बुधवार, 28 सितंबर 2011

आज की पत्रकारिता और आज के पत्रकार


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नूतन ठाकुर: "मर्द और औरत की शैतानी- इंसान की नादानी" देखिए आज रात दस बजे...  "कौन है लड़कियों का शिकार करने वाला शैतान बाबा"- पूरी खबर सिर्फ हमारे चैंनेल पर...  "शेर मरेगा, शकीरा नाचेगी, गोल होगा, गोली चलेगी, एक ठुमके पर एक मौत".... या "खुलेंगे नर्किस्तान के तीन दरवाजे, आयेगा जलजला".... ये वे कुछ ऐसे हेडलाइंस हैं जिन पर आज कल के महत्वपूर्ण और गंभीर टीवी चैनल अक्सर विचार-विमर्श करते और अपने दर्शकों को जागरुक करते हुए नज़र आ जाते हैं. कमोबेश यही स्थिति कई बार कुछ गंभीर, पुराने और प्रतिष्ठित अखबारों में भी दिख जाया करती हैं.
इन्‍हीं बातों को ध्यान में रखते हुए कई दिनों से मेरे मन में आज के पत्रकारों और पत्रकारिता को ले कर कुछ सवाल उठ रहे थे. जिस त्वरित गति   से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अब इन्टरनेट के जरिए देश-विदेश की खबरें दूर-दराज के इलाकों में भी आसानी से पहुंच रही हैं। उस से निसंदेह आज  के पत्रकार अछूते नहीं रहे हैं. खबरों को जल्दी से जल्दी जनता तक पहुंचाने की होड़ में उन्हें आये दिन न सिर्फ नई-नई चुनौतियों का सामना करना  पड़ता है अपितु कई बार तो इस पूरे क्रम में उनकी व्यक्तिगत जिंदगी भी काफी प्रभावित होती है.
फिर अचानक कल मुझे ख़याल आया कि क्यूँ नहीं इस सम्बन्ध में आजकल काफी धूम-धड़ाके से हिट फेसबुक पर इसी विषय पर कुछ वाद-विवाद छेड़ कर देखा जाए कि किस प्रकार हमारे समाज के विभिन्न वर्ग इस सम्बन्ध में अपने विचार रखते हैं. मुझे यह भी मालूम था कि चूँकि एक बड़ी भारी संख्या में हमारे पत्रकार साथी भी फेसबुक के शिकार हैं, इसीलिए उनकी तरफ से भी कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ जरूर आएँगी, और फिर दूसरे लोग भी इस विषय में अपने विचार रखेंगे. मैंने कुल मिला कर दो सवाल अपने साथियों के सामने रखे. पहला- ‎"आज के पत्रकार पहले के पत्रकारों की तुलना में अधिक क्षमतावान हैं. इस विषय पर आप की क्या राय है" और दूसरा- "पत्रकारिता ने अपनी प्रामाणिकता बहुत हद तक खो दी है. क्या आप इससे सहमत हैं?"इन सबसे जो राय मुझे मिले हैं वे इस लायक हैं जो आप के सामने रखा जा सके, जिससे हमारे बारे में उठ रही मान्यताओं को हम जान सकें.
पहले मैं दूसरे सवाल पर आई राय रखती हूँ. भोपाल की वन्य-जीव कार्यकत्री का जवाब सुने- "what a question Sir jee? सवाल में  ही जवाब है." वाराणसी के मैनेजमेंट फर्म का संचालन कर रहे राम राय कहते हैं- "और पीपली लाइव ने इसे प्रमाणित भी कर दिया है"  यानी कि पीपली लाइव से हम पत्रकारों का नुकसान ही नुकसान है, क्यूंकि अब तो आम आदमी भी हमारे अन्दर के तमाम खेलों को जानने-समझने लगा है. दिल्ली की वकील अनिता शुक्ला और मुंबई की गृहणी अनीता सिंह तो यह बात मानती ही हैं, नागपुर के लोकमत समाचार के सब एडिटर समीर ईनामदार तक यह कहने से नहीं चूकते-" I agree with u." बिहार के रजनीश कुमार कहते  हैं- "100%." लखनऊ के रहने वाले पर जेओर्जिया स्टेट विश्वविद्यालय के प्राध्यापक अरविन्द पाठक इसे ग्लोबल परिदृश्य में देखते हैं- "यह स्थिति अब पूरे विश्व में है."
लेकिन इसके विपरीत भी कहने वाले लोग हैं. भोपाल के एक पोर्टल के सम्पादक दीपक शर्मा बदले में पूछते हैं- "किस की प्रामाणिकता बढ़ी है." तो बुलंदशहर के एक अन्य पत्रकार पृथ्वीपाल सिंह तो खुल कर सामने आते हैं-"नहीं, कदापि नहीं। पत्रकारिता दिन प्रतिदिन नये आयामों को छू रही है। अत्याधुनिक संसाधनों से ओतप्रोत पत्रकारिता ने और अधिक सजग एवं चैतन्य प्रमाणिक बना दिया है। वर्तमान परिवेश में पत्रकारिता सही दिशा की ओर बढ़ रही है। गुण-दोष के आधार पर निरंतर उत्तरोत्तर प्रगतिशील है।"
एक तीसरी धारा भी बहती नज़र आती है. उदाहरण के लिए मधुबनी निवासी दिल्ली स्थित पत्रकार रजनीश झा का कहना है- "पत्रकारिता ने नहीं अपितु पत्रकारों ने अपनी प्रमाणिकता गंवाई है," तो बहराइच के फ्रीलांसर पत्रकार हरिशंकर शाही इसे आगे बढाते हैं- "बिलकुल सही कहा रजनीश जी ने पत्रकारिता ने नहीं पत्रकारों ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, अब पत्रकार किसी मिशन के लिए नहीं अपितु वसूली के लिए आने लगे हैं. विचारों की जगह केवल सनसनी आ गयी है." राज कुमार रंजन, जो प्रभात खबर रांची के पत्रकार हैं, समन्वय बैठाने का प्रयास करते हैं- "कुछ लोगों के  चलते पत्रकारिता पर शक करना सही नहीं है ."
यह तो हुई पत्रकारिता की बात, अब पत्रकारों की काबिलियत पर हुई चर्चा को देखा जाए. इस पर अमिता शुक्ल कुछ यूँ प्रतिक्रया देती हैं- "इन लोगों के पास सुविधाएं तो बहुत हैं पर ज्ञान और विवेक बहुत कम है" इस पर दिल्ली के अधिवक्ता अरुण बक्षी पूछ बैठते हैं- "क्या सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर में तुलना की जा सकती है?" फरीदकोट के गुरप्रीत सिंह इस से सहमत हैं तो आगरा के प्रवक्ता राज किशोर सिंह पूर्णतया असहमत. लखनऊ से अपना साप्ताहिक अखबार निकालने वाले संजय शर्मा का कहना है- "हां" तो आगरा के सामजिक कार्यकर्ता जीतेंद्र शर्मा कहते हैं- "नहीं".
एक बार फिर रजनीश झा इसका विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं- "पहले के पत्रकार विचारों के साथ पत्रकारिता में आते थे, आज के पत्रकार पत्रकारिता की व्यवसायिकता को सीख कर पत्रकारिता में आते हैं. कार्यक्षमता नि:संदेह अधिक हो सकती है क्यूंकि सेठ की नौकरी करनी है तो क्षमता से प्रदर्शन भी करना होगा, मगर विचारों और पत्रकारिता के मूल सिद्दांतों में शून्यता आ गयी है." जिसका समर्थन हरिशंकर शाही यूँ करते  हैं-' क्षमतावान  नहीं संसाधन युक्त हो गए हैं, पहले पत्रकरिता में सोच होती थी अब सिर्फ ग्लैमर की चमक दिखती है."
अंत में गुडगांव के एक निजी अस्पताल में कार्यरत एक डाक्टर मुनीश प्रभाकर की बात कहूँगी- "शायद हां पर कुल मिला कर कुछ पीत-पत्रकारिता करने वालों, पेड न्यूज़ छापने वालों और उच्च कोटि के भ्रष्ट पत्रकारों ने इसे पूरी तरह बदनाम कर दिया है." अब इन सबों में कौन कितना सही है और कौन कितना गलत, ये तो हम सबों को ही विचारना होगा।
लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित 'पीपल्स फोरम' की एडिटर

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