मंगलवार, 27 सितंबर 2011

लोकतांत्रिक मूल्य और मीडिया /डॉ0 राकेश रयाल



14 Sepडॉ0 राकेश रयाल

       लोकतंत्र की सार्वभौमिक मान्यता के कारण इसका सही अर्थ समझना और सही परिभाषा करना एक कठिन काम है क्योंकि लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धान्तों को किसी दार्शनिक अथवा राजनीतिज्ञ ने किसी निश्चित समय पर निर्धारित और निश्चित नहीं किया, वरन् उसका पिछले ढ़ाई तीन हजार वर्षों में धीरे-धीरे विकास हुआ है । लोकतंत्र की शुरूआत ऐथेन्स (यूनान) से मानी जाती है। अरस्तू, रूसो, टामसपेन, मौंटेस्क्यू, अब्राहम लिंकन से लेकर बट्रेन्ड रसेल आदि ने अपने – अपने सिद्धान्तांे के आधार पर लोकतंत्र की व्याख्या की है। यहॉं तक कि 1917 में मार्क्सवादी सिद्धान्तों पर हुयी रूसी क्रान्ति तथा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में बनी साम्यवादी सरकारों ने भी स्वयं को ’’जनवादी लोकतंत्र’’ कहा था।
        भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। तमाम चुनौतियों और विसंगतियों के बावजूद वोट के जरिए सत्ता परिवर्तन और जन आकांक्षा की पूर्ति के लिए काम करने वाली सरकारों का गठन करा देने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने में तो हम भारत के लोग सफल हो गए हैं परन्तु एक ऐसी राजनैतिक प्रणाली हम विकसित नहीं कर सके हैं जो लोकतंत्र की आदर्श परम्पराओं की स्थापना के लिये त्याग, सत्कर्म और उच्चतम आदर्शों के अनुरूप आचरण करे। सामाजिक आन्दोलनों के जरिए समाज बार-बार इस बात का प्रयास करता है कि कैसे लोकतात्रिक व्यवस्था को अधिक जवावदेह और बेहतर बनया जाए। आन्दोलनों के इन्हीं स्वरों को मीडिया मुखर बनाता है और व्यापक भी। इन अर्थों में लोकतंत्र, सामाजिक आन्दोलन और मीडिया एक दूसरे के पूरक हैं,एक-दूसरे को मजबूत और बेहतर बनाने के कारक हैं। 
        भारतीय संविधान की उद्येशिका से भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का पता चलता है। इस उद्येशिका में कहा गया है कि -  ’’हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रशिक्षण एवं अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान कों अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’
        जब भी बात लोकतंत्र के निहित स्तंभों की होती है तो “मीडिया” का नाम अवश्य आता है। ऐसा पढ़ता एवं सुनता आया हूँ कि मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में अपना दायित्व निर्वहन कर रहा है। यानी “इट इज वन ऑफ़ द फोर पिलर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी”। सैद्धांतिक रूप से ऐसा कहा एवं माना जाता है कि लोकतंत्र के चार स्तम्भ होते हैं जो इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था dks cuk;s j[krs gSaA  
        वर्तमान में भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में मीडिया अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहा है.आधुनिक भारत में करोड़ो लोग अपने दिन का प्रारंभ समाचार पत्रों के साथ करते हैं.मीडिया ने भारत में स्वाधीनता प्राप्ति के पूर्व लोगों के मन में देशभक्ति की भावना का संचार किया एवं आज भी वह लोगों के मन में स्वस्थ नागरिकता का विकास करने के लिए सतत प्रयत्नशील है.
        मीडिया ही वह एकमात्र साधन है जो सामान्य वर्ग की आवाज सब तक प्रस्तुत कर पाने में सक्षम है. आधुनिक पत्रकार समाज के उच्च वर्ग से लेकर निम्न वर्ग, सबकी समस्याओं एवं संदेशों को हम तक निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करता है.
        उदहारण के लिए -घरेलू हिंसा के विरुध्द -बेल बजाओ अभियान उल्लेखनीय है . इसके साथ-साथ मीडिया हमें सही एवं गलत का निर्णय लेने में सक्षम बनती है .सूचनाओं के प्रसारण के अतिरिक्त मीडिया हमें जागरूक भी बनाती है .चाहे वह धूम्रपान एवं मद्यपान से होने वाली हानियों के प्रति सचेत करना हो अथवा उपभोक्ता जागरूकता के लिए जागो ग्राहक जागो अभियान ,या फिर एड्स जैसी गंभीर बीमारी के प्रति लोगों को जागृत करना तथा एड्स के प्रति लोगों के मन में बसी गलत धारणाओं को समाप्त करना ,इन सब योगदानों के लिए मीडिया का योगदान निश्चित ही प्रशंसनीय है.
        आधुनिक पत्रकार घोटालों एवं भ्रष्टाचार के खुलासों में सदैव अग्रणी रहते हैं .चाहे वह राष्ट्रमंडल खेलों में हुआ घोटाला हो जहाँ दिल्ली की साज -सज्जा के लिए गरीबों के हिस्से की राशि व्यय की गयी या फिर वह ए.राजा एवं मीरा राडिया का 2-G स्पेक्ट्रम घोटाला हो ,अथवा वह आदर्श विवाद प्रकरण हो .इन सब को आम जनता के समक्ष लाने का कार्य मीडिया ही करता है .आज विकिलीक्स के खुलासों ने समग्र विश्व में खलबली मचा कर रख दी है .चाहे वह राहुल गाँधी का विवादित बयान हो या फिर यू.पी. ए. सरकार को बचाने के लिए सांसदों की खरीद -फ़रोख्त का सनसनीखेज खुलासा. इस प्रकार के समाचारों से मीडिया ही हमें अवगत कराती है.
        कई बार हमारे देश में पीड़ितों को उचित न्याय नहीं मिल पता है तथा अपराधी साफ तौर पर बच निकालता है .ऐसी स्थिति में मीडिया पीड़ितों के साथ हो रहे अन्याय से हम सब को अवगत कराता है एवं न्याय प्राप्ति में पीड़ितों का सहयोग कराता है हम सभी जेसिका लाल हत्याकांड और प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड से भलीभांति परिचित हैं. वह मीडिया ही थी जिसने जेसिका और प्रियदर्शिनी के साथ हो रहे अन्याय से समग्र राष्ट्र को परिचित कराया.
        इतने योगदानों के साथ-साथ मीडिया हमें एक उत्तरदायी नागरिक बनाने का कार्य भी करता है .चाहे वह अनिवार्य मतदान के लिए प्रेरित करना हो अथवा अतुल्य भारत जैसे विज्ञापनों के माध्यम से प्रेरित करना.
        लोकतंत्र के तीन स्तम्भों की छत को खड़े करने में मीडिया रूपी इस चौथे स्तम्भ की अहम भूमिका है, जो इन तीनों स्तम्भों और जनता के बीच संवाद कायम कर पारदर्शिता लाती है तथा तारतम्य बनाये रखता है,जिससे लोकतंत्र की यह छत मजबूत और टिकाउ बनी रहे और इसके नीचे रहने वाली लोकतांत्रिक जनता इस छत के नीचे सुरक्षित रह सके।
        लोकतन्त्र के मूल्यों को बनाये रखने व एक स्वच्छ लोकतंत्र के निर्माण में मीडिया की अहम भूमिका है। स्वच्छ लोकतंत्र का तात्पर्य ऐसे समाज से है जिसमें सरकार व एक आम आदमी के बीच संवैधामिक तारतम्य हो। समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ उस समाज में अपना जीवन यापन कर रहा हो। सरकार और जनता के बीच संवाद बरकरार हो तथा पारदर्शिता बनी रहे।
        अतः हम यह कह सकते हैं कि मीडिया समाज अथवा लोकतंात्रिक समाज का दर्पण है जिसमें समाज में हो रहे अच्छे/बुरे सभी गतिविधियों व कार्यों को हम इसके माध्यम से देख सकते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लोकतांत्रिक मूल्यों को बरकरार रखने व बनाये रखने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसे वह लोकतंत्र रूपी छत के चौथे स्तम्भ के रूप में निर्वाह करता है।
डॉ0 राकेश रयाल
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