गुरुवार, 4 अगस्त 2011

हिंदी पत्रकारिता के प्रकाश पुंज विद्यार्थी


प्रकाशन :सोमवार, 1 मार्च 2010
ओ.पी.हरयाण
मध्यप्रदेश की वीर प्रसूता भूमि ने राष्ट्र की आज़ादी के लिये जो जननायक जन्में, गणेश शंकर विद्यार्थी भी उनमें से एक थे। 25 अक्टूबर 1890 क्वार सुदी 12 संवत् 1947) दिन शनिवार को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के अतुरसुइया मोहल्ले में अपने ननिहाल में नाना मुंशी सूरज प्रसाद के घर जन्में विद्यार्थी जी का बचपन मध्यप्रदेश के विदिशा और मुंगावली (अशोक नगर) में बीता। गणेश जी के जन्म और नामकरण के संबंध में एक रोचक दास्तान है, जब गणेशजी अपनी माँ के गर्भ में थे, उस समय उनकी नानी ने एक स्वप्न देखा था कि वे भगवान गणेश की एक मूर्ति अपनी बेटी गोमती को दे रही है। वह स्वप्न उन्होंने अपने बेटी को सुनाया और निश्चित किया कि यदि नाती हुआ तो उसका नाम गणेश ही रखूँगी। इसी स्वप्न के आधार पर उनका नाम गणेश रखा गया। उनके पिता जयनारायण श्रीवास्तव और माँ श्रीमती गोमती देवी का जीवन सदा धार्मिक एवं सात्विक विचारों का था। गणेश शंकर के जन्म के समय मुंशी जय नारायण श्रीवास्तव अपनी जन्मभूमि ग्वालियर रियासत के मुंगावली (अशोक नगर) नामक स्थन पर रहकर वहीं के (ए.वी.एस.) ऐंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल 1901 से 1905 जब जयनारायण श्रीवास्तव की बदली भेलसा (विदिशा) हो गयी थी तब गणेश शंकर विदिशा में पढ़े थे। 1905 में उन्होंने मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की थी और 1907 में एण्ट्रेंस। गणेश शंकर की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू भाषा में शुरू हुई। धीरे-धीरे उन्हें हिन्दी का भी अच्छा ज्ञान हो गया। एम.ए. की पढ़ाई के लिये गणेश शंकर इलाहाबाद की कायस्थ पाठशाला में भर्ती हो गये। यहाँ पढ़ाई के दौरान उनका सुझाव अख़बारों में लेख लिखने की ओर भी हुआ। इस मामले में उनका उत्साह बढ़ाने का काम उर्दू अख़बार स्वराज्य ने किया। स्वराज्य अख़बार में उनके लेख छपने लगे। इस तरह शोषण शंकर का नाम स्कूल से बाहर आया और लिखने-पढ़ने के बीच उनकी पैठ होने लगी।
विद्यार्थी
अपने अध्ययन एवं लेखन के दौरान गणेश शंकर की भेंट पंडित सुन्दरलाल जी से हुई और उन्होंने उनको हिन्दी में लिखने के लिये प्रोत्साहित किया। पंडित सुन्दर लाल ने ही गणेश शंकर को विद्यार्थी उपनाम दिया जो आगे चलकर उनके नाम में हमेशा-हमेशा के लिये जुड़ गया। एक बार किसी ने उनसे पूछा कि आप अपने नाम के साथ विद्यार्थी शब्द क्यों जोड़ते हैं.....? तब विद्यार्थी जी ने जवाब दिया मनुष्य अपने जीवन भर कुछ न कुछ सीखता रहता है। वह विद्यार्थी ही बना रहता है। इसलिये मैं अपने नाम के साथ विद्यार्थी जोड़ता हूँ और अपने आपको विद्यार्थी मानता हूँ।
लेखक और पत्रकार
अर्थाभाव के कारण गणेश शंकर विद्यार्थी ने पढ़ाई अधूरी छोड़कर 1908 में कानपुर के करेंसी कार्यालय में 30 रुपये मासिक वेतन पर नौकरी कर ली। इलाहाबाद प्रवास के दौरान गणेशजी पंडित सुन्दरलाल के संपर्क में आ गये थे, जो वहाँ से प्रखर साप्ताहिक, कर्मयोगी निकालते थे। शिवनारायण भटनागर और उनके ऊर्दू साप्ताहिक स्वराज्य से भी हुआ। स्वराज्य के मात्र एक वर्ष के प्रकाशन काल में एक के बाद एक उसके आठ संपादकों को कारावास की सजा हुई। हिन्दी और उर्दू पर समान अधिकार रखने वाले विद्यार्थी जी ने दोनों पत्रों के लिये लिखा। यह वह पृष्ठभूमि थी जो गणेश शंकर विद्यार्थी का भविष्य रच रही थीं। कर्मयोगी। पढ़ने कारण ही उन्हें करेंसी कार्यालय की नौकरी और बाद में पृथ्वीनाथ मिडिल स्कूल की अध्यापकी छोड़ना पड़ी।
विद्यार्थी जी के लेख कर्मयोकगी हितवार्ता एवं अभ्युदय जैसे क्रांतिकारी अख़बारों में छपने लगे। दिसम्बर 1911 में जब सम्राट जार्ज पंचम हिन्दुस्तान आये और उनका दिल्ली दरबार लगा तो विद्यार्थी जी का एक बहुत विस्फोटक लेख हितवाद अख़बार में छपा। इस लेख से विद्यार्थी जी की काफ़ी प्रसिद्धि मिली। लेखन कार्य से विद्यार्थी जी की जान पहचान देशभक्तों में हो गई। विद्यार्थी जी को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका में 3 नवम्बर, 1912 से 25 रुपये वेतन पर अभ्युदय में चले गये। करीब आठ नौ माह बाद जब विद्यार्थी जी दशहरे की छुट्टियों में कानपुर आये तो इनके कुछ साथियों ने कानपुर से अख़बार निकालने की सलाह दी तथा आर्थिक संसाधन जुटाने में सहायता करने का विश्वास दिलाया। विद्यार्थी जी 23 नवम्बर 1913 में अभ्युदय की नौकरी छोड़कर कानपुर आ गये।

‘प्रताप का प्रारंभ’
लगभग दो माह के भीतर कुछ उत्साही लोगों की मदद से साधन जुटाकर विद्यार्थी जी ने कानपुर के फील खाना मोहाल में प्रताप प्रेस की नींव डाली तथा 9 नवम्बर 1913 को साप्ताहिक प्रताप का पहला अंक निकला। इस पहले अंक से ही यह सिद्धान्त सूचक पंक्तियाँ प्रताप में छपने लगीं तथा जब तक प्रताप निकला यह पंक्तियाँ उस पर बराबर छपती रही।

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।

यह नर नहीं, नर पशु निरा है और मृतक समान है।।


विद्यार्थी जी के अथवा परिश्रम से प्रताप जनता का अपना पत्र बन गया। उसकी संपादकीय टिप्पणियाँ व लेख गरबों, दीन-दुखियों व मजदूर किसानों की वकालत करते थे। इसी वजह से प्रताप धनवान लोगों को आखों में खटकने लगा तथा सरकार की भी भुकुटी चढ़ गई। प्रताप की शुरूआत के पाँच साल के भीतर ही दो बार जमानतों जब्त हुई और घर तथा प्रेस की पुलिस तलाशी ली गई। पहली बार 26 अक्टूबर 1916 को कुली प्रथा नामक नाटक छापने के कारण प्रताप प्रेस से एक हज़ार रु. तथा दूसरी बार 22 अप्रैल, 1916 को कुली प्रथा नामक नाटक छापने के कारण प्रताप प्रेस से एक हज़ार रु. तथा दूसरी 22 अप्रैल, 1918 तो फ़िदा-ए-वतन शीर्षक कविता प्रकाशित करने के फलस्वरूप प्रताप अख़बार से एक हज़ार रुपये की जमानत माँगी गई। जमानत जप्त होने के कारण ही जून 1918 में प्रताप बंद हो गया परन्तु जुलाई के पहले सप्ताह से ही पुनः प्रकाशित हुआ।

विद्यार्थी जी ने पाँच व्यक्तियों की एक समिति बनायी ताकि दुर्दिन आने पर प्रताप प्रेस या प्रताप अख़बार का प्रकाशन बंद नहीं होने पाये। इसमें स्वयं के अलावा राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त आदि शामिल थे। समिति का पंजीयन 15 मार्च 1919 को कानपुर में हुआ।

प्रताप पर मुकदमे
इसी वर्ष दिसंबर माह में कानपुर में 25 हज़ार मिल मजदूरो ने मंहगाई के कारण हड़ताल कर दी। उस हड़ताल में विद्यार्थी जी और उनके प्रताप ने मजदूरों का पूरा साथ दिया। परिणामतः मजदूरों के वेतन में 15 प्रतिशत बढ़ोŸारी हुई। इस घटना से जनता से प्रताप की माँग बढ़ गयी तथा सन 1920 में वह दैनिक के रूप में निकलने लगे। सन 1921 में रायबरेली के मुंशीगंज, फुरसतगंज और कराया बाजार में किसानों और ताल्लुकेदारों व जमींदारों के बीच हुए झगड़े में गोलियाँ चलीं। जिसमें कई किसान घायल हुए। विद्यार्थी जी ने प्रताप में इस घटना को उजागर किया तथा किसानों का पक्ष लिया। इसका नतीजा यह निकला कि एक ताल्लुकेदार ने प्रताप पर मुकदमा चला दिया। इस मुकदमें में विद्यार्थी जी की ओर से गवाही देने के लिये पं. मोतीलाल नेहरू तथा पं. मदन मोहन मालवीय तक को आना पड़ा। मुकदमे का फैसला विद्यार्थी जी व प्रताप के विरुद्ध गया। इस मुकदमे में विद्यार्थी जी की कई मास जेल में रहना पड़ा। विद्यार्थी जी और प्रताप अख़बार पर सन 1926 में एक और जबर्दस्त मुकदमा चला। यह मुकदमा शिकोहाबाद के एक थानेदार ने मैनपुरी के डिप्टी कलेक्टर की अदालत में चलाया। बात यह थी कि शिकोहाबाद का थानेदार काफ़ी घूसखोर था और स्वभाव से भी बहुत जालिम था। जब विद्यार्थी जी को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने इस मामले की पूरी जाँच करायी तथा जाँच का ब्यौरा दैनिक प्रताप में छापा। इसी बात को लेकर उस थानेदार ने दैनिक प्रताप के संपादक और प्रकाशक सुरेन्द्र शर्मा पर मानहानि का मुकदमा चलाया और अंत में हाईकोर्ट से विद्यार्थी जी मुकदमा जीत गए। विद्यार्थी जी और प्रताप पर सांई खेड़ा मानहानि का भी मुकदमा चला किन्तु इसमें सुलह हो गयी चम्पारन में अँगरेज़ जनता पर जो अत्याचार कर रहे थे, उसकी पोल सबसे पहले विद्यार्थी जी ने ही प्रताप में खोलीं। जिसका परिणाम यह हुआ कि काफ़ी जाँच पड़ताल के बाद वहाँ नील की खेती ख़त्म कर दी गयी तथा वहाँ की जनता का दुख दूर हो गया। काकोरी की ट्रेन डकैती का महत्व भी जनता को विद्यार्थी जी ने पहली बार प्रताप के द्वारा बताया। साइमन कमीशन के बहिष्कार में विद्यार्थी जी व उसके प्रताप ने काफ़ी हिस्सा लिया।

राजनीतिक कार्यकर्ता विद्यार्थी
गणेश शंकर विद्यार्थी एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे और उत्तर प्रदेश (उस समय का युक्त प्रांत) के अग्रणी नेताओं में उनका स्थान था। आरंभ में वे क्रांतिकारी विचारधारा से प्रभावित थे लेकिन 1916 में लखनऊ कांग्रेस में गांधी जी को उन्होंने अपना नेता मान लिया और उन्हीं की राह पर चल पड़े। तथापि उनका प्रताप और वे स्वयं क्रांतिकारियों के मददगार बने रहे। फ़रारी में शरण देना, मुकदमों की तैयारी और आर्थिक सहयोग का सिलसिला बनाये रखा। सरदार भगत सिंह ने भी अपना अज्ञातवास प्रताप के संपादकीय सहयोगी के रूप में बिताया था। 1925 की कानपुर ने भी अपना अज्ञातवास प्रताप के संपादकीय सहयोगी के रूप में बिताया था। 1925 की कानपुर कांग्रेस के आयोजन की विद्यार्थी से धुरी थे। 1926 में एक उद्योगपति को पराजित कर गणेशजी संयुक्त प्रांत कौंसिल (उत्तर प्रदेश) के लिये चुने गये। 1929 में सदस्यता छोड़ने के कांग्रेस के फैसले का पालन करने वाले वे पहले नेता थे। 1929 फर्रुखाबाद युक्त प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गये और बाद में उन्हें प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष चुना गया। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में गणेश शंकर विद्यार्थी युक्त प्रांत उत्तर प्रदेश के प्रथम डिक्टेटर (एकाधिपति) मनोनीत हुए थे। पत्रकारिता और स्वतंत्रता संग्राम के सिलसिले में विद्यार्थी जी को पाँच बार कारावास का दंड भुगतना पड़ा। फिरंगी हुकूमत गोया बहाना ही ढूँढती रहती थी कि मौका मिले और कलम के इस जांबाज योद्धा को जेल में डालो......! गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप ने देशी रियासतों में प्रजा पर होने वाले अत्याचारों के ख़िलाफ़ जमकर लोहा लिया और ऐसे अनेक आंदोलन चलाये, जिसके कारण उन्हें न्याय मिला। इंदौर, ग्वालियर, उदयपुर, जोधपुर आदि अनेक रियासतों में प्रताप के प्रवेश पर ही रोक लगा दीं थी लेकिन विद्यार्थी जी न तो इन प्रतिबंधों के सामने झुके और न ही राजाओं सामंतों के प्रलोभन उन्हें अपने मार्ग से डिगा सके।

क्रांतिकारियों के मददगार
सरफ़रोशी की तमन्ना रखने वाले महान क्रांतिकारी सरदार भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रोशन सिंह ठाकुर, रामकृष्ण खत्री आदि का कोई ठोस अथवा नियमित आय स्त्रोत नहीं था। समय-समय पर गणेश शंकर विद्यार्थी ने इनके लिये आजीविका के साधन जुटाकर इनकी सक्रिय सहायता की का एक पैर तो जेल में ही रहता था विद्यार्थी जी ऐसे क्रांतिकारियों के परिवारों की समय-समय पर यथासंभव आर्थिक सहायता भी की। उन्होंने चंद्रशेखर आजाद के पिता की आर्थिक सहायता विशेष रूप से की थी। सरदार भगत सिंह को उन्होंने जिले के एक मिडिल स्कूल में हेडमास्टर बनवाया तो काकोरी कांड के बाद अशफाक उल्लाह खान को अपने कार्यालय प्रताप में रख लिया था। 19 दिसंबर 1927 को फांसी लगने के बाद शहीद अशफाक का मकबरा भी शाहजहाँपुर में विद्यार्थी जी ने ही बनवाया था। इतिहास में विद्यार्थी जैसे शहीदों के सरपरस्त कम ही मिलेंगे।

विद्यार्थी जी का बलिदान
देश भक्त सरकार भगतसिंह और उनके साथियों को अँगरेज़ी हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी। इस ख़बर से पूरे देश में कोहराम मच गया। कानपुर में 24 मार्च की सुबह यह ख़बर सुनकर लोग शोक सतप्त हो गये। हुतात्माओं के सम्मान में कानपुर में हड़ताल का आव्हान किया गया। इससे कानपुर में एक भयंकर साम्प्रदायिक दंगा शुरू हो गया। दुकानों और मकानों में लूटपाट शुरू हो गई। आगजनी की कई घटनाएँ हुई, हिंसा का तांडव मच गया। भारत के मानव हिन्दू मुसलमान दोनों धर्मों का मानने वाले जन पारस्परिक युद्धों के समय कितने नीचे गिर जाते हैं इसकी कल्पना कर सकना कोई कठिन कार्य नहीं है। हम सब उस पतन के साक्षी हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व और पश्चात काल में भारतवासियों ने यह विभीषिकाएँ भी देखीं हैं। 1931 का कानपुर का हिन्दू मुस्लिम तुमुल युद्ध विभीषिकापूर्ण था। तत्कालीन शासन उस तुमुल युद्ध को बढ़ाने में सहायक ही नहीं उसका प्रेरक भी था। कानपुर के बंगाली मोहाल नामक क्षेत्र में प्रायः दो सो मुस्लिम नारी घिरे पड़े थे। रात में कुछ मार डाले गये थे। बचे हुए डेढ़ दो सौ लोग उस रात को मारे जाने वाले थे। गणेश शंकर विद्यार्थी बिना खाये पिये प्रातः घर से निकल गये और बंगाली मोहाल पहुंचे वहाँ के आक्रांक हिन्दू गणेश शंकर विद्यार्थी को देखकर सहम गये। विद्यार्थी जी ने वहाँ से घिरे हुए मुसलमान नर नारी बालकों को निकला और उन्हें मुसलमान मोहल्लों में पहुंचाया। विद्यार्थी जी को हृदय से आशीष देते हुए ये भयग्रस्त लोग सुरक्षित स्थिान पर पहुँच गये।

ओ.पी.हरयाण

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