बुधवार, 19 मार्च 2014

ज्यादा स्मार्ट बनने वाले अक्सर पकड़े ही जाते हैं



   

पकड़ा गया इंडिया टीवी के रजत शर्मा का सफ़ेद झूठ


नई दिल्ली। इंडिया टीवी के सर्वेसर्वा रजत शर्मा 14 मार्च को प्रसारित 9 बजे के कार्यक्रम 'आज की बात' में अरविंद केजरीवाल के कई पेंच खोलने की कोशिश की। बुखार होने और बीमार होने का हवाला देते हुए रजत शर्मा ने पत्रकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करने के लिये 14 मार्च का कार्यक्रम एंकर किया। लेकिन कार्यक्रम के अंत में रजत शर्मा ने जो दावा किया था अब वो सारे दावे सवालों के घेरे में है। इस कार्यक्रम के अंत में रजत शर्मा ने अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को संबोधित करते हुए कहा कि "केजरीवाल जी, आपको पब्लिक लाइफ में आये हुये चार दिन हुये हैं। संघर्ष क्या होता है, ये आपको नहीं मालूम है। लेकिन अपनी बात कहने की आजादी के लिये मैंने इमरजेंसी के ज़माने में जेल काटी है। उस ज़माने में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश था, आज़ाद अखबार निकालने के लिये पुलिस मुझे पकड़ के ले गई और मैंने मार खाई। दो दिन तक थाने में टार्चर सहा और अगर हिम्मत से सच कहने के लिये सौ बार और ज़ेल जाना पड़ेगा तो मैं तैयार हूं क्योंकि देश की जनता मेरे साथ है।" गौरतलब हो कि रजत शर्मा ने अपने कार्यक्रम में इस तरह के दावे किये हैं।
दरअसल 57 वर्षीय रजत शर्मा का जन्म 30 अप्रैल 1956 में हुआ था। इन्होने जिस इमरजेंसी के ज़माने में जेल काटने की बात कही है, उसकी हक़ीकत ये है कि रजत शर्मा ने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ही 1982 के आसपास की थी। आपातकाल 25 जून, 1975 को लगाया गया था और 21 मार्च 1977 तक लागू था। यहाँ गौर करने की बात ये है कि जिस वक़्त के बारे में रजत शर्मा एक स्वतंत्र अखबार निकालने की बात करते हैं उस वक़्त इनकी उम्र मात्र 19 साल की थी। अब यहाँ ज़रा सोचने वाली बात ये है कि अगर वो सिर्फ आंदोलन में जेल जाने की बात कहते तो एक बार उनकी बातों पर विश्वास किया भी जा सकता था। लेकिन 19 साल की उम्र में अखबार चलाने की बात ज़रा अतिसंयोक्ति सी लग रही है क्यूंकि उन्होंने खुद अपने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया है कि उनका पत्रकारिता कैरियर 1982 में शुरू हुआ है और उसी वक़्त उन्होंने अपना पहला लेख लिखा था, फिर 1975 में वो अखबार कैसे निकालने रहे थे? रजत शर्मा के ही पुराने इंटरव्यू के अनुसार 1982 में पहली बार उन्होंने ऑनलुकर में अपना पहला लेख लिखा था।
गौरतलब हो कि 11 अप्रैल 2009 को बीबीसी को दिये एक साक्षात्कार के अंश में या विकिपीडिया पर इसकी सत्यता की जांच कर सकते हैं। उनका कहना था कि "पत्रकार बनने का कभी नहीं सोचा था। बस सोचा था कि एम कॉम के बाद बैंक में नौकरी करूँगा और घर का भार कम करूँगा। एम कॉम के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहा था तभी मेरी मुलाक़ात जयनंदा ठाकुर से हुई। उन्हें रिसर्चर की ज़रूरत थी। उन्होंने इसके लिए मुझे चार सौ रुपये महीने देने का वादा किया। एक दिन मैंने उनसे कहा कि जितनी सूचनाएँ मैं देता हूँ, वो सब तो आप इस्तेमाल नहीं करते। क्या मैं इसे इस्तेमाल कर सकता हूँ? फिर मैंने एक लेख ऑनलुकर पत्रिका को भेजा और उन्होंने इसके लिए मुझे 600 रुपये दिए। ये बात जुलाई 1982 की होगी। ऑनलुकर के एडीटर डीएम सिल्वेरा ने मुझे पत्रिका में बतौर ट्रेनी का ऑफ़र दिया। इसे आप मेरी किस्मत ही कह सकते हैं। 1982 के आखिर में उन्होंने मुझे संवाददाता बना दिया, फिर 1984 में दिल्ली का ब्यूरो चीफ़।"
अब यहाँ ये रिसर्च का विषय है कि रजत शर्मा ने अपने पुराने इंटरव्यू में झूठ बोला था कि उनका पत्रकारिता कैरियर सन 1982 में शुरू हुआ था या फिर अब बोल रहे हैं कि वो 1975 में आपातकाल के दौरान उनके आज़ाद अखबार चलाने के लिए उन्हें जेल भेजा गया था। वैसे 'आप की अदालत' लगा कर मशहूर हुये रजत शर्मा अब 'आप' की अदालत के कटघरे में हैं। जाहिर है, केजरीवाल को झूठा बताने की कोशिश में रजत शर्मा ऐसी बात कह गये हैं, जिसे साबित करना उनके लिये मुश्किल होगा।

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