शुक्रवार, 21 मार्च 2014

हम गुनहगार औरतें... / दिव्या आर्य


...
 सोमवार, 30 दिसंबर, 2013

अपनी मां और छह भाई-बहन के साथ पूजा फ़ुटपाथ पर रहती है.
वे कौन सी औरतें हैं, जो सड़क पर रहने को मजबूर हैं, डरती हैं कि कोई ‘ग़लत फ़ायदा’ ना उठा ले? इसलिए रात को सोती नहीं, पर दिन में नौकरी कर पैसे कमाती हैं.
जैसे क्लिक करें पूजा शर्मा, जिनसे मैं मिली दिल्ली के हनुमान मंदिर के फ़ुटपाथ पर. हज़ारों बेघरों के बीच एक महिला की अपनी ज़िन्दगी बसाने की कोशिश.
वे कौन सी औरतें हैं, जो अपने से वरिष्ठ सहकर्मी के ख़िलाफ़ यौन शोषण की शिकायत करने का साहस करती हैं?
जैसे क्लिक करें एस अकिला जिन्होंने मुझे बताया कि शिकायत के लिए आवाज़ उठाने का ख़ामियाज़ा उन्हें सन टीवी में अपनी नौकरी गंवाकर चुकाना पड़ा.
वे कौन सी औरतें हैं, जो अपने साथ हुई यौन हिंसा के सच्चे अनुभव बेबाक़ तरीके से दुनिया के सामने एक नाटक में अभिनय कर दिखाती हैं?
जैसा ‘निर्भया’ के साथ सामूहिक बलात्कार पर बने नाटक में हुआ. स्कॉटलैंड के फ्रिंज फ़ेस्टिवल में मैं मिली क्लिक करें छह महिलाओं से जिन्होंने ‘निर्भय’ होकर एक नाटक का मंचन कर दुनियाभर के सामने खोल के रख दिए अपनी ज़िन्दगी के घाव.
  एडिनबरा के अलावा नाटक 'निर्भया' का मंचन लंदन में भी हुआ.
एडिनबरा के अलावा नाटक 'निर्भया' का मंचन लंदन में भी हुआ.
वे कौन सी औरतें हैं, जिनके काम को अश्लील फ़ब्तियों, आरोपों और धमकियों के ज़रिए बदनाम किया जाता है?
जैसे क्लिक करें सागरिका घोष, जिन्होंने मुझे कहा कि उनकी पत्रकारिता पर बहस की जगह सेक्सिस्ट और अभद्र भाषा का इस्तेमाल हो, तो उन्हें बहुत गुस्सा आता है, कभी लड़ पड़ती हैं तो कभी नज़रअंदाज़ कर देती हैं.

हम गुनहगार औरतें हैं - किश्वर नाहीद

हम गुनहगार औरतें हैं
जो अहले जुब्बा की तमकिनत से
न रौब खाएं, न जान बेचें
न सिर झुकाएं, न हाथ जोड़ें
हम गुनहगार औरतें हैं...
वे कौन सी औरतें हैं, जो शादी तो करती हैं पर मां न बनने का फ़ैसला करती हैं, या मां बन सकती हैं लेकिन बच्चे गोद लेने का विकल्प चुनती हैं?
जैसे ठीक मेरी उम्र की क्लिक करें अंजना कुमार, जब मैंने उनसे पूछा मां न बनने पर लोग क्या कहते हैं, तो बोलीं, “जजमेंटल हो जाते हैं, ग़ैर-ज़िम्मेदार कहते हैं, पर घर, करियर और मां-बाप का ज़िम्मा बख़ूबी निभाने वाली मैं ग़ैर ज़िम्मेदार कैसे?”
शायद कुछ ऐसी ही औरतों के ज़हन में रखते हुए पाकिस्तानी शायरा क्लिक करें किश्वर नाहीद ने अपनी कविता ‘हम गुनहगार औरतें हैं’, लिखी होगी.
किश्वर नाहीद की कविता में औरतें ताक़त का रौब नहीं खातीं, न सर झुकाती हैं और न हाथ जोड़ती हैं. पिछले साल मैं ऐसी कई महिलाओं से मिली.
सागरिका घोष को ट्विटर पर भेजा गया एक ट्वीट.
कुछ ऐसी भी थीं, जिनसे मैं मिल नहीं पाई, पर जिनकी आवाज़ बहुत बुलंद थी. क्योंकि वे एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज के ख़िलाफ़ उठी थीं.
कुछ अब भी सहमी थीं, कड़े यौन हिंसा क़ानून के पारित होने के बाद भी पुलिस के ग़ैर-ज़िम्मेदार औऱ असंवेदनशील रवैये से.
जैसे एक कामकाजी औरत क्लिक करें राखी, जिन्होंने दो महीने तक एक आदमी के पीछा करने औऱ तेज़ाब फेंकने की धमकी से डरकर जब पुलिस से मदद मांगी तो पलटकर पुलिस ही उस पर इल्ज़ाम लगाने लगी.
कुछ अब भी सड़कों पर सुरक्षित नहीं महसूस कर रही थीं. त्यौहार जैसे मौकों पर गुंडागर्दी के माहौल को हल्ला-गुल्ला मानकर बर्दाश्त करने का चलन नहीं तोड़ पा रही थीं.
जैसे कॉलेज में पढ़नेवाली क्लिक करें प्रांशिता जिन्होंने होली से एक हफ्ते पहले लड़कों की छेड़छाड़ से तंग होकर कॉलेज जाना ही छोड़ दिया.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के बनाए पोस्टर.
सब लड़ नहीं रहीं, पर आवाज़ें चारों ओर हैं. निर्भया के साथ हुए सामूहिक बलात्कार को एक साल हुआ, तो 16 दिसंबर 2013 को मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय गई.
वहां कई ‘गुनहगार औरतें’ मिलीं. वे नारे लगा रही थीं, ‘महिलाएं मांगें आज़ादी, बसों में चलने की, रात को निकलने की, ख़ाप से आज़ादी, बाप से भी आज़ादी..’
‘बेख़ौफ़ आज़ादी’ के उस माहौल में किसी ने कहा कि हिंसा चाहे सड़क पर हो या घर के अंदर, फ़ैसला शादी का हो या नौकरी का, ये बहस अब गर्मा गई है, इस अनोखे साल में कुछ दीवारें तो ढह गई हैं.
उस बात में कुछ बल तो ज़रूर होगा, जो ‘गुनहगार औरतों’ का ऐसा लेखा-जोखा मैं जोड़ती आई हूं और आप पढ़ते जा रहे हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए क्लिक करें यहां क्लिक करें. आप हमें क्लिक करें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

इसे भी पढ़ें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें