सोमवार, 10 मार्च 2014



वेब मीडिया, वैकल्पिक पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार


      
      वेब मीडिया, वैकल्पिक पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार

21वीं सदी ने फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग आदि माध्यमों का बाहें फैला कर स्वागत किया है। विश्व के करोड़ों लोगों की आवाज़ बन गया है वेब-मीडिया।

ये वो लोग हैं, जिनके पास कहने के लिए बहुत कुछ था पर अपनी बातें साझा करने के लिए कोई प्लैटफॉर्म नहीं था। वेब मीडिया ने शहरों मे रहने वाले, अपने-अपने डिब्बेनुमा घरों मे बंद युवाओं , वयस्कों और कुछ अवकाश प्राप्त वरिष्ठ नागरिकों के लिए मानवीय सम्बन्धों, अनुभवों और सूचनाओं की एक नयी खिड़की खोल दी। 
ये वो जमात है जो अपने घर या फ्लैट के ठीक सामने रहने वाले पड़ोसी को पहचानना तो दूर की बात है, उसका नाम तक नहीं जानता। वेब मीडिया ने इन सभी को वो साझा मंच दे दिया है जहां से वे अपने विचार, अपनी भावनाओं और सूचनाओं का आदान प्रदान कर सकते हैं। वेब माध्यम वैकल्पिक पत्रकारिता का एक साझा मंच बन कर उभरा है।  

ब्लॉग पर लेख लिखना या फेसबुक पर अपने विचार लिखना और अपने अनुभव बांटना एक तरह की व्यक्तिगत पत्रकारिता है, जहां आप अपने विचार, अपनी जानकारी बिना किसी संशोधन के पोस्ट कर सकते हैं। इस माध्यम की एक अच्छाई यह है की की यहाँ कोई आपका मालिक नहीं है जो तय करे की आपको क्या लिखना है और क्या नहीं? आपको पूरी वैचारिक स्वतन्त्रता ये माध्यम देता है। परंतु इसके नुकसान भी हैं। यहाँ कोई वरिष्ठ मार्गदर्शक आपके पास नहीं है जो आपको ये बता सके की आप कहाँ गलती कर रहे हो। यहाँ ऐसा कोई व्यक्ति या साधन उपलब्ध नहीं होता जो आपके लेख को सुधार सके। अन्य समाचार माध्यमों मे यह काम संपादक करता है, जिससे गलतियों की गुंजाइश कम हो जाती है।

इस बारे मे कोई संदेह नहीं है की वेब माध्यमों ने युवाओं को जोड़ा है और समाचारों के आदान प्रदान के इस वैकल्पिक माध्यम ने कई सामाजिक आंदोलन भी खड़े किए हैं। पिछले वर्ष दिल्ली मे एक चलती बस मे मेडिकल कालेज की छात्रा के साथ हुये बलात्कार और फिर अस्पताल मे उस छात्रा की मृत्यु के कारण जो सामाजिक आंदोलन खड़ा हुआ , वह निश्चित रूप से वेब माध्यमों और वैकल्पिक पत्रकारिता की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस आंदोलन ने सरकार को कानून मे संसोधन करने के लिए बाध्य किया।

वहीं पिछले दिनों झूठी सीडी बांटकर और वेब माध्यमों का दुरुपयोग कर मुजफ्फरनगर मे दंगे भी करवाए गए। धर्मांधता का विष बोया गया, जिसमे दर्जनो निरपराध लोगों की मृत्यु हुयी और 50हजार से जादा लोगों को घर छोड़ कर भागना पड़ा।
इसका कारण अधिकांश युवाओं का वैचारिक दिवालियापन और इंटरनेट ही है। काटो और चिपकाओ की मानसिकता वाला युवा वर्ग न तो अपने चारों तरफ घटने वाली घटनाओं को गंभीरता से लेता है, न तो ज़िंदगी को। ये वो पीढ़ी है जो कोचिंग क्लास और गाइड के भरोसे परीक्षा मे पास होती है। लायब्रेरी मे दिन बिताना, सैकड़ों पुस्तकों मे से अपने जरूरत की जानकारी खोजना, किसी भी विषय पर लिखी गयी सामिग्री को अपने तर्क की कसौटी पर कसना, जैसे काम यह पीढ़ी नहीं करती। सीधे गूगल के सर्च इंजिन से जो मिल जाए उसे कापी-पेस्ट कर लेना, फिर बिना उसकी सच्चाई जाने फेसबुक, ट्विटर जैसे माध्यमों से उसको अपने मित्रों से साझा करना और फिर चाहे वह असत्य ही क्यों न हो उसको सत्य मान कर उस पर निरर्थक बहंस करना जैसे काम यह वर्ग करता है।  

आज शहरों मे हर नुक्कड़, हर महाविद्यालय, हर रेस्तरां, हर माल या शॉपिंग एनक्लेव मे कानों मे ईयर फोन लगाए, टैब को टैप करते, अपने आस-पास की दुनिया से अनभिज्ञ, वास्तविकता से दूर अपनी अलग दुनियाँ मे रमें युवा वर्ग को हम देख सकते हैं। फेसबुक, ट्विटर, ई मेल आदि सुविधाएं आज मोबाइल फोन पर उपलब्ध हैं। युवाओं पर इनका नशा इतना हाबी है की अभिभावकों द्वारा इन पर रोक लगाए जाने पर युवाओं द्वारा आत्महत्या के कितने ही मामले सामने आए हैं। यथार्थ से अनभिज्ञ अपनी इस काल्पनिक दुनियाँ मे विचरण करने वाले युवा कभी-कभी तो यह भी भूल जाते हैं की वे रेल की पटरी लांघ रहे हैं या सड़क के बीचो-बीच खड़े हैं। ये अक्सर जान लेवा साबित होता है।

भारतीय स्त्री ने वेब माध्यमों पर अपनी छाप छोड़ी है। फेस बुक और ब्लॉग जैसे माध्यमों मे स्त्रियों का बोलबाला है। अपनी पारिवारिक और व्यावसायिक ज़िम्मेदारी को निभाते हुये भारतीय महिलाएं वैचारिक स्तर पर कितनी सक्रिय हैं यह वेब माध्यमों मे सहज देखा जा सकता है। भारतीय विदुषियाँ देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सोच मे अपनी सार्थक साझेदारी निभाती प्रतीत होती हैं। वेब माध्यम स्त्री सशक्तिकरण का एक मजबूत मंच बन कर उभरा है। नारी चेतना और स्त्री की इस आवाज़ का स्वागत किया जाना चाहिए। वेब माध्यमों पर अपनी कविता, कहानी और लेखों के माध्यम से महिलाओं ने साहित्य को भी समृद्ध किया है। यहीं पर यह कहते हुये संकोच हो रहा है परंतु पूरी विनम्रता से मैं ये कहना चाहूँगा की वेब माध्यमों पर महिलाओं मे एक दूसरे की पीठ थप-थपाने का प्रचलन बढ़ा है। बिना कथ्य पर ध्यान दिये उसे लाइक कर देना और एक दूसरे की कमियों को इंगित न करके उन्हे भी प्रोत्साहित करने का काम अधिकांश महिलाएं करती हैं।  

वेब माध्यमों को सामाजिक चेतना का माध्यम बनाते समय इसके दुरुपयोग को रोकने का काम भी उन्ही लोगों का है जो ये माध्यम अपना रहे हैं। इस माध्यम का उपयोग करने वालों को अपने मानक स्वयं तय करने होंगे, खुद पर स्वयं अंकुश लगाना होगा। देश और समाज का अहित करने वाली भ्रामक सूचनाओं को रोकने, अनावश्यक, असंसदीय और अश्लील शब्दों के उपयोग को रोकने का काम भी इस माध्यम को स्वयं करना होगा।
अंत मे अधोलिखित कुछ पंक्तियों के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देना चाहूँगा ….

ट्विटर
है वह डाल 
जिस पर कौवे से लेकर कोयल तक 
तोते से लेकर कबूतर तक 
करते हैं गुटर गूं ....
बगुले बहुत हैं यहाँ 
हंस तो शायद कभी कभार 
ही इस पर बैठते हैं ....
फेसबुक बन गयी है 
हमारे जीवन की लाग बुक 
जहाँ अपनी जवानी की 
तस्वीर चिपकाकर 
दूसरों की कविता 
उनके विचार चिपका कर 
हम बटोरते हैं वाह-वाहियाँ 
मित्र  
एक दुसरे की पीठ खुजाते हुए 
खुद को 
परम विद्वान् होने का भ्रम पाले 
अपने पडोसी से लेकर 
आसमान तक पर थूकते रहते हैं
ब्लॉग
है वह सजा धजा प्लैटफार्म 
जहाँ आम पाठक की गाड़ी 
कम ही रुकती है
परन्तु जब आप 
ट्विटर पर गीत लिखते हैं 
तो अच्छा लगता है
फेस बुक पर मुस्कराते हैं 
तो मेरा दिन महक जाता है
ब्लॉग पर उकेरते हैं 
संवेदनाओं की रेखाएं 
मेरा दिल बाग-बाग हो जाता है
बाग-बाग हो जाता है ....
                                 ओमप्रकाश पांडे  'नमन'
मोबाइल- 8080888988/9820787034
Blog-www.namanbatkahi.blogspot.com

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