बुधवार, 7 सितंबर 2011

पत्रकारिता के एक संत का यूं ही चले जाना








महेंद्र सिंह राठौड़ 
चंडीगढ़ जनसत्ता में पूर्व मुख्‍य उपसंपादक रहे हरीश पंत ने मंगलवार को चंडीगढ़ के पीजीआई में अंतिम सांस ली। उन्हें अचानक तबीयत बिगडऩे के बाद अपने गांव नाहन (हिमाचल प्रदेश) से यहां लाया गया था। डाक्टरों के अथक प्रयास के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। बुधवार को नाहन में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।
पंत जी बिल्कुल स्वस्थ नहीं थे, लेकिन सेहत इतनी खराब भी नहीं थी कि अचानक छोड़कर चले जाए। होनी को जो मंजूर था वही हुआ। उनके न रहने की खबर के बाद उनकी इकलौती बेटी को गहरा सदमा लगा और वे अचेत हो गई। बेटी के साथ उनका लगाव ज्यादा था। पिछले दिनों इंजीनियरिंग के लिए बेटी को प्रवेश दिलाने के लिए वे चेन्नई गए थे। यह कोई पंद्रह-बीस दिन पहले की बात है। अगर स्वास्थ्य खराब होता तो वे इतनी लंबी यात्री नहीं कर पाते। वे आराम से गए और आराम से आ गए। आने के बाद उनसे बात हुई तो उन्होंने खुद ही बताया था कि स्वास्थ्य ठीक रहता है। अगर अपने गांव नाहन में ही कोई रिपोर्टिंग का काम मिल जाए तो वे करने को तैयार हैं। चंडीगढ़ या आसपास भी वे काम करने के इच्छुक थे। उन जैसे व्यक्ति को कोई भी अच्छी जगह पर रखने को तैयार हो जाता लेकिन उन्होंने इसके लिए कभी गंभीरता से प्रयास नहीं किया।
उनकी पत्नी राज्य सरकार की नौकरी में है। पंतजी के न रहने पर उनकी क्या दशा हुई होगी इसे आसानी से समझा जा सकता है। डाक्टरों के जवाब देने के बाद वे भी अपनी सुध बुध खो बैठी थी लेकिन सब कुछ उन्हें ही करना था इसलिए संयम उनके लिए जरूरी था और उन्होंने ऐसा किया भी। चंडीगढ़ में पंतजी के खास सहयोगी से उन्होंने फोन से संपर्क करना चाहा लेकिन बात हो नहीं सकी। परिचितों और अन्य लोगों से संपर्क कर उनके सहयोग पंतजी को नाहन ले जाया गया। ऐसी जीवन वाली और गजब की हि मत रखने वाली महिला को नमन है।
हरीश पंत की विशेषताओं का अंत नहीं है, इतनी खूबियों वाला इंसान जो पहली ही मुलाकात में किसी को भी प्रभावित कर सकता है। कुछ लोग अपना प्रभाव क्यों छोड़ देते हैं? और कुछ छोडऩे का प्रयास करते हैं लेकिन निष्प्रभावी ही रहते हैं। दरअसल ऐसे लोगों का कोई धरातल नहीं होता, सब कृत्रिम होता है। पर पंतजी जमीन से जुड़े हुए वे इंसान थे जिनमें किसी तरह का छदम नहीं था। साम, दाम, दंड, भेद से कोसों दूर जैसे उनका कभी इनसे कोई नाता ही न रहा हो। बहुत बार वे अपने काम में इतने व्यस्त रहते कि उन्हें पता भी नहीं रहता कि आसपास डेस्क पर कोई बातचीत भी हो रही है। वे बोलते बहुत कम थे लेकिन जितना बोलते थे उसमें गंभीरता होती थी, ठोस बातें होती थी। वे आलोचना से दूर रहते थे।
कभी-कभार मूड होता तो मजाक कर लेते वरना सहयोगी उनसे ही मजाक करते थे जिसका वह कोई बुरा नहीं मानते थे। कुछ शर्मीले भी थे, लिहाजा अपनी तरफ से कोई ऐसा बात नहीं करते जिसका बतंगड़ बन जाए। एक बार किसी फिल्म का डायलाग -बच्चे की जान लोगे क्या, उन्हें पसंद आ गया और बहुत दिन वह उनकी जुबान पर चढ़ा रहा और वे इसका इस्तेमाल करते रहे। जब बहुत काम कर लेते और फिर कोई काम आ जाता और शिफ्ट इंचार्ज उन्हें कह देते पंतजी देखना तो वे मजाक में कह देते बच्चे कि जान लोगे क्या और सबसे पहले खुद ही खिलखिला कर हंस देते। बहुत दिन तक यह सिलसिला चला। रात की शिफ्ट में काम करके गए और कभी दिन की शिफ्ट में आने के लिए कह दिया जाता तो वे वही मजाक में कह देते, क्या बच्चे की जान लोगे, वे यह सब मजाक में कह देते लेकिन अगले दिन ड्यूटी पर आते।
पंतजी बहुत विनम्र स्वभाव के थे। शायद ही कोई होगा जो यह कह सके कि पंतजी को उसने गुस्से में देखा या इसी लहजे में बात की हो। उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों की ठोस जानकारी थी। किसी भी विषय पर कोई भी जिज्ञासा हो उनसे लोग पूछते और संतुष्ट होते थे। भाषा पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी, हिंदी और अंग्रेजी में समान अधिकार था। हिंदी की कापी का संपादन करना हो तो वे बिना ज्यादा कांट-छांट के उसे अच्छी खबर बना देते। इसमें वे वह सामने वाले पर अपनी विद्वता साबित करने का प्रयास नहीं करते जैसा अक्सर लोग किया करते हैं। उनका स्वभाव ही ऐसा था वे किसी को हतोत्साहित नहीं बल्कि उसका हौसला बढ़ाने में भरोसा करते थे।
अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में तो उन्हें महारत हासिल थी। खबरों की उन्हें बेहद समझ थी। साथी लोग उन्हें चलता फिरता शब्द कोश्‍ा या फिर इंसाइक्लोपीडिया भी कहते थे। कुछ अपवाद को छोड़कर उन्हें हर विषय की तह तक जानकारी होती थी। अगर किसी की जानकारी नहीं होती तो वे फट से कह देते उन्हें इस बारे में पता नहीं है। बहुत बार हिंदी में ही स्टीक शब्द के लिए जब बहुत माथापच्ची के बाद भी कोई विकल्प नहीं मिलता तो पंतजी से पूछने पर वह मिल जाता। अचानक किसी खबर के संदर्भ में फ्रांस की क्रांति की बात आ जाए तो पूछने पर पंतजी उसका पूरा खुलासा कर देते थे।
नक्सलवादी आंदोलन हो या फिर पंजाब में आतंकवाद, बोडो आंदोलन हो या फिर अमेरिका की साम्राज्यवादी नीति उन्हें बहुत कुछ जानकारी होती थी। यह केवल एक उदाहरण मात्र है बहुत बार विज्ञान के विषयों पर उनकी जानकारी को देखकर साथी लोग दंग रहते रहे हैं। इस सबके बावजूद वे अपने को सामान्य ही मानते थे। वे बहुत काबिल आदमी थे और इसकी बदौलत वे बहुत ऊपर तक जा सकते थे लेकिन वे जहां थे वहीं खुश थे। संतोषी वृत्ति के व्यक्ति थे और हर हाल में खुश रहना जानते थे।
होली के मौके पर चंडीगढ़ जनसत्ता में मजाकिया खबरें छपा करती थी। लगभग सभी खबरों में बाइलाइन भी हुआ करती थी। संवाददाताओं के अलावा डेस्क के लोगों के नाम भी होते थे लेकिन कुछ बिगड़े हुए रूप में, कुछ तो ऐसे बना दिए जाते कि साथी लोग उनसे कई दिन तक मजाक भी करते रहते। पंतजी का नाम भी जाता था लेकिन कमाल देखें उनके नाम को भी बिगाड़ा नहीं जा सकता था। लिहाजा ज्यादा से ज्यादा हरीश पंत की जगह हरीश संत लिखा जाता था। सचमुच वह संत प्रवृति के थे और यह नाम पंत से भी ज्यादा सार्थक है।
इतने विनम्र, संस्कारी, नेकदिल और सच्चे पुरुष पंतजी को न जाने क्यों अंगूर की बेटी से लगाव हो गया। शुरुआती दौर में लोगों को हैरानी हुई इसलिए उन्हें इससे दूर रहने की ही सलाह देते थे। शुरू के दौर में वे कहते थे कि बस कभी कभार रोज नहीं, लेकिन वे इस लत बना बैठे और इसने उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया। उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया, काम में किसी तरह की कमी नहीं आई लेकिन वे अब गुमसुम और उदास के अलावा एकाकी रहने लगे थे। सहयोगियों ने इसकी वजह भी पूछी लेकिन उन्होंने शायद ही किसी को बताया होगा। वह अंतर्मुखी व्यक्ति थे इसलिए संभव है उन्होंने लत की वजह किसी ही बताई हो।
जम्‍मू में भी उनकी यह आदत छूटी नहीं। ज्यादा होने पर जब शरीर झेलने में नाकाम होने लगा तो उन्होंने सब छोड़ छाड़कर घर जाने का फैसला किया। वीआरएस लेने के बाद वे जम्‍मू से हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के अपने गांव नाहन में आ गए। गांव आने के बाद उनके स्वास्थ्य में सुधार होने लगा क्योंकि अब उन्होंने अपनी आदत पर काफी हद तक काबू पा लिया था। कुछ सालों तक उन्होंने यह सब देख लिया था। घर से बाहर रहते बात और होती लेकिन अब घर में यह सब ठीक नहीं यही मानकर वे इस लत पर काबू पा सके। इसके बाद उनके स्वास्थ्य में बहुत सुधार हुआ, न केवल वह बल्कि परिवार के लोग भी कहते अब सब कुछ ठीक हो गया है। मंगलवार को उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी।
जनसत्ता चंडीगढ़ संस्करण के स्थगित होने के बाद वे इंडियन एक्सप्रेस के जम्‍मू संस्करण में मुख्‍य उपसंपादक के तौर पर चले गए। अंग्रेजी और हिंदी उनके लिए एक समान थी लिहाजा वहां भी जनसत्ता जैसा ही प्रभाव हो गया। वह प्रभाव जमाते नहीं थे बल्कि खुद-ब-खुद हो जाता था। उनकी आलोचना कोई नहीं करता था, कर भी नहीं सकता था क्योंकि वे निर्विवाद थे। किसी का अहित नहीं करते थे, किसी को अपनी जुबान से कड़वा नहीं बोलते थे। कोई गलती भी कर जाए तो उसे हलका सा समझा भर देते थे।
ऐसे व्यक्ति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है और लोगों ने सीखा भी है। किस तरह से इतनी विद्वता के बाद भी विनम्र बने रहा जा सकता है। इतने संस्कारी, ज्ञानी, और आदर्श पुरुष का इस तरह से चले जाना मन को व्यथित कर गया। उनके न होने की खबर से मन बहुत उदास हुआ। न जाने क्यों मुझे हिंदी की पुरानी फिल्म बंदिनी का वह गीत स्मरण हो गया – ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना..। आदरणीय पंतजी को शत-शत प्रणाम। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। उनके परिवार को कठिन हालात का मुकाबला करने की शक्ति प्रदान करें।

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