बुधवार, 14 सितंबर 2011

द संडे इंडियन का 21वी सदी की 111 लेखिकाएं पर केंन्द्रित अंक

अनामी शरण बबल
 
और लंबी प्रतीक्षा के बाद अंतत: द संडे इंडियन का बहुप्रतीक्षित 21वीं सदी की 111हिन्दी लेखिकाएं पर केंन्द्रित अंक आ ही गया। हालांकि आयोजन के महत्व और नीयत को देखे तो एक साथ इतनी सारी प्रतिष्ठित नामी बेनामी उभरती और स्थापित लेखिकाओं को एक कवर में देखना और उनके आंशिक परिचय से जानकार होने का सुख अकथनीय है। ज्यादातर लेखिकाओं को यत्र तत्र सर्वत्र कभी यहां तो कभी वहां यदा कदा देखने पढने का मौका मिलता रहा है। मगर लेखिकाओं की पूरी फौज या टोली को एक बाराती की तरह एक मंड़ली में देखने या दिखाने के लिए द संडे इंडियन संपादकीय परिवार के साथ साथ इस पत्रिका समूह के कुबेरदाता को भी बहुत बहुत मुबारकबाद। खासकर इसलिए कि आधुनिकता में भी उन्हें सेक्स, नंगई, बाजार और विज्ञापनों के अलावा जो दिखता है वही बिकता के है के बाजारी मुहाबरे के बाद भी साहित्य (समाज, कला और संस्कृति) की  चिंता (याद) रही।
इस अंक के प्रति इसे मेरा पत्र ना माने,। क्योंकि तब आप इसकी आत्मा को काटकर केवल जगह के अनुसार कहीं फिट कर देंगे। यह पत्र इस अंक का मूल्यांकन भर है। हालांकि साहित्य में मेरी कोई पकड़ नही, बस थोड़ी दिलचस्पी है। लिहाजा मेरा प्रयास है कि एकदम खरा और पक्षपात किेए बगैर ही इस अंक पर मैं कोई राय प्रकट करूं। एक साथ लेखिकाओं के समूह (भीड़ नहीं) को देखकर तो मैं अभी तक मोहित और स्पंदित हूं। खैर, बात संपादकीय से शुरू करे कि लेखिकाओं की लेखन परम्परा  के आदि से बात शुरू करते हुए ओंकारेश्वर पांडेय का लेख (संपादकीय से ज्यादा एक लेख है, अपनी तमाम दिक्कतों और योजनाओं के उल्लेख के बाद भी) काफी रोचक और ज्ञानवर्द्धक है। लेखिकाओं के लेखन की शुरूआती पड़ताल से लेकर संपादक ने  1907 में हिन्दी की पहली कहानी और लेखिका राजेन्द्र बाला की कहानी दुलाईवाला तक के सफर को समय काल और परिस्थितियों के अनुसार सामने रखा है। सही मायने में इसे संपादकीय ना मान कर एक आलेख की तरह देखे।, ताकि महिला लेखन की शुरूआती दौर से लेकर आज तक के रचनाकार महिलाओं के संघर्ष, संग्राम, चुनौतियों के बीच सफलता, उपलब्धि और लेखन के प्रति लगातार बढ़ती जिजीविषा रूचि और उत्साह का पूरा एक कैनवस सामने प्रकट होता है। विदेशी रचनाकार महिलाओं का उल्लेख करके भी उनकी परम्परा और शैली से तुलनात्मक विवेचना करके ओंकारेश्वर ने भारतीय लेखिकाओं के बहुआयामी लेखन क्षमता और प्रतिभा को पाठकों के बीच रखा है।
आपके चयन प्रक्रिया और आधार में इसे हस्तक्षेप ना माना जाए, मगर लगता है कि कुछ विवेक और चयन में संयम बरतने की जरूरत थी। श्रेष्ठ 21 नामों में कमसे कम पांच नाम का चयन शायद ही किसी के गले उतर पाएगा। खासकर  रमणिका गुप्ता और डा. सरोजनी प्रीतम का नाम यदि इस कड़ी में है तो बाकियों की योग्यता का सही मूल्यांकन की कसौटी पर ही सवाल उठ खड़े होंगे? खासकर अखबारी हंसिकाओं के बूते प्रीतम को श्रेष्ठ मान लेना सरासर गलत है। उन्होनें ऐसा लिखा ही क्या है कि उन्हें 21 में स्थान दिया जाए? शायद अपने चयन पर उन्हें खुद हैरानी (शर्म) हो रही होगी। और सही मायने में महिला लेखन आज इतना बहुआयामी हो चुका है कि चार लाईनी कविता लेखन करने वाली को यहां पर कोई जगह ही नही। और रमणिका गुप्ता खुद को सिमोन द बोउवार की तरह साहसी, बेबाक, नीडर और अपने प्यार सेक्स और (?) राजनीति के यौनाचार को स्पष्ट करके श्रेष्ठ 21 में जगह पाना भी हैरतनाक है। खासकर दिल्ली में रहकर और आलतू फालतू जो कुछ भी लिखकर या परोसकर या तमाम पत्रिकाओं में कुछ भी सामने रखकर या दस पांच किताबें छपवाकर (परोसकर) वे क्या 21 श्रेष्ठ बनने की क्षमता या कूब्बत रखती है ?  
सात समंदर पार की लेखिकाओं पर जब एक खास आलेख और वर्गीकरकण किया जा रहा था, उस हाल में फिर सुषमा बेदी को श्रेष्ठ 21 में रखना सरासर गलत सा प्रतीत हो रहा है। फिर एक बड़ा पाठक वर्ग जिसके नाम को ही नहीं जानता हो, उसे एकाएक बेदी के नाम से हैरानी ही होगी। दो नाम और है, जो काबिल होने के बाद भी मेरे ख्याल से अभी इस लायक तो कतई नहीं है कि उन्हें इतनी जल्दी श्रेष्ठ 21 में गिना जाए। कुछ समय बाद बेशक इनके चयन पर मेरे समेत बहुतों को आपति नहीं या कम होगी, मगर अनामिका और खासकर गगन गिल का अभी चयन मंजूर नही।
 10-15 देशों में जाकर काव्य पाठ करना या 5-7 विदेशी विश्वविघालयों में जाकर अध्यापन करना श्रेष्ठ 21 रचनाकारों में चुने जाने का कोई पैमाना नहीं है। फिर इन दोनों की कविताओं में ऐसी क्या खास ही है कि इस वर्ग मे रखा जाए। फिर भी, यदि अनामिका और गगन को  इस कतार में रखते हैं तो फिर कमल कुमार, कुसुम अंसल, तेजी ग्रोवर, क्षमा शर्मा, ऋता शुक्ल, उषा किरण खान, मधु कांकरिया जया जादवाणी, गीतीजंलि, उर्मिला शिरीष, नमिता सिंह आदि में सबसे बड़ी कमी यह तो नहीं है कि इनमें ज्यादातर दिल्ली से दूर रहती है। श्रेष्ठ 21 में खासकर पदमा सचदेव, अर्चना वर्मा, इंदू बाली को स्थान नहीं देने के पीछे आपका तर्क क्या होगा?
बाकियों पर टिप्पणी करके मैं कोई विवाद खड़ा करने की बजाय संतोष और खुशी प्रकट कर सकता हूं। खासकर सात समंदर पार की लेखिकाओं के बारे में जानकर काफी सुखद लगा। वहीं पत्रकारों में लेखन और सार्थक रचनात्मक लगन और भी ज्यादा प्रेरक है। काश महिला पत्रकारों पर भी एक लेख के साथ वर्गीकरण की प्रस्तुति रहती तो इस अंक की गरिमा और बढ़ जाती। जिसे भविष्य में (बाद में) 8-10 पेज देकर महिला पत्रकारों के लेखन और साहित्य पर फोकस किया जा सकता है। खासकर महिला पत्रकारों के तेवर और सफलता को शायद भविष्य में सामने रखना जरूरी भी है, क्योंकि खबरिया चैनलों में जिस तेजी के साथ महिलाओं और लड़कियों की इंट्री हो रही है, उससे तो महिलाओं के प्रति सारी धारणा ही खत्म हो रही है। इस क्षेत्र में  महिलाओं ने अपनी क्षमता, प्रतिभा और कार्य कुशलता की धाक जमाकर यह बता दिया है कि बस उन्हें केवल मौके की तलाश है।

अनामी शरण बबल




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