सोमवार, 24 मार्च 2014

मीडिया की मीडिया नागरिकता




मीडिया नागरिकता

रवीश कुमार

2014.03.02
समाज की जानकारी का सोर्स मीडिया है और मीडिया की जानकारी का सोर्स भी मीडिया है। घूम घूम के वही बात। धीरे धीरे मीडिया नागरिक चंद अवधारणाओं के गिरफ़्त में जीने लगता है
रवीश/हम एक मीडिया समाज में रहते हैं। नागरिकता कई प्रकार की होती है लेकिन लगातार कई माध्यमों के असर में हम 'मीडिया नागरिक' बन रहे हैं। हम पहले से कहीं ज़्यादा मीडिया के अलग अलग माध्यमों से अपनी अपेक्षाएँ पाल रहे हैं और ये माध्यम हमें प्रभावित कर रहे हैं। जो काम विज्ञापन अपने असर में हमसे साबुन से लेकर जीन्स तक का सक्रिय उपभोक्ता बनाने में करता है वही काम मीडिया हमें 'दलीय उपभोक्ता' बनाने में कर रहा है। ट्वीटर पर कई लोग अपने हैंडल नाम के लिए नमो फ़ैन्स या रागा फ़ैन्स या केजरी फ़ैन्स लिखते हैं। फ़ैन्स राजनीति का नया उपभोक्ता वर्ग है जिसे सतत प्रचार के ज़रिये पैदा किया जाता है। मीडिया और सोशल मीडिया के स्पेस में। यही वो मीडिया नागरिक है जो सोशल मीडिया के अपने स्पेस में 'नान रेसिडेंट सिटिज़न' की तरह मुख्यधारा की मीडिया को देखता है जैसे एक एन आर आई इंडिया को ताकता है। यह मीडिया को भी एक राज्य और उसमें ख़ुद को नागरिक की तरह देखता है।
पिछले तीन साल से टीवी लगातार इन सवालों के केंद्र में है कि अन्ना आंदोलन को पैदा किया। यह तब हुआ जब टीवी कई घटनाओं के निरंतर दिखाने की आदत का शिकार हो चुका था। प्रिंस जब गड्ढे में गिरा और उससे पहले दिल्ली में मंकी मैन का आना। टीवी लगातार खोज रहा था कि ऐसा कुछ हो जिसे वो घंटों दिखाये। सबकुछ सुनियोजित तरीके से नहीं भी हो रहा था मगर हो जा रहा था। अन्ना आंदोलन एक ऐसा मसला बन गया जिसने मीडिया नागरिकता का विस्तार जंतर मंतर और रामलीला मैदान तक कर दिया। वहाँ होना और टीवी के सामने होना या सोशल मीडिया पर होना एक हो गया। मैं नहीं मानता कि रामलीला मैदान में लोग टीवी पर चेहरा दिखाने गए थे न ही टीवी उन्हें दिखाकर वहाँ ला रहा था। फ़ोन ट्वीटर और फ़ेसबुक और इन सब माध्यमों से भी सुनकर उत्तेजित होकर आए।
अन्ना आंदेलन के कवरेज ने ऐसे घरों में दोपहर के वक्त न्यूज़ टीवी चला दिया जब सीरीयल देखने का होता है। टीआरपी की भाषा में औरतों का समय होता है। लोगों का नए सिरे राजनीतिकरण तो हो रहा था मगर उससे कहीं ज़्यादा 'मीडिया नागरिकीकरण' होने लगा। लोग जहाँ थे वहीं पर एक ख़ास तरीके से मीडिया नागरिक बन गए। टीवी सोशल मीडिया और मोबाइल का विस्तार एक दूसरे के पूरक बन गए।
गुजरात चुनावों के दौरान अहमदाबाद में एक बीजेपी कार्यकर्ता के घर बैठकर नमो चैनल देख रहा था। एक फ़ोन चालू रखा गया था ताकि उस जगह का रिश्तेदार मोदी का भाषण सुन रहा था जहाँ नमो चैनल नहीं आता था। दिल्ली चुनावों के दौरान मुझे विदेशों से कई फ़ोन आए जो अरविंद केजरीवाल की सफलता को लेकर चिन्तित थे। कुछ होते देखना चाहते थे। फ़ेसबुक के इन बाक्स में कुछ लोगों ने लिखा कि अरविंद का क्या होगा इस चिन्ता से रात भर जाग रहे हैं। उसी तरह जब दिसम्बर के महीने में अरविंद का कवरेज कई गुना बढ़ गया और इससे नरेंद्र मोदी मीडिया विस्थापित हो गए तब नमो फ़ैन्स बेचैन होने लगे। मीडिया नागरिकता के कई लक्षणों में से एक है। नागरिक बेचैनियों का विस्तार है न्यूज़ चैनल और उसके डिबेट शो।
टीवी का विस्तार गाँवों और झुग्गियों में तेज़ी से हो रहा है। मुंबई दिल्ली की झुग्गियाँ हों या सड़क किनारे बनी मड़ई आप देखेंगे कि उनकी छतों पर डिश टीवी का तवाकार एंटिना बजबजा रहा है। ठेले पर फल बेचने वाले एक जवान ने हाथ मिलाते हुए कहा कि आप नेताओं को सही से नंगा करते हो। इतनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा टीवी पर। केबल पर। यह वो तबक़ा है जिसे मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल ने खदेड़ दिया है। मैं दिल्ली कई इलाक़ों में ऐसे अनेक लोगों से मिलता हूँ जो दिल्ली में रहते हुए बीस साल से सिनेमा हाल नहीं गए हैं। इनमें से कई ऐसे हैं जो कभी सिंगल सिनेमा में फ़्रंट स्टाल का टिकट लेकर देखते थे। इस तबके लिए टीवी सिनेमा है। मनोरंजन का माध्यम है। टीवी के दर्शक का सत्तर फ़ीसदी हिस्सा यही है जिसे नेता नव मध्यमवर्ग कहते हैं। ग़रीबी के सागर में रेखा से ऊपर डूबता उतराता तबक़ा। इसी तबके तक पहुँच की ज़िद में न्यूज़ चैनल भी सिनेमा का विस्तार बन गए। रिपोर्टिंग की जगह किस्सागो बन गए। अब यह समाज धीरे धीरे राजनीतिक तौर से रूपांतरित हो रहा है। राजनीतिक पहले भी था मगर इसकी सक्रियता मीडिया के स्पेस में भी बढ़ रही है। यही प्रवृत्ति इसके ऊपर के तबके में हैं। इस तबके में पेपर भले न आता हो मगर टीवी आता है।
इसीलिए आप देखेंगे कि टीवी सिर्फ बोलने लगा है। दिखाना छोड़ दिया है। जनमत के नाम पर हताशा का समोसा तला जा रहा है। बातों और तथ्यों का कोई परीक्षण नहीं है । इंटरनेट स्पेस में पहले से मौजूद तथ्यों के आधार पर सवाल बनते हैं और पूरा संदर्भ एक सीमित दायरे में बनता चला जाता है। हर टीवी पर एक ही टापिक और जानकारी का एक ही सोर्स गूगल। किसी चैनल के पास अपनी रिपोर्टिंग के ज़रिये नई जानकारी नहीं है। चैनल सिर्फ लोगों में मौजूद मिथकों, अवधारणाओं, अधकचरी जानकारियों और बेचैनियां का छेना फाड़ कर पनीर बना रहे हैं। यह जनमत नहीं भगदड़ है। जहाँ सब चिल्ला रहे हैं और सुनने वाले को लगता है कि उसकी बात हो रही है। " आप सही करते हो नेताओं को धो डालते हो " ऐसी प्रतिक्रिया इसी की अभिव्यक्ति है।
इसीलिए कहता हूँ कि मीडिया समाज की सक्रियता का मतलब जागरूकता ही हो यह ज़रूरी नहीं है। उसकी जानकारी का सोर्स मीडिया है और मीडिया की जानकारी का सोर्स भी मीडिया है। घूम घूम के वही बात। धीरे धीरे मीडिया नागरिक चंद अवधारणाओं के गिरफ़्त में जीने लगता है। यह उसका आरामगाह यानी कंफर्टज़ोन बन जाता है। एक किस्म की कृत्रिम जागरूकता और भागीदारी बनती है। अवधारणाओं की विविधता समाप्त हो जाती है।
इनदिनों कई टीवी चैनलों पर मत प्रतिशत बढ़ाने का थर्ड रेट अभियान चल रहा है। वोट देना ज़रूरी है लेकिन इसके नब्बे प्रतिशत हो जाने से क्या गुणात्मक बदलाव आता है क्या किसी ने सोचा है । वोट देना ही ज़रूरी है या यह भी ज़रूरी है कि बिना जानकारी के वोट न दें। एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र में यह कहा जाना चाहिए कि अगर मुद्दों की पर्याप्त समझ या जानकारी नहीं है तो वोट न दें। प्रतिशत संख्या के लिए जनमत नहीं हो रहा मगर मीडिया ने इसे संख्यात्मक जनतंत्र में बदल दिया है और मीडिया नागरिक ने स्वीकार भी कर लिया है। मीडिया नागरिक अपनी ही अवधारणाओं के सहारे मीडिया का प्रतिबिम्ब बन जाता है। प्रतिकृति या अनुकृति। 'मिरर इमेज' । वो मीडिया की आभासी दुनिया में भड़ास निकाल कर अपनी नागरिकता को जी रहा है।
यहीं से एक संभावना पैदा होती है जनमत को गढ़ने की। मीडिया कारपोरेट और पूँजी का खेल शुरू हो जाता है। विज्ञापन और बयानों के ज़रिये नेता की लोकप्रियता पैदा कर दी जाती है। अब इस खेल से कोई बच नहीं सकता। चिन्ताओं को भुनाने का खेल चल रहा है। चंद चिन्ताओं की पहचान कर उसे व्यापक रूप दिया जा रहा है और एक उम्मीद बेची जा रही है। जनमत सर्वेक्षण के नाम पर कौन कितना लोकप्रिय है और सीटों की संख्या कितनी है इस पर बात हो रही है। मीडिया ने रिपोर्टिंग बंद कर यही रास्ता पकड़ लिया है।  ख़बरों और समस्याओं की फ़ाइलें लेकर बड़ी संख्या में लोग रिपोर्टरों को खोज रहे हैं। चैनलों के चक्कर लगा रहे है। ईमेल कर रहे हैं। जिन्हें न्यूज़ रूम में कोई पढ़ता तक नहीं। हरियाणा से एक सज्जन का फ़ोन आया कि मुख्यमंत्री मुफ़्त चिकित्सा योजना लागू हुई है जिससे दूसरे राज्यों के ग़रीब मज़दूरों को बाहर कर दिया गया है। उनका सरकारी अस्पतालों में इलाज बंद हो गया है। सज्जन ने कहा कि अनशन पर बैठने जा रहा हूँ। देखता हूँ मीडिया कैसे नहीं आएगा । इसी ब्लाग पर स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए लड़ रहे धर्मवीर पालीवाल की कहानी लिखी मगर सोशल मीडिया में चर्चा तक नहीं की और किसी में छापा कर नहीं। एक सज्जन एक लाख करोड़ के धान ख़रीद घोटाले की फ़ाइल लेकर चैनल चैनल घूम रहे हैं कोई पढ़ने वाला तक नहीं। इस कथित घोटाले में बीजेपी कांग्रेस सहित कई सरकारें शामिल हैं। ऐसी बात नहीं कि मीडिया ने घोटालों की खोज नहीं की है। अख़बारों ने की है। टीवी ने कम ।
दूसरी तरफ़ ऐसे कृत्रिम मुद्दे उठ रहे हैं जो कांग्रेस बीजेपी के खुराक बनते हों। ऐसा नहीं है कि मुद्दे नहीं उठते मगर इनकी संख्या दस से बारह होकर रह जाती है। लगातार रिपोर्टिंग नहीं होती। रिपोर्टिंग ने चैनल का बहुत कुछ दांव पर लगता है। संपादक की दोस्ती दाँव पर लगती है। चैनल या अख़बार कई तरह की असुविधा से बच जाते हैं। अख़बारों में भी टीवी है । वहाँ भी घटना प्रधान चर्चा है। इसीलिए टीवी पर जनमत शो की बाढ़ है।  आयं बायं सायं बोलकर चले जाइये। इसमें आप पहचाने नहीं जाते कि आपकी रिपोर्ट से किसी को तकलीफ़ तो नहीं हुई। डिबेट शो ज़रूरी है मगर ख़बर की क़ीमत पर नहीं। डिबेट शो जनमत के नाम पर फ्राड है। समझिये इस बात को।  अपनी खुजली टीवी देखते हुए मत खुजाइये। मैं इसीलिए घर पर कोई डिबेट शो नहीं देखता। कोई शो अच्छा होगा मगर यह एक बुनियादी ज़ररत की क़ीमत पर है।  क्या आप सब्ज़ी की जगह रोज़ रसगुल्ला खा सकते हैं। पौष्टिकता के लिए ज़रूरी है रिपोर्टिंग। इसके न होने से ही मीडिया और मीडिया नागरिक एक दूसरे की अनुकृति बन जाते हैं। कृत्रिम जनमत बनता है।
(रवीश जी के ब्लॉग कस्बा से साभार)

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