…?
लेखक तो मैं तब भी होता। एक तो घर का माहौल ऐसा था कि सभी भाई खूब पढ़ते थे, रुचि लेते थे। खुद पिता जी ने अभावों में रहते हुए भी कई भाषाएँ सीखी थीं। हमें भी प्रोत्साहन देते। फिर संयोग से अध्यापक भी अच्छे मिले जो खूब स्नेह करते थे। जब मैं सोलह वर्ष का था, मेरा एक निबंध मेरे अध्यापक ने कक्षा में पढ़कर सुनाया और खूब तारीफ की थी। फिर बी.ए. में पढ़ता था, तब भी ऐसा ही हुआ। तो मुझे लगता था, लेखक तो मैं हो सकता हूँ। निराला जी से भेंट बहुत बाद में हुई, जब मैं इलाहाबाद में एम.ए. का छात्र था…
उसे भेंट की याद है आपको? तब क्या निराला बिलकुल स्वस्थ थे?
हाँ, मैं ‘परिमल’ खरीद रहा था कि कहीं से घूमते-फिरते वह आ गए। मेरे हाथ में ‘परिमल’ देखकर बोले, इसमें कुछ अतुकांत कविताएँ हैं जो आपको शायद ज्यादा पसंदन आएँ। मैंने कहा, वही तो मुझे ज्यादा पसंद हैं। सुनकर निराला को आश्‍चर्य हुआ था। उनकी आँखों में प्रसन्नताभरी चमक मैंने देखी…
तब के निराला तो बिलकुल देवपुरुषों जैसे थे। उस समय निराला अपने चरम थे, कहीं कोई असामान्यता नहीं! कविताएँ सुनाने का खूब शौक था, लेकिन अपनी नहीं, दूसरों की। सैकड़ों कविताएँ उन्हें याद थीं, पार्क में रात देर तक बैठकर सुनाया करते थे। रवींद्रनाथ टैगोर की कितनी ही कविताएँ मैंने शब्दश: उनसे सुनी हैं।
बाद में आप आलोचना से कटकर भाषा विज्ञान की ओर आए। आपको क्या लगता है, कौन से सवाल, कौन सी चुनौतियाँ थीं जो आपको इधर खींच लाईं?
एक तो मैंने जब से होश सँभाला, यही सुनता आया हूँ कि एक थे आर्य, एक थे द्रविड़। आर्य अक्रांता थे, द्रविड़ों को खदेड़ा था। आज भी आर्य भारत अलग है, द्रविड़ भारत अलग। तो मैं सोचा करता था, क्या यह वाकई ऐसा है? क्या आर्य सचमुच बाहर से आए थे? दूसरे, यह कहा जाता था कि हिंदी में तो इतनी बोलियाँ हैं और सब एक-दूसरे से जुदा-जुदा तो हिंदी एक भाषा कैसे रही? देश एक कहाँ है…? मुझे लगा कि इन प्रश्‍नों को सुलझाया जाए। हिंदी बोलने वाले हम इतने सारे लोग हैं। भाषा-संबंधी देन भी हमारी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन कुछ गलतफहमियों के सहारे उन्हें नकारा जाता था और हममें हीनता पैदा की जाती है। मैंने पहले तो यही देखा कि क्या आर्य वाकई बाहर से आए थे? मैंने पाया—और इसे सभी भाषाविज्ञानी मानते हैं, कोई विवाद नहीं इसमें—कि सघोष महाप्राण ध्वनियाँ (जैसे घ, भ इत्यादि) केवल हिंदी, संस्कृत में हैं। तो अगर ये आर्य कहीं बाहर से आए होते तो दूसरी भाषाओं में भी ये ध्वनियाँ होनी चाहिए, लेकिन नहीं मिलीं—संसार की किसी भी और भाषा में नहीं। अब सवाल यह है कि हमारी भाषा में सुरक्षित कैसे रहीं, कहाँ से आईं? तो बहुत सारी बातें जिन्हें भाषाविज्ञानी अब तक रूढि़ की तरह ढोते चले आए थे, मैंने नए सिरे से परखा…और जैसे-जैसे आगे बढ़ा, मुझे मजा भी बहुत आया। जिन दिनों के.एम. मुंशी संस्थान में था, मैंने सोचा अवसर का लाभ उठाया( जाए। उन दिनों भाषा विज्ञान के बारे में जमकर अध्ययन किया।
आपकी किताब घर की बात पढ़कर अच्छा लगा, थोड़ा खेद भी हुआ। भाषा की इतनी बढिय़ा अर्थ-छवियाँ बिखरी पड़ी हैं वहाँ कि लगा, आप बहुत अच्छे उपन्यासकार हो सकते थे। पर आपको भारी भरकम आलोचक ने उसे दबा दिया।
(हँसकर) मैंने बिलकुल शुरू में एक उपन्यास लिखा था, ‘चार दिन’। अब भी उपन्यास लिखने का इरादा खत्म नहीं हुआ। उम्मीद रखिए…
अपने साहित्यिक मित्रों के बारे में कुछ बताइए? सुना है, खूब छेड़छाड़, शरारतें होती थीं नागर जी के साथ?
निराला जी के यहाँ ही भेंट हुई थी नागर जी से। हमसे छोटे थे चार साल, लेकिन बातें बड़ों जैसी समझदारी की करते थे। हम कहते, ”हम बड़े हैं, आप कहा करो, क्या ‘तुम…’, ‘तुम’ करते हो?’’ तो जवाब मिला, ”आप हमसे नहीं बोला जाएगा। नरेंद्र शर्मा को बोल सकते हैं पर तुमसे नहीं!’’ आपको बताया है कि उन्होंने ही मुझे मारधाड़ वाली आलोचना से रोका था। बैसवाड़ा के न होते हुए भी इतनी बढिय़ा बैसवाड़ी वह बोल लेते थे कि ताज्जुब होता था। उनके उपन्यासों में—खासकर संवादों में बैसवाड़ी के कुछ बहुत ही बढिय़ा प्रयोग मिलते हैं। अभी उनकी ग्रंथावली पर लिखने के लिए मैं उनके उपन्यास दुबारा पढ़ रहा था तो उनमें एक-दो जगह ठेठ गाँव के मुहावरे इतने बढिय़ा ढंग से आए हैं कि मैं कुछ देर तक किताब दूर रखकर हँसता ही रहा कि शहर का यह आदमी जान कैसे गया इन्हें?
केदारनाथ अग्रवाल से भी लंबी मित्रता है। हमसे बड़े हैं, मगर चार साल नहीं, एक साल। बहुत लंबा पत्र-व्यवहार है उनसे, अभी पीछे छपा भी है। इनकी कविताएँ बहुत आकर्षित करती हैं मुझे। लेकिन गद्य और भी गजब का है। मुझे लगा, इस गद्य की ताकत लोगों को बतानी चाहिए। लोग अब देख रहे हैं, खुद समझ रहे हैं कि क्या कुछ है इन पत्रों में।
और नागार्जुन?
नागार्जुन से भी मित्रता है, पर उनसे लंबा पत्र-व्यवहार नहीं हुआ।
केदार और नागार्जुन के व्यक्तित्व की जाहिर है, अलग-अलग रेखाएँ आपको खींचती होंगी! क्या फर्क लगा आपको उनमें?
केदार के यहाँ संवेदनाशीलता बहुत है, सौंदर्यानुभूति उनकी बहुत सजग, बहुत तीव्र है, इसलिए उनके प्रकृति चित्रण का जवाब नहीं। ऐसे दृश्यों की सुंदरता देखकर आप मुग्ध हो जाएँगे लेकिन व्यंग्य केदार के यहाँ बहुत नीचे हैं। नागार्जुन के यहाँ व्यंग्य नंबर एक पर हैं, बहुत उम्दा हैं, लेकिन सौंदर्य चित्रण देखें तो तीसरे-चौथे नंबर पर। केदार के मुकाबले बहुत हलके पड़ते हैं।
प्रगतिवाद में केदार जी की चर्चा सबसे कम हुई है। बड़े प्रगतिवादी आलोचक हलके टोन में उनकी चर्चा करके छोड़ देते हैं, ऐसा क्यों?
आप ठीक कह रहे हैं। मैंने तो इस पर बकायदा लिखा है कि केदार जी की उपेक्षा हुई है और यह गलत है।
हिंदी साहित्य का मौजूदा दृश्य कुछ-कुछ निराश पैदा करने वाला नहीं लगता आपको? किताब पाठकों से दूर चली गई। एक तो पाठक कम हैं, फिर किताबें महंगी भी बहुत हैं।
लेकिन आप जरा जाकर पता लगाइए, प्रकाशक तो बढ़े हैं और उनकी हालत देखें तो लेखक तो वहीं का वहीं है और प्रकाशक कहाँ से कहाँ पहुँच गए! किताबें बिकती नहीं, तो कैसे होता ऐसे?
सरकारी खरीद की ओर भागते हैं सभी। किताबें बोरों में बंद हो जाती हैं, पाठकों तक नहीं आतीं…
यह तब भी होता था। प्रकाशक इसी चीज के पीछे भागता था। पाठक को संस्कार देने काकाम उसने नहीं किया और आज भी ऐसा ही है। पर दूसरी भाषाओं में ऐसा नहीं है, बंगला में देखें, मराठों में देखें! कुछ वर्ष पहले अखबारी कागज पर छपा हुआ माइकेल मधुसूदन दत्त का काव्य बहुत सस्ते में खरीदा था मैंने!…उन लोगों की पुस्तकें सजिल्द कम होती हैं। किताब लाइब्रेरी की बजाय पाठकों तक पहुँचे यह ज्यादा है। हमारे यहाँ उलटा है। अमरीकी प्रभाव ज्यादा है। किताब की साज-सज्जा बढिय़ा होगी, लेकिन दाम इतना रखेंगे कि कोई खरीद ही नहीं सकता।
क्या मीडिया का दबाव भी साहित्य की इस दुर्गति के लिए जिम्मेदार हैखासकर टी.वी.?
देखिए, साहित्य का तो एक तरह का नशा है, जिसे एक बार लग गया उसे लग गया। फिर आसानी से छूट नहीं सकता। दूरदर्शन ने आपके पाठक छीने नहीं, वह तो नए दर्शक पैदा कर रहा है। जिसे किताबें पढऩी होंगी, वह किताबें ही पढ़ेगा। मैं खुद बहुत कम देखता हूँ टीवी। इसकी बजाय तो मुझे संगीत सुनना अच्छा लगता है और वह मैं सुनता हूँ ट्रांजिस्टर से।
लेकिन जिस तरह लेखक ललचाते हुए दूरदर्शन की ओर भाग रहे हैं, फिर वहाँ चाहे उनका अपमान हो, कहानियों में दूरदर्शनी सीरियलों जैसा जो कामचलाऊपन आ रहा है और लोगों को लगने लगा है कि दूरदर्शन में तो इतने दर्शक हैं, वे किस स्तर के हैं इससे फर्क नहीं पड़तातो एक क्रेज तो बना ही है कि…
यह सब बहुत थोड़े समय के लिए होता है, चला जाता है। कोई सोचे कि इससे साहित्य खत्म हो जाएगा, तो यह बेवकूफी है!…साहित्य इतनी हलकी चीज नहीं।
आज साहित्य में इतने कटघरे और गुटबंदियाँ हैं कि नया लेखक जिधर भी जाए, अपने सामने काँटेदार बाड़ देखता है। यह हालत कैसे बदले?
नए लेखकों को चाहिए कि वे अलग से या मिलकर इस काँटेदार बाड़ को तोड़ें। आगे बढऩे वालों को कोई रोक सका है भला।
आजकल आप क्या विशेष कर रहे हैं?…किस तरह की योजना?
मैं ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान पर एक तरह का शोध कार्य कर रहा हूँ। एशिया और ऋग्वेद से संबंधित पुस्तक आशा है, जल्दी ही आएगी। ऋग्वेद कई दृष्टियों से मुझे महत्वपूर्ण लगा है, खासकर भाषा-संबंधी अध्ययन और प्रागैतिहासिक काल की संस्कृति, जीवन शैली, शिल्प और विकास की अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं की खोज के लिए।
और ज्यादातर समय इसी में जाता होगा?
काफी एकांत है यहाँ…स्थान थोड़ा दूर भी है, इसलिए कभी-कभार ही कोई आता है मिलने। लिखने-पढऩे के लिए काफी समय मिल जाता है।
कहते-कहते मुसकरा देते हैं रामविलास जी। मैं देवेंद्र सत्यार्थी पर लिखी गई किताब ‘तीन पीढिय़ों का सफर’ उन्हें भेंट करता हूँ और बताता हूँ, ”आज ही सत्यार्थी जी मिले थे। कह रहे थे—कोई कितना ही मना करें, पुरस्कार के लिए कहीं एक लालच तो होता ही है मन में। रामविलास जी से मामले में हम सबसे आगे हैं। और उन्होंने बताया कि एक किताब उन्होंने समर्पित की थी आपको, ‘उठाइए लाठी आलोचक जी’ इस ललकार के साथ…’’
रामविलास जी हँस पड़ते हैं, ”और वह किताब आज तक मुझे नहीं मिली। उनसे कहिएगा—मुझे क्यों नहीं भेजी वह किताब?’’
मैं आलोचना के इस शिखर पुरुष को प्रणाम कर लौट पड़ता हूँ।

साहित्य में पुलिस जैसी भूमिका है आलोचक की : भीमसेन त्‍यागी


सातवें दशक के चर्चित कथाकार भीमसेन त्‍यागी का जन्‍म 19 सि‍तंबर, 1935 को जरवल (बहराइच) में हुआ। उनका बचपन पश्‍चि‍म उत्‍तर प्रदेश के बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) में बीता और वहीं प्रारंभि‍क शि‍क्षा हुई। वि‍द्यार्थी जीवन में नि‍र्माण साप्‍ताहि‍क पत्र नि‍काला। तब से ही राष्‍टी्य स्‍तर की प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में रचनाएं प्रकाशि‍त होने लगीं। ’नया जीवन’, ‘सरि‍ता’, ‘मुक्‍ता’ आदि‍ पत्रि‍काओं के संपादकीय वि‍भाग में कार्य कि‍या। ‘नीहारि‍का’ कथा मासि‍क और हिंद पाकेट बुक्‍स के संपादक रहे। ‘जी टेलि‍फि‍ल्‍मस’ में कार्यक्रम परामर्शदाता के पद पर भी कार्य कि‍या। जमीन, नंगा शहर, वर्जित फल, काला गुलाब (उपन्‍यास), जबान, दीवारें ही दीवारें, कमजोर प्‍यार की कहानि‍यां (कहानी संग्रह) और आदमी से आदमी तक (शब्‍द चि‍त्र) उनकी प्रमुख कि‍ताबें हैं। इनके अलावा त्रैमासि‍क पत्रि‍का भारतीय लेखक का संपादन व प्रकाशन। अजीव संयोग है कि‍ उनका देहांत 19 सि‍तंबर (वर्ष 2006) को जन्‍मदि‍न वाले दि‍न हुआ। उनसे यह बातचीत 3 जनवरी, 2002 को की गई थी-
लेखन की तरफ आपका रुझान कब और कैसे हुआ?
लेखन की तरफ आने का निर्णय मेरा चुनाव नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य था। बचपन गांव और कस्बे के मिले-जुले परिवेश में बीता। वहां खुला जीवन था। उससे भी खुली थी प्रकृति। याद आता है कि पहली रचना सरसों के खेत की मेढ़ पर बैठकर सरसों के ही बारे में लिखी थी। उस कविता का अब एक शब्द भी याद नहीं है, लेकिन उसके साथ जो सृजन का थ्रिल था, वह आज भी जस-का-तस मौजूद है। इसके अतिरिक्त कस्बे के जीवन में एक-दो किस्सागो थे, जो राजा-रानी, परियों की कथाओं का वाचन करते थे। बीस-तीस श्रोता देर रात तक एकाग्र होकर सुनते थे। उन श्रोताओं में आठ-दस साल की उम्र का सबसे छोटा श्रोता मैं होता था। उन कहानियों में ऐसी पकड़ बल्कि जकड़ थी जो श्रोताओं को बांधे रखती थी। बाद में आधुनिक कहानियों से परिचय हुआ तो वे भिन्न स्वाद की अच्छी रचनाएं लगीं, लेकिन मन उन्हें कहानी स्वीकार करने को तैयार नही था, क्योंकि कहानी का जो स्वरूप व संवेदना उन किस्सों के माध्यम से मन में अंकित हो गई थी, आधुनिक कहानी उनसे एकदम भिन्न थी।
धीरे-धीरे साहित्य के प्रति रुचि बढ़ती गई और एक दिन पाया कि मैं पठन-पाठन और लेखन के अतिरिक्त और कुछ भी करने के  योग्य नही हूं। मजबूरी में लेखन से जुड़ी पत्रकारिता को व्यवसाय के रूप में स्वीकार किया। वह भी बहुत दिन नहीं चल पाया।
कथ्य और शिल्प में महत्वपूर्ण कौन है?
कथ्य और शिल्प को अलग-अलग करके नहीं आंका जा सकता। हर रचना अपने शिल्प का स्वयं निर्माण करती है। यदि कथ्य के अनुरूप शिल्प नहीं उगता, वह रचना के साथ एकमेएक होकर नहीं आता, तो संपूर्ण रचना नहीं बन पाती। रचना में कथ्य महत्वपूर्ण है तो शिल्प स्वत: महत्वपूर्ण होगा और यदि कथ्य ही महत्वपूर्ण नहीं है तो शिल्प का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
विभिन्न गुटों व आंदोलनों का साहित्य में क्या योगदान रहा है?
दूसरे आंदोलनों की तरह साहित्य में भी आंदोलनों की भूमिका नकारात्मक और सकारात्मक दोनों रही है। आंदोलनों ने वैचारिक धरातल पर समसामयिक सोच को प्रभावित किया और साहित्य में एक सार्थक भूमिका निभाई है। इसके विपरीत आंदोलन व्यक्तिगत गुटबाजी, स्वीकृति की प्यास और दूसरों को टंगड़ी मारकर आगे निकल जाने की अंधी दौड़ का कारण भी बने।
हिंदी साहित्य में प्रेमचंद और प्रसाद के विवाद से शुरू होकर छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और आज के अनेक वाद-विवादों में आंदोलनों की नकारात्मक भूमिका देखी जा सकती है।
प्रगतिवाद ने जहां एक तरफ यथार्थवाद और जनोन्मुख सोच को अभिव्यक्ति दी, वहीं साहित्य में कट्टरता और नारेबाजी को स्थापित किया। इसमें साहित्य और समाज का हित होने के साथ-साथ अहित भी कम नहीं हुआ।
उसके बाद के आंदोलनों में भी यह प्रक्रिया दोहराई जाती रही। असल में साहित्यकार को समाज तथा राजनीति के प्रति सचेत और सजग जरूर होना चाहिए, लेकिन किसी वाद से बंधकर रहना उसकी प्रगति में साधक नहीं, बाधक ही सिद्घ होगा।
साहित्यिक आंदोलनों के पीछे राजनीतिक दलों का दबाव रहा है। राजनीतिक दल जिस तरह श्रमिकों, महिलाओं, युवकों के मोर्चे खोलते हैं, उसी तरह साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी दखल रखना चाहते हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों के साहित्यिक संगठन हैं। वे उनके माध्यम से अपनी राजनीति का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन साहित्यकार राजनीतिक दलों के आपसी वैमनस्य और खींचतान से ऊपर होता है। वह उनसे मार्गदर्शन लेने की बजाए उनकी आलोचना करता है।
चीनी क्रांति के दौरान क्वाओ-मो-जो बहुत महत्वपूर्ण चीनी लेखक थे। वह राजनीति में भी सक्रिय थे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष माउत्से तुंग ने उनसे पार्टी का वायस-चेयरमैन बनने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि मैं लेखक पहले हूं, पार्टी का कार्यकर्ता बाद में। पार्टी का पद ग्रहण करने का मतलब पार्टी के अनुशासन में रहना और पार्टी के निर्णयों को जस-का-तस स्वीकार करना है। मैं एक लेखक की हैसियत से आलोचना के अपने अधिकार को नहीं खोना चाहता। वह आजीवन पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता रहे, लेकिन कभी भी पार्टी का पद ग्रहण नहीं किया।
हिंदी साहित्य में ग्रामकथा और नगरकथा का विवाद पुराना है। आप इनमें से किसे महत्वपूर्ण समझते हैं?
महत्वपूर्ण विवाद नहीं, लेखन होता है। नगरकथा के लेखकों में भी कुछ का लेखन महत्वपूर्ण है। हिंदी साहित्य की ट्रेजडी यह है कि इसके अधिकांश लेखक शहरी मध्यमवर्ग से आते हैं। जबकि भारत की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांव में है। यही आबादी असली भारत है।
प्रेमचंद हिंदी के पहले महत्वपूर्ण ग्राम-कथाकार हैं। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन की दरिद्रता, सरलता और साथ ही कांइयापन सहज और सरल रूप में प्रकट हुआ है। प्रेमचंद के पास शिल्प का चमत्कार नहीं, लेकिन उनकी सरलता में ही शिल्प का सर्वोत्तम रूप मिलता है। उनके यहां शिल्प आरोपित नहीं, बल्कि सहज प्रस्फुटित है।
प्रेमचंद के देहावसान के पश्‍चात कथा के रथ की बागडोर जिनके हाथों में आई, वे गांव के नहीं, शहरी मध्यमवर्ग के लेखक थे। जैनेंद्र, अज्ञेय और इलाचंद्र जोशी जैसे व्यक्तिवादी लेखकों के सामने प्रेमचंद एक पहाड़ की तरह खड़े थे। उसे लांघे बिना वे अपना मार्ग नहीं बना सकते थे। प्रेमचंद को लांघना कठिन था। इसलिए उपरोक्त लेखकों ने उस पहाड़ को छोटा बनाने की प्र्रक्रिया शुरू कर दी। प्रेमचंद पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए। वह कलाकार नहीं, केवल मुंशी थे। ज्यादा-से-ज्यादा उन्हें समाज सुधारक कहा जा सकता है लेखक तो कतई नहीं।
प्रेमचंद-निंदा की यह प्रक्रिया कई वर्ष चलती रही और पाठकों में प्रेमचंद का प्रभाव गिरता-बढ़ता रहा। प्रेमचंद के निधन के करीब 18 वर्ष बाद ‘मैला आंचल’ का प्रकाशन हिंदी साहित्य की एक विस्फोटक घटना थी। फणीश्‍वरनाथ रेणु के माध्यम से कथा-प्रवाह एक बार फिर असली भारत की ओर मुड़ा। रेणु के साथ प्रेमचंद पर नए सिरे से गंभीर चर्चा शुरू हुई और उनका महत्व निरंतर बढ़ता गया।
साहित्य जगत में अश्‍लीलता को लेकर कई बार विवाद उठे हैं। श्‍लील और अश्‍लील के बारे में आपका क्या मत हैं?
अश्‍लीलता का प्रश्‍न उतना ही पुराना है, जितना स्वयं साहित्य। वास्तव में अश्‍लीलता साहित्य में नहीं बल्कि साहित्यकार की मानसिकता में हो सकती है। अगर रचनाकार की मानसिकता स्वस्थ व समाजपरक है तो नग्न चित्रण भी अश्‍लील न होकर सार्थक और सही मायनों में साहित्य का उद्देश्य पूरा करनेवाला हो जाता है। एलेक्जेंडर कुप्रिन का ‘यामा-द-पिट’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। स्त्री-पुरुष संबधों का जैसा नग्न चित्रण इस उपन्यास में है वैसा साहित्य में बहुत कम हुआ है। लेकिन इस नग्न चित्रण के बावजूद जो मानवीय संवेदना ‘यामा-द-पिट’ में है, वह उसे विश्‍व के श्रेष्ठतम उपन्यासों की कतार में ला खड़ा करती है।
गोर्की की कहानी ‘एक इंसान का जन्म’ में नग्न चित्रण है, लेकिन पाठक क्षणभर के लिए भी कहीं अश्‍लीलता अनुभव नहीं करता।
जगदम्बाप्रसाद दीक्षित की कहानी ‘जिंदगी और गदंगी’ में भरपूर नग्नता होने के बाद भी लेशमात्र अश्‍लीलता नहीं है। निर्णायक बिंदु नग्नता नहीं, लेखक की मानसिकता ही है।
साहित्यिक पुरस्कार देने में राजनीति होती है। इससे आप कहां तक सहमत हैं?
पुरस्कारों में राजनीति का दखल होता है, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है। नोबेल पुरस्कार से लेकर ज्ञानपीठ और दूसरे देसी पुरस्कारों तक में बार-बार सामने आया है कि उनके पीछे एक निश्‍चि‍त विचारधारा को पुरस्कृत करना और निहित स्वार्थों की पूर्ति करना होता है।
सर्वाधिक कु चर्चित नोबेल के बारे में मान्य सत्य है कि वामपंथी विचारधारा के महानतम लेखकों को यह पुरस्कार नहीं मिला। इन लेखकों में गोर्की, चेखव, दोस्तोवस्की जैसे लेखक भी हैं जो अनेक नोबेल पुरस्कार विजेताओं और स्वयं नोबेल पुरस्कारों से भी भारी पड़ते हैं।
रूसी लेखकों में तोल्सतोय जैसे महान लेखक की भी उपेक्षा की गई। इसके विपरीत कई दहाई ऐसे लेखकों को पुरस्कार दिए गए जिनका आज कोई नाम भी नहीं लेता।
भारतीय परिपे्रक्ष्य में केवल रवीन्द्रनाथ टैगोर को और अब अर्धभारतीय नायपाल को इस पुरस्कार से नवाजा गया, जबकि इसी दौर के शरत, प्रेमचंद, मंटो और तकषि शिवशंकर पिल्लै जैसे महान भारतीय लेखकों, जिनका योगदान रवीन्द्रनाथ टैगोर से अधिक ही है, को यह पुरस्कार नहीं मिला। कारण- रवीन्द्रनाथ का विराट जनसंपर्क और उनकी ऋषितुल्य वेशभूषा का प्रदर्शन था।
नोबेल के अतिरिक्त भारतीय पुरस्कारों में भी यही रणनीति और कूटनीति काम करती रही है। अशोक वाजपेयी और सामान्य कोटि के कवियों को बड़े-से-बड़े पुरस्कार मिलते हैं और उनके समकालीन निश्‍चि‍त रूप से अधिक महत्वपूर्ण रचनाकार उपेक्षित रह जाते हैं।
असल में जो रचनाकार सही मायनों में रचनाकार हैं, उन्हें पुरस्कारों की अपेक्षा नहीं, उपेक्षा करनी चाहिए। वास्तविक पुरस्कारदाता पाठक होता है। पाठक जिसे स्वीकार कर ले, वही सच्चा लेखक है और पाठक का प्यार ही सच्चा पुरस्कार है।
हिंदी साहित्य के पांच महान साहित्यकार?
पांच नाम लेना कठिन है। फिर भी हिंदी के महान साहित्यकारों में प्रेमचंद, यशपाल, निराला, रेणु, नागार्जुन, मुक्तिबोध हैं।
किन लेखकों ने आपको प्रभावित किया?
उपरोक्त लेखकों के अतिरिक्त तोल्सतोय, चेखव, गोर्की, मोपासां, लू-शुन, कामू, हेमिंग्वे, कालिन विल्सन आदि ने किसी-न-किसी रूप में प्रभावित किया।
साहित्य में आलोचक की क्या भूमिका है?
साहित्य में आलोचक की वही भूमिका है, जो समाज में पुलिस की।

हिन्दी कहानी में रीतिकाल अब शुरू हुआ है : विद्यासागर नौटियाल


विद्यासागर नौटियाल कथा लेखन का सुपरिचित नाम हैं। ‘सूरज सबका है’ और ‘उत्तर बायां है’ जैसे उपन्यासों के लिए चर्चित विद्यासागर नौटियाल ने लेखन 1949 में प्रारम्भ किया था और नयी कहानी के उर्वर दिनों में ‘भैंस का कट्या’ जैसी अविस्मरणीय कहानी लिखी। फिर वे अरसे तक लेखन से दूर रहे। सन् 1990 में उन्होंने दुबारा लेखन की दुनिया में दस्तक दी और इसके बाद उन्होंने उपन्यासों, कहानियों के साथ ‘मोहन गाता जाएगा’ जैसा आत्मकथ्य भी लिखा। उनके अब तक छह उपन्यास और तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। हाल ही में ‘यमुना के बागी बेटे’ शीर्षक से आया उनका उपन्यास एक नये विषय के साथ गम्भीर प्रयोग है। राजनीति और लेखन दोनों को अपने सिद्धान्तों और मूल्यों की कसौटी पर परखने वाले नौटियाल सामाजिक विषमताओं से लड़ना मुख्य चुनौती मानते हैं। प्रस्तुत है लेखन और समसामयिक विषयों पर उनसे युवा कथाकार पल्‍लव कुमार की बातचीत -
आपके लेखन की शुरुआत कब और कैसे हुई ?
जीवन में लेखन की शुरुआत कविताओं से हुई। कविता यानी पद्य। 1946 से ही तुकबंदी करने लगा था। लेकिन कविता कैसे लिखी जाती है इसके बारे में तब कोई जानकारी नही थी।(हंसते हुए) आज भी नहीं है।
सन् 1946 में मेरे पड़ोसी गाँव के एक विद्यार्थी मित्र लोकेन्द्र सकलानी के सुझाव पर मैने अपनी कविताओं के संग्रह की एक छोटी-सी पाण्डुलिपि तैयार की थी। हमें यह बात मालूम थी कि टिहरी जेल में एक छापाखाना भी है। हम दोनों ने जेल में जेलर से भेंट कर उस कविता संग्रह को वहाँ छपाने की बात की। जेलर ने वह कविता संग्रह अपने पास रख लिया और दूसरे दिन आने को कहा। पाण्डुलिपि जेलर के हवाले करने के बाद हम उस दिन उस पर खर्च होने वाली धनराशि को जुटाने के बारे में विचार करते रहे। जेलर ने कुछ दिनों तक कोई निर्णय नहीं दिया। हमने उससे खर्चे के बाबत पूछताछ नहीं की। लेकिन जेल के छापाखाने से कोई निश्चित निर्णय न मिल जाने तक हमने उसके बारे में किसी अन्य छात्र को जानकारी देना ठीक नहीं समझा। हमारी वह योजना कामयाब नहीं हो पाई। जेलर ने उस पुस्तिका को छापने में अपनी असमर्थता प्रकट कर दी थी। हमें मालूम था कि देहरादून में किताबें छपती है। लेकिन वहाँ तक जाने की हमारी सामर्थ्य नहीं थी।
और पहली कहानी ?
1950 के आसपास पहली कहानी लिखी थी- ‘मूक बलिदान’ । कहानी के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी। कहानी के तकनीकी पहलुओं के बारे में आज भी शून्य हूँ। इसलिए कहानी लिख देता हूँ पर कहानी  के बारे में कहीं लिखने से डरता हूँ। अपने अज्ञान को ढक कर रखना ठीक होता है।
प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ पढ़ी थी। कुछ कहानियाँ अंग्रेजी में कैथरीन मैन्सफील्ड और ओ. हेनरी की। विक्टर ह्यूगो का एक नाटक ‘द बिशप्स कैंडलस्टिक्स’ मंचित भी किया था। वह कहानी, जो मैंने लिखी, कॉलेज मैग्जीन में प्रकाशित हुई थी। उससे पहले सामन्ती शासन में कोई पत्रिका आदि कॉलेज में नहीं छपती थी। अपने शहर में एक परिचित नव विवाहिता की असामयिक मृत्यु की घटना ने मुझे विचलित कर दिया था। अपने अन्दर पैदा हो उठे दर्द को मैं कागज पर उतारने लगा तो वह कहानी बन गया। उसकी प्रतिलिपि मेरे पास सुरक्षित है। कॉलेज मैग्जीन के बाद उसे अन्यत्र नहीं छपवाया।
कविता के नाम पर तुकबंदी कुछ बाद तक करता रहा। 1952 में बी.एच.यू. में बी.ए. प्रथम वर्ष का विद्यार्थी बना। केदारनाथ सिंह और मैं सहपाठी तो थे ही, एक छात्रावास में भी आ लगे। केदार से बहुत जल्दी मेरी घनिष्टता हो गई। का.हि.वि. में आने से पहले यू. पी. कॉलेज बनारस में पढ़ते हुए ही केदारनाथ सिंह हिन्दी साहित्य का एक सुपरिचित कवि बन गया था। उसकी कविताएँ सुन कर मुझे लगता कि मैं किसी दूसरी दुनिया में आ लगा हूँ। उन कविताओं को सुनने के बाद मुझे महसूस होने लगा कि कविता लिखना मेरे वश की बात नहीं हैं। त्रिलोचन शास्त्री और विष्णुचन्द्र शर्मा से भी निकटता हो गई। मैं अपना ध्यान पूरी तरह कहानियों पर ही केन्द्रित करने लगा। अपने भीतर उग रहे कवि की हत्या करने का इल्जाम में जिन्दगी भर केदार पर ही थोपता रहा। आज भी मंच पर किसी कवि को दहाड़ते सुनता हूँ तो मेरे मन में यह विचार प्रबल होने लगता है कि अगर केदार की कविताएँ सुन कर आँखें न खुली होती तो मैं भी अवश्य एक सम्मेलनी कवि के रूप में ख्यात हो सकता था।
जब बी.एच.यू.आए थे तब आपके यहाँ कैसे हालात थे? टिहरी में क्या चल रहा था तब?
टिहरी एक सामंती शहर था। मैं बहुत छोटी आयु मे राज्य प्रजामण्डल द्वारा संचालित सामन्तविरोधी आन्दोलन का अंग बन चुका था। भाषण भी बहुत अच्छे देने लगा था। पहले कॉलेज की वादविवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया। फिर श्रोताविहीन जन सभाओं में बोलने लगा। जासूसों के आतंक के मारे हमारे श्रोता कहीं दूर से बहुत छुपते हुए हमारी बातें सुनते थे और वहीं से वापिस चले जाते थे। अच्छा साहित्य वहाँ नहीं मिलता था। दैनिक पत्रों में अंग्रेजी भारत की राजधानी दिल्ली से आने वाले सिर्फ ‘हिन्दुस्तान’ और ‘वीर अर्जुन’ वहाँ कहीं-कहीं दिखाई देते थे। उनको पढ़ने वालों पर भी रियासती जासूसों की कड़ी नजरें लगी रहती थीं। जो कुछ भी पढ़ने को मिल पाता मैं पढ़ लेता था। चोरी-छुपे ‘भारत भारती’ पढ़ लिया था। मधुशाला कंठस्थ हो गई थी। सामंती शासन के विरुद्ध रियासती प्रजामंडल ने भारत की आजादी से पहले और बाद में जो प्रबल स्वतंत्रता संग्राम संचालित किया, मैं उसमें आगे बढ़ कर भाग लेता रहा। उसी आंदोलन के दौरान कम्युनिस्ट नेता नागेन्द्र सकलानी के संपर्क में आ गया था। सकलानी 11 जनवरी 1948 को सामंती गोली का शिकार बने और शहीद हो गए। टिहरी रियासत 14 जनवरी 1948 को आजाद हुई। प्रजामंडल ने सामन्ती शासन को उखाड़ कर अपनी सत्ता स्थापित कर ली। पाँच महीनों के अन्दर अस्थायी प्रजामंडल शासन ने बालिग मताधिकार के आधार पर पाँच लाख की आबादी वाली रियासत के अन्दर मतदाता सूचियाँ तैयार करवा ली और आम चुनाव संपन्न करवा लिए, जिसमें महिलाओं को भी मतदान का समान अधिकार था। आजाद टिहरी में अपने जन्म के तत्काल बाद अँगूठा चूसने के बजाय तेज दौड़ लगाने वाले उस कम्युनिस्ट समर्थित शासन को भारत सरकार टेढ़ी नजरों से देखने लगी थी। उस राज्य को एक अलग राज्य के रूप में जारी रखना केन्द्र में बैठे काँग्रेसी नेताओं को खतरनाक लगने लगा था। उसे भारत में विलीन करते हुए जबर्दस्ती संयुक्त प्रान्त में मिला कर एक जिले का रूप दे दिया गया। इन तमाम तथ्यों के विस्तृत विवरण ‘मोहन गाता जाएगा’ में दिए गए हैं, जोकि मेरे अलावा मेरी रियासत के लोगों की आत्मकथा भी है।
फिर जब बी.एच.यू. में आ गए तब क्या था वहाँ ?
बनारस में मेरा संपर्क डॉ. नामवर सिंह से हुआ, जो रिसर्च करते हुए हमारी एक पीरियड लेने लगे थे। मैंने इन्हें अपनी कहानियाँ पढ़ने को दी। उन्हें कहानियाँ पसन्द आईं। मुझे प्रोत्साहन मिलने लगा। प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें नियमित तौर पर होती थी। उनमें काशी के अधिकतर साहित्यकार भाग लेते थे। प्रलेस के मंत्री नामवर सिंह थे और विष्णुचन्द्र शर्मा और मैं सहायक मंत्री। त्रिलोचन शास्त्री, चन्द्रबली सिंह, जगत शंखधर, ठाकुरप्रसाद सिंह जैसे लोगों से लगातार संपर्क भी मेरे लेखन में सहायक होता था। शिवप्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र, डॉ. बच्चनसिंह, डॉ. रामअवध द्विवेदी हमारे अध्यापक थे। नामवर सिंह के साथ रहने के कारण डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी मुझे भी परिवार का सदस्य मानने लगे थे। केदारनाथ सिंह और विश्‍वनाथ त्रिपाठी मेरे सहपाठी थे। बाद में विजयमोहन सिंह भी बी.एच.यू. में आए। लगातार प्रलेस की गोष्ठियों में अपनी रचनाएँ सुनाने पर उपस्थित साहित्यकारों के सुझाव बहुत मददगार साबित होते थे।
सन् 1953 में मैने ‘भैंस का कट्या‘ कहानी लिखी। उन दिनों हिन्दी साहित्य में ‘कल्पना’ प्रतिष्ठित पत्रिका थी। मैने कहानी ‘कल्पना’ को भेज दी। 1954 की ‘कल्पना’ में उसके प्रकाशित होते ही मैं काशी से बाहर भी हिन्दी का एक परिचित कथाकार हो गया। तब काशी और प्रयाग के साहित्यकारों का आपस में बहुत घनिष्ट संपर्क रहता था। प्रयाग जाने पर मैंने मार्कण्डेय से भेंट की। उन्हें ‘भैंस का कट्या’ बहुत अच्छी लगी थी। भैरव प्रसाद गुप्त और श्यामू संन्यासी से भी भेंट हुई। ‘कहानी’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू होते ही मेरी कहानियाँ उसमें भी छपने लगी। मेरी कहानियों की पत्र-पत्रिकाओं में खूब चर्चा होने लगी।
मार्क्सवादी दर्शन के संपर्क में कैसे आए ?
टिहरी रियासत में स्वतंत्रता संग्राम में कम्युनिस्ट नेता नागेन्द्र सकलानी के संपर्क में आ गया था। बहुत बाद में भारत-चीन सीमा विवाद के दौरान सन् 1962 में गिरफ्तार होने पर 1964 में लिखी मेरी एक जेल डायरी इस बीच पुराने कागजात मे मिली है। उसमें नागेन्द्र सकलानी के बारे में भी जिक्र आया है। उन्हीं के सम्पर्क ने मुझे वामपंथ से जोड़ा और मैंने मार्क्सवादी दर्शन के महत्व को भी समझा।
पहल में एक बार आपका संक्षिप्त परिचय छपा था कि आपके जीवन का बड़ा हिस्सा आजाद हिन्दुस्तान की जेलों में बीता। यह कैसे-क्यों हुआ?
आम जनता के रोजमर्रा के सवालों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से लगातार संघर्ष किए जाते थे। उनमें भाग लेते रहने के कारण जेल भी जाना पड़ता था। मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का छात्र था तब मुदालियर कमीशन की रिपोर्ट का विरोध करने के कारण भी जेलों में रहना पड़ा।
पहला उपन्यास 1959 में छपने के बाद दूसरी किताब जो कहानियाँ की थी 1984 में आई। इतने बड़े अंतराल का क्या कारण था ?
उपन्यास ‘उलझे रिश्ते’ का प्रकाशन बड़े नाटकीय ढंग से हुआ था। उन दिनों मैं फीलखाने में कुशवाहा कान्त और गोविन्दसिंह खेमे के एक लेखक ज्वालाप्रसाद केशर के घर पर किरायेदार के तौर पर रहने लगा था। आंदोलन के कारण विश्‍वविद्यालय के अधिकारियों ने मुझे हॉस्टल से बाहर धकेल दिया था। केशर मेरा मित्र था। वह मात्र लेखन पर आश्रित रहता था। उसकी पत्नी से उसकी नहीं पटती थी। वह अपने मायके में ही रहने लगी थी। माँ की आयु अधिक होने के साथ उनकी देखने की शक्ति भी समाप्त  हो चुकी थी। नौटियाल न कह पाने के कारण वे मुझे मोटिया कह कर पुकारती थी। नामवर सिंह की माँ भी मेरा नाम उच्चारित नहीं कर पाती थीं। काशीनाथ सिंह ने इस बात का अपने किसी संस्मरण में जिक्र किया है। एक बार ऐसा हुआ कि कई महीनों के बीत जाने के बाद भी मैं माई के पास किराये की रकम जमा नहीं कर पाया। तब माई की हालत (दयनीय, क्रोध की नहीं) देख कर मुझसे ज्यादा चिन्ता केशर को होने लगी। वह मेरे बहुत अच्छे मित्रों में था। हलकी चीजें लिखता था, लेकिन हलके दिल का आदमी नहीं था। मुझे अपने घर से निकाल बाहर कर देने की बात उसके मन में कभी नहीं आई। केशर के खिलाफ बनारस की किसी अदालत में अश्‍लील लेखन का एक मुकदमा चल रहा था। मजिस्ट्रेट ने हिन्दी में लिखी केशर की तथाकथित अश्‍लील मानी जा रही रचनाओं के अंश, जो बचाव में पेश किए गए, पढ़ने से मना कर दिया जब तक कि उनका अंग्रेजी अनुवाद भी पेश न कर दिया जाय। उस शाम केशर बहुत परेशान हालत में घर लौटा। मेरे पूछने पर उसने पूरी बात बता दी। मैने उन अंशों का रात भर अंग्रेजी में अनुवाद कर दूसरे दिन सुबह केशर को दे दिया। मैंने उन दिनों विश्‍वविद्यालय के छात्र जीवन से संबंधित एक छोटा उपन्यास लिख कर पूरा किया था। केशर के उपन्यास इलाहाबाद के रूपसी प्रकाशन से भी छपते थे। अपनी परेशानियों में उलझा हुआ वह एक दिन सुबह मेरे कमरे में आया। कहीं बाहर जाने की तैयारी में था। उसने पूछा नौटियाल, तुम जो उपन्यास लिख रहे थे वह पूरा हो गया? मैंने उपन्यास उसके हवाले कर दिया। इलाहाबाद जा रहा हूँ। देखें इसका किसी प्रकाशक से कुछ पैसा मिल जाय तो दे दूँगा। उस कमरे में हम दो विद्यार्थी रहते थे। मैं और टिहरी निवासी मेरे मित्र बरफसिंह रावत। दोनों का.हि.वि. से निष्कासित थे। बरफसिंह रावत ने आलमारी से निकाल कर उपन्यास की पाण्डुलिपि केशर के हवाले कर दी। इलाहाबाद से लौटने के बाद केशर ने मुझे पैसा दिया। माई को किराए की अदायगी कर दी गई। कुछ अतिरिक्‍त रुपये मेरी जेब में भी आ लगे। वह उपन्यास रूपसी प्रकाशन से छापा था। उसकी कोई प्रति अब उपलब्ध नहीं है। टिहरी स्थित मेरे घर से किसी जासूस ने जानबूझ कर उसे गायब किया, ऐसा मुझे लगातार संदेह रहा है। उपन्यास की कथा ऐसी थी कि अपनी पढ़ाई समाप्त कर विश्‍वविद्यालय छोड़ने के दस साल बाद एक नौजवान के मन में छात्र जीवन के अपने मित्रों के हालात को जानने की जिज्ञासा होती है। प्रत्येक मित्र से उसके संबंध अलग-अलग किस्म के थे। उनमें से कुछ को वह उनके असली नाम से पुकारने के बजाय, अपने द्वारा या मित्र-मंडली के द्वारा दिए गए नामों से संबोधित करता था। कोई रूदिन था, कोई बज़ारोव। उन्हीं संबोधनों का उपयोग करते हुए वह उन सबको पत्र भेजता है। अधिकांश पत्र वापिस लौट आते है। डेड लेटर आफिस की इस टिप्पणी के साथ कि पाने वाले का पता नहीं लग रहा है। (असली बात जो लेखक दर्शाना चाहता था वह यह थी कि वे समाज में खो गए हैं) वापिस लौट आए वे पत्र मूल में उपन्यास में दे दिए गए। कुछ पत्रों के उत्तर प्राप्त होते हैं। वे उत्तर भी शामिल कर दिए गए। वे उत्तर कुछ-कुछ खुलासा करते हैं कि मूल पत्र, जिसका जवाब लिखा जा रहा है, में क्या-कुछ लिखा गया होगा। विश्‍वविद्यालय के छात्र जीवन पर आधारित यह अनुपलब्ध उपन्यास मेरे कुल लेखन के

बच्चों के दोस्त होकर लिखें, उपदेशक बनकर नहीं: प्रकाश मनु


कथाकार प्रकाश मनु को उनके उपन्‍यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर साहित्‍य अकादेमी का हिंदी के लि‍ए पहला बाल साहित्‍य पुरस्‍कार दिया जाएगा। उन्‍हें यह पुरस्‍कार 14 नवंबर को प्रदान किया जाएगा। उनसे युवा कथाकार उमेश कुमार की बातचीत के अंश-
चलिए, बचपन से ही शुरुआत करते हैं। आप अपने जन्म और प्रांरभिक तथा उच्च शिक्षा के बारे में कुछ बताएं? और यह भी बताएं कि जिंदगी के अब तक के सफर में आपने क्या खोया, क्या पाया?
मेरा जन्म शिकोहाबाद में हुआ। यह उत्तर प्रदेश में है, फिरोजाबाद के एकदम नजदीक। पहले शिकोहाबाद मैनपुरी जिले में आता था, आजकल फिरोजाबाद जिले में है। वही फिरोजाबाद जहां घर-घर चूडिय़ां बनती हैं और इसीलिए ‘सुहागनगरी’ भी जिसे बोलते हैं। शिकोहाबाद में बल्बों की बड़ी फैक्टरी है, जिसमें फिलिप्स, बजाज समेत बड़ी-बड़ी कंपनियों के बल्ब बनते हैं। इसके बावजूद शिकोहाबाद एकदम कस्बाई शहर है। जिसमें शहराती संस्कृति और गंवाई संस्कृति साथ-साथ चलती हैं।
गंवई संस्कृति के बावजूद शिकोहाबाद की प्रसिद्धि शुरू से इस रूप में रही कि वह शिक्षा में बहुत बढ़ा-चढ़ा शहर है। फिर मैं तो शायद किताबी कीड़ा ही था और बचपन से इस कदर पढऩे-लिखने का चस्का था कि अगर खाने-पीने का सामान लिफाफे या पुडिय़ा में आया तो उसे भी खोलकर पढ़ता था कि देखें, इसमें क्या लिखा है? और आज साठ वर्ष पूरे कर लेने पर भी वह नशा कहिए या पागलपन कहिए जरा भी कम नहीं हुआ। बल्कि कभी-कभी मैं दोस्तों से कहा करता हूं कि पढ़ते-पढ़ते मेरे प्राण निकल जाएं, इससे बेहतर मृत्यु की कल्पना मैं नहीं कर पाता। बचपन में पढ़ाई-लिखाई में काफी अच्छा था। इसीलिए घर वालों का सपना था कि मैं पढ़-लिखकर इंजीनियर बनूं। मेरे बड़े भाई साहब बल्बों की फैक्टरी हिंदी लैंप्स में बड़े पद पर थे। इंजीनियर थे। इसीलिए यह रास्ता मेरे लिए शायद सुगम होता। मां-बाप का भी यही सपना था। हैरानी की बात यह है कि माता-पिता एकदम अनपढ़ थे, लेकिन बच्चों को पढ़ाने में उनका उत्साह अनथक था।
बारहवीं के बाद इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया। पर मैंने बहाना बनाया कि मुझे तो इलेक्ट्रोनिक्स चाहिए, जबकि यहां मुझे इलेक्ट्रिकल मिल रहा है तो मैं नहीं जाऊंगा। इसलिए कि इंजीनियर नहीं बनना चाहता था। मेरे भाई साहब इंजीनियर थे तो हमेशा बढिय़ा पेंट-कोट क्रीज में रहते थे। मुझे यह नागवार लगता था। मुझे ढीला-ढाला रहना पसंद था। तो सोचा प्रोफेसर हो जाऊंगा। प्रोफेसर तो ढीले-ढाले भी बढिय़ा लगते हैं। लेकिन फिर एम.एस-सी तक आते-आते लगा मेरा रास्ता तो कुछ और है। फिर हिंदी से एम.ए., पी.एच.डी। घर वाले कह रहे थे कि क्या पागल हो गए हो, हिंदी से एम.ए. क्यों करना चाहते हो? पर मैंने घर में अनशन किया। मां मेरे साथ थीं। और तब से जो रास्ता पाया आज भी दीवानों की तरह उसी रास्ते पर चला चल रहा हूं। शुरू के कुछ वर्ष प्राध्यापिकी में बीते फिर कोई तीन दशक पत्रकारिता में। लेकिन मेरे लिए तो जिंदगी का मतलब था लिखन…लिखना और बस लिखना। या कहिए पढऩा और लिखना। इसमें क्या पाया, क्या खोया इस बारे में मैंने कभी ज्यादा नहीं सोचा।



लेखन के प्रति कब और कैसे रुझान हुआ? शुरू में किस तरह की चीजें आपने लिखीं?
बहुत छुटपन में मां जो कहानियां सुनाया करती थीं उनका मन पर बड़ा गहरा अक्स पड़ता था। कहीं न कहीं मन में लिखने का पहला बीज शायद तभी पड़ा होगा। फिर बड़ा हुआ तो पाठ्य पुस्तकों में शामिल कविता, कहानियां ऐसी थीं जिनसे साहित्य की दुनिया का प्रथम द्वार खुला। उन दिनों हमारे यहां हिंदी की एक बड़ी अच्छी सहायक पुस्तक थी ‘भाषा भास्कर’ जिसे हमारे यहां के हिंदी के बड़े ही अनुरागी अध्यापक ने लिखा था। शास्त्री जी करके हम उन्हें जानते थे। उस पुस्तक में मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, प्रसाद, पंत, निराला की ऐसी सुंदर कविताएं उद्धृत की गई थीं कि मुझे याद है सुबह-सुबह उठकर मैं उन्हें दोहाराता था  तो मन आनंद से भर उठता था। मैथिलीशरण गुप्त की ‘साकेत’ की ये पंक्तियां जिनमें कैकेई के पश्‍चात्ताप की गहरी छाया है, ‘यह सच है तो अब लौट चलो घर भैया, अपराधिन मैं हूं तात तुम्हारी मैया…!’ सबसे पहले इसी पुस्तक में पढऩे को मिलीं। और ये आज तक मुझे विचलित करती हैं। बालकृष्ण शर्मा नवीन की ‘लपक चाटते झूठे पत्ते जिस दिन देखा मैंने नर को, उस दिन सोचा क्यों न लगा दूं, आज आग इस दुनिया भर को’ जैसी पंक्तियां पहले-पहल तभी पढऩे को मिलीं। और मुझे लगा कि साहित्य तो बहुत बड़ी चीज है। वह दिलों को मथ डालता है और हमारी सोच और व्यक्तित्व बदल सकता है। बस, तभी थोड़ा-थोड़ा लिखना शुरू हुआ। चीनी हमले के विरोध में कुछ पंक्तियां लिखी थीं, लेकिन कुछ आगे चलकर एक मजदूर कि जिंदगी या भिखारिन की दिवाली पर लिखी गई कविताएं शायद कुछ बेहतर थीं। धीरे-धीरे, जैसे-जैसे बढ़ता गया, लिखने की नई-नई दिशाएं और रास्ते मिलते गए। शुरुआत कविताओं से ही हुई। मुक्त छंद कविताओं से। फिर कुछ गीत-मुक्तक लिखे गए, कहानियां लिखी गईं। लेकिन असली बदलाव आया जब मैंने मुक्तिबोध, रघुबीर सहाय और बाद के कवियों को पढ़ा तो लगा कि हां, अब रास्ता साफ हो रहा है। अब शायद मैं कुछ-कुछ समझ पा रहा हूं कि मुझे क्या लिखना है, किसके लिए लिखना और वह भीतर की कैसी तड़प है जो शब्दों में उतरना चाहती है? फिर तो कविताओं के साथ-साथ कहानियां और गद्य भी काफी लिखा गया। ‘यह जो दिल्ली’, ‘कथा-सर्कस’ और ‘पापा के जाने के बाद’ सरीखे उपन्यास सामने आए। और अभी बहुत कुछ है जो भीतर चल रहा है। कह नहीं सकता कि वह कब किस शक्ल में सामने आए? बच्चों के लिए भी अभी बहुत कुछ लिखने का मन है। देखिए, कब हो पाता है।

प्रकाश मनु पत्नी डॉक्टर सुनीता के साथ
मूल नाम बदलकर आप प्रकाश मनु कब हुए? और इसकी जरूरत क्यों महसूस की आपने?
मेरा पारिवारिक नाम है चंद्रप्रकाश विग। पर मुझे यह शुरू से ही ज्यादा पसंद नहीं है। मुझे लगता था चंद्रप्रकाश विग तो कोई दुनियादार आदमी हो सकता है, जो पढ़-लिख के अच्छे नंबर लाता है, नौकरी करता है या दो-चार पैसे कमाता है। लेकिन मेरे भीतर जो लिखने वाला शख्स है, वह चंद्रप्रकाश विग नहीं हो सकता। क्योंकि वह थोड़ा अलग और काफी गैर-दुनियादार किस्म का व्यक्ति है। तो शुरू से ही इस नाम को बदलने की कोशिशों में जुट गया। शुरू में जब मजदूरों के दर्द और शोषण की विद्रोही कविताएं ज्यादा लिख रहा था, तो मन में जाने कैसे ‘रुद्र’ की इमेज आई और मैं चंद्रप्रकाश विग से चंद्रप्रकाश रुद्र हो गया। कई वर्षों तक चंद्रप्रकाश रुद्र ही रहा। मेरी कई कविताएं इस नाम से छपीं। और एक संपादित पुस्तक ‘रोशनी के बीज’ जिसमे कुछ नए उभरते कवियों के साथ-साथ रामविलास शर्मा जैसे दिग्गज कवियों की कविताएं भी थीं। बाद में जब रिसर्च के सिलसिले में कुरुक्षेत्र गया तो लिखने का मिजाज थोड़ा बदला, मेरा अपना मन भी। जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ का मन पर गहरा असर था। तो उनके उथल-पुथल और द्वंद्व भरे नायक मनु में मुझे कुछ ऐसा नजर आया जो काफी कुछ मेरे जैसा था। मनु में सृष्टि के द्वंद्व की पीड़ा थी और अच्छे और बुरे का संगम भी। मनु मानो हर मनुष्य का रुपक है, जिसमें उसकी अच्छाइयों और बुराइयों में एक महाभारत निरंतर चलता है। मुझे यह मनु भा गया। और फिर चंद्रप्रकाश रुद्र का रुद्र गायब हुआ तो चंद्र भी हट गया। और मैं प्रकाश मनु हो गया। मुझे लगता था बहुत बड़े नाम की बजाय एक छोटा सा नाम अच्छा है। इसीलिए शायद मुझे प्रकाश मनु अच्छा लगा होगा। और आज तो मूल नाम की बजाय इसी नाम से पुकारा जाना मुझे अच्छा लगता है।
बचपन की कोई खट्ठी-मीठी याद?
बहुत सी यादें हैं, पर उनमें एक ऐसी है कि उसे आज तक भुला नहीं पाया। हुआ यह कि कक्षा नौ में हमें अंग्रेजी पढ़ाते थे राजनाथ सारस्वत। वे कैसे थे, यह बताना मुश्किल है। बस इतना बता सकता हूं कि उनके आगे अपने को अच्छे-अच्छे खां समझने वाले दादा किस्म के लड़के भी थर्राया करते थे। वे कक्षा में जिन बच्चों को बहुत प्यार करते थे और योग्य समझते थे, उनमें मैं भी था। पर एक बार मैं भी उनके गुस्से की चपेट में आ गया। हुआ यह कि एक बार उन्होंने कुछ होमवर्क दिया था। बीच में लंबी छुट्टियां आ गईं, तो उसे पूरा करना मुझे याद नहीं रहा। और सच तो यह है कि क्लास में किसी को वह याद नहीं रहा। उन्होंने पूरी क्लास को मुर्गा बनने की सजा दे दी। सारे मुर्गा बन गए, पर मैं नहीं बना। मेरा कहना था कि आप मुझे जितना भी चाहें मार लीजिए, पर मुर्गा मैं नहीं बनूंगा। इस हुक्मउदूली से वे कितना तिलमिलाए होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है। गुस्से में उन्होंने कहा कि अगर मेरा कहना नहीं मानते हो, तो क्लास से निकल जाओ। पर मैं इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ। उनके दो पीरियड पड़ते थे और दोनों पीरियड में उस दिन पढ़ाई नहीं हुई। बस यही नाटक चलता रहा। और मैं न मुर्गा बना न क्लास से बाहर जाने के लिए तैयार हुआ। आखिर में उन्होंने कहा कि अच्छा, अगर सभी विद्यार्थी कह दें कि विग को छोड़ दो  तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा। उनका यह कहते ही एक साथ पुकार उठी, ”छोड़ दीजिए सर, छोड़ दीजिए!’’ और तब मैं छूटा। उस दिन की मेरी खुशी और रोमांच की आप कल्पना नहीं कर सकते। मैं मानो आकाश में सैर कर रहा था और लग रहा था कि मैं तो अर्जुन हूं, जिसने महाभारत जीत लिया है। आज भी इस घटना को याद करता हूं, तो मैं खुशी और रोमांच से भर जाता हूं।
आपने बड़ों के लिए काफी महत्वपूर्ण रचनाएं दी हैं। आपके यह जो दिल्ली है’, ‘कथा-सकर्स’ और पापा के जाने के बाद’ उपन्यास बहुत प्रसिद्ध हुए। इसके बावजूद आपका रुझान बाल साहित्य की तरफ ज्यादा दिखाई देता है। ऐसा क्यों?
इसका श्रेय तो सबसे अधिक ‘नंदन’ पत्रिका को ही जाता है। नंदन में बच्चों के लिए लिखने-पढऩे और बच्चों से सीधे संवाद के इतने मौके मिले कि बाल साहित्य की दुनिया के बहुत सारे अनजाने क्षितिज मेरे आगे उदघाटित हुए। मुझे लगा अभी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और बच्चों के लिए लिखना कितना सुख, आनंद और रोमांच से भरा है, यह मैंने तब ही जाना। शायद यही वजह है कि बच्चों के लिए लिखना इधर कुछ अधिक हुआ। और बाल साहित्य में अलग-अलग विधाओं की मेरी कोई पचास किताबें, जिनमें बच्चों के लिए लिखे गए उपन्यास, कविता-कहानियां और ज्ञान-विज्ञान की कहानियां भी हैं। मेरी कोशिश तो यही रही कि बच्चों के लिए जो भी लिखा जाए फिर चाहे वह ज्ञान-विज्ञान का साहित्य ही क्यों न हो, बड़ा रोचक और रसपूर्ण हो। इसी तरह कई वर्षों की मेहनत से हिंदी बाल कविता का इतिहास लिखा। और अब समूचे हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लगभग पूरा हो चुका है। जो जल्दी ही आपको पढ़ने को मिलेगा।
आपने बच्चों के लिए प्रचुर मात्रा में लिखा है। हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में आपको क्या कहना है। क्या आप इस स्थिति से संतुष्ट है?
हिंदी में बाल साहित्य की स्थिति के बारे में बात करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि एक ओर जहाँ बेहद साधारण रचनाओं का बड़ा ढेर है, वहीं इतनी अच्छी और बेहतरीन रचनाएं भी लिखी गई हैं कि देखकर चकित रह जाना पड़ता है। सर्वेश्‍वर, दामोदर अग्रवाल और डा. शेरजंग गर्ग सरीखे कवियों ने जो कविताएं लिखी हैं, वे सचमुच असाधारण और विश्‍व कविता में पांक्‍तेय हैं। इसी तरह प्रेमचंद, भूपनारायण दीक्षित, सत्यप्रकाश अग्रवाल, हरिकृष्ण देवसरे, रमेश थानवी, पंकज बिष्ट और देवेंद्र कुमार के उपन्यास हों या नई-पुरानी पीढ़ी के लेखकों द्वारा लिखी गई कहानियाँ और नाटक, गुणाकर मुले सरीखे लेखकों का बच्चों और किशोरों के लिए लिखा गया विज्ञान साहित्य—यह ऐसा नहीं है कि इसे कोई बच्चों का खेल समझ ले। इसके पीछे बड़ा तप और साधना जरूरी है। जबकि बाल साहित्य की एक मुश्किल तो यही कि अकसर लोग बिना पढ़े ही उसके बारे में फतवे देने लगते हैं। और जानकारी का हाल यह है कि हिंदी का पहला महत्वपूर्ण बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ प्रेमचंद ने लिखा था और वह भी अपनी मृत्यु से थोड़ा ही पहले, यही लोगों को नहीं पता। बाल साहित्य का यह कितना बड़ा गौरव है कि इसकी उपन्यास विधा का प्रारंभ प्रेमचंद ने किया था 1936 में, यह बाल साहित्य के लेखकों को ही नहीं पता। इसी तरह प्रेमचंद ने बच्चों के लिए खास तौर से जो कहानियाँ लिखी थीं, ‘जंगल की कहानियाँ’, वे इतनी रोचक हैं कि क्या कहा जाए? पर उन पर ही किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो फिर बाल साहित्य की चिंता कौन करे? इसी तरह हिंदी के एक से दिग्गज कवियों ने बच्चों के लिए कविताएं लिखीं, इनमें एक ओर पंत और महादेवी तो दूसरी ओर भवानी भाई,  प्रभाकर माचवे,  भारत भूषण और रघुवीर सहाय सरीखे कवि हैं। ऐसे ही मोहन राकेश, कमलेश्‍वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सरीखे लेखकों की बाल कहानियों का अपना रंग है। पर इसका क्या किया जाए कि इन सबको एक बार पढ़ लेने की बजाय लोग बार-बार यही सवाल पूछते हैं कि बाल साहित्य में लिखा क्या जा रहा है और उसे हम क्यों महत्व दें? बाल साहित्य में अभी बहुत सारे क्षेत्रों में काम होना बाकी है। पर बाल साहित्य की मौजूदा हालत ऐसी भी नहीं है कि उस पर आप दया दिखाएं।

प्रकाश मनु साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी के साथ
बच्चों के लिए लिखते समय किन बातों का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए?
मेरे खयाल से बच्चों के लिए लिखते समय बस एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम जो कुछ लिखें, बच्चों के दोस्त होकर लिखें, उपदेशक बनकर नहीं। एक लंबे अरसे से बच्चों के लिए लिखते हुए और ‘नंदन’ पत्रिका में कोई ढाई दशक गुजारने के बाद जो बात मैं समझ पाया, वह यह कि बच्चे उपदेशों से घृणा करते हैं। लिहाजा आप बच्चों के लिए जो कुछ भी लिखना चाहें या उन्हें कुछ भी बताना चाहें, अगर आप खेल-खेल में उन्हें नहीं बता पाते, तो वह निरर्थक और बेकार है। इसी तरह लीक पीटते रहने की बजाय कुछ नया लिखें, तो वही सार्थक है। इसके लिए ज्यादा अच्छा है कि अपने बचपन की दुनिया में जाएं। वहाँ हमेशा एक जादुई दुनिया आपका इंतजार कर रही होती है, जहां बहुत कुछ नया, हैरतअंगेज पर साथ ही साथ मानीखेज भी है।
भारतीय भाषाओं विशेष तौर से हिंदी में श्रेष्ठ बाल साहित्य का अभाव दिखाई देता है। ऐसा क्यों?
भाई, इस सवाल का जवाब मैं दे चुका हूँ। कम से कम हिंदी में मैं कह सकता हूं कि यहां अच्छे बाल साहित्य का कतई अभाव नहीं है। हाँ, उसके बारे में एक तो लोगों को पता कम है, फिर वह बच्चों तक उतना अधिक नहीं पहुंच पा रहा, जितना पहुंचना चाहिए था। यह मैं मानता हूं। इसके पीछे प्रकाशकों का रवैया भी जिम्मेदार है, जिन्हें अच्छे बाल साहित्य की समझ नहीं है और वे अच्छा-बुरा कुछ भी अंधाधुंध छापे जा रहे हैं और उसके प्रचार-प्रसार पर कानी कौड़ी भी खर्च नहीं करते। फिर हमारे मीडिया का रवैया भी कम दोषी नहीं है, जिसके कारण बाल साहित्य की अच्छी किताबों की चर्चा नहीं हो पाती। उनकी समीक्षा वगैरह का कोई मंच तो है ही नहीं। तो लोगों को पता कैसे लगेगा कि अच्छा क्या लिखा जा रहा है? इस चक्कर में अच्छा और बुरा गड्डमड्ड हो रहा है और लोग बगैर सोचे, बगैर पढ़े बाल साहित्य के बारे में कुछ फतवा जारी करने के गोरखधंधे में लगे हैं।
आप लंबे समय तक बच्चों की पत्रिका से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों की रुचि में किस तरह का बदलाव आ रहा है?
सबसे पहली बात तो यह कि आज का बच्चा पहले की तुलना में कहीं अधिक सचेत बच्चा है। पहले बच्चों में जो इनोसेंस या अबोधता थी, इधर के बच्चे में वह थोड़ी कम है, पर उसमें आसपास की दुनिया को देखने और सोचने-समझने की दृष्टि कहीं अधिक विकसित है। इस कारण बच्चा ऐसी चीजों में अधिक रुचि लेता है, जिसमें मनोरंजक ढंग से अच्छी और उपयोगी जानकारी दी गई हो। इसी तरह राजा-रानी की कोरी कल्पना की कहानियों की बजाय आज के बच्चे को ऐसी कहानियाँ कहीं अधिक रुचती हैं जिनमें उस जैसा ही कोई छोटा बच्चा केंद्र में हो और उसकी किसी छोटी-बड़ी मुश्किल पर कहानी गढ़ी गई हो। हाँ, कुछ लोग कहते हैं कि आज के बच्चे की दुनिया बदल गई है, इसलिए उसे फंतासी या परीकथाएं नहीं, सिर्फ यथार्थ की कहानियाँ देनी चाहिए पढऩे को। पर मेरा अनुभव है कि बच्चे को जादू या फंतासी अच्छी लगती है और किसी भी विषय पर लिखी गई ऐसी जादुई कहानियाँ, जो खुद में एक नया और ताजा विचार भी लिए हों, बच्चे को बहुत लुभाती हैं। उससे उसे रिलीफ भी मिलता है और अपनी समस्या से निकलने का रास्ता भी। हालांकि बच्चों के लिए यथार्थ पर कहानियां भी जरूर लिखी जानी चाहिए, पर वे सार्थक तभी होंगी जब उनमें किस्सागोई और कथा-रस हो।
अकसर कहा जाता है कि इस तकनीकी युग में बचपन खो सा गया है। बच्चा जन्म लेते ही जल्दी से जल्दी प्रौढ़ हो जाना चाहता है। इस बारे में आप क्या कहेंगे?
हाँ, यह बात तो ठीक है कि आज का बच्चा जल्दी से जल्दी प्रौढ़ बन रहा है और बचपन खो सा गया है। पर बच्चा प्रौढ़ बनना नहीं चाहता, बच्चे को प्रौढ़ बनाया जा रहा है। कहना चाहिए कि उससे जबरन उसका बचपन छीना जा रहा है। उसके कंधे पर भारी-भरकम बस्ता लादकर और घड़ी की सूइयों पर टंगी जिंदगी के बीच उसे कीलित करके उसका बचपन उससे छीना जा रहा है। बल्कि सच तो यह है कि कभी-कभी मुझे लगता है, हम सब अपराधी हैं जिनके सिर पर बच्चे से उसका बचपन छीनने का बड़ा भारी अपराध है। इसकी क्या सजा हो, मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाता, पर यह बेशक बहुत बड़ा और अक्षम्य गुनाह है। कोई भी ऐसा बच्चा नहीं है जो तबीयत से खेलना-कूदना और अपनी मनपसंद किताबें-पत्रिकाएं पढऩा न चाहता हो। बच्चों के लिए सारी दुनिया में एक से एक खूबसूरत फिल्में बनती हैं, एक से एक बढिय़ा सीरियल भी। पर हमने उन्हें ऐसे सीरियलों के भरोसे छोड़ दिया है, जिनमें घोर हिंसा और सेक्स के दृश्य हैं। बड़े-बच्चे सब मिलकर उन्हीं कुरुचिपूर्ण सीरियलों को देख रहे हैं। बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है और आगे चलकर वे क्या बनेंगे, सोचकर कई बार तो मैं कांप उठता हूं।
आप अपनी जो आत्मकथा लिख रहे हैं, उसके कुछ अंश पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं। लगता है, आत्मकथा में आप शिक्षा जगत और बचपन को विशेष तौर से फोकस कर रहे हैं। इसकी कोई खास वजह?
कोई खास वजह नहीं, सिवाय इसके कि हर शख्स की तरह मुझे भी अपना बचपन खासा फेसिनेट करता है। जब-जब मुश्किलों में पड़ता हूं, आहत और कमजोर महसूस करता हूं, तो जिन चीजों से मुझे ताकत मिलती है, उनमें बचपन भी है जो एक साथ जादुई रहस्यों और बड़ी संभावनाओं से भरा है। मैं जब बड़े लेखकों से मिलता हूं या उनकी रचनाओं के निकट जाता हूं तो मुझे गंगास्नान की अनुभूति होती है। इसी तरह जब बचपन की दुनिया में झांकता और गोते लगाता हूं, तब भी मुझे गंगास्नान की ही अनुभूति होती है। वैसे आत्मकथा में बचपन पर इतना फोकस क्यों है, इसका भी एक रोचक किस्सा है। हुआ यह कि एक वरिष्ठ लेखक जो मेरे परिवार की व्यावसायिक पृष्ठभूमि से भी परिचित थे, एक बार मिले तो उन्होंने एक सवाल पूछ लिया। वह सवाल यह था कि भई प्रकाश मनु, तुम ऐसे परिवार में जन्म लेकर लेखक कैसे हो गए? सवाल सुनकर मैं बड़ी देर तक चुप रहा। फिर कहा, इसका जवाब तो बड़ा लंबा हो जाएगा। और सच पूछिए, तो यह आत्मकथा उन लेखक मित्र के उसी सवाल का लंबा जवाब है। और चूंकि मेरे लेखक होने के रहस्य की कुंजी शायद मेरे लज्जालु और आत्मलीन बचपन में ही कहीं छिपी है, इसलिए आत्मकथा में भी उसी पर फोकस है। इसी तरह बचपन से ही घोर पढ़ाकू रहा और शायद अब भी हूँ। पहले साइंस से और फिर हिंदी से मास्टर की डिग्री लेने के अलावा पी-एचडी भी की। तो शिक्षा जगत से गहरा वास्ता तो होना ही था। बाद में प्राध्यापक होने पर पढ़ाया भी। तो इस सब के रिफ्लेक्स आत्मकथा में हैं। हां, जीवन का एक बड़ा हिस्सा पत्रकारिता करते बीता, तो उसकी छायाएँ भी जगह-जगह इस आत्मकथा में पडऩी ही थीं और वे पड़ीं। पर यह प्रसंग यहां रहने ही दें, तो बेहतर है। क्योंकि पत्रकारिता में जो कुछ आज देखता हूं, उसमें बहुत कुछ ऐसा है, जो मुझे बहुत दुखी और संतप्त करता है।
हाल ही में आपके ‘ठुनठुनिया’ बाल उपन्यास को साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है, इस बारे में आपकी प्रतिक्रिया क्या है।
मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या कहूं? हां, अच्छा तो लगा ही, बल्कि कहना चाहिए कि एक सुखद आश्‍चर्य सा हुआ। इसलिए कि बाल साहित्य में आप कुछ भी लिखें, उसकी चर्चा न के बराबर होती है। हां, आसपास के कुछ बच्चे हैं, जो कभी-कभी मेरी किताबें पढऩे के लिए ले जाते हैं। उनमें से एक बच्चा यह उपन्यास भी ले गया। जब वह इसे लौटाने के लिए आया, तो उसकी उत्साह से भरी लेकिन टूटी-बिखरी सी प्रतिक्रिया और आंखों में चमक, यही बस मुझे याद रह गई। …मोटे तौर से बच्चों के लिए लिखने वाला कोई भी लेखक वर्तमान अनुत्साही माहौल में ऐसी ही दो-चार निधियां संभालकर रख लेता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। पर उस उपन्यास में कुछ है, जिसने लोगों के दिलों को छुआ और उस पर लोगों का ध्यान गया, इससे खुशी तो होती ही है। पर मेरा कहना है कि हिंदी में बच्चों के लिए लिखी गई एक से एक अच्छी, सार्थक और बड़ी रचनाएं हैं, जिन्हें सामान्य रचनाओं की एक बड़ी भीड़ से अलगाना जरूरी है। इस पुरस्कार के साथ-साथ अच्छे आलोचना ग्रंथों से यह काम हो सकता है और होना चाहिए। इसके बाद शायद हिंदी बाल साहित्य के आगे जो भ्रम का अंधेरा है, वह छंटे और बाल साहित्य की सही तस्वीर लोगों के सामने आए। फिर बाल साहित्य का महत्व समझ में आएगा, तो उसे बच्चों के नजदीक ले जाने की जिम्मेदारी भी लोग समझेंगे।
आपका बाल उपन्यास ‘ठुनठुनिया’ का जो पात्र है वह बड़ा ही मजेदार है। उसके बारे में कुछ बताएं?
आपने ठीक कहा, ठुनठुनिया वाकई बड़ा मजेदार पात्र है और कहना चाहिए कि मुझे भी बहुत पसंद है। इसलिए कि उसका परिवेश थोड़ा गंवई और काफी कुछ पिछड़ा हुआ है। लेकिन वह परिस्थितियों से हार नहीं मानता। वह जिंदादिली से भरा ऐसा पात्र है जिसमें हंसी की फुरफुरिया फूटती रहती हैं। बुरे से बुरे हालात में वह हार नहीं मानता और कोई न कोई रास्ता निकाल लेता है। पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे नहीं सही मगर समझदारी में वह अव्वल है और खुली आंखों से दुनिया को देखना जानता है। जीवन की खुली पाठशाला में वह पढ़ा इसलिए उसकी पढ़ाई बड़ी अचूक है और हमेशा मौके पर काम आती है। लोगों के दिल को पढऩा और उनसे प्यार करना उसे आता है इसीलिए चाहे गरीब खिलौने वाला, चाहे कठपुतली का खेल दिखाने वाला या फिर गांव का जमींदार हर कोई उसे प्यार करता है। और ठुनठुनिया की मां तो इतनी ग्रेट लेडी है और अपने बच्चे पर इस तरह प्यार निसार करती है कि कहना होगा कि वह बड़ी गरीब लेकिन ग्रेट मां है। इसी मां का प्यार यहां-वहां भटकने के बाद उस घर खींच लाता है। वह जिंदगी में आगे बढ़ता है मगर अपने पुराने दोस्तों को नहीं भूलता और सबको साथ लेकर एक अद्भूत दुनिया रच डालता है। जिसमें कला-संगीत, नाटक और हंसी खुशी के बड़े अलमस्त रंग हैं। सच कहूं तो मुझे वह दुनिया बड़ी प्रिय है और किसी यूटोपिया की तरह लगती है।

विधाओं की कोई एल.ओ.सी. नहीं होती : कान्तिकुमार जैन


कांतिकुमार जैन उन संस्‍मरणकारों में से जिन्‍होंने संस्‍मरण को साहि‍त्‍य की केंद्रीय वि‍धा के रुप में स्‍थापित किया। उनके संस्‍मरण खासे चर्चित और कुचर्चित भी हुए। उनसे प्रसिद्ध समीक्षक साधना अग्रवाल की बातचीत-
कान्ति जी, जहाँ तक मुझे मालूम है, छत्तीसगढ़ी बोली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन आपने किया है- नई कविता और भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य पर भी आपका कार्य है। आलोचना की पुरानी फाइल पलटने से मुझे उसमें आपका एक लेख- ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ देखने को मिला। मुक्तिबोध मंडल के कवियों ने ही आरंभ में ‘नर्मदा की सुबहकी योजना बनाई थी जिसे अज्ञेय ने न केवल झटक लिया बल्कि बहुत से पुराने कवियों को हटा दिया। ऐसा क्यों कर हुआ? कृपया इसे स्पष्ट करें।
1972 में जब मैं मप्र हिन्दी ग्रंथ अकादमी के लिए ‘नई कविता’ नामक पुस्तक लिख रहा था, तब मैंने देखा कि विवेचकों के आग्रहों, पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण नई कविता का सच्चा इतिहास नहीं लिखा जा सका है। हिन्दी में समीक्षा को ही इतिहास मान लिया जाता है। नई शोध के फलस्वरूप उपलब्ध नई जानकारी को इतिहास में समाहित करने की परंपरा हमारे विश्वविद्यालयों में नहीं है। मैंने उक्त पुस्तक में मुक्तिबोध के विवेचन के साथ जब ‘मुक्तिबोध मंडल के कवि’ का विचार सामने रखा तो डॉ. जगदीश गुप्त जैसे नई कविता के विचारकों ने प्रारंभ में अपनी असहमति प्रकट की, किन्तु बाद में वे भी मेरे तर्कों और तथ्यों से आश्‍वस्‍त हुए।
मुक्तिबोध ने ‘नर्मदा की सुबह’ की योजना बनाई थी। मुक्तिबोध के मित्र और शुजालपुर में उनके विद्यालय-सहयोगी रह चुके वीरेन्द्र कुमार जैन मानते हैं कि मालवा में ही हिन्दी की प्रयोगवादी और नई कविता का जन्म हुआ था। बाद में इस काव्यधारा में नेमिचंद जैन और भारतभूषण अग्रवाल जुड़े। वीरेन्द्र कुमार जैन ने मुक्तिबोध पर लिखे और 13 मई, 1973 के ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित अपने लंबे संस्मरण में स्पष्ट किया है कि कैसे अज्ञेय जी की संगठन क्षमता के कारण उन्हें ‘तारसप्तक’ के संपादन के लिए आमंत्रित किया गया। ठीक यही बात शमशेर जी ने भी कही है। अज्ञेय जी ने ‘तार सप्तक’ की मूल सूची से कुछ नाम निकाल दिए और कुछ नए जोड़ दिए। अज्ञेय तारसप्तक के झंडा बरदार नेता नहीं थे। मुक्तिबोध के ‘अनन्य मित्र और मुक्तिबोध मंडल के कवि’ प्रमोद वर्मा ने मुझे अपने पत्र में लिखा: ‘दूसरा तारसप्तक’ छप चुका था। मुक्तिबोध को यह देखकर हैरानी हुई कि नई कविता के नाम से प्रस्तुत छठे दशक की कविता ‘तारसप्तक’ के मूलतः वामपंथी रुझान को काट तराश कर कोरम कोर, सौंदर्यपरक कलावादी बना दी गई है। ऐसा तो छायावाद के जमाने में भी नहीं हुआ था। तो क्या यह सब उनके नव स्वाधीन देश को अंतरराष्ट्रीय पूँजीवाद की गिरफ्त में रहे चले आने के लिए ही किया जा रहा था?’
मैंने मुक्तिबोध मंडल की अपनी स्थापना का लंबा विवेचन किया जो डॉ. नामवर सिंह संपादित ‘आलोचना’ में छपा भी। इस विवेचन में जिन कवियों और विचारकों के नाम आए थे वे सब मेरे परिचित मित्र थे, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, रामकृष्ण श्रीवास्तव, जीवनलाल ‘विद्रोही’, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे- सभी मुक्तिबोध के प्राचीन मित्र। परसाई और भाऊ समर्थ भी गो वे कवि नहीं थे। मुक्तिबोध ने बहुत सोच-विचार कर कवियों की सूची की अंतिम रूप दिया और उनकी कविताएँ भी एकत्र की थीं। यदि ‘नर्मदा की सुबह’ छप गई होती तो हिन्दी की स्वतंत्रता परवर्ती कविता का इतिहास कुछ दूसरा ही होता। अज्ञेय जी ने सप्तक श्रृंखला के माध्यम से मुक्तिबोध द्वारा प्रस्तावित ‘नर्मदा की सुबह’ वाली वामपंथी रुझान की कविता को हाईजैक कर लिया। सप्तकों की खानापूरी करने के लिए बाद में वे बहुत ही साधारण कवियों को ही हाईलाइट करते रहे। ‘आलोचना’ में प्रकाशित अपने लेख में मैंने विवेचित कवियों का समीक्षात्मक आकलन तो किया ही था, उनका संस्मरणात्मक आख्यान भी प्रस्तुत किया था, दोनों को ताने-बाने की तरह बुनते हुए। मेरे बाद के संस्मरणों में इसी शैली का उपयोग किया गया है। मुझे संतोष है कि यह शैली सामान्य पाठकों के साथ ही सुधी आलोचकों को भी पसंद आई। यह शैली विद्वत्ता का आतंक पैदा करने के स्थान पर हार्दिकता जगाती है।
कायदे से सागर विवि के हिन्दी विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष होने के नाते ही नहीं, बल्कि आप में जो आलोचनात्मक प्रतिभा है, उसे देखते हुए आपको आलोचक होना चाहिए था, क्योंकि आपके संस्मरणों में आपके आलोचक की चमक की चिंगारी जहाँ-तहाँ प्रचुरता से दिखती है, मेरे मन में जब-तब यह सवाल उठता है। कृपया अपनी स्थिति से हमें परिचित कराएँ।
एक समय था जब हिन्दी का विश्‍वविद्यालयीन अध्यापक कवि होता ही था। फिर कवि के रूप में प्रतिष्ठा न मिलने पर वह कविता का पाला छोड़कर आलोचना के क्षेत्र में सक्रिय होता था। आचार्य नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह जैसे अनेकानेक कवि-आलोचकों से हम परिचित हैं। हमारे यहाँ आलोचना के साथ विद्वता का फलतः गंभीरता का अनिवार्य रिश्ता माना जाता है। विद्वता आतंकित तो करती है, आकर्षित नहीं करती। हमारे विश्‍वविद्यालय विद्वत्ता का विकास तो करते हैं, संवेदना का नहीं। ज्यादा विद्वत्ता से मुझे भय लगता है। ऐसा नहीं है कि आलोचना के क्षेत्र में मैंने कुलांचे न भरी हों, पर वहाँ बहुत भीड़ थी। वहाँ कोई किसी को तब तक घास नहीं डालता जब तक उसके साथ अपना गुट या शिष्यमंडली न हो। आलोचना के क्षेत्र में मेरी स्थिति शरणार्थी की थी। हिन्दी समाज कुम्हार के उस चाक के समान है जो माँगे दिया न देय। ऐसे में मैंने संस्मरणों की राह पकड़ी, शरणार्थी से पुरुषार्थी बनने के लिए। वह भी लगभग दिवसावसान के समय। समीक्षा को मैंने संस्मरणों की मुस्कान से मिला दिया, 33, 67 के अनुपात में। यह मेरी अपनी ‘रेसेपी’ थी। मेरी यह ‘रेसेपी’ आलोचकों को पसंद आई। मेरे अच्छे संस्मरण वे माने गए, जिनमें मैंने रचनाकार या चिंतक या अध्यापक के छोटे-छोटे आत्मीय प्रसंगों के आधार पर उसके व्यापक एवं बृहत्तर रचना कर्म और जीवन मूल्यों का विश्‍लेषण किया। जैसे बच्चन के, डॉ. रामप्रसाद त्रिपाठी के, रजनीश के या ‘सुमन’ के। आप चाहें तो इन्हें संस्मरणात्मक समीक्षा कह लें या समीक्षात्मक संस्मरण। ‘तुम्हारा परसाई’ शीर्षक पुस्तक मैंने इसी शैली में लिखी है।
पाठकों को गंभीरता और आलोचना की यह फिजां पसंद आई। याद कीजिए, शायर का वह मंसूबा जिसमें वह कहता है:
क्यों न फिरदौस में दोजख को मिला दें या रब
सैर के वास्ते थोड़ी सी फिजां और सही।
मेरे संस्मरण साहित्य की सैर के शौकीनों को यही थोड़ी सी फिजां मुहैया करते हैं।
सागर विवि से अवकाश प्राप्त करने के बाद संस्मरण लिखने की बात सहसा आपके मन में कैसे उठी? यूँ जहाँ-तहाँ आपने इसका संकेत दिया है लेकिन मुझे लगता है आपके पाठक के नाते मेरे मन में इस प्रश्‍न को लेकर जो जिज्ञासा है, उसका निदान आप ही कर सकते हैं।
संस्मरण लिखने की न तो मेरी कोई तैयारी थी, न ही आकांक्षा, कोई योजना भी न थी। डॉ. कमला प्रसाद के कहने से मैं श्रीमती सुधा अमृतराय पर एक संस्मरण लिख चुका था। उसे मित्रों ने पसंद किया, भाषा विज्ञान जैसा नीरस विषय पढ़ाने वाले से ऐसी तरल भाषा और रोचक शैली की अपेक्षा किसी को नहीं थी। ऐसे में एक दिन स्थानीय महाविद्यालय के अध्यापक मित्र घर आए। वे लेखक भी हैं, समीक्षा जैसी गुरु गंभीर विधा में लिखते हैं। कमला से उन्हें एलर्जी है, पुराने सहयोगी रह चुकने कारण। उनके गुरुओं ने उन्हें बताया था कि संस्मरण हल्की-फुल्की विधा है। उनके गुरु के गुरु आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी प्रेमचंद द्वारा संपादित ‘हंस’ के आत्मकथांक/संस्मरणांक का काफी मखौल उड़ा चुके थे। उन्हें लगा कि भाषा विज्ञान और समीक्षा के पुण्य तीर्थ से संस्मरण के गटर में पतन मेरे सारे पुण्यों को नष्ट कर देगा। मेरे उद्धार की चिंता के कारण उन्होंने फरमाया-संस्मरण तो वो लिखता है जो चुक जाता है। संस्मरण तो मरे हुओं पर लिखे जाते हैं। कुछ भी लिख दो, मरा हुआ व्यक्ति न प्रतिवाद कर सकता है, न ही आपकी खबर ले सकता है। फिर संस्मरण तो आत्मश्‍लाघा की विधा है। जिसे कोई भाव नहीं देता, वह अपनी पीठ ठोकने लगता है। संस्मरण उनके लिए शेड्यूल्ड कास्ट विधा थी और संस्मरण लेखक को वे कुल की हीनी, जात कमीनी, ओछी जात बनाफर राय का सगोत्री मानते थे। उनकी चेतना पर संस्मरण का मरण काबिज था, संस्‍मृत के पक्ष में भी, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिपरक सोनोग्राफी की। सुमन जी, त्रिलोचनजी या प्रेमशंकर जी ने तो कम आपत्ति की, उनके अनुगतों ने ज्यादा हो-हल्ला मचाया।
जो जितना पुराना और बड़ा कांवड़िया था, उसने उतना ही ज्यादा हल्ला मचाया। यह सब तो सच है पर लिखना नहीं चाहिए। कुछ ने मेरी औकात बताई। क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा। कुछ ने मुझ पर ‘क्रुयेलिटी’ का आरोप लगाया। मुझे संतोष है कि सुमन जी ने अपने होशो हवास में ‘हंस’ में प्रकाशित मेरा संस्मरण पढ़ लिया था, प्रेमशंकर जी ने भी। मैं संस्मरण श्रद्धालुओं के लिए नहीं लिखता। आस्था सुदृढ़ करने के लिए जो संस्मरण पढ़ते हैं, उन्हें मेरी सलाह है कि वे ‘कल्याण’ या ‘कल्पवृक्ष’ पढ़ें। इसी बीच दो दुर्घटनाएँ और हो गईं। मेरी कूल्हे की हड्डी टूट गई, काफी अर्से तक चलना-फिरना दूभर हो गया। न पुस्तकालय जा सकते, न ही अपने अध्ययन कक्ष की अलमारियों की ऊपरी शेल्फों से किताब निकाल सकते। ईश्‍वर प्रदत्त इस चुनौती का सामना मैंने संस्मरण लिखकर किया। ईश्‍वर से तो मैं निबट लिया पर कमलेश्वर का क्या करूँ? कमलेश्‍वर को अध्यापकों की सारी प्रजाति ‘पतित’ और ‘नालायक’ लगती है। उनके लेखे ‘रचनशीलता’ही सर्वोपरि है। सो भैये, लो ‘एक पतित और नालायक प्राध्यपक’ के संस्मरण पढ़ो। जान कर संतोष हुआ कि उनको मेरे संस्मरण पठनीय ओर प्रिज्म की तरह लगे। वाहे गुरु की फतह।
सवाल यह भी है कि पहला संस्मरण लिखने-छपने के बाद पत्रिका के संपादक और पाठकों की प्रतिक्रिया का आप पर कैसा असर हुआ?
पहला संस्मरण छपा अप्रैल-अक्टूबर ‘96 की ‘वसुधा’ में। वह किंचित् लंबा था, डॉ. कमला प्रसाद ने कहा कि आपके संस्मरण ‘वसुधा’ के बहुत पन्‍ने घेरते हैं पर रोचकता के कारण पाठक उन्हें पूरा पढ़ते हैं। मैं छोटे संस्मरण लिख ही नहीं पाता। छोटे संस्मरण मुझे या तो शोक प्रस्ताव जैसे लगते हैं या चरित्र प्रमाणपत्र जैसे। ‘हंस’ में मेरे लंबे-लंबे संस्मरण छपे और पाठकों को पसंद आए। भारत भारद्वाज ने लिखा कि संस्मरणों का जो दिग्विजयी अश्‍व काफी अर्से से प्रयाग और काशी के बीच घूम रहा था, वह अब सागर में स्थायी रूप से बाँध लिया गया है। मेरे संस्मरणों पर कमला प्रसाद को और राजेन्द्र यादव को बहुत सुनना पड़ा, अश्‍लीलता को लेकर। अश्‍लीलता मेरे संस्मरणों में मेरे कारण नहीं थी, संस्मृत के अपने व्यक्तित्व के कारण थी। पर कई सुधियों को दुःशासन द्वारा भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण में अश्‍लीलता या अनैतिकता नहीं दिखाई पड़ी, दिखाई पड़ी वेदव्यास द्वारा महाभारत में चीरहरण का उल्लेख किए जाने पर। इन दिनों एक विज्ञापन आ रहा है दूरदर्शन पर। लड़की पूछती है- क्या खा रहे हो? लड़का कहता है- लो तुम भी खाओ। लड़की फिर कहती है- पर यह तो तंबाखू है। लड़का कहता है- जीरो परसेंट टोबेको, हंड्रेड परसेंट टेस्ट। मेरे संस्मरणों में भी अश्‍लीलता जीरो प्रतिशत ही है, स्वाद कुछ लोगों को शत-प्रतिशत मिलता है। यह उनकी अपनी स्वादेन्द्रिय का कमाल है।
संस्मरण हिन्दी में एक अरसे से लिखे जाते रहे हैं बल्कि पिछले वर्षों में काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह एवं रवीन्द्र कालिया की संस्मरण पुस्तकें भी छपीं जो वस्तुतः उनके समकालीन रचनाकारों पर केन्द्रित हैं। आपने किस तरह संस्मरण की पूरी परंपरा से अलग हटकर कबीर के कपूत बनने का साहस संजोया?
अभी कुछ दिन हुए, संस्मरणों के एक प्रेमी पाठक मुझसे मिलने आए थे। उन्होंने बातचीत के दौरान बचपन में पूछी जाने वाली एक बुझौवल सुनाई:
तीतर के इक आगे तीतर
तीतर के इक पीछे तीतर
आगे तीतर पीछे तीतर
बताओ कुल कितने तीतर
फिर इस बुझौवल का संस्मरण-पाठ भी पेश किया:
का के है आगे इक का
का के पीछे है इक का
आगे इक का, पीछे इक का
बताओ कुल कितने हैं का
यहाँ एक का काशीनाथ का है, दूसरा कालिया का, तीसरा इस नाचीज कान्तिकुमार का है। यह सब कबीर के कपूत हैं, कपूतों की वह परंपरा ‘उग्र’ और ‘अश्क’ से होती हुई कृष्णा सोबती, हरिपाल त्यागी तक पहुँचती है। मैं भी इसी परंपरा का एक पड़ाव हूँ। मैं कुछ ज्यादा ही कपूत साबित हुआ।
कुछ विद्वानों का मत है कि आपने संस्मरण विधा को हाल के दिनों में प्रकाशित अपने संस्मरणों से केन्द्रीय विधा बना दिया है। इस बारे में आपको क्या कहना है?
इस संबंध में मैं क्या कहूँ? संस्मरण विधा आज समकालीन लेखन की केन्द्रीय विधा बन गई हैं, इसमें संदेह नहीं। पर इसका सारा श्रेय मेरा ही नहीं है। काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह के संस्मरणों से इस विधा में जो खुलापन आया था, उससे पाठकों की एक मानसिकता बन गई थी। मुझे उस मानसिकता का लाभ मिला। किसी भी संस्मरणीय के केवल कृष्णपक्ष का उद्घाटन करना लक्ष्‍य नहीं है, बल्कि उसके व्यक्तित्व की संरचना के तानों-बानों और उसके परिवेश की सन्निधि में उसकी रचनात्मकता के छोटे-बड़े प्रसंगों के माध्यम से ‘स्कैनिंग’ मेरा अभीप्सित है। अपने संस्मरणों को रोचक और पठनीय बनाने के लिए रचनात्मक कल्पना का उपयोग तो मैंने किया है पर ‘फेकता’(fake) का नहीं। मेरे संस्मरणों में अनेक प्रसंग सेंधे भरने के लिए गाल्पनिक तो हो सकते हैं पर वे पूरी तरह काल्पनिक नहीं हैं। अपने संस्मरणों में मैं स्वयं को बचाकर नहीं चलता।
मैंने कभी डायरी नहीं लिखी। स्मृति के और पुराने पत्रों के सहारे ही लिखता हूँ। एकाध संस्मरण में जहाँ भ्रमवश दूसरों से सुने तथ्यों के सहारे मुझसे घटनाओं की पूर्वापरता में गड़बड़ी हुई है, पाठकों ने मुझे पकड़ लिया है, इसका अर्थ मैंने यही लगाया कि हिन्दी में सुधी और सावधान पाठकों की कमी नहीं है। असावधानीवश हुई इन चूकों को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं हुआ। जैसे ‘विद्रोही’ के संदर्भ में कमलेश्‍वर ने या मुक्तिबोध के संदर्भ में ललित सुरजन ने या ‘वसुधा’ के अंतिम अंक के संबंध में भारत भारद्वाज ने मेरी त्रुटि की ओर ध्यान आकर्षित किया। मैं इनका कृतज्ञ हूँ। ये त्रुटियाँ किसी बदनीयती के कारण नहीं हुईं। संस्मृतों के संपूर्ण व्यक्तित्व या रचनाशीलता के नियामक तत्त्वों के मेरे निष्कर्षों पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पर भूल तो भूल है।
अपने संस्मरणों पर मेरे पास हजारेक पत्र तो आए ही होंगे। टेलीफोन भी कम नहीं आए। लोग पाठकों के न होने का रोना बेवजह ही रोते हैं। अकेले रजनीश वाले संस्मरण पर ही मुझे सैकड़ों पत्र मिले और अभी तक मिल रहे हैं। देश से भी, विदेशों से भी। इन पत्रों के आधार पर मैंने एक श्रृंखला लिखने का मन बनाया है- संस्मरणों के पीछे क्या है? रजनीश के संस्मरण पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं वाला संस्मरण तो लिखा भी जा चुका है- ‘रजनीश का दर्शन: आध्यात्मिक दाद खुजाने का मजा।’असल में संस्मरणों को संस्मृत का ही आईना नहीं होना चाहिए, उसे उसके परिवेश का भी अता-पता देना चाहिए। उसे प्रचलित जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता की भी जाँच पड़ताल करनी चाहिए। मेरे लिए संस्मरण विशिष्ट कालखंड का सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास है।
पिछले दिनों हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में रसाल जी, अंचल जी और सुमन जी पर जिस तरह आपके संस्मरण छपे उससे आपके दुश्मनों की संख्या में जरूर इजाफा हुआ, लेकिन सच बात यह भी है कि आज हिन्दी की कोई भी पत्रिका आपके संस्मरण के बिना अधूरी लगती है। क्या अब आप पूर्णतः संस्मरण समर्पित हैं या और भी आपकी कोई योजना है?
आपके इस प्रश्‍न के उत्तर में मैं नसीम रामपुरी का एक शेर उद्धृत करना चाहता हूँ:
हार फूलों का मेरी कब्र पर खुद टूट पड़ा
देखते रह गए मुँह फेर के जाने वाले
ऐसा तो नहीं है कि मैं अब संस्मरण छोड़कर कुछ और नहीं लिखता, पर अब जो कुछ लिखता हूँ, वह संस्मरणमय हो उठता है। ‘तुम्हारा परसाई’ मेरी नव्यतम पुस्तक है जिसे मैंने परसाई जी के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। ‘तुम्हारा परसाई’ पढ़कर एक नामी-गिरामी प्रकाशक ने मुझे लिखा कि मुक्तिबोध पर भी ऐसी पुस्तक मैं क्यों नहीं लिखता? मेरा उत्तर था, ऐसी पुस्तक लिखने के जितने धैर्य और समय की आवश्यकता है, वह अब मेरे पास नहीं है। हाँ, मुक्तिबोध जी के नागपुर के दिनों पर लिखने का मन जरूर बना रहा हूँ, ‘महागुरु मुक्तिबोध: जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से। यह जीवनलाल वर्मा ‘विद्रोही’, रामकृष्ण श्रीवास्तव, श्रीकांत वर्मा, शिवकुमार श्रीवास्तव, प्रमोद वर्मा, अनिल कुमार, सतीश चौबे, भाऊ समर्थ, हरिशंकर परसाई जैसे रचनाकारों के साहित्य, संस्मरणों और पत्रों के माध्यम से नागपुर के दिनों के मुक्तिबोध के जीवन, मानसिकता और रचनाशीलता को ‘डिस्कवर’ करने की संस्मरणमय कोशिश होगी। इस कोशिश के कुछ अंश आपने ‘हंस’, ‘वसुधा’, ‘साक्षात्कार’, ‘आशय’, ‘अन्यथा’, ‘परस्पर’ जैसी पत्रिकाओं में देखे भी होंगे। मालगुड़ी डेज़ की तरह अपने बचपन के दिनों का वृत्तांत भी मैं लिख रहा हूँ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के नाम से। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल के अभावों, संघर्षों, शोषण, प्रकृति से तादात्म्य और लोक की अदम्य जिजीविषा का आख्यान। यह भी संस्मरणात्मक ही होगा। फिर संस्मरणों की मेरी नई पुस्तक भी है-‘जो कहूँगा, सच कहूँगा’ नाम से। एक तरह से ‘लौटकर आना नहीं होगा’ का दूसरा खंड। इन संस्मरणों में मेरी शिकायत मानवीय दुर्बलता से उतनी नहीं, जितनी टुच्चे स्वार्थों और संकीर्ण सोच के कारण किए जाने वाले छल, छद्म और फरेब से है। कथनी और करनी में जितनी दूरी आज दिखाई पड़ रही है, उतनी शायद कभी नहीं रही। मानवीय गरिमा का क्षरण करने वाली किसी भी चतुराई या संकीर्णता से मुझे एलर्जी है। इस एलर्जी को प्रकट करना दुश्मनों की संख्या में इजाफा करना है। मेरे दुश्मन बढ़ रहे हैं अर्थात् मेरे संस्मरण ठीक जगह पर चोट कर रहे हैं। ‘मे देअर ट्राइव इनक्रीज़’।
अभी शब्द शिखरपत्रिका में आपके नाम लिखे कुछ महत्वपूर्ण लेखकों के पत्र छपे हैं। राजेन्द्र यादव के लिखे पत्रों से ऐसा आभास होता है कि आप पर लगातार दबाव डालकर हंसके लिए उन्होंने आपसे संस्मरण लिखवाए ही नहीं बल्कि आपको जेल भिजवाने का भी पूरा प्रबंध कर दिया है। वस्तुस्थिति क्या है, यह आप ही बताएँगे।
नहीं, राजेन्द्र यादव का मुझ पर संस्मरण के लिए कोई दबाव नहीं था। संस्मरण के पात्र का चुनाव सदैव मेरा ही रहा है, उसका ढंग भी। अब 70 साल की उम्र में कोई मुझ पर दबाव डालकर कुछ लिखा लेगा, यह प्रतीति ही मुझे हास्यास्पद लगती है। राजेन्द्र यादव अच्छे संपादक हैं, वे रचनाकार की सीमाओं को और क्षमताओं को पहचानते हैं। वे साहसी भी हैं, मुझे लगता है वे जितने बद नहीं, बदनाम उससे बहुत ज्यादा हैं। शायद बदनामी मनोवैज्ञानिक रूप से उनके लिए क्षतिपूर्ति उपकरण है। बदनामी और विवाद उन्हें अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए अनिवार्य लगते हैं। कुछ लोग होते हैं जिन्हें चर्चा में बने रहना अच्छा लगता है। चर्चा और बदनामी उनके लिए लगभग पर्याय होते हैं। मैं आपको बताऊँ, ‘अंचल’ वाला संस्मरण तो कोई छापने को तैयार ही नहीं था। अंचल प्रगतिशील रह चुके थे, ‘लाल चूनर’वाले। अतः प्रगतिशील खेमे की पत्रिकाएँ अपने नायक का सिंदूर खुरचित रूप दिखाने को तैयार नहीं थीं। अंचल जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके थे। अतः सम्मेलन से संबद्ध पत्रिकाओं के अपने संकोच थे। अक्षय कुमार जैन ने तो मुझे साफ लिखा कि हिन्दी के पाठक अभी ऐसी मानसिकता के नहीं हो पाए हैं कि वे आपके ऐसे संस्मरण पचा सकें। ‘वागर्थ’ (उस जमाने की), ‘वाणी’, ‘अक्षरा’ जैसी निरामिष पत्रिकाओं से मैं क्या उम्मीद करता? अन्ततः मैंने वह राजेन्द्र यादव को भेज दिया। राजेन्द्र यादव से मेरी कोई आत्मीयता नहीं थी। जीवाजी विश्‍वविद्यालय में मैंने उनका उपन्यास नहीं लगाया था। वे मुझसे रुष्ट थे। सोचा, उनको भी खंगाल लिया जाए। हफ्ते भर में उनका पत्र आया, शीघ्र छपेगा। ‘अंचल’ छपने पर बड़ा बावेला मचा। अश्‍लील, क्रुयेल, अनैतिक, चरित्रहनन, खुद बड़े पाक बने फिरते हैं टाइप। जेल पहुँचाने का इंतजाम राजेन्द्र यादव ने नहीं, मेरे मित्रों ने किया। भोपाल के मेरे एक बहुत पुराने मित्र ने जो स्वयं को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से बड़ा तो नहीं, पर उनके समकक्ष मानते हैं, अंचल जी की बेटी को कानूनी कार्यवाही के लिए उकसाया। वह स्वयं अनुभवी है, उसके पति न्यायाधीश हैं। वे कानून के जानकार हैं, समझदार। अतः उन मित्र महोदय के बहकावे में नहीं आए। हाँ, एक अखिल मुहल्ला कीर्ति के धनी कवि ने जरूर मुझ पर मानहानि जैसा कुछ करने की धमकी दी। पर वे भी टांय-टांय फिस्स से ज्यादा नहीं बढ़ पाए। सुधीर पचौरी और विष्णु खरे जैसी सुधी और नीरक्षीर विवेकी विचारकों ने अश्‍लीलता की चलनी में मेरी छानबीन की, यह भूलकर कि सूप कहे तो कहे, चलनी क्या कहे जिसमें बहत्तर छेद। हिन्दी समाज में अश्‍लीलता की कबड्डी खेलना समीक्षकों का सबसे पसंदीदा खेल है। यार लोग चाहते हैं कि मैं मित्रों के कांधे पर चढ़कर नहीं, भूतपूर्व मित्रों के कांधों पर चढ़कर अंतिम यात्रा पर निकलूँ। यहाँ हर पड़ोसी, दूसरे की खिड़की में ताक-झाँक की फिराक़ में रहता है, अपनी खिड़की में मोटे-मोटे ‘ब्लाइंड’ डालकर। अपने संस्मरणों के हर शब्द के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। किसी राजेन्द्र यादव के पाले में गेंद फेंकना बेईमानी भी है, अनैतिकता भी। वह कायरता तो है ही।
कहने की जरूरत नहीं कि आज हिन्दी में आपने संस्मरण विधा में नई जान फूंकी है और हर नया लेखक कान्तिकुमार जैन बनने की कोशिश में लगा है। आप इस स्थिति को किस रूप में देखते हैं।
आपके इस तरह के प्रश्‍न के उत्तर में मैं आपको एक लतीफा सुनाना चाहता हूँ- स्कूल में पढ़ने वाले और नए-नए तरुण हुए एक छात्र को उसके एक सहपाठी ने एक प्रेम प्रसंग के निपटारे के लिए द्वंद युद्ध में ललकारा। यह युद्ध तलवारों से लड़ा जाना था। ललकारित छात्र ने अपने पिताजी से कहा कि पिताजी, आप मेरे लिए एक लंबी तलवार बनवा दें जो सहपाठी की तलवार से छह इंच लंबी हो। पिताजी समझ गए। बोले- बेटे! यदि तुम्हें सामनेवाले को परास्त करना है तो छह इंच आगे बढ़कर मारो। इस तरह के युद्ध तलवार की लंबाई से नहीं, भीतर के हाँसले से लड़े जाते हैं। यदि किसी का मेरुदंड कमजोर हो तो न तलवार की लंबाई काम आती है, न पिताजी का संरक्षण। ऐसे लोगों को संस्मरण नहीं लिखने चाहिए।
मुझे लगता है कि आपके संस्मरणों के पीछे परसाई खड़े हैं आशीर्वाद की मुद्रा में, क्योंकि यह बात तो बिल्कुल साफ है कि आपके भीतर के आलोचक और परसाई के व्यंग्य की धार से आपके संस्मरण परवान चढ़े हैं। वैसे तो अपनी नई पुस्तक तुम्हारा परसाईमें विनम्रतापूर्वक यह कहकर कि तुम्हारा परसाई में मेरा क्या है, आपने अपना संकोच स्पष्ट कर दिया है फिर भी कुछ बचा रहता है परसाई से उऋण होने के लिए। इस प्रसंग में आप कुछ और जोड़ना चाहेंगे।
परसाई जी मेरे मित्र थे- आत्मीय और अंतरंग। उनका और मेरा लगभग चालीस वर्षों का साथ था। उनसे प्रेरित और प्रभावित न होना कठिन था। वे मुझसे बड़े थे, प्रतिष्ठित। फिर विचारधारा के स्तर पर भी मैं उनके बहुत निकट रहा हूँ। मुझे उनकी जो बात सबसे पसंद थी वह यह कि अपनी विचारधारा की वे अपने व्यंग्यों में घोषणा नहीं करते थे, उसे संवेदित होने देते थे। जैसे बिजली इंसुलेटेड वायर के भीतर ही भीतर दौड़ती रहती है, यहाँ से वहाँ तक। पर अंत में वह तार झटका भी देता है और प्रकाश भी। इस अर्थ में वे हिन्दी के अनेक वामपंथी लेखकों से विशिष्ट हैं। दुर्भाग्य है कि हिन्दी में संघवाद, विचारधारा और उसके संगठनों का प्राधान्य है। हर संगठन अपने आदमी की तमाम-तमाम चूकों, खामियों, विचलनों को ढाँकने-मूँदने में लगा है। ठीक राजनीतिक दलों की तरह। संप्रदायवाद, भ्रष्टाचार, छल, घोटालों, बेईमानियों का हम गुट निरपेक्ष या संगठन तटस्थ होकर विरोध नहीं करते। परसाई ऐसा करते थे। इसीलिए परसाई की मार चतुर्मुखी होती थी ओर उनका प्रभाव भी इसीलिए सब तरह के पाठकों पर था। ऐसे समय परसाई जी जैसे लेखकों को होना चाहिए। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता है, जिसमें अपने अवसान के समय सूर्य पूछता है कि मेरे बाद पृथ्वी का अंधकार कौन दूर करेगा। मिट्टी का एक दिया सामने आया। बोला- अपनी शक्ति भर मैं करूँगा। मैं मिट्टी का वही दिया हूँ।
तुम्हारा परसाईएक विलक्षण पुस्तक है जो काशीनाथ सिंह जी की पुस्तक काशी का अस्सीकी तरह धमाके से विधाओं की वर्जनाओं को तोड़ती है। संस्मरणात्मक भी यह है लेकिन उससे ज्यादा परसाई के जीवन और लेखन का मोनोग्राफ। क्या आपको ऐसा नहीं लगता?
विधाओं का वर्गीकरण तो साहित्य शास्त्रियों ने सुविधा के लिए कर रखा है। विधाओं की चौहद्दी में बँधने से रचनाकारों की क्रियेटिविटी बाधित होती है। जैसे बहुत घिसने से बासन का मुलम्मा छूट जाता है, वैसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी काम में आते रहने से विधाओं की दीप्ति भी फीकी पड़ जाती है। समर्थ रचनाकार प्रत्येक युग में साहित्य के परिधान में कुछ न कुछ परिवर्तन करता है। वास्तव में विधाओं की कोई एलओसी नहीं होती। विधाओं का अतिक्रमण करने से साहित्य की थकान मिटती है, साहित्यकार की भी। ‘तुम्हारा परसाई’ को मैंने जानबूझकर परसाई के जीवन, व्यक्तित्व, परिवेश और व्यंग्यशीलता का संस्मरणात्मक आख्यान कहा है। इससे परसाई जी के जीवन के और लेखन के तानों-बानों को समझने में सुविधा होती है। मुझे संतोष है कि इधर हिन्दी के बहुत से लेखक संस्मरण लिखने में रुचि ले रहे हैं। हर पत्रिका के लिए संस्मरण लगभग अनिवार्य हो गए हैं। इन संस्मरणों से हिन्दी साहित्य के वास्तविक इतिहास का कच्चा माल सामने आ रहा है। हिन्दी साहित्य के समकालीन इतिहास की दूसरी परंपरा का सामने आना कई दृष्टियों से वांछनीय है।
अंतिम सवाल, मुझे ठीक से नहीं मालूम लेकिन मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपकी धर्मपत्नी साधना जैन का आपके लेखन में कितना सहयोग है- आपकी स्मृति को रिफ्रेश करने में या संदर्भों को दुरुस्त करने में?
साधना मेरी पत्नी हैं पढ़ी-लिखीं, साहित्यिक समझ से भरपूर। घटनाओं के पूर्वापर क्रम की और व्यक्ति द्वारा उच्चरित कथन को ज्यों का त्यों दुहरा सकने की उनमें विलक्षण प्रतिभा है। उर्दू के शेर तो उन्हें ढेरों याद हैं। अपने संस्मरण लेखन में जहाँ कहीं मैं अटकता हूँ, स्मृति का मैगनेट साफ करने में वे मेरी सहायता करती हैं। वे मेरी जीवन-संगिनी हैं फलतः संस्मरण-संगिनी भी। 1962 में मुझसे विवाह के उपरांत वे मेरे सारे मित्रों को जानती हैं और उन्हें समझती भी हैं। मैं डायरी नहीं लिखता पर यदि लिखता तो पत्नी से छिपाकर नहीं रखता। मैं हिन्दी के उन लेखकों में नहीं हूँ जो अपनी पत्नी को दर्जा तीन पर स्थान देते हैं- पहले मेरा लेखन, फिर मेरे दोस्त, फिर तू। मैं उन लेखकों में भी नहीं हूँ जो यह कहकर गौरवान्वित होते हैं, लेखन तो मेरा अपना है, मेरी पत्नी का इसमें कोई योग नहीं है। ऐसे लोग या तो मुझे सामंती पुरुषाना अहंकार से ग्रस्त लगते हैं या अपनी पत्नी को निर्बुद्धि समझते हैं। संयोग से न तो मुझमें वैसा अहंकार है, न ही साधना वैसी निर्बुद्धि हैं।
अपने संस्मरणों में अपनी पत्नी का उल्लेख करने का परिणाम यह हुआ है कि बहुत से संस्मरण लेखक अपनी पत्नी को भी क़ाबिले उल्लेख समझने लगे हैं। एक ने तो अपनी पत्नी को करवाचौथी परिधि से निकालकर साहित्य का कोई पुरस्कार भी दिलवा दिया है। गुजरात की एक धर्मपत्नी ने जिनके पति अच्छे खासे साहित्यकार हैं और जिन्होंने प्रेम विवाह किया था, बड़े दुःख से मुझे लिखा- काश! मेरे पति भी अपने संस्मरणों में उसी सम्मान और स्नेह से मेरा उल्लेख करते जैसे आप अपनी पत्नी का करते हैं। उस उमर में जब साहित्यकार पति और कुछ नहीं कर सकता, उसे इतना तो करना ही चाहिए।
(भारतीय लेखक, अक्टूबर-दिसंबर, 05  से साभार)

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