शनिवार, 17 सितंबर 2011

वेब पत्रकारिता : पहचान की जरूरत नहीं







-संजय कुमार
सूचना और संचार क्रांति के दौर में आज प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के बीच वेब पत्रकारिता का चलन तेजी से बढ़ा है और अपनी पहचान बना ली है। अखबारों की तरह बेव पत्र और पत्रिकाओं का जाल, अंतरजाल पर पूरी तरह बिछ चुका है। छोटे-बड़े हर शहर से अमूमन बेव पत्रकारिता संचालित हो रही है। छोटे-बड़े सभी शहरों के प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया भी वेब पर हैं। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में थोड़े ही समय में इसने बड़ा मुकाम पा लिया है। हालांकि समर अभी शेष है। इसे और आगे जाना है।
विदेशों के बाद भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी इसकी घुसपैठ हो चुकी है। हालांकि भारत में अभी भी वेब पत्रकारिता की पहुंच अगली पंक्ति में खड़े लोगों तक ही सीमित है। इधर के दिनों में यह मध्यम वर्ग तक भी आया है। जहां तक अंतिम कतार में खड़े लोगों तक पहुंचने की बात है तो अभी यह कोसों दूर है। हालांकि अंतरजाल मुहैया कराने वाली कंपनियों ने मोबाइल फोन और ग्रामीण क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया है और इंटरनेट अब गांवों तक पहुंच गया है। इसके माध्यम से बेव पत्रकारिता ने भी अपनी पहुंच बना ली है।
‘तहलका डॉट कॉम’ ने जब स्टिंग ऑपरेशन कर बंगारू लक्ष्‍मण से संबंधित खबर फ्लैश किया तब देशभर में वेब पत्रकारिता को खास नजरिये से देखा गया। सूचना तकनीक के क्षेत्र में कंप्यूटर के आने और फिर डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू यानी वर्ल्ड वाईड वेब के इन्टरनेट के माध्यम से सूचना तकनीक के क्षेत्र में जो क्रांति आयी। इसने दुनिया को सीमित कर दिया। एक अंगुली की मदद से पूरी दुनिया को कुछ ही क्षण में जानने का मौका मिला। वर्ष 1969 में, एडवांडस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी ने संयुक्त राज्य अमेरिका के चार विश्वविद्यालयों के कम्प्यूटरों की नेटवर्किंग करके इंटरनेट की शुरुआत की थी।
आज यह जिस मुकाम पर आ चुका है उसकी कल्पना शायद एजेंसी ने भी नहीं की होगी। वेब की दुनिया में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिये किसी देश की भौगोलिक सीमायें आड़े नहीं आती, बल्कि अमेरिका में बैठे-बैठे कोई व्यक्ति किसी भी देश की सामान्य सूचना और वहां से प्रकाशित अखबारों को वेबसाईट पर देख-पढ़ सकता है। इसने सूचना और खबर के साथ-साथ जीवन को भी एक छत के नीचे ला खड़ा किया। अमेरिका हो या भारत किसी देश की खबर, सूचना, जीवन आदि के लिए कहीं भटकने की जरूरत नहीं पड़ती है। सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया में इस तकनीक ने विश्व के लोगों को जितना करीब ला दिया है उतना करीब शायद ही किसी अन्य तकनीक ने लाने का प्रयास किया हो ? इसकी सबसे बडी खूबी यह है कि वेब साईट पर भारत में अगर कुछ डाला जाता है तो उसे हजारों मील दूर बैठे किसी भी क्षेत्र में, उसे उसी क्षण देखा जा सकता है। ई-मेल का पहले पहल प्रयोग 1972 में हुआ था।
जहां तक वेब पत्रकारिता की शुरुआत की बात है तो, 1992 में वर्ल्ड वाइड वेब जारी होने के बाद 1995 तक विश्व में यूजनेट पर करीब ढाई हजार समाचार ग्रुप छा गये। 1995 में चेन्नई से प्रकाशित दैनिक अंग्रेजी पत्र ‘हिन्दू’ ने नेट संस्करण शुरू किया। इसी के साथ देशी वेब पत्रकारिता ने जोर पकड़ा और 1996 में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया और ‘द हिन्दुस्तान टाइम्स’ ने अपना इंटरनेट संस्करण शुरू किया। और आज इनकी संख्या में दिनों दिन बढ़ोत्तरी हो रही है। समाचार पत्र हो या टीवी-खबरिया चैनल या फिर रेडियो सभी वेब पत्रकारिता में कूद पडे हैं। सभी अपने अपने वेब साइट पर समाचार दे रहे हैं। आज भारत में देशी अंग्रेजी ऑनलाईन वेब पत्रकारिता और हिन्दी ऑनलाईन वेब पत्रकारिता का अपना एक अलग संसार कायम हो चुका है। लगभग सभी राष्ट्रीय और स्थानीय प्रमुख समाचार पत्रों का अपना वेबसाईट है और वे ई-पेपर निकाल रहे हैं।
विश्व में हजार समाचार पत्र इन्टरनेट पर अपना संस्करण दे रहे हैं। वेब पत्रकारिता के दौर में अंग्रेजी समाचारों के मामले में वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क टाईम्स और फाइनेंशियल टाईम्स के नेट संस्करण काफी चर्चित हैं। ये सभी वेबसाईट 1996 के शुरूआती दौर में इन्टरनेट पर आये थे। भारत में इंटरनेट उपभोक्तओं की संख्या लाखों में है। तेजी से देश के ग्रामीण क्षेत्रों में कम्प्यूटर लगाने का कार्य किया जा रहा है। फिर भी, अभी रेडियो और दूरदर्शन की तरह इंटरनेट की पहुंच भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं के बराबर है। देश की आम जनता तक इंटरनेट की सुविधा पहुंचे इस दिशा में पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने नई दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय ई-भागीदारी सम्मेलन में कहा था कि सामाजिक, आर्थिक असंतुलन को दूर करने के लिए इंटरनेट से संबंधित सेवा ‘ब्राडबैंड’ भी लोगों तक पहुंचे और इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देना जरूरी है। डॉ. कलाम ने ब्राडबैंड नि:शुल्क उपलब्ध कराने की चर्चा करते हुए कहा था कि सरकार सड़कों पर जो राशि खर्च करती है उससे अधिक वह सामान पर शुल्कों व लोगों की समृध्दि से हासिल कर लेती है। इंटरनेट एक ऐसा माध्यम बन चुका है जो दूरदराज में बैठा व्यक्ति दुनिया को एक जगह सिमटा लेता है। सूचना के इस महासमुंदर के पास हर लोगों को पास लाना होगा। पूर्व राष्ट्रपति ने जो बात कही उसे अमली जामा पहना कर इस क्रांति से लोगों को खासकर ग्रामीण जनता को जोड़ कर विकास की धारा को और तेज किया जा सकता है।
यह सच है कि शहरी क्षेत्र तो इंटरनेट का फायदा उठा रहा हैं। विदेशों की तरह भारत में वेब पत्रकारिता विकास तो कर रहा है लेकिन कई समस्याओं की वजह से यह आम नहीं हो पा रहा है। सबसे बडी वजह यह है कि इसके लिए एक अद्द कम्प्यूटर और इंटरनेट की सुविधा जरूरी है। इन पर अच्छी खासी लागत आती है। जैसा कि भारत की जनसंख्या का एक बडा हिस्सा गाँव में रहता है। शहरी बाजार की तुलना में ग्रामीण बाजार बहुत बडा है, लेकिन गाँवों के समुचित विकास और पिछडेपन की वजह से वहां का आर्थिक संकट सबसे बडा कारण है। साथ ही भारत में बिजली की समस्या गंभीर है। इसकी वजह से साइबर कैफे ठीक ढंग से कार्य नहीं कर पाते हैं और लोग इसका समुचित फायदा नहीं उठा पाते। एक सरकारी आंकडे के अनुसार वर्ष 2002 में एक पंजीकृत इंटरनेट कनेक्शन को औसतन पांच लोग प्रयोग करते थे। हालांकि इसमें अब काफी बढ़ोत्तरी हुई है। साइबर कैफे और व्यक्तिगत कम्प्यूटर की माँग और संख्या तेजी से शहरी क्षेत्रों में बढी है। यही नहीं कस्बाई और छोटे शहरों में भी साइबर कैफे खुलने से इंटरनेट की पहुंच बढ़ गई है। फिर भी विदेशों की तुलना में यहां कम है।
वेब पत्रकारिता का सबसे ज्यादा फायदा विदेशों में रहने वाले लोग उठा रहे हैं। अमेरिका में बैठा बिहार के भागलपुर जिला निवासी अब भागलपुर की खबरों के लिए चिंतित नहीं रहता है वह जिले से प्रकाशित स्थानीय समाचार पत्रों को नेट पर ही पढ़ लेता है। उसे अपनी खबर के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं पडती। अमेरिका में छपने वाले पत्रों में दिल्ली की खबरें तो मिल जाती हैं लेकिन छोटे शहरों की खबरें पढने को नहीं मिलती । इसकी वजह यह है कि आज सभी पत्रों के स्थानीय संस्करण छपने लगे हैं। पटना हो या लखनउ या फिर भोपाल वहां से छपने वाले राष्ट्रीय पत्रों का कई जिलों से प्रकाशन हो रहा है। ऐसे में खबरें जिले तक ही सिमट कर रह गई है। एक जिले से दूसरे जिले में रहने वाला कोई भी व्यक्ति अपने जिले की खबर नहीं पढ़ पाता है। इन हालात में वेब पत्रकारिता ने एक अच्छा माध्यम दिया है। इससे छोटी से छोटी खबरों को नेट पर तलाश कर पढ़ा जा सकता है। हालांकि अक्सर देखने को मिलता है कि ई-पेपर संस्कण को अपडेट करने की रफ्तार काफी धीमी है। फिर भी खबरें देर सबेर सही नेट पर आ ही जाती है।
अंग्रेजी ऑनलाइन वेब पत्रकारिता की शुरुआत हिन्दी से पहले हुई। दरअसल, हिन्दी फॉन्ट की समस्या की वजह से हिन्दी ऑनलाइन वेब पत्रकारिता देरी से आई। हालांकि आज भी फॉन्ट की समस्या बरकरार है क्योंकि हिन्दी ऑनलाईन वेब पत्रों का अपना अलग-अलग पैकेज फाँन्ट है। सभी अलग-अलग फॉन्टों में खुलते हैं, जिससे पाठकों को बहुत परेशानी होती है। हांलाकि अब लगभग सभी ई अखबार अपने अपने संस्करण के साथ डाउनलोड करने के लिए फोन्ट भी देने लगे हैं। 90 के दशक में प्रमुख हिन्दी दैनिकों ने नेट संस्करण निकाल कर वेब पत्रकारिता में घुसपैठ की। मसलन, 1997 में दैनिक जागरण ने ‘जागरणडॉटकॉम’, 1998 में अमर उजाला ने ‘अमरउजालाडॉटकॉम’, दैनिक भास्कर ने ‘भास्करडॉटकॉम’, 1999 में ‘वेबदुनियाडॉटकॉम’, 2000 में प्रभात खबर ने ‘प्रभातखबरडॉटकॉम’।
भारतीय समाचार पत्रों ने जो विकास वेब पत्रकारिता के क्षेत्र में किया वह साहित्यिक पत्रकारिता ने नहीं किया है। हालांकि कुछ चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं का नेट संस्करण आने लगा है। इनमें चर्चित ‘हंस’ पत्रिका ‘हंसमन्थलीडॉटकॉम’ और ‘वर्तमान साहित्य’, का ‘खबरएक्सप्रेसडॉटकॉम’, पाखी, बयान आदि नेट पर हैं। जबकि अलग से वेब पर साहित्य को समर्पित साइटों में ‘अभिव्यक्तिहिन्दीडॉटओआरजी, ‘अनुभूतिहिन्दीओआरजी’, ‘हिन्दीनेस्टडॉटकॉम’, ‘लिटरेटवर्ल्डडॉटकॉम’, ‘सृजनगाथा आदि शामिल हैं। हंस और वर्तमान साहित्य अपने अंक को जहां नेट पर डालते हैं वहीं साहित्यिक साइटें, साहित्य के विविध आयामों पर सामग्री देते हैं। वहीं वेब पत्रकारिता में केवल मीडिया की खबरों आदि को जगह देने वालों में साइट हैं मसलन, भड़ास4मीडियाडॉटकॉम, मीडियामोरचाडॉटकोडॉटइन, मीडियामंचडॉटकॉम, मीडियाविमर्षडॉटकॉम आदि। जबकि वेब पत्रकारिता की दिशा में केवल वेब पत्रकारिता करने वाले साइटों में प्रवक्ता, जनोक्ति, मोहल्लालाइव, तेवर, रविवार, हस्तक्षेप, वेब दुनिया, चौथी दुनिया, तहलका आदि सैकड़ों हैं।
आज अमूमन सभी राष्ट्रीय और स्थानीय समाचार पत्र वेब पत्रकारिता में कूद चुके हैं और नेट पर अपने पत्रों का संस्करण निकाल रहे हैं। हालांकि भारत में वेब क्षेत्र में पत्रकारिता अलग से काफी कम हो रही है सिर्फ गिने चुने ही वेब साइर्ट इस क्षेत्र में अलग से हैं। वहीं दैनिक पत्र अपने समाचार पत्रों के संस्करण को केवल नेट पर छोड़ देते हैं। देखा जाये तो भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने जिस तरह से स्वत्रंत नेटवर्क फैलाया है उस तरह से वेब पत्रकारिता का नेटवर्क नहीं है। अगर अखबारों के संस्करण को थोड़ी देर के लिए छोड़ दिया जाये तो भारत में देशी वेब पत्रकारिता नहीं के बराबर मिलेगा। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया जो अपना नेट संस्करण निकालते हैं वे अलग से इसकी व्यवस्था तक नहीं करते हैं। उनके पास वेब पत्रों के लिए अलग से विभाग कार्य नहीं करता। इसकी सबसे बड़ी वजह शायद यह है कि इससे अतिरिक्त आय नहीं के बराबर होती है। हालांकि कुछ साइटों ने अपने ई-अखबार के लिए अलग से संवाददाता भी रखे हैं। वेब पत्रकारिता के लिए अलग से टीम नहीं रहने से मौलिकता का भी अभाव रहता है। खबरों में अपडेट का अभाव साफ दिखता है। वैसे एक-आध साइटें हैं जो खबर अपडेट करने की दिशा में सक्रिय है। वेब पत्रकारिता को व्यापक बनाने के लिए अलग से रिर्पोटर रख कर ऑनलाइन रिर्पोट फाइल करवाने की आवश्यकता है। साथ ही प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की तरह इसे अलग रख कर इसके विकास के प्रति जबावदेही होना होगा। केवल अखबारों के संस्करण नेट पर छोड़ने से काम नहीं चलेगा। वेब पत्रकारिता को स्थापित करने के लिए इसकी अपनी दुनिया होनी चाहिए ताकि यह अपनी मौलिकता के साथ पहचानी जाये।
खैर, जो भी हो, आने वाले दिनों में वेब पत्रकारिता निश्चित तौर पर वह मुकाम पायेगा जो प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने पाया है। तेजी से बड़े शहरों से होता हुआ छोटे शहरों और अब कस्बा-ग्रामीण क्षेत्रों में पैर पसार रहा है।

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