गुरुवार, 27 मार्च 2014

जोधा सी नीति बनाने में नाकाम रहे एम जे अकबर





हमदी बे लिखते हैं…
 कुछ अखबार (द स्टेट्समैन और आनंद बाजार) ऐसे हैं, जो अपने संस्थान में कभी भी कम्युनिस्ट पृष्‍ठभूमि के कर्मचारी को नहीं रखते, बशर्ते कि उसकी किसी ने सिफारिश न की हो। यह उन लोगों पर भी लागू होता है, जो केवल किसी कम्युनिस्ट अखबार में रहे हों, भले ही उनका सक्रिय राजनीति से कोई जुड़ाव न रहा हो।
 बिरला के (उद्योगपति बिरला द्वारा सर्चलाइट) इस अखबार को खरीदने से पहले तक मुरली प्रसाद मनोहर एक अच्छे और जनपक्षीय संपादक, कर्मचारियों के अच्छे नेतृत्वकर्ता थे। लेकिन मालिक बदलने के बाद अकबार के प्रबंधन ने धीरे-धीरे उनके सहकर्मियों को उनके खिलाफ खड़ा करके उन्हें हटा दिया। उनमें केवल वही एक पेशेवर और योग्य थे।
 द इंडियन नेशन की जिम्मेदारी एक योग्य प्रबंधक के हाथ में आ गयी। उसने संपादकीय कर्मचारियों की केवल (दरभंगा के) महाराज के पक्ष में खबर लिखने की प्रवृत्ति को रोकने की कोशिश की। सबसे खराब घटना उस समय घटी, जब 1952 में महाराज लोकसभा का चुनाव हार गये। इस अखबार ने यह खबर नहीं छापी। प्रबंधक सभी कर्मचारियों को डांट लगाते हुए कहा कि ‘महाराज की हार द इंडियन नेशन के नहीं छापने से बदल नहीं जाएगी।’
 डालमिया (द टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक) संपादक फ्रैंक मोरेज को बदलकर ऐसा संपादक रखना चाहते थे, जो यह वादा कर सके कि अपने व्यक्तिगत प्रभाव से वह उनके आयकर के मामलों को हल कर देगा।
 थॉमस ने बॉम्बे कर्मचारी संघ का अध्यक्ष रहते हुए एक बार एक दिन की हड़ताल की घोषणा की थी। लेकिन हड़ताल वाले दिन से एक दिन पहले ही उसने अध्यक्ष का पद छोड़ दिया और काम करने लग गया।
द स्टेट्समैन
 द स्टेट्समैन ने फिल्म ‘द प्राइवेट लाइफ ऑफ हेनरी 8’ के प्रदर्शन की खबर को इस तर्क के साथ छापने से मना कर दिया कि इससे भारतीय लोगों की नजर में ब्रिटिश की छवि खराब होगी।
 द स्टेट्समैन के संपादक ऑर्थर मूर ने पहली बार हस्ताक्षर सहित लेख लिखने का दस्तूर शुरू किया।
 भारी मात्रा में ब्रिटिशों के विज्ञापन मिलने लगने के बाद द स्टेट्समैन उन तीन फर्मों पर निर्भर नहीं रह गया, जो जमाखोरी और चावल के दामों में बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार थीं। कलकत्ता में द स्टेट्समैन के प्रतिद्वंदी अखबार उन भारतीय फर्मों की कृपा तले दबे थे। इसलिए उन्होंने अकाल को कमतर करके पेश किया। इन अखबारों ने अकाल की कोई खबर या तस्वीर छापी भी, तो वह केवल द स्टेट्समैन से होड़ के चलते। इन अखबारों ने खुले तौर पर अपने विज्ञापनदाताओं का पक्ष लिया और कहा कि वे अपने विज्ञापनदाताओं के हितों का ध्यान रखेंगे।
 द स्टेट्समैन ने आजाद कश्मीर की सरकार का एक विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें इमारती लकड़ी की नीलामी के दिन की सूचना दी गयी थी। इसके बचाव में कहा गया कि सही दिखने वाला यह विज्ञापन गलती से छप गया। लेकिन निश्चित तौर पर स्टेवेन इस बात को लेकर चिंतित नहीं थे कि जिस देश के अखबार के बतौर द स्टेट्समैन की पहचान है, वहां से विज्ञापन मिलने बंद हो जाएंगे। भारत सरकार ने द स्टेट्समैन को विज्ञापन पर रोक लगा दिया। इसको मिलने वाले विज्ञापनों में भारत सरकार के विज्ञापन करीब आधे होते हैं। यहां तक कि अभी 120 करोड़ के विज्ञापनों में से 65 करोड़ के विज्ञापन संघ और राज्य सरकारों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के होते हैं। 1950 में यह अनुपात और अधिक था। द स्टेट्समैन को झुकना पड़ा।
 स्टेवेन अपनी कड़ी मेहनत और अच्छे लेखने के लिए जाने जाते थे लेकिन कार्यालय में सोना, सशस्त्र निजी सुरक्षाकर्मी रखना, योग करना और समलैंगिकता जैसे आरोपों ने कर्मचारियों में उन्हें उपहास का विषय बना दिया था।
पत्रकारिता में जॉनसन जैसा संपादक
 स्टेवेन के बाद जॉनसन द स्टेट्समैन के संपादक बने। राजनीतिक रूप से जॉनसन इसलिए स्वीकार्य थे क्योंकि वे अपने मद्रास मेल टुडे के दिनों से सी राजगोपालाचारी के मित्र थे। अखबार का काम संभालने से पहले जॉनसन ने शर्त रखी थी कि भारत में संपादक ही सर्वोच्च होगा। संभवत: वह आजाद कश्मीर वाले विज्ञापन की गलती वाली घटना को भूलना चाहते थे। अखबार के प्रबंधक को बाहर कर दिया गया। इस पद पर उसकी संपादकीय विभाग के ही एक वरिष्ठ कर्मचारी को नियुक्त किया गया। हालांकि नये प्रबंधक की नियुक्ति को बाबुओं ने स्वीकार नहीं किया और उनकी यूनियन के प्रदर्शन के दौरान प्रबंधक को धक्का-मुक्की सहनी पड़ी। प्रबंधक को बचाने के लिए जॉनसन को हवा में रिवाल्वर लहरानी पड़ी।
 रात को एक वरिष्ठ उप संपादक सभी विज्ञापनों का प्रूफ जांचता था। अगर किसी भी विज्ञापन में कोई भी चीज आपत्तिजनक लगती, तो वह विज्ञापन अगली रात के लिए रोक लिया जाता था।
 जॉनसन रात को रेडियो प्रसारण सुनने के बाद टेलीफोन से मुख्य उपसंपादक से बात करते और उस दिन की मुख्य और पहले पन्नों के अखबारों के बारे में चर्चा करते।
 रात को जो मुख्य उपसंपादक कार्यालय में होता, उसके लिए जॉनसन का टेलीफोन उठाना और खबरों पर चर्चा करना बहुत तकलीफदेह होता। एक बार जॉनसन के सवाल पर रात की पाली में मुख्य उपसंपादक की अनुपस्थिति में काम कर रहे एक उपसंपादक ने अपना आपा खो दिया और उसने जॉनसन से कहा कि वह उनसे बहस करने में अपना समय खराब नहीं कर सकता। अगली सुबह जॉनसन ने संपादकीय बैठक में इस बात की चर्चा की। बैठक के बाद एक सहायक संपादक तुरंत उप संपादक के घर पहुंचे और उसे जॉनसन को हड़काने की खुशी में शराब भेंट की।
 बीसी राय व्यक्तिगत रूप से साफ छवि के थे और बिना किसी समझौते के अखबार का समर्थन करते थे। हालांकि यह समर्थन बहुत सावधानीपूर्वक था न कि खुल्लमखुल्ला। इसलिए लोगों का ध्यान इस ओर नहीं जा पाता।
 स्वेज संकट के समय जॉनसन ने मिस्र का समर्थन किया। इस रुख से ब्रिटिश व्यापारिक हितों से जुड़े लोग बहुत नाराज हुए। अखबार उठाने वाली सबसे बड़ी एजेंसी के मालिक ने उसके अखबार को लेना बंद करने की चेतावनी दी। लेकिन जॉनसन ने उसे भाव नहीं दिया।
 स्टेट्समैन में जब पहली बार यह खबर छपी कि सिगरेट पीने से कैंसर हो सकता है तो इंपीरियल टोबैको कंपनी ने इसके सारे विज्ञापन रोक दिये। जॉनसन ने सभी उप संपादकों को यह नोटिस जारी कर दिया कि इस तरह की खबर रोकी नहीं जाए, भले ही वह दोबारा छप जा रही हो।
 जब एंड्रयू येल एंड कंपनी (जो कभी स्टेट्समैन की भी मालिक थी) के खिलाफ एक खदान में दुर्घटना की जांच रिपोर्ट आयी, तो उसकी खबर खुद जॉनसन ने बनायी।
 जॉनसन ने एक बार अखबार और मालिक के संबंधों पर संपादकीय लिखा। उनका मानना था कि केवल बड़े अखबार जिनके पास अपार संसाधन हो और विज्ञापनों से अच्छी कमाई होती हो तभी वह स्वंतत्र रह सकते हैं।
 अखबार के मालिक और संपादक के संबंधों को लेकर उनका मानना था कि बेहतर होगा कि इसे दोनों की आपसी समझदारी पर छोड़ दिया जाए।
 रिपोर्टरों को प्रोत्साहित करने के लिए चोपड़ा उन्हें बाइलाइन देने का हथकंडा अपनाता था।
 संयुक्त मोर्चा सरकार कलकत्ता के मध्य वर्ग के बीच लोकप्रिय नहीं रह सकी। स्टेट्समैन का प्रसार कलकत्ता के मध्यवर्गीय लोगों के बीच ही था। मध्यवर्ग शहर और हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, जिसकी वजह से उनका जीवन मुश्किल हो रहा था।
 पहले चोपड़ा, फिर रंगाचारी और फिर नानपोरिया और अंतत: ननपोरियो को उन लोगों ने अपमानित भी कर दिया। उनमें एक ने उन्हें उनके मुंह पर ही कमीना कह दिया।
 नानपोरिया के एक पसंदीदा लेखक जो कि उसकी तरह आयात हुआ था, ने अपना कुछ लिखने की बजाय दूसरे लोगों के लेखों को चुराकर लिखना शुरू कर दिया।
 निहाल सिंह को दिल्ली का स्थानीय संपादक बनाया गया। जिस दिन निहाल सिंह ने यह काम संभाला दिल्ली से कोई भी संपादकीय मंजूरी के लिए नहीं गया। स्टेट्समैन में यह चलन था कि ज्यादातर संपादकीय कलकत्ता में तैयार होते थे। उत्तर भारत से जुड़े मुद्दों पर दिल्ली से लिखे गये संपादकीय को कलकत्ता से मंजूरी मिलती थी और वह दिल्ली से छपता था।
 नानपोरिया ने सूचना मंत्रालय से प्रबंधक संपादक के खिलाफ सौदा करना शुरू कर दिया। दोनों ही पारसी थे और दोनों को एक ही समर्थन मिलता था खासतौर से पालखीवाला से।
 इसमें कोई दो राय नहीं कि आनंद बाजार पत्रिका का साहित्यिक पक्ष मजबूत था। साहित्यिक लोगों से दैनिक अखबार निकालने का काम लेना संतोष घोष की एक उपलब्धि थी।
 पत्रकारिता में पेशेवर की बजाय व्यक्तिगत पहलू ज्यादा मायने रखते हैं। यह कोई सांस्थानिक सिद्धांत नहीं है। एक अखबार पत्रकारों के इर्द-गिर्द खड़ा होता है लेकिन पत्रकारों की भर्ती नेतृत्व पर निर्भर है।
 इस बात से इनकार करना मुश्किल है कि पक्षपात बहुत धीरे-धीरे और चुपके से कई रूपों में होता है। जैसे कि काम उधारी या अग्रिम की भुगतान की सुविधा, घूमने-फिरने या फिर मनोरंजन पर होने वाले खर्च का आसानी से भुगतान, जल्दी-जल्दी वेतन बढ़ोतरी या फिर जिम्मेदारी वाला काम सौंप देना।
 अमृत बाजार पत्रिका, आनंद बाजार से भी पुराना अखबार है लेकिन यह खुद को कभी गंभीरता से नहीं लेता। इसका ध्यान सिर्फ विज्ञापन जुटाने में रहता है। इसलिए सरकार से अच्छा रिश्ता बनाये रखता है।
 सीआर ईरानी ने जॉनसन द्वारा स्टेट्समैन के संपादक की स्थापित स्वतंत्रता का कभी भी सम्मान नहीं किया। सीआर दास हमेशा वो सब कुछ करने के लिए तैयार रहते जो ईरानी चाहते थे और वह केवल दफ्तरी चीज बनकर रह गये।
एमजे अकबर के प्रसंग
 अवीक सरकार के बॉम्बे दौरे के दौरान खुशवंत सिंह ने उन्हें एमजे अकबर से मिलवाया। बाद में उन्हें संडे निकालने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी।
 अकबर ने बॉम्बे से अपने मित्रों को बुला लिया और वे एक टीम की तरह काम करने लगे। धीर-धीरे पहले के दो लोग बिना किसी दया के बाहर कर दिए गये। (जनता पार्टी) के सत्ता में आने के बाद अखबार ने खुद को जनता पार्टी का सहयोगी बना दिया।
 वे अकबर से यह पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि क्यों वह देश का भी श्रेय लूट रहे हैं। हालांकि वह बूढ़ा व्यक्ति जानता था कि देश के साहित्यिक पाठक इस तरह की सामग्री पसंद नहीं करेंगे। यह एक उदारहण है कि कैसे एक आदमी की सफलता दूसरे को हत्तोसाहित करती है।
 अकबर अपनी टीम के लोगों को ऊपर पहुंचाने के मामले में अच्छे संगठनकर्ता साबित हुए। उनकी टीम का एक व्यक्ति स्पोर्टस वर्ल्ड का और दूसरा रविवार का सहायक संपादक बन गया। दूसरे लोग उन्हें सफल व्यक्ति के तौर पर देखने लगे और उम्मीद लगाये रहते थे कि वह उन्हें भी ऊपर पहुंचा देंगे।
 मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि संडे उन खबरों को नहीं छापेगा जो जॉर्ज फ्रर्नांडीज को पसंद न हो। जॉर्ज को चरण सिंह से काफी उम्मीदें थी। बाद में वह जगजीवन राम से भी उम्मीद लगाये रहे। एक बार तो एक ही अंक में फर्नांडीज और चरण सिंह की अलग-अलग लेखों में दो या तीन फोटो छपी।
 अवीक सरकार की दृढ़ मान्यता थी कि अखबार सनसनी के रूप में ही बेचे जा सकते हैं। संडे सुरेश राम और कांति भाई को खूब जगह देता था। मुझे नहीं लगता कि अकबर के ऑफिस या स्पोर्टस वर्ल्ड और रविवार में कोई भी ऐसा था, जो उन्हें न कह सके। हालांकि नयी दिल्ली के लिए वह इतने महत्वपूर्ण नहीं थे।
 सब अकबर को खुश रखने के लिए परेशान रहते थे। केवल वरुण सेनगुप्ता को छोड़कर जिनका अवीक से अपनी नजदीकी थी, अकबर वरुण की चापलूसी किया करता था। लेकिन अब अकबर को बिजनेस स्टैंडर्ड और आनंद बाजार दोनों से बाहर कर दिया गया ह

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