रविवार, 14 अगस्त 2011

पत्रकारिकता के समक्ष विश्र्वसनीयता का संकट सबसे बड़ी चुनौतीःबलबीर दत्त


देश की पत्रकारिकता जगत में लगभग छह दशक तक आए निरंतर बदलाव के गवाह बने प्रखयात पत्रकार बलबीर दत्त का मानना है कि आज के युग में पत्रकारिता के समक्ष विश्र्वसनीयता का संकट सबसे बड़ी चुनौती है। उनका मानना है कि आज पत्रकारिता में कई स्वार्थी तत्व भी घुस आए है, निजी स्वार्थ के लिए पत्रकारिता के नाम पर नाजायज फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है और अब पत्रकारिता का पवित्र पेशा भी भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रहा है। प्रस्तुत है, उनसे बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-
प्रश्नः आजादी की पूर्व और आजादी के बाद की पत्रकारिता में क्या प्रमुख अंतर आए हैं?
दत्तः- देश में आजादी के पूर्व की पत्रकारिता स्वाधिनता आंदोलन का एक हिस्सा था, यह एक वैचारिक आंदोलन था और जो लोग भी पत्रकारिता में आए है, उनके अंदर देश को आजाद देखने का एक जज्बा होता था। उस दौरान के अधिकांश अखबार भी राष्ट्रवादी होते थे। उस वक्त के बड़े अखबार इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, पायनियर, सिविल एंड मिलिट्री गजट प्रमुख समाचार पत्र माने जाते थे और उनका प्रसार संखया भी अच्छा था। अधिकांश अखबार राष्ट्रवादी आंदोलन में शामिल हुए। पहले के अखबार अंग्रेजी शासन के खिलाफ लिखने के लिए जेल जाने को भी तैयार रहते थे। पहले के अखबार पूंजी प्रधान नहीं होते थे। उस वक्त अमृत बाजार नामक पत्रिका सिर्फ १०० रुपए के कोष से निकलनी शुरु हुई। लेकिन आज का अखबार पूंजी प्रधान उद्य्‌नोग बन गया है। तब अखबारों में संपादक का काफी महत्व होता था, यह माना कहा जाता था-एडिटर इज किंग। उस वक्त संपादकीय का बहुत महत्व होता था, कई अखबार तो सिर्फ संपादकीय पढ ने के ही खरीदे जाते थे। अखबारों की गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दिया जाता था, विज्ञापन की शुद्धियों पर भी ध्यान रखा जाता था।
प्रश्नःमौजूदा परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता के समक्ष क्या-क्या चुनौतियां है?
दत्तः-आज पत्रकारिकता के समक्ष विश्र्वसनीयता का संकट सबसे बड़ी चुनौती है। विश्र्वसनीयता पर खरा नहीं उतरने के कारण प्रतिष्ठा भी गिर गई है। बहुत से स्वार्थी तत्व नाजायज फायदा उठाने के लिए पत्रकारिकता के इस पवित्र पेशे में घुस आए है। पत्रकारिता अब भ्रष्टाचार भी अछूता नहीं रहा है। पहले पत्रकार गर्व से सिर उठा कर चलते थे। अब लोग पत्रकारों से भी सहम गए है, पुलिस और पत्रकार दोनों से डरने लगे है। पेशे की प्रतिष्ठा गिर गई है। इसके लिए जिम्मेवार भी पत्रकार ही है। हर कार्य क्षेत्र में आज गिरावट आई है, चारित्रिक पतन हर क्षेत्र में हुआ है। पूरे समाज में गिरावट आई है। राजनीति आज एक नाकारात्मक शब्द के रुप में बदनाम हुआ है। सांसद, विधायक व जनप्रतिनिधि का शब्द बदनाम हुआ है। यही कारण है कि आज स्कूली बच्चे भी इसकी आलोचना करने लगे है। सवाल के बदले नोट लेने का मामला प्रकाश में आया है। झारखंड के मंत्रियों के बारे में यह कहा जाता है कि पहले वे पुराने खटारा साईकिल पर घूमते थे, आज बड े-बड े बंगला में रहते है।
प्रश्नःसरकार और मीडिया के बीच आपसी संबंधों आपके क्या विचार है?
दत्तः-मीडिया और सरकार के बीच की लड़ाई में मीडिया की जीत हुई। सरकार की ओर से कई जानकारियों को छिपाने की कोशिश की जाती है,लेकिन आज की सशक्त मीडिया सरकार के इस प्रयास पर पानी फेरने में लगी रहती है। यही कारण है कि वाटरगेट स्कैंडल में मीडिया की भूमिका के कारण अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड ा। इसी तरह से वियातनाम युद्ध में अमेरिकी सैनिकों के अत्याचार की खबरों के कारण अमेरिकी की काफी किरकिरी हुई थी। भारत में भी आपातकाल के दौरान मीडिया पर कई तरह के प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई,लेकिन इसके विरोध में कई अखबारों ने अपनी कड ी आपत्ति जतायी और अंततः मीडिया की ही जीत हुई।
प्रश्नःसामाजिक दायित्वों के निर्वहन में मीडिया को कितनी सफलता मिली है?
दत्तः-आज के परिप्रेक्ष्य में मीडिया का सामाजिक दायित्व भी बढ़ा है। पूरी दुनिया में मीडिया की शक्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई है,जिसके कारण सामाजिक वातावरण और राजनीतिक बदलाव लाने में मीडिया का महत्वपूर्ण स्थान हो गया है। मीडिया का प्रभाव ही है कि कभी साम्यवादी देश कहलाने वाले चीन में भी आज पूंजी का प्रवाह हो रहा है। पाकिस्तान में कई बार सत्ता पर कब्जा करने की लड ाई के बावजूद आज भी वहां लोकतंत्र जिन्दा है। पूरी दुनिया में लोकतंत्र जितना मजबूत होगा, मीडिया की शक्ति उतनी बढ ेगी और इसके साथ ही मीडिया का सामाजिक दायित्व भी बढ ेगा, इसलिए मीडियाकर्मियों को बड ी सावधानी से काम करने की आवश्यकता है।
प्रश्नःमीडिया में आयी गिरावट के कारण क्या है?
दत्तः- वैश्र्िवक परिवर्त्तन से देश भी अछूता नहीं रहा है, आज देश भी हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार की समस्या से जूझ रहा है। पहले न्यायपालिका भ्रष्टाचार से पूरी तरह से अछूती थी,लेकिन आज न्यायपालिका की ओर भी लोग अंगूली उठाने लगे है। स्कूलों में कितने शिक्षक पढ़ाते है, इसकी गिनती की जा सकती है,लेकिन कितने शिक्षक राजनीति कर रहे है,इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहले लोग डॉक्टर को बड ी इज्जत की नजरों से देखते थे,लेकिन आज यह भी खबर आती है कि कुछ डॉक्टर दवा बनाने वाली कंपनियों के इशारे पर दवाईयां लिखते है और कई तरह के चेकअप कराते है। इस तरह के समाज में पत्रकारिता भी एक टापू के सामान नहीं हो सकता है। समाज में आए बदलाव का असर पत्रकारिता पर भी पड ेगा ही।
प्रश्नःपत्रकारिता में महिलाओं को किस स्थान पर देखते है?
दत्तः-पत्रकारिता के लिए जितनी संजिदगी होनी चाहिए, वह लड़कियों व महिलाओं में ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाती है। बड ी संखया में विभिन्न पत्रिकारिता और जनसंचार संस्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त कर युवतियां बाहर निकलती है,लेकिन धीरे-धीरे वह इस क्षेत्र से विभिन्न कारणों से कट जाती है। हालांकि आज के ग्लैमर और महिला सशक्तिकरण के युग में छोटे-बड े अखबारों के लिए महिला पत्रकारों का रहना काफी आवश्यक है।
प्रश्नः लोकतंत्र के चार स्तंभों में पत्रकारिता किस पायदान पर है?
दत्तः- भारतीय संविधान में लोकतंत्र के सिर्फ तीन स्तंभों विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका का उल्लेख है। संविधान में प्रेस शब्द का कहीं जिक्र तक नहीं है, जबकि अमेरिकी संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लेख है,लेकिन भारतीय संविधान में सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जिक्र है।इसके बावजूद आज पत्रकारिता देश में लोकतंत्र का पहला स्तंभ बन गया है।
प्रश्नः मीडिया के मौजूदा स्वरुप में संवाद समितियों की भूमिका किस तरह की हो गई?
दत्तः- आजादी के बाद प्रारंभिक काल में जब देश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और संचार माध्यम उतना सशक्त नहीं था, तब समाचार पत्रों के लिए संवाद समितियों की भूमिका काफी अहम थी। देश-दुनिया के विभिन्न हिस्सों में घटने वाली घटनाओं के लिए समाचार पत्र पूरी तरह से संवाद समितियों पर ही निर्भर थे, लेकिन आज परिस्थितियां बदली है। बड़ी संखया में इलेक्ट्रॉनिक चैनल आ गए, इंटरनेट के कारण सभी खबरें तुरंत पूरी दुनिया में फैल जाते है, फोटो भी अब आसानी से उपलब्ध हो जाते है,ऐसी स्थिति में संवाद समितियों का महत्व थोड ा कम हुआ है,लेकिन अब भी समाचार पत्र देश भर के विभिन्न हिस्सों और दुनिया भर की खबरों को हासिल करने के लिए अधिकांशतः संवाद समितियों पर ही निर्भर करते है।

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