रविवार, 14 अगस्त 2011

प्रभात खबर-अखबार नहीं आंदोलन

prahbat khabar-भारत कुमार
जब बाड़ ही खेत खाए तो खेत को कौन बचाए। यह कहावत भारत में अक्सर इस्तेमाल की जाती है। क्योंकि यहां इसके बहुतेरे उदाहरण मिलते हैं। लोगों को उम्मीद थी कि आजादी के बाद पुलिस, प्रशासन और नेता मिलकर उनकी सुरक्षा करेंगे।
उनके लिए विकास के अवसर पैदा करेंगे। लेकिन हुआ उल्टा। ये लोग जनता की कीमत पर अपने ही विकास में लग गए। ऐसे में जनता ने अपना भरोसा मीडिया पर जताया। लेकिन यहां भी वही कहानी दोहरायी गयी। मीडिया का प्रभुवर्ग देखते ही देखते सत्ता तंत्र और बाजारवादी ताकतों का दरबारी बन गया। जनता के विश्वास को उसने ठेंगा दिखा दिया।
ऊपर कही गयी बात आज की हकीकत है। लेकिन इसके अपवाद भी मौजूद हैं। जैसे पुलिस, प्रशासन और राजनैतिक नेतृत्व में सभी बुरे नहीं हैं, उसी प्रकार सभी चैनल या समाचार पत्र भी बुरे नहीं हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो भीषण प्रतियोगिता और राजनैतिक उत्पीड़न के बावजूद पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं मानते। वे इसे एक मिशन मानते हैं। झारखंड का प्रमुख समाचार पत्र ‘प्रभात खबर’ इन्हीं में से एक है।
प्रभात खबर इस वर्ष अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है। जिस अखबार के शुरूआती दिनों में उससे जुड़े लोग रोज अपनी आवश्यक जरूरतों में से कटौती करते थे, ताकि अखबार के लिए न्यूजप्रिंट कागज खरीदा जा सके, ऐसा अखबार 25 वसंत सफलतापूर्वक देख लेता है तो यह आंधी और तूफान में एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने जैसा है। ज्वार भाटे के बीच समुद्र में से मोती खोज कर लाने जैसा है।
फर्श से अर्श तक तय किए गये इस सफर का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इस सफर के दौरान मुसाफिर ने अपने मूल्यों और सिंद्धांतों को कभी नहीं त्यागा। प्रभात खबर ने वह दौर देखा है जब कई छोटे बड़े समाचार पत्र राजनीतिक दलों के प्रवक्ता बन रहे थे।
अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठ भी राजनीतिक पार्टियों और व्यावसायिक घरानों के लिए समर्पित होने लगे थे। टूट जाने के उस दौर में अखबार ने कष्ट सहते हुए भी खुद को समझौतावादी नहीं बनने दिया।  इसी साहस के कारण अखबार की एक अलग पहचान बनी और धीरे-धीरे उसने झारखंड के अलावा बंगाल और मौजूदा बिहार के लोगों का भरपूर प्यार हासिल किया।
अपने इस विस्तार का श्रेय प्रभात खबर अपने एडिटोरियल कन्टेंट (संपादकीय सामग्री) को देता है। जनोन्मुखी चरित्र को कायम रखते हुए प्रभात खबर ने कई घोटाले उजागर किए। भ्रष्टाचार के कई मामलों की जनता के सामने पोल खोल दी। ऐसा करके उसने सत्ता तंत्र को अपने खिलाफ कर लिया। इसकी कीमत अखबार को हमेशा चुकानी पड़ी।
अखबार पर तरह-तरह के दबाव बनाये गये, धमकियां मिली, आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा। इन सबके बीच ही प्रभात खबर को देश के दो बड़े मीडिया घरानों से मिलने वाली व्यावसायिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन परिस्थितियां जितनी बिगड़ीं, प्रभात खबर में उतना ही निखार आया।
आज 47 लाख लोग अपनी सुबह की शुरूआत इसी अखबार के अवलोकन से करते हैं। आज भी अखबार का वही मूल मंत्र है जो आज से 25 साल पहले था- सामाजिक सरोकार को कायम रखते हुए जनता के साथ, जनता के सवालों पर पत्रकारिता करना। यही प्रभात खबर की सफलता का राज है।

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