शुक्रवार, 28 मार्च 2014

खोजी पत्रकारिता पर एक नजरिया






-सुग्रोवर||

दूर के ढोल सुहावने होने ‘की कहावत खोजी पत्रकारिता पर सोलहों आने लागू होती है. यदि आप सत्ताधीशों से मेलजोल रखना चाहते हैं, “पेज थ्री” पार्टियों में आमंत्रित होना चाहते हैं, तबादलों, नियुक्तियों, सरकारी ठेकों और लाइजनिंग के ज़रिये अथाह धन अर्जित करना चाहते हैं, सरकारी सम्मान पाना चाहते हैं तो मुआफ करें, आपका जन्म खोजी पत्रकारिता के लिए नहीं हुआ है. यह तो ऐसा कार्य है जिसके हो जाने के बाद आपको कोई धन्यवाद भी नहीं देगा. हाँ, यदि आपके पास पुख्ता जानकारियां नहीं हैं तो आप मानहानि के मुकद्दमें में भी फंस सकते हैं. यही नहीं जान पर भी बन सकती है, आपके खिलाफ पुलिस में झूठे मामले भी बनाये जा सकते हैं या फिर दबंगई का भी शिकार होना पड़ सकता है, यहाँ तक कि ताकतवर जमातें आपके विरोध में लामबंद हो सकती है.investigative journalism
खोजी पत्रकारिता आपको अपने लिखे से मानसिक संतुष्टि तो देती है साथ ही साथ आपको शक्तिशाली लोगों और समूहों की नाराज़गी का पात्र भी बना देती है. धमकियाँ भी मिलती हैं, परोक्ष-अपरोक्ष हमले भी होते हैं. इसका मतलब यह भी नहीं कि इस नाराज़गी के भय से खोजी पत्रकारिता से परे रहा जाये. हाँ, किसी भी मामले की पड़ताल करते समय कई सावधानियां बरतने की जरूरत होती है. खास तौर पर यह भी देखा जाना चाहिए कि मामला जनहित का हो. कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके सूत्र आपका इस्तेमाल कर रहे हों. क्योंकि एक पक्ष का नुकसान होने पर किसी दूसरे पक्ष को फायदा भी पहुंचता है. यदि वह फायदा जायज़ है तो कोई दिक्कत नहीं मगर नाजायज़ है तो आप सांपनाथ को होने वाला फायदा नागनाथ को दिलवा कर समाज का कोई भला नहीं करते. बस थोड़ी सी सनसनी भर फैला कर एक का रायता बिखेर देते हैं और दूसरे को थाली परोस देते हैं.
हर खोज़ी पत्रकार को दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियाँ सदा अपने ज़ेहन में रखनी चाहिए कि
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.”

यह तभी हो सकता है कि खोजी पत्रकार स्वयं की नज़रों में खुद को नैतिक रूप से मज़बूत पाता हो, यहीं से आत्मविश्वास पनपता है. आपमें तथ्यों का पोस्टमार्टम करने की उत्सुकता का होना खोजी पत्रकारिता का सबसे जरूरी तत्व है. उत्सुकता आपको मामले की तह तक पहुँचाने में महती भूमिका निभाती है.
चूँकि खोजी पत्रकारिता के साथ कई तरह के खतरे जुड़े होते हैं और कानूनी तौर पर भी अपने आपको मज़बूत बनाये रखने के लिए आपको हर छोटे से छोटे तथ्य की तह तक जाकर बारीकी से पड़ताल करनी होती है ताकि रिपोर्ट में किसी तरह की गलती न रहे, कोई भी लूप होल रह जाने पर काफी मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट अविश्वसनीय ठहराई सकती है और आपकी रिपोर्ट का निशाना बन रहे ताकतवर लोग आपको झूठा साबित कर सकते हैं.
कई बार हम अपने अनुसन्धान या पड़ताल के दौरान खुद को एक गहरी और अँधेरी गुफा में पाते हैं जहाँ से आगे बढ़ने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता. आगे बढ़ने का कोई सूत्र नहीं. ऐसे में हार नहीं मान लेनी चाहिए. अपनी रिसर्च एक बार फिर नए सिरे से शुरू करनी चाहिए और उन सारे कोणों से मामले को देखा जाना चाहिए जो पिछली बार अनदेखे रह गए.
कई बार हमें अपनी पड़ताल के दौरान कुछ अन्य लोगों की सहायता लेनी पड़ती है मगर रिपोर्ट की गोपनीयता को बनाये रखना भी बहुत जरूरी है. गोपनीयता के प्रति हमेशा सावचेत रहें मगर यह भी ध्यान रहे कि आपकी इस पड़ताल की सहायता करने वाली टीम को आपका आशय अच्छी तरह समझ में आये ताकि आपको बिलकुल सही सूचना मिल सके.
किसी भी खोजी रिपोर्ट पर काम करने से पहले उस विषय में अच्छी तरह से जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए ताकि किसी से सवाल करते समय उसके जवाबों में उलझे बिना सत्य की तह तक पहुच सकें. यह जानकारी इन्टरनेट के जरिये भी आसानी से हासिल की जा सकती है तो किताबों से भी या फिर किसी विषय विशेषज्ञ से भी दक्षता हासिल की जा सकती है.
आपके जितने ज्यादा विश्वसनीय सम्पर्क होंगे आपकी रिपोर्ट उतनी ही बेहतर बनेगी, जोकि कई अलग अलग जगहों से जांची हुई होगी.
एक अच्छा खोजी पत्रकार वही होता है जो अपने विषय से सम्बंधित पक्ष की सुरक्षा का पूरा ध्यान रख सके, अपने सम्पर्क सूत्रों की गोपनीयता बरक़रार रख सके. साथ ही खुद को भी नैतिकता के दायरे में बाँध कर रख सके. न कि किसी लालच के वशीभूत हो.
किसी भी विषय पर पड़ताल करने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि जिस विषय को आप उठाने जा रहे हैं वह जनहित से जुड़ा हो ना कि किसी संस्था, राजनैतिक दल, कॉर्पोरेट या व्यक्ति विशेष के हित से.
दस्तावेजी सबूतों के रूप में हमेशा फोटो कॉपी मिलती है, असल दस्तावेज देखने को नहीं मिलते. अब फोटो कॉपी मेन्युप्लेट नहीं हुई, इसकी क्या गारंटी? बेहतर होगा इन सबूतों के अलावा भी सबूत जमा करें. यह लोगों के मौखिक बयान भी हो सकते हैं. ऐसे किसी भी बयान की विडियो रिकॉर्डिंग जरूर करें, वह भी बयान देने वाले की जानकारी में लाकर. वीडियो रिकॉर्ड ना कर सकें तो ऑडियो रिकॉर्डिंग जरूर करें. बिना रिकॉर्डिंग बयान बदल भी सकते हैं. रिकॉर्डिंग करते समय बयान देने वाले को बता दें कि आप अपनी सहूलियत के लिए इस बातचीत को रिकॉर्ड कर रहे हैं ताकि वक्त जरूरत काम आ सके. इसी सूरत में आपकी रिकॉर्डिंग कानूनी तौर पर वैध होगी. निजता के अधिकार का सम्मान करें. रिकॉर्डिंग के लिए अच्छी गुणवत्ता के मोबाइल फोन का भी इस्तेमाल किया जा सकता है पर उच्च गुणवत्ता की रिकॉर्डिंग महंगे फोन से ही हो सकती है.
सबूत जमा करने की प्रक्रिया में जब एक से अधिक व्यक्तियों के बयान लिए जाएँ तो जाँच लें कि बयान विरोधाभासी ना हों. विरोधाभासी बयान रिपोर्ट की सत्यता पर सवालिया निशान लगा देंगें.
आरोपों की पुष्टि के लिए विभिन्न स्रोत्रों का इस्तेमाल करें. कभी भी एक सूत्र के हवाले से रिपोर्ट तैयार ना करें. यदि आपने एक सूत्र पर विश्वास कर रिपोर्ट बना दी तो वह खोजी रिपोर्ट नहीं गॉसिप होगी.
अपनी रिपोर्ट में कभी भी अजीबो गरीब शब्दों का प्रयोग न करें. “कुछ समय बाद” और “एक बड़ी राशि” या “किसी इलाके में” जैसे जुमलों के साथ पूरे किये गए वाक्य रिपोर्ट को अधकचरी जानकारी का तमगा दिलवा देंगें. तथ्यों को पुख्ता करने वाले तथ्य एक के बाद एक सामने रखते जाएँ.
रिपोर्ट लिखते समय अपने शब्दों को अपने नियंत्रण में रखें. आरोपी के लिए कभी अपनी रिपोर्ट में “अपराधी” या अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल न करें. निष्कर्ष निकालने का काम पाठकों या दर्शकों पर छोड़ दें. यदि आपकी रिपोर्ट में दम है तो बाकि का काम आपके पाठक और दर्शक कर देंगें.
आरोपी से उसका पक्ष जानना बहुत जरूरी है. यदि आरोपी अपना पक्ष ना रखना चाहे तो आप किसी भी तरह उसका पक्ष जानें और अपनी रिपोर्ट में शामिल करें.
रिपोर्ट सार्वजनिक करने से पहले एक बार फिर से अपनी रिपोर्ट गौर से पढ़ें और देखें कि आपकी रिपोर्ट में कहीं पर भी ऐसा संकेत ना हो जिससे आपके सूत्रों का पता चलता हो, आपके सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती हो. क्योंकि आरोपी सबसे पहले यही सोचेगा कि इस पत्रकार को यह बात कौन कौन बता सकता है. यदि ऐसा है तो उसे तुरंत दुरुस्त करें.
जब तक आपके पास आरोप प्रमाणित करने वाले पक्के सबूत न हों कभी भी रिपोर्ट न लिखें. अपनी रिपोर्ट प्रसारित या प्रकाशित करने से पहले इसे अपने विश्वस्त वकील को दिखवा लेने से आप कानूनी पचड़ों से बच सकते हैं.
यदि आपको लगता है कि आरोप तो सही हैं मगर सबूत नहीं हैं तब स्टिंग ऑपरेशन का सहारा लिया जा सकता है. स्टिंग ऑपरेशन करते समय आपको अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ेगी.
 यह आलेख पिंकसिटी प्रेस क्लब के मुखपत्र पाती में भी प्रकशित हो चुका है
(सुग्रोवर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा. उसी दौरान राजस्थान में अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय)

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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