शुक्रवार, 21 मार्च 2014

पूंजीवादी पत्रकारिता vs वैकल्पिक पत्रकारिता





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निलेश कुमार, वर्धा
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में आयोजित हिन्दी का दूसरा समय के तीसरे दिन की परिचर्चा हिन्दी और पत्रकारिता पर केन्द्रित रही। समानान्तर सत्र के दौरान चौथा और महत्वपूर्ण विषय रहा- ‘वैकल्पिक पत्रकारिता’ । समता भवन के रामचंद्र शुक्ल कक्ष में हुई इस परिचर्चा में देश के जाने-माने पत्रकार और विद्वान उपस्थित रहे । परिचर्चा का संचालन कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी के विभागाध्यक्ष डॉ. राम आह्लाद चौधरी ने और अध्यक्षता समयान्तर के संपादक पंकज विष्ट ने की ।
मंच पर उपस्थित वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर जी, प्रो. खगेन्द्र ठाकुर और स्वाधीन जी के अलावे पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज, समावर्तन पत्रिका के संपादक मुकेश वर्मा, महेंद्र गगन, अमित राय, स्वतंत्र लेखिका मधु कांकरिया, पुष्पराज एवं अन्य वक्ताओं ने काफी सार्थक बहस की।
परिचर्चा में मुख्यतः वैकल्पिक पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति, भविष्य में संभावनाएं, समस्याएँ, चुनौतियों एवं संभव उपायों पर बातें रखी गईं।
परिचर्चा की शुरुआत करते हुए पंकज विष्ट ने कहा कि मुख्य धारा के प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाएँ आज के समय में हित एवं स्वार्थ की पूर्ति के लिए काम कर रहे हैं। हित, जिसमें प्रसार को बढ़ाने हेतु प्रयासरत रहते हैं और स्वार्थ, जिसके अंतर्गत पेड न्यूज़ के आड़ में समाचार परोसते हैं। चुनाव आयोग के अनुमान का हवाला देते हुए उन्होने पेड न्यूज़ का कारोबार पांच सौ करोड़ के आस-पास बताया । उन्होने कहा कि मुख्य धारा की प्रिंट एवं एलेक्ट्रोनिक पत्रकारिता समाज के जिस सतह को दिखती है, उस सतह के नीचे कई यथार्थ हैं और इस यथार्थ को वैकल्पिक पत्रकारिता ही बयां करती है । उन्होंने वैकल्पिक पत्रकारिता की पूंजी, प्रचार हेतु चैनल और वितरण संबंधी समस्याओं पर भी प्रकाश डाला।
वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने कहा कि मुख्यधारा के समाचार पत्रों मे समाचार वही हैं जो विज्ञापन से बची हुई जगहों में प्रकाशित होती हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की शुरुआत ही वैकल्पिक पत्रकारिता से हुई थी । वैकल्पिक समाज, वैकल्पिक सरोकार, वैकल्पिक जीवन से । उन्होने काल मार्क्स और महात्मा गांधी को याद करते हुए कहा कि पत्रकारिता की शुरुआत नया समाज बनाने के लिए होती है, लेकिन व्यवस्था धीरे-धीरे इनके उद्देश्य एवं मूल्यों को प्रभावित कर देती है।
प्रेम भारद्वाज ने अपने वक्तव्य में कहा कि जब हम विकल्प कि बात करते हैं, तो यह कुछ ग़लत होने, निराशा और बेचैनी की ओर इंगित करता है। उन्होने मुख्य मीडिया को चिकनी सड़क बताते हुए कहा कि मुख्य मीडिया रास्ते में आने वाले गाँव, कस्बों को छोड़ते हुए बाइपास से निकाल जाती है और वैकल्पिक पत्रकारिता उन्हीं कस्बों, मुहल्लों की पगडंडियो पर चलती है।
उन्होने कहा कि हमेशा से अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता को लेकर चर्चाएँ होती रहती हैं, लेकिन प्रतिबद्धता को लेकर नहीं। देश के जाने-माने अंग्रेज़ी समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया की नब्बे प्रतिशत कमाई का जरिया विज्ञापन है, इस बात को विस्तारित करते हुए उन्होने इस ओर भी संदेह जताया कि आने वाले पंद्रह वर्षों में संपादकीय पेज बंद हो सकते हैं ।
स्वाधीन जी ने तेलंगाना का संदर्भ देते हुए बताया कि सच्चाइयाँ सामने नहीं आ पा रही है, इसका एकमात्र विकल्प वैकल्पिक पत्रकारिता ही है। (............)
महेंद्र गगन ने कहा कि विकल्प असंतोष से पैदा होता है और यहीं वैकल्पिक पत्रकारिता कि ज़रूरत महसूस होती है। उन्होने सोशल साइटस को भी आज के समय में बेहतर विकल्प बताया । मुकेश वर्मा ने ये बताते हुए कि किस तरह मुख्य मीडिया अपने उद्देश्य से भटक चुकी है, कहा कि आज ज़रूरत है इस पूंजीवादी व्यवस्था के युग में मानवीय मूल्यों को महत्व दिया जाए ।
प्रो. रमेश दीक्षित ने मुख्य धारा की पत्रकारिता को अपन गौरवपूर्ण इतिहास खो देने के लिए जिम्मेदार बताते हुए वैकल्पिक पत्रकारिता को ही विकल्प सुझाया और समाज से इसे समर्थन मिलने की उम्मीद जताई।
पुष्पराज ने नागरिक और जनता में अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि नागरिक नगर से बना है और मुख्य मीडिया इनके लिए पत्रकारिता करती है, जबकि वैकल्पिक मीडिया आम जनता के लिए । उन्होने इसके पाठकों के बीच में से ही लेखकों एवं पत्रकारों को प्रोत्साहित किए जाने की पेशकश की।
प्रो. खगेन्द्र ठाकुर ने पूंजीवादी गणतन्त्र में हर आंदोलन का अपना मीडिया होने को आवश्यक बताया । उन्होने उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया कि वैकल्पिक पत्रकारिता के विकास में एक बाधा यह भी है कि इसके खिलाफ़ साजिशें रची जाती हैं । मधु कांकड़िया ने जागरूक नागरिक की हैसियत से अपनी बात राखी और अपने वक्तव्य में ये स्पष्ट किया कि किस तरह मुख्य मीडिया सत्य को छिपाता ज़्यादा है और दिखाता कम है ।
संचालक डॉ. चौधरी के शब्दों में कहा जाए तो मुख्य धारा की पतरकरिता से उत्पन्न लाइलाज बीमारी का सटीक प्रिसक्रिप्शन ‘वैकल्पिक पत्रकारिता’ है और इसी संजीवनी के माध्यम से पत्रकारिता को नई दिशा और दिशा मिलेगी।
कार्यक्रम की समाप्ति पंकज विष्ट ने परिचर्चा के दौरान उठे सवालों का जवाब देकर किया । इसमें विभिन्न पाठ्यक्रमों के विद्यार्थी, शोधार्थी , अध्यापकगण एवं अन्य कर्मचारी उपस्थित रहें ।

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