मंगलवार, 27 सितंबर 2011

डॉ गोविंद सिंह / बदलते दौर में हिंदी पत्रकारिता


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22 Sep

Professor Govind Singh
डॉ गोविंद सिंह
प्रोफेसर एवं अध्‍यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार,
उत्‍तराखंड मुक्‍त विश्‍़ववि‍द्यालय, उंचापुल, हल्‍द्वानी
         हिंदी पत्रकारिता पर पिछले कुछ अर्से से यह आरोप लग रहा है कि वह अपनी दिशा से भटक रही है। वह मिशन को छोड कर प्रोफेशन बन गई है। समाज के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी को नहीं समझ पा रही है। एक अंदाज से देखें तो इन आरोपों में दम नजर आता है किंतु ये आरोप पूरी तरह से सही नहीं हैं। हां,यह सच है कि पत्रकारिता बदल रही है। आखिर जमाना बदल रहा है तो पत्रकारिता क्‍यों न बदले। पत्रकारिता अपने वक्‍त की धडकन होती है। और जब वक्‍त बदलता है तो धडकन का बदलना भी स्‍वाभाविक है।
          इसे समझने के लिए आइए चलें आजादी से पहले के दौर में। आजादी से पहले पूरा देश एक ही दुश्‍मन से लड रहा था। और वह दुश्‍मन था गुलामी। तब इक्‍का दुक्‍का अंग्रेजी अखबारों को छोड कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अखबार भी इसी दुश्‍मन से लड रहे थे। हिंदी की पत्रकारिता तो पूरी तरह से आजादी के यज्ञ में अपनी आहुति दे रही थी। हिंदी के पहले अखबार उदंत मार्तंड से लेकर भारत मित्र, प्रताप, कर्मवीर, आज, सैनिक, सरस्‍वती, हिंदू पंच, और चांद जैसी पत्र पत्रिकाएं पूरी तरह से आजादी पाने के महामिशन में जुटी हुई थीं। बाल गंगाधर तिलक, महामना मदन मोहन मालवीय, और महात्‍मा गांधी सरीखे नेता अपनी वाणी के साथ ही लेखनी से भी देश की राजनीि‍त को दिशा दे रहे थे। इनके चलाए हुए अखबार महज अखबार नहीं, अंग्रेजों के खिलाफ लडाई के पैने हथियार थे। तब कहा जाता था कि-
                  अगर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।
आगरा से निकलने वाले अखबार सैनिक का ध्‍येय वाक्‍य था-
                  कमर बांधकर, अमर समर में नाम करेंगे
                  सैनिक हैं, हम, विजय स्‍वत्‍व संग्राम करेंगे।
अखबार के पहले ही अंक में लिखा था-
बस, एक ही अभिलाषा है, परम पिता ऐसी कृ्पा करें कि सैनिक जब तक जिये, देश के लिए जिये। और जिस दिन मरे, देश के लिए मरे। जीवन, धन, सुख, सब कुछ जाए पर वह आदर्श भ्रष्‍ट न होने पाए।
इसी तरह कानपुर से छपने वाले प्रताप का ध्‍येय वाक्‍य था-
          जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है
          वह नर नहीं, नरपशु निरा है, और मृतक समान है।
           एक समय था, जब प्रताप देश के स्‍वतंत्रता संग्रामियों का अड़डा हुआ करता था। इसके संपादक गणेश शंकर विद़यार्थी न सिर्फ देशभक्‍त पत्रकार थे,बल्कि एक क्रांति���ࠀकारी भी थे। अपनी आग उगलती लेखनी के कारण वे अनेक बार जेल गए और सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने की अपनी उत्‍कट जिजीविषा के चलते 1931 के सांप्रदायिक दंगों में उन्‍होंने अपनी शहादत तक दे दी।
          आजादी से पहले की समूची पत्रकारिता पर गांधी जी का असर साफ तौर पर देखा जा सकता है। गांधीजी जानते थे कि केवल अंग्रेजों के खिलाफ सिर्फ लडाई लडकर हम उन्‍हें नहीं हरा सकते। अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए हमें खुद अपने भीतर सुधार लाना होगा। लिहाजा वो समाज के दबे-कुचले वर्गों को उूपर उठाने के काम में  लग गए। उनके पत्र नवजीवन, हरिजन और यंग इंडियन सचमुच समाज सुधारक का काम करते थे।
        यानी आजादी से पहले के हमारे अखबार आजादी प्राप्‍त करने के महायज्ञ में अपनी आहुति���ࠀ दे रहे थे। वे हर लिहाज से भारत और भारतीयों को तैयार कर रहे थे। इसलिए वह पूरी तरह से मिशनरी पत्रकारिता थी। उसे आज की भाषा में पेशेवर या व्‍यावसायिक कतई नहीं कहा जा सकता था। लेकिन आजादी के बाद पत्रकारिता को भी अपना रास्‍ता बदलना पडा। चूंकि उसके सामने आजादी पाने का लक्ष्‍य नहीं रह गया था, इसलिए कुछ अखबार सरकार के साथ मिलकर राष्‍ट निर्माण के काम में लग गए जबकि बाकी अखबार खुद को धीरे-धीरे व्‍यावसायिक बनाने में जुट गए।
        हिंदी पत्रकारिता ने पहली बार 1977 में तब करवट ली जब देश में बडा राजनीति���ࠀ परिवर्तन हुआ। उसके बाद टेक्‍नोलॉजी में आए बदलाव के कारण छोटे अखबारों को पंख पसारने का अवसर मिला। जहां राष्‍टीय कहे जानेवाले अखबार सिमटने लगे, वहीं क्षेत्रीय अखबार अपने नए-नए संस्‍करण निकालने लगे।
         वर्ष 1991 में आए आर्थिक सुधारों ने पत्रकारिता में जैसे क्रांति���ࠀ ही ला दी। भारत में विदेशी टीवी चैनल आने लगे। अखबारों और मीडिया कंपनियों में विदेशी निवेश के दरवाजे खुलने लगे। विदेशी पत्र-पत्रिकाओं के स्‍वदेशी संस्‍करण छपने लगे। भारतीय अखबार भला इनसे प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकते थे। इंटरनेट का आगाज हुआ। छपाई और रूप सज्‍जा में तो अंतर आया ही, साथ ही अखबारों की विषयवस्‍तु में भी व्‍यापक अंतर आने लगा। सचमुच पिछले 20वर्षों में हिंदी पत्रकारिता ने जबर्दस्‍त विस्‍तार किया। जहां 1980तक देश के दस शीर्ष अखबारों में बडी मुश्किल से हिंदी के इक्‍का-दुक्‍का अखबारों का नाम ही आ पाता था, वहीं आज दस में से छह अखबार हिंदी के हैं। पहले चार अखबार तो क्रमशह हिंदी के ही हैं। आज हिंदी के 14 करोड पाठक हैं तो अंग्रेजी के महज 3 करोड 20 लाख हैं। यह भी तब है जबकि समुचे हिंदी भाषी समाज में अभी सिर्फ 25 प्रति���ࠀशत लोग ही अखबार पढते हैं।
        जिस दिन बाकी के 75 प्रति���शत लोग भी अखबार पढने लग जाएंगे, उस दिन की सहज ही कल्‍पना की जा सकती है। कहने का आशय यह है कि जैसे जैसे हिंदी समाज आगे बढ रहा है, वैसे वैसे हिंदी पत्रकारिता भी फैल रही है, पनप रही है।
            लेकिन खतरा यह है कि व्‍यावसायिकता की इस आंधी में कहीं सचमुच हिंदी पत्रकारिता अपनी दिशा ही न भूल जाए। आज हिंदी पत्रकारिता पर बाजार का जबर्दस्‍त दबाव है। बाजार अपने आप में कोई बुरी चीज नहीं है, लेकिन जब वह अखबार की विषयवस्‍तु को भी नियंत्रित करने लग जाती है, खबरों की विश्‍वसनीयता को अपने पक्ष में मोडने लग जाती है, तो खतरा बढ जाता है। संक्रमण के इस दौर में आज अनेक अखबार इस संकट से जुझ रहे हैं। मार्केटिंग के दबाव में अखबारों की भाषा बदली जा रही है। संपादक के अधिकारों में लगातार कटौती की जा रही है। खबरों और लेखों के स्‍तर में कमी आ रही है। यहां तक कि खबरों के बिकने यानी पेड न्‍यूज के आरोपों से भी भारतीय पत्रकारिता दागदार हुई है। इसलिए यही समय है जब हिंदी पत्रकारिता को अपनी दिशा तय करनी होगी। यह ठीक है कि आज वह पूरी तरह से मिशनरी नहीं हो सकती, लेकिन उसे अपनी साख तो बचाए रखनी ही होगी।     




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