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गुरूवार, 1 सितंबर 2011
By Administrator
vartika nanda

वर्तिका नन्दा, मीडिया विश्लेषक

आंदोलन के खत्म होने के बाद अब यह समय सरकार की करवट को भांपने और उसकी रफ्तार को देखने का है। पर साथ ही अब अन्ना टीम को भी जरा सतर्क होना होगा। कैमरे के पीछे बैठ कर कवर करने वालों ने भले ही वही दिखाया जो दिखाना जरूरी, जन हित, जनता की पसंद और टीआरपी की रूचि का था लेकन यह भी महसूस किया गया कि कई सिविल सोसायटी ग्रुप इस दौरान काफी उग्र बने रहे। नेताओं ने भी अपना गुस्सा भरकर निकाला।

अन्ना को लेकर जितना लिखा गया औऱ लिखा जा रहा है, वह अपने आप में एक रिकार्ड है। अन्ना अब आंदोलन और बदलाव जैसे शब्दों के पर्याय बन चुके हैं। बहरहाल लोकतंत्र और जन के बीच का रास्ता इस बार बड़ा और हवादार हुआ है और एक नया अध्याय खुल कर सामने आ गया है।

लेकिन हर आंदोलन कुछ सबक देकर जाता है। यह लाजमी भी है।

आंदोलन की समाप्ति पर अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में सबसे शपथ दिलवाते हैं कि वे लोग न तो घूस देंगे, न लेगें। यह एक तरह की रिमाइंडर थ्योरी है जो ठीक उसी तरह की है जैसे कि बचपन में स्कूल में शपथ ली जाती थी कि हम सभी भारतवासी भाई-बहन हैं। शपथ ज्यादातर पर कोई असर नहीं छोड़ती पर संजीदा लोगों को शायद वो सालों याद रहती होगी, उसी भाव के साथ। यहां भी शपथ मैदान से जाते लोगों को जैसे अपने अंदर एक भाव को भरकर आगे ले जाने के लिए प्रेरित करती है।

पर सवाल उठता यह भी है कि भ्रष्टाचार क्या सिर्फ वही है जो सरकारी अफसरों या फिर सांसदों के जरिए होता है या यह उससे आगे की भी चीज है। मेरी नजर में भ्रष्टाचार जितनी बड़ी सरकारी या राजनीतिक समस्या है, उतनी ही बड़ी सामाजिक भी। यह परिवार से शुरू होता है। दहेज के सपनों से वो फूलता है और फिर एक बड़ा आकार ले लेता है। इसलिए शपथ को शायद दहेज न लेने (यह बात देने से ज्यादा बड़ी लगती है मुझे) से भी जोड़ा जा सकता था या अब भी जोड़ा जा सकता है।

इस आंदोलन ने युवाओं के सोते देशप्रेम को जगा दिया लेकिन जब वे मैदान से गए तो यह भी लगा कि जैसे इतने दिनों से जिस शक्ति को एक बांध में रोका गया था, वो एकाएक फिर से खुल गया। खुला बांध बाढ़ भी लाता है कभी-कभी। शायद यह अच्छा होता कि इन युवाओं को किसी मकसद से जोड़ा जाता। किसी सतत बदलाव से भी जो भ्रष्टाचार से भी आगे होता। रात भर सड़को पर बाइक पर भागते युवाओं को किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए प्रेरित भी किया जा सकता था। अब भी इन्हें समाज के लिए हर रोज किसी सकारात्मक कदम से बांधा जा सकता है। बुजुगों की अनदेखी इस देश की बड़ी संवेदनशील समस्या रही है। जाने क्यों आंदोलन बार-बार युवा शक्ति अकेले की ही बात पर बार-बार दोहराव करता गया। राजनीतिक पार्टियां भी हमेशा युवाओं की ही बात किया करती हैं कुछ इस अंदाज में कि मानो जो युवा नहीं, वो काम का भी नहीं। इन युवाओं को अपने आपस-पास के परिवेश में सामाजिक काम करने, सड़कों पर बिखरे पत्थरों को हटाने या हटवाने, काम न करती ट्रैफिक लाइटों की व्यवस्था सुधरवाने, टूटी सड़कों को ठीक करवाने के लिए सांसदों पर जोर डालने, अपने परिसरों को साफ रखवाने, आस-पास के लोगों की मदद करने जैसे कई कर्तव्य याद दिलाए जा सकते थे। अब भी यह संभव है। यह शक्ति इस देश के बासी पड़ते चेहरे को रौनक से भर सकती है। वह सालों से रूके पड़े कामों को एक अनूठी गति देकर साबित कर सकती है कि इस देश की आबादी सिर्फ भीड़ नहीं बल्कि कर्मशील ताकत है।

दिल्ली के कुछ प्रमुख अखबार इस सारे आंदोलन के दौरान एक से बढ़कर एक तस्वीरें छापते हैं। एक तस्वीर एक नग्न अभिनेत्री की पीठ की है जिस पर अन्ना लिखा है। एक अभिनेत्री का बयान है कि वे अन्ना के साथ डेट पर जाना चाहती हैं और उन्हें 100 गुलाब भेंट करना चाहती हैं। कुछ गायकों की तस्वीरें हैं जो वहां जाकर देशभक्ति के गाने गाते हुए अपना जनसंपर्क भी कर आते हैं। टोपियों की बिक्री एक बड़ा व्यवसाय बन कर उभरती है वगैरह।

इन सबमें कई बातें छूट जाती हैं। देश के उत्तर-पूर्व में आई बाढ़, पाक अधिकृत कश्मीर में घुसपैठियों को मार शहीद हुआ एक 26 वर्षीय युवा, लीबिया, बढ़ती हुई महंगाई और भी न जाने क्या-क्या।

आंदोलन के खत्म होने के बाद अब यह समय सरकार की करवट को भांपने और उसकी रफ्तार को देखने का है। पर साथ ही अब अन्ना टीम को भी जरा सतर्क होना होगा। कैमरे के पीछे बैठ कर कवर करने वालों ने भले ही वही दिखाया जो दिखाना जरूरी, जन हित, जनता की पसंद और टीआरपी की रूचि का था लेकन यह भी महसूस किया गया कि कई सिविल सोसायटी ग्रुप इस दौरान काफी उग्र बने रहे। नेताओं ने भी अपना गुस्सा भरकर निकाला।

अब समय संभल कर चलने का है। इसे बार-बार जीत न कहिए। जीतने वालों को जीत पाने के बाद सबसे पहले अपने गुमान और उससे होने वाले नशे पर ही नियंत्रण करना चाहिए। ताकत के मिलने पर बाकी दूसरे पक्ष यही देखा करते हैं कि ताकत औऱ जीत पाने वाला उसे हजम कर भी पा रहा है कि नहीं। रामलीला मैदान से जम कर छींटकशी हुई। किरण बेदी तो मुंह पर तौलिया ढक कर नकल भी उतार गईं। उधर संसद में लालू और शरद यादव भी जम कर बोल लिए। स्वामी अग्निवेश भी अपनी जुबान पर काबू नहीं रख पाए। सिविल सोसायटी भी अगर वही करने लगी जो संसद के अंदर बैठे महानुभव अक्सर करते हैं तो फिर दोनों में फर्क ही क्या रहेगा। इसलिए अब ठहर जाइए जरा और सुस्ता भी लीजिए। इस देश की बड़ी आबादी को अन्ना और उनकी टीम से जिस बखूबी जोड़ा है, उसे बार-बार दिशा याद दिलानी होगी। नारों से ज्या काम बताने होंगे। झंडे फहराने से ज्यादा अपनी सार्थकता के झंडे गाढ़ने होंगे। ऐसा काम कर दिखाना होगा कि ठंडे पड़े सरकारी महकमे भी हैरान हो जाएं। पर इसके लिए जरूरी होगा सब्र और संभला हुआ संवाद।

अब मौसम बदला है। इसलिए बदलाव के इस दौर में संयम रखिए क्योंकि इंसान की पहचान उत्सव में नहीं, तूफान में होती है।

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मीडियाकर्मी को न्याय के निजाम की स्थापना के लिए काम करना चाहिए
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क्यों इतना हंगामा है बरपा
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हिन्दी में ई पुस्तकों की मुश्किल डगर
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