गुरुवार, 18 अगस्त 2011

खुशवंत सिंह के पिता ने दिलवाई थी भगत सिंह को फांसी:


ठंड़े बस्ते में गई मनमोहन की सिफारिश"

दिल्ली सरकार देगी सम्मान ?





शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की एक दुर्लभ तस्वीर
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बलिदान को शायद ही कोई भुला सकता है। आज भी देश का बच्चा-बच्चा उनका नाम इज्जत और फख्र के साथ लेता हैलेकिन दिल्ली सरकार उन के खिलाफ गवाही देने वाले एक भारतीय को मरणोपरांत ऐसा सम्मान देने की तैयारी में है जिससे उसे सदियों नहीं भुलाया जा सकेगा। यह शख्स कोई और नहीं, बल्कि औरतों के विषय में भौंडा लेखन कर शोहरत हासिल करने वाले लेखक खुशवंत सिंह का पिता सरशोभा सिंह है और दिल्ली सरकार विंडसर प्लेस का नाम उसके नाम पर करने का प्रस्ताव ला रही है।

 भगत सिंह का घर
भारत की आजादी के इतिहास को जिन अमर शहीदों के रक्त से लिखा गया है, जिन शूरवीरों के बलिदान ने भारतीय जन-मानस को सर्वाधिक उद्वेलित किया है, जिन्होंने अपनी रणनीति से साम्राज्यवादियों को लोहे के चने चबवाए हैं, जिन्होंने परतन्त्रता की बेड़ियों को छिन्न-भिन्न कर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया है तथा जिन पर जन्मभूमि को गर्व है, उनमें से एक थे भगत सिंह।
यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में यह वर्णन किया है– भगत सिंह एक प्रतीक बन गया। सैण्डर्स के कत्ल का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गांव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूंज उठा। उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियता प्राप्त हुई वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।
जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में मुकद्दमा चला तो भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने को कोई तैयार नहीं हो रहा था। बड़ी मुश्किल से अंग्रेजों ने दो लोगों को गवाह बनने पर राजी कर लिया। इनमें से एक था शादी लाल और दूसरा था शोभा सिंह। मुकद्दमे में भगत सिंह को उनके दो साथियों समेत फांसी की सजा मिली।
 'सर' शादी लाल
इधर  दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले। शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है। यह अलग बात है कि शादी लाल  को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा भी नहीं दिया। शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
शोभा सिंह अपने साथी के मुकाबले खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली में हजारों एकड़ जमीन मिली  और खूब पैसा भी। उसके बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया। सर सोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है। आज  दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।  खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देश भक्त और दूरद्रष्टा निर्माता साबित करने का भरसक कोशिश की।
 खुशवंत सिंह की हवेली

 मॉडर्न स्कूल खुशवंत सिंह

 'सर' सोभा सिंह
खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की। खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेका था। बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही तो दी, लेकिन इसके कारण भगत सिंह को फांसी नहीं हुई। शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था। हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की। खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं, बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं।

 मेल टुडे में छपा कार्टून
अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और खुशवंत सिंह की नज़दीकियों का ही असर कहा जाए कि दोनों एक दूसरे की तारीफ में जुटे हैं। प्रधानमंत्री ने बाकायदा पत्र लिख कर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से अनुरोध किया है कि कनॉट प्लेस के पास जनपथ पर बने विंडसर प्लेस का नाम सर शोभा सिंह के नाम पर कर दिया जाए।
4.

चाह कर भी इतिहास को नहीं झुठला सकते खुशवंत सिंह

।। - धीरज भारद्वाज ।।
हिंदी के एक कथाकार हैं- प्रेमचंद सहजवाला। जब हमने इस सीरीज़ की पहली कहानी प्रकाशित की तो उनका कमेंट आया जिसमें एक किताब का जिक्र था। हमने उनसे संपर्क साधा तो पता चला कि उन्होंने भगत सिंह के कई अनछुए पहलुओं पर एक अनोखी किताब लिख रखी है। किताब का नाम है, ‘ भगत सिंह, इतिहास के कुछ और पन्ने ‘  हमने अनुरोध किया तो उन्होंनें हमें वह किताब भिजवा दी।
करीब सवा सौ पन्नों की इस किताब में 20 से भी अधिक इतिहास की पुस्तकों और अभिलेखों के संदर्भ लिए गए हैं। जहां तक मैंने इस किताब को समझा है, इसमें कांग्रेस के भीतर नरमदल और गरम दल के भीतर चले टकराव की ओर इशारा किया गया है, लेकिन भगत सिंह के जीवन और उनके विचारों का काफी तथ्यपूर्ण चित्रण है। जिस दिन भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंका था उस दिन के बारे में विस्तार से बताया गया है। किताब के मुताबिक शोभा सिंह ने न सिर्फ गवाही दी थी, बल्कि भगत सिंह कोपकड़वायाभी था।
किताब मे प्रमुख इतिहासकार ए जी नूरानी के हवाले से लिखा गया है, शोभा सिंह, जो कि नई दिल्ली के निर्माण में प्रमुख ठेकेदार थे, अभी-अभी गैलरी में प्रविष्ट हुए थे। वे अपने चंद मित्रों के चेहरे खोज रहे थे जिनके साथ उन्हें बाद में भोजन करना था….. ठीक इसी क्षण धमाक-धमाक की आवाज से दोनों बम गिरे थे। सभी भागने लगे, लेकिन शोभा सिंह दोनों पर नजर रखने के लिए डटे रहे…. जैसे ही पुलिस वाले आए शोभा सिंह ने दो पुलिसकर्मियों को उनकी ओर भेजा और स्वयं भी उनके पीछे लपकेपुलिस जब नौजवानों के निकट पहुंची तब किसी भी अपराध बोध से मुक्त अपने किए पर गर्वान्वित दोनों वीरों ने खुद ही अपनी गिरफ़्तारी दी…“
हालांकि खुशवंत सिंह ने यह तो कुबूल किया था कि उनके मरहूम पिता ने भगत सिंह की शिनाख्त की थी, लेकिन शायद यह छिपा गए थे कि उनके पिता इस हद तक अंग्रेजी सरकार के पिट्ठू बन गए थे कि सिपाहियों के मददगार बन कर क्रांतिवीरों की गिरफ्तारी का इनाम लेने में जुट गए थे। खुशवंत सिंह ये बता पाएंगे कि इतिहास उनके परिवार पर लगा दाग कभी धो पाएगा?
प्रेमचंद सहजवाला
सहजवाला का भी कहना हैं, ” जब खुद खुशवंत सिंह भी भली भाति जानते हैं कि सर शोभा सिंह का नाम आते ही इतिहास का एक अप्रिय पन्ना खुल जाएगा और किसी को भी उस सड़क पर पहुंचते ही भगत सिंह की याद आने लगेगी तो उन्हें खुद ही ऐसा करने से बचना चाहिए जिससे उनके पिता को और कोसा जाए।” यही उनकी देशभक्ति का परिचायक होगा और प्रायश्चित भी।



जग गई अलख सरफरोश दीवानों की: कहा, “दाग न लगने देंगे भगत सिंह की शहादत पर…”


।। धीरज भारद्वाज ।।

भगत सिंह की शहादत का मजाक बनाना शायद सरकार के लिए आसान नहीं रह गया। दिल्ली ही नहीं, देश भर में शहीद-ए-आज़म के खिलाफ अदालत में गवाही देने वाले गद्दार शोभा सिंह के खिलाफ लोग एकजुट होने लगे हैं। पंजाब के कई नेताओं ने धमकी दी है कि अगर जल्दी ही सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया तो वे सड़क पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
तीक्ष्ण सूद
पंजाब के वरिष्ठ भाजपा नेता तीक्ष्ण सूद ने कहा है कि विंडसर प्लेस का नाम शोभा सिंह के नाम पर करने का दिल्ली सरकार का यह फैसला करोड़ों देशभक्तों का अपमान है। सूद के मुताबिक पंजाब की जनता दिल्ली सरकार के इस फैसले को किसी हाल में लागू नहीं होने देगी। उन्होंने मीडिया दरबार को बताया कि अगर जरूरत पड़ी तो भगत सिंह के समर्थक ट्रकों में भर कर दिल्ली आ जाएंगे और संसद का घेराव करेंगे।

जग गई अलख सरफरोश दीवानों की: कहा, “दाग न लगने देंगे भगत सिंह की शहादत पर


भगत सिंह क्रांति सेना के सदस्य
इधर दिल्ली में भगत सिंह क्रांति सेना ने सभी कॉलेजों में जागरुकता अभियान चलाने का फैसला किया है। सेना के अध्यक्ष ताजिंदर पाल सिंह बग्गा के मुताबिक इस अभियान के तहत दिल्ली भर के कॉलेजों में पोस्टर बांटे जाएंगे और छात्रों से हस्ताक्षर लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ज्ञापन भी सौंपे जाएंगे। बग्गा ने मीडिया दरबार को बताया कि अगर जरूरत पड़ी तो अभियान को देश भर में फैलाया जाएगा।
बहरहाल मीडिया दरबार की यह मुहिम रंग ला रही है और ट्विटर, फेसबुक तथा ऑरकुट के अलावा दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइटों पर भी इसके बारे में चर्चा होने लगी। देश के कई अखबारों और टीवी चैनलों ने भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। दिल्ली आजतक और न्यूज 24 ने इस मामले पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का पता नहीं था कि शोभा सिंह पर क्या आरोप हैं। हालांकि यह बात गले से नीचे उतरने वाली नहीं थी, लेकिन चैनलों ने उनका यह बयान भी प्रसारित किया जिसमें उनहोंने आशवासन दिया कि अब दिल्ली सरकार इस तथ्य की जानकारी को भी गृह मंत्रालय भेजेगी।
हालांकि इतना कुछ हो रहा हैलेकिन चिंता की बात यह है कि अब तक सरकार या केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कोई ऐसा संकेत तक नहीं दिया है जिससे कोई दिलासा भी मिल पाए। यहां दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां लिखना आवश्यक प्रतीत हो रहा है -
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में न सही तेरे सीने में सही
हो कहीं भी मगर आग जलनी चाहिए ।।
पोज2
 बाक्स

मेरे पिता ने तो सिर्फ भगत सिंह की शिनाख्त की थी। उसे फांसी हो गई तो इसमें उनका क्या कसूर…? : खुशवंत सिंह


।।-धीरज भारद्वाज।।
भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले सर शोभा सिंह के नाम पर नई दिल्ली के विंडसर प्लेस का नामकरण करने की दिल्ली और केंद्र सरकार की कोशिशों के विरुद्ध मीडिया दरबार की मुहिम पर अभूतपूर्व रिस्पॉन्स मिल रहा है। देश भर से लोगों की प्रतिक्रियाएं न सिर्फ इस वेबसाइट पर बल्कि फेसबुक, ऑरकुट व गूगल प्लस पर भी बड़ी तादाद में आ रही हैं। हजारों लोग हर दिन इन लेखों के तथा उनपर हुई टिप्पणियों को पसंद कर रहे हैं और खुद ही इसे विभिन्न संचार माध्यमों पर प्रचारित कर रहे हैं।
खुशवंत सिंह और उनके पिता ' सर ' शोभा सिंह
जहां इस सीरीज़ के प्रकाशित होने से आम पाठक सर शोभा सिंह के लिए अपमानजनक टिप्पणियां कर रहा है, वहीं कई ऐसे भी हैं जो खुशवंत सिंह तथा उनके पिता को पाक-साफ ठहरा रहे हैं।
क्योंकि खुशवंत सिंह ने अपने कॉलम में यह दावा किया है कि नई दिल्ली सिख बिल्डरों को उनका कर्ज़ नहीं चुका रही है, इसलिए हमने कुछ नामचीन सिख हस्तियों से इस मसले पर बात की।
एमएस बिट्टा
कांग्रेस नेता मनिंदर जीत सिंह बिट्टा ने दिल्ली सरकार के इस कदम को बेहद अफसोस-जनक और गैर जरूरी करार दिया। उन्होंने मीडिया दरबार से बातचीत करते हुए कहा कि वे ऐसा हरगिज़ होने नहीं देंगे और सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करेंगे। बिट्टा ने कहा कि विंडसर प्लेस से उन्हें खास लगाव है क्योंकि उसी चौराहे पर उनपर हमला हुआ था।
शहीद भगत सिंह सेवा दल के अध्यक्ष व दिल्ली के निगम पार्षद जीतेंद्र सिंह शंटी ने भी सरकार के इस कदम का विरोध किया है। उन्होंने बताया कि
जितेन्द्र सिंह शंटी
जल्दी ही उनका सेवा दल विंडसर प्लेस और संसद पर धरना देने की तैयारी कर रहा है।
उधर कुछ हस्तियां ऐसी भी हैं जो इतिहास को सिरे से नकारने मं लगी हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटि के अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना  ने
परमजीत सरना
कहा कि उन्होंने पूरा इतिहास खंगाल लिया है, लेकिन इस तथ्य में कोई दम नही मिला कि शोभा सिह ने भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी थी। हालांकि उन्होंने मीडिया दरबार को यह भरोसा दिलाया कि जैसे ही उन्हें ठोस सुबूत मिल जाएंगे, वह भी इस मुहिम में खुल कर साथ देंगे। यह अलग बात है कि बार-बार संपर्क करने और इतिहास की किताबों के सदर्भ देने के बावजूद सरना ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया।
बोल्ड मैटर एक बाक्स में
दिलचस्प बात यह है कि खुद खुशवंत सिंह ने  कुबूल किया है कि उनके पिता ने भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी थी। उन्होंने यह स्वीकारोक्ति 1997  में मचे ऐसे ही हंगामे के बाद अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की एक प्रशनोत्तरी में की थी। खुशवंत द्वारा यह स्वीकारोक्ति 13 अक्तूबर सन् 1997 के  अंक में छपी थी। हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए सवाल-जवाब का हिंदी अनुवाद भी साथ ही प्रकाशित किया जा रहा है:-
(खुशवंत सिंह द्वारा उस गवाही का चश्मदीदी होने का सबूत है यह स्वीकारना)
Did you know about the existence of records where your father deposed against Bhagat Singh?
(क्या आपको उन दस्तावेज़ों का पता था जिनके मुताबिक आपके पिता ने भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही दी थी?)
Of course, I knew.It was an open trial.
(निस्संदेह, मुझे पता था। यह एक खुला मुकद्दमा था।)
 Were you aware of these events as they unfolded?
(क्या जो बातें सामने आईं उनका आपको पता था ?)
All this was published openly in the papers.
(यह सबकुछ खुलेआम अखबारों में छप चुका था।)
 Did you ever ask your father about it?
(कभी आपने अपने पिता से इस बारे में पूछा था?)
After he came back from the assembly, all that was discussed was the bomb-throwing incident. Of course, at that point he did not know who the two boys were.
(जब वो असेंबली से वापस आए थे तो बम फेंके जाने की खूब चर्चा हुई थी। यकीनन, वे उस वक्त उन लड़कों को नहीं पहचानते थे।)

What was the exact sequence of events?
(उस वक्त क्या घटनाक्रम हुए थे?)
My father, Sir Shobha Singh, was in the visitor’s gallery when the bombs were thrown. He was asked to identify the two men, which is what he did. BhagatSingh pleaded guilty so what could my father do? Anyway they were sentenced for killing Saunders, not for this incident.
(जब बम फेंका गया था उस वक्त मेरे पिता सर शोभा सिंह दर्शक दीर्घा में थे। उन्हें दो लोगों की शिनाख्तकरने को कहा गया था, जो उन्होंने कर दिया। भगत सिंह को दोषी ठहराया गया तो इसमें मेरे पिता क्या कर सकते थे? बहरहाल, उन्हें सॉन्डर्स को गोली मारने के लिए फांसी हुई थी, इस घटना के लिए नहीं।)
 Did your father in his later years feel any regret about his testimony?
(क्या आपके पिता ने बाद में कभी अपनी गवाही पर अफसोस जताया था?)
There was national regret when Bhagat Singh was hanged. He’d become a hero by then.
(जब भगत सिंह को फांसी लगी थी तो यह राष्ट्रीय शोक था। वह उस समय तक एक नायक बन चुका था।)
 Being a British contractor, do you think your father was anti-nationalist?
(एक ब्रितानी ठेकेदार होने के कारण क्या आपको अपने पिता कभी राष्ट्रीयता के विरोधी लगे?)
He was not only a British contractor, he was also the biggest contractor in Delhi.
(वे न सिर्फ एक ब्रितानी ठेकेदार थे, बल्कि वे सबसे बड़े ठेकेदार भी थे।)

Are you angry/embarrassed by what your father did?
(क्या आप अपने पिता के कृत्यों से नाराज़/ शर्मिंदा हैं?)
At that time, we did not feel anything about it. He had only identified them. To insinuate that he got his knighthood for this is rubbish. He was knighted 15 years later.
(उस वक्त हमने इस बारे में कुछ नहीं सोचा था। उन्होंने सिर्फ उनकी (भगत सिंह और राजगुरु) शिनाख्त की थी। कोई अगर ये माने कि उन्हें इसीलिए उपाधि मिली थी, तो यह बकवास है। उन्हें उपाधि (मुकद्दमें के) पंद्रह सालों बाद मिली थी।)

Why do you feel the controversy has been dug up now?
 (आपको ऐसा क्यों लगता है कि विवाद को अभी उभारा जा रहा है?)

This entire thing is aimed at me. My father died a long time ago, so it doesn’t affect him. This is at the instigation of the saffron brigade.
(यह सभी कुछ मुझपर निशाना साध कर किया जा रहा है। मेरे पिता की मौत बरसों पहले हो चुकी है, इसलिए उनपर तो कोई फर्क पड़ता नहीं है। यह भगवा ब्रिगेड के बढ़ावे पर हुआ है।)
 And your reaction to the timing?
(और इस टाइमिंग पर आपकी प्रतिक्रिया?)
My writing’s become more and more anti-saffron brigade. I’d written a strong piece when the chargesheet was filed in the Babri Masjid case and this story appeared four days later.
(मेरा लेखन भगवा ब्रिगेड के खिलाफ अधिक से अधिक मुखर हुआ है। जिस दिन बाबरी मस्ज़िद मामले में आरोप पत्र दाखिल हुआ था उस दिन मैंने एक कड़ा लेख लिखा था। यह कहानी उसके चार दिनों बाद सामने आई।)
 What do you think of Bhagat Singh?
(भगत सिंह के बारे में आप क्या सोचते हैं?)
I thought very highly of Bhagat Singh. I even managed to get his autograph when he was in jail.
(मेरे मन में भगत सिंह के लिए बहुत सम्मान है। मैं तो उनके जेल में रहने के दैरान उनका ऑटोग्राफ भी लेने में कामयाब हो गया था।)
केपीएस गिल
हालांकि खुशवंत सिंह और उनके परिवार के शुभचिंतक इसके बावजूद सर शोभा सिंह का नाम अमर कर देने की सरकारी कवायद का समर्थन करने से नहीं चूक रहे। पंजाब के पूर्व डीजीपी केपीएस गिल यह तो मानते हैं कि शोभा सिंह ने भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही दी थी जो राष्ट्रीयता के विरुद्ध था, लेकिन उन्हें विंडसर प्लेस का नाम उसके नाम पर करने में कोई बुराई नहीं दिखती। मीडिया दरबार ने जब गिल से पूछा कि क्या वो इस नामकरण के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम को अपना समर्थन देंगे..? तो उनका जवाब खासा चौंकाने वाला था। केपीएस गिल ने अपनी बुलंद आवाज में कहा, “जब दिल्ली में गुलामी का प्रतीक औरंगजेब रोड मौजूद है, तो फिर शोभा सिंह के नाम में क्या बुराई हैआप औरंगजेब रोड का नाम बदलवा कर आइए, फिर मैं आपके साथ खड़ा मिलूंगा।

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शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की एक दुर्लभ तस्वीर
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बलिदान को शायद ही कोई भुला सकता है। आज भी देश का बच्चा-बच्चा उनका नाम इज्जत और फख्र के साथ लेता हैलेकिन दिल्ली सरकार उन के खिलाफ गवाही देने वाले एक भारतीय को मरणोपरांत ऐसा सम्मान देने की तैयारी में है जिससे उसे सदियों नहीं भुलाया जा सकेगा। यह शख्स कोई और नहीं, बल्कि औरतों के विषय में भौंडा लेखन कर शोहरत हासिल करने वाले लेखक खुशवंत सिंह का पिता सरशोभा सिंह है और दिल्ली सरकार विंडसर प्लेस का नाम उसके नाम पर करने का प्रस्ताव ला रही है।

 भगत सिंह का घर
भारत की आजादी के इतिहास को जिन अमर शहीदों के रक्त से लिखा गया है, जिन शूरवीरों के बलिदान ने भारतीय जन-मानस को सर्वाधिक उद्वेलित किया है, जिन्होंने अपनी रणनीति से साम्राज्यवादियों को लोहे के चने चबवाए हैं, जिन्होंने परतन्त्रता की बेड़ियों को छिन्न-भिन्न कर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया है तथा जिन पर जन्मभूमि को गर्व है, उनमें से एक थे भगत सिंह।
यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में यह वर्णन किया है– भगत सिंह एक प्रतीक बन गया। सैण्डर्स के कत्ल का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गांव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूंज उठा। उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियता प्राप्त हुई वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।
जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में मुकद्दमा चला तो भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने को कोई तैयार नहीं हो रहा था। बड़ी मुश्किल से अंग्रेजों ने दो लोगों को गवाह बनने पर राजी कर लिया। इनमें से एक था शादी लाल और दूसरा था शोभा सिंह। मुकद्दमे में भगत सिंह को उनके दो साथियों समेत फांसी की सजा मिली।
 'सर' शादी लाल
इधर  दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले। शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है। यह अलग बात है कि शादी लाल  को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा भी नहीं दिया। शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
शोभा सिंह अपने साथी के मुकाबले खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली में हजारों एकड़ जमीन मिली  और खूब पैसा भी। उसके बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया। सर सोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है। आज  दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।  खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देश भक्त और दूरद्रष्टा निर्माता साबित करने का भरसक कोशिश की।
 खुशवंत सिंह की हवेली

 मॉडर्न स्कूल खुशवंत सिंह

 'सर' सोभा सिंह
खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की। खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेका था। बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही तो दी, लेकिन इसके कारण भगत सिंह को फांसी नहीं हुई। शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था। हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की। खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं, बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं।

 मेल टुडे में छपा कार्टून
अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और खुशवंत सिंह की नज़दीकियों का ही असर कहा जाए कि दोनों एक दूसरे की तारीफ में जुटे हैं। प्रधानमंत्री ने बाकायदा पत्र लिख कर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से अनुरोध किया है कि कनॉट प्लेस के पास जनपथ पर बने विंडसर प्लेस का नाम सर शोभा सिंह के नाम पर कर दिया जाए।
4.

चाह कर भी इतिहास को नहीं झुठला सकते खुशवंत सिंह

।। - धीरज भारद्वाज ।।
हिंदी के एक कथाकार हैं- प्रेमचंद सहजवाला। जब हमने इस सीरीज़ की पहली कहानी प्रकाशित की तो उनका कमेंट आया जिसमें एक किताब का जिक्र था। हमने उनसे संपर्क साधा तो पता चला कि उन्होंने भगत सिंह के कई अनछुए पहलुओं पर एक अनोखी किताब लिख रखी है। किताब का नाम है, ‘ भगत सिंह, इतिहास के कुछ और पन्ने ‘  हमने अनुरोध किया तो उन्होंनें हमें वह किताब भिजवा दी।
करीब सवा सौ पन्नों की इस किताब में 20 से भी अधिक इतिहास की पुस्तकों और अभिलेखों के संदर्भ लिए गए हैं। जहां तक मैंने इस किताब को समझा है, इसमें कांग्रेस के भीतर नरमदल और गरम दल के भीतर चले टकराव की ओर इशारा किया गया है, लेकिन भगत सिंह के जीवन और उनके विचारों का काफी तथ्यपूर्ण चित्रण है। जिस दिन भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंका था उस दिन के बारे में विस्तार से बताया गया है। किताब के मुताबिक शोभा सिंह ने न सिर्फ गवाही दी थी, बल्कि भगत सिंह कोपकड़वायाभी था।
किताब मे प्रमुख इतिहासकार ए जी नूरानी के हवाले से लिखा गया है, शोभा सिंह, जो कि नई दिल्ली के निर्माण में प्रमुख ठेकेदार थे, अभी-अभी गैलरी में प्रविष्ट हुए थे। वे अपने चंद मित्रों के चेहरे खोज रहे थे जिनके साथ उन्हें बाद में भोजन करना था….. ठीक इसी क्षण धमाक-धमाक की आवाज से दोनों बम गिरे थे। सभी भागने लगे, लेकिन शोभा सिंह दोनों पर नजर रखने के लिए डटे रहे…. जैसे ही पुलिस वाले आए शोभा सिंह ने दो पुलिसकर्मियों को उनकी ओर भेजा और स्वयं भी उनके पीछे लपकेपुलिस जब नौजवानों के निकट पहुंची तब किसी भी अपराध बोध से मुक्त अपने किए पर गर्वान्वित दोनों वीरों ने खुद ही अपनी गिरफ़्तारी दी…“
हालांकि खुशवंत सिंह ने यह तो कुबूल किया था कि उनके मरहूम पिता ने भगत सिंह की शिनाख्त की थी, लेकिन शायद यह छिपा गए थे कि उनके पिता इस हद तक अंग्रेजी सरकार के पिट्ठू बन गए थे कि सिपाहियों के मददगार बन कर क्रांतिवीरों की गिरफ्तारी का इनाम लेने में जुट गए थे। खुशवंत सिंह ये बता पाएंगे कि इतिहास उनके परिवार पर लगा दाग कभी धो पाएगा?
प्रेमचंद सहजवाला
सहजवाला का भी कहना हैं, ” जब खुद खुशवंत सिंह भी भली भाति जानते हैं कि सर शोभा सिंह का नाम आते ही इतिहास का एक अप्रिय पन्ना खुल जाएगा और किसी को भी उस सड़क पर पहुंचते ही भगत सिंह की याद आने लगेगी तो उन्हें खुद ही ऐसा करने से बचना चाहिए जिससे उनके पिता को और कोसा जाए।” यही उनकी देशभक्ति का परिचायक होगा और प्रायश्चित भी।



जग गई अलख सरफरोश दीवानों की: कहा, “दाग न लगने देंगे भगत सिंह की शहादत पर…”


।। धीरज भारद्वाज ।।

भगत सिंह की शहादत का मजाक बनाना शायद सरकार के लिए आसान नहीं रह गया। दिल्ली ही नहीं, देश भर में शहीद-ए-आज़म के खिलाफ अदालत में गवाही देने वाले गद्दार शोभा सिंह के खिलाफ लोग एकजुट होने लगे हैं। पंजाब के कई नेताओं ने धमकी दी है कि अगर जल्दी ही सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया तो वे सड़क पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
तीक्ष्ण सूद
पंजाब के वरिष्ठ भाजपा नेता तीक्ष्ण सूद ने कहा है कि विंडसर प्लेस का नाम शोभा सिंह के नाम पर करने का दिल्ली सरकार का यह फैसला करोड़ों देशभक्तों का अपमान है। सूद के मुताबिक पंजाब की जनता दिल्ली सरकार के इस फैसले को किसी हाल में लागू नहीं होने देगी। उन्होंने मीडिया दरबार को बताया कि अगर जरूरत पड़ी तो भगत सिंह के समर्थक ट्रकों में भर कर दिल्ली आ जाएंगे और संसद का घेराव करेंगे।

जग गई अलख सरफरोश दीवानों की: कहा, “दाग न लगने देंगे भगत सिंह की शहादत पर


भगत सिंह क्रांति सेना के सदस्य
इधर दिल्ली में भगत सिंह क्रांति सेना ने सभी कॉलेजों में जागरुकता अभियान चलाने का फैसला किया है। सेना के अध्यक्ष ताजिंदर पाल सिंह बग्गा के मुताबिक इस अभियान के तहत दिल्ली भर के कॉलेजों में पोस्टर बांटे जाएंगे और छात्रों से हस्ताक्षर लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ज्ञापन भी सौंपे जाएंगे। बग्गा ने मीडिया दरबार को बताया कि अगर जरूरत पड़ी तो अभियान को देश भर में फैलाया जाएगा।
बहरहाल मीडिया दरबार की यह मुहिम रंग ला रही है और ट्विटर, फेसबुक तथा ऑरकुट के अलावा दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइटों पर भी इसके बारे में चर्चा होने लगी। देश के कई अखबारों और टीवी चैनलों ने भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। दिल्ली आजतक और न्यूज 24 ने इस मामले पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का पता नहीं था कि शोभा सिंह पर क्या आरोप हैं। हालांकि यह बात गले से नीचे उतरने वाली नहीं थी, लेकिन चैनलों ने उनका यह बयान भी प्रसारित किया जिसमें उनहोंने आशवासन दिया कि अब दिल्ली सरकार इस तथ्य की जानकारी को भी गृह मंत्रालय भेजेगी।
हालांकि इतना कुछ हो रहा हैलेकिन चिंता की बात यह है कि अब तक सरकार या केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कोई ऐसा संकेत तक नहीं दिया है जिससे कोई दिलासा भी मिल पाए। यहां दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां लिखना आवश्यक प्रतीत हो रहा है -
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में न सही तेरे सीने में सही
हो कहीं भी मगर आग जलनी चाहिए ।।
पोज2
 बाक्स

मेरे पिता ने तो सिर्फ भगत सिंह की शिनाख्त की थी। उसे फांसी हो गई तो इसमें उनका क्या कसूर…? : खुशवंत सिंह


।।-धीरज भारद्वाज।।
भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने वाले सर शोभा सिंह के नाम पर नई दिल्ली के विंडसर प्लेस का नामकरण करने की दिल्ली और केंद्र सरकार की कोशिशों के विरुद्ध मीडिया दरबार की मुहिम पर अभूतपूर्व रिस्पॉन्स मिल रहा है। देश भर से लोगों की प्रतिक्रियाएं न सिर्फ इस वेबसाइट पर बल्कि फेसबुक, ऑरकुट व गूगल प्लस पर भी बड़ी तादाद में आ रही हैं। हजारों लोग हर दिन इन लेखों के तथा उनपर हुई टिप्पणियों को पसंद कर रहे हैं और खुद ही इसे विभिन्न संचार माध्यमों पर प्रचारित कर रहे हैं।
खुशवंत सिंह और उनके पिता ' सर ' शोभा सिंह
जहां इस सीरीज़ के प्रकाशित होने से आम पाठक सर शोभा सिंह के लिए अपमानजनक टिप्पणियां कर रहा है, वहीं कई ऐसे भी हैं जो खुशवंत सिंह तथा उनके पिता को पाक-साफ ठहरा रहे हैं।
क्योंकि खुशवंत सिंह ने अपने कॉलम में यह दावा किया है कि नई दिल्ली सिख बिल्डरों को उनका कर्ज़ नहीं चुका रही है, इसलिए हमने कुछ नामचीन सिख हस्तियों से इस मसले पर बात की।
एमएस बिट्टा
कांग्रेस नेता मनिंदर जीत सिंह बिट्टा ने दिल्ली सरकार के इस कदम को बेहद अफसोस-जनक और गैर जरूरी करार दिया। उन्होंने मीडिया दरबार से बातचीत करते हुए कहा कि वे ऐसा हरगिज़ होने नहीं देंगे और सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करेंगे। बिट्टा ने कहा कि विंडसर प्लेस से उन्हें खास लगाव है क्योंकि उसी चौराहे पर उनपर हमला हुआ था।
शहीद भगत सिंह सेवा दल के अध्यक्ष व दिल्ली के निगम पार्षद जीतेंद्र सिंह शंटी ने भी सरकार के इस कदम का विरोध किया है। उन्होंने बताया कि
जितेन्द्र सिंह शंटी
जल्दी ही उनका सेवा दल विंडसर प्लेस और संसद पर धरना देने की तैयारी कर रहा है।
उधर कुछ हस्तियां ऐसी भी हैं जो इतिहास को सिरे से नकारने मं लगी हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटि के अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना  ने
परमजीत सरना
कहा कि उन्होंने पूरा इतिहास खंगाल लिया है, लेकिन इस तथ्य में कोई दम नही मिला कि शोभा सिह ने भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी थी। हालांकि उन्होंने मीडिया दरबार को यह भरोसा दिलाया कि जैसे ही उन्हें ठोस सुबूत मिल जाएंगे, वह भी इस मुहिम में खुल कर साथ देंगे। यह अलग बात है कि बार-बार संपर्क करने और इतिहास की किताबों के सदर्भ देने के बावजूद सरना ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया।
बोल्ड मैटर एक बाक्स में
दिलचस्प बात यह है कि खुद खुशवंत सिंह ने  कुबूल किया है कि उनके पिता ने भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी थी। उन्होंने यह स्वीकारोक्ति 1997  में मचे ऐसे ही हंगामे के बाद अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की एक प्रशनोत्तरी में की थी। खुशवंत द्वारा यह स्वीकारोक्ति 13 अक्तूबर सन् 1997 के  अंक में छपी थी। हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए सवाल-जवाब का हिंदी अनुवाद भी साथ ही प्रकाशित किया जा रहा है:-
(खुशवंत सिंह द्वारा उस गवाही का चश्मदीदी होने का सबूत है यह स्वीकारना)
Did you know about the existence of records where your father deposed against Bhagat Singh?
(क्या आपको उन दस्तावेज़ों का पता था जिनके मुताबिक आपके पिता ने भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही दी थी?)
Of course, I knew.It was an open trial.
(निस्संदेह, मुझे पता था। यह एक खुला मुकद्दमा था।)
 Were you aware of these events as they unfolded?
(क्या जो बातें सामने आईं उनका आपको पता था ?)
All this was published openly in the papers.
(यह सबकुछ खुलेआम अखबारों में छप चुका था।)
 Did you ever ask your father about it?
(कभी आपने अपने पिता से इस बारे में पूछा था?)
After he came back from the assembly, all that was discussed was the bomb-throwing incident. Of course, at that point he did not know who the two boys were.
(जब वो असेंबली से वापस आए थे तो बम फेंके जाने की खूब चर्चा हुई थी। यकीनन, वे उस वक्त उन लड़कों को नहीं पहचानते थे।)

What was the exact sequence of events?
(उस वक्त क्या घटनाक्रम हुए थे?)
My father, Sir Shobha Singh, was in the visitor’s gallery when the bombs were thrown. He was asked to identify the two men, which is what he did. BhagatSingh pleaded guilty so what could my father do? Anyway they were sentenced for killing Saunders, not for this incident.
(जब बम फेंका गया था उस वक्त मेरे पिता सर शोभा सिंह दर्शक दीर्घा में थे। उन्हें दो लोगों की शिनाख्तकरने को कहा गया था, जो उन्होंने कर दिया। भगत सिंह को दोषी ठहराया गया तो इसमें मेरे पिता क्या कर सकते थे? बहरहाल, उन्हें सॉन्डर्स को गोली मारने के लिए फांसी हुई थी, इस घटना के लिए नहीं।)
 Did your father in his later years feel any regret about his testimony?
(क्या आपके पिता ने बाद में कभी अपनी गवाही पर अफसोस जताया था?)
There was national regret when Bhagat Singh was hanged. He’d become a hero by then.
(जब भगत सिंह को फांसी लगी थी तो यह राष्ट्रीय शोक था। वह उस समय तक एक नायक बन चुका था।)
 Being a British contractor, do you think your father was anti-nationalist?
(एक ब्रितानी ठेकेदार होने के कारण क्या आपको अपने पिता कभी राष्ट्रीयता के विरोधी लगे?)
He was not only a British contractor, he was also the biggest contractor in Delhi.
(वे न सिर्फ एक ब्रितानी ठेकेदार थे, बल्कि वे सबसे बड़े ठेकेदार भी थे।)

Are you angry/embarrassed by what your father did?
(क्या आप अपने पिता के कृत्यों से नाराज़/ शर्मिंदा हैं?)
At that time, we did not feel anything about it. He had only identified them. To insinuate that he got his knighthood for this is rubbish. He was knighted 15 years later.
(उस वक्त हमने इस बारे में कुछ नहीं सोचा था। उन्होंने सिर्फ उनकी (भगत सिंह और राजगुरु) शिनाख्त की थी। कोई अगर ये माने कि उन्हें इसीलिए उपाधि मिली थी, तो यह बकवास है। उन्हें उपाधि (मुकद्दमें के) पंद्रह सालों बाद मिली थी।)

Why do you feel the controversy has been dug up now?
 (आपको ऐसा क्यों लगता है कि विवाद को अभी उभारा जा रहा है?)

This entire thing is aimed at me. My father died a long time ago, so it doesn’t affect him. This is at the instigation of the saffron brigade.
(यह सभी कुछ मुझपर निशाना साध कर किया जा रहा है। मेरे पिता की मौत बरसों पहले हो चुकी है, इसलिए उनपर तो कोई फर्क पड़ता नहीं है। यह भगवा ब्रिगेड के बढ़ावे पर हुआ है।)
 And your reaction to the timing?
(और इस टाइमिंग पर आपकी प्रतिक्रिया?)
My writing’s become more and more anti-saffron brigade. I’d written a strong piece when the chargesheet was filed in the Babri Masjid case and this story appeared four days later.
(मेरा लेखन भगवा ब्रिगेड के खिलाफ अधिक से अधिक मुखर हुआ है। जिस दिन बाबरी मस्ज़िद मामले में आरोप पत्र दाखिल हुआ था उस दिन मैंने एक कड़ा लेख लिखा था। यह कहानी उसके चार दिनों बाद सामने आई।)
 What do you think of Bhagat Singh?
(भगत सिंह के बारे में आप क्या सोचते हैं?)
I thought very highly of Bhagat Singh. I even managed to get his autograph when he was in jail.
(मेरे मन में भगत सिंह के लिए बहुत सम्मान है। मैं तो उनके जेल में रहने के दैरान उनका ऑटोग्राफ भी लेने में कामयाब हो गया था।)
केपीएस गिल
हालांकि खुशवंत सिंह और उनके परिवार के शुभचिंतक इसके बावजूद सर शोभा सिंह का नाम अमर कर देने की सरकारी कवायद का समर्थन करने से नहीं चूक रहे। पंजाब के पूर्व डीजीपी केपीएस गिल यह तो मानते हैं कि शोभा सिंह ने भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही दी थी जो राष्ट्रीयता के विरुद्ध था, लेकिन उन्हें विंडसर प्लेस का नाम उसके नाम पर करने में कोई बुराई नहीं दिखती। मीडिया दरबार ने जब गिल से पूछा कि क्या वो इस नामकरण के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम को अपना समर्थन देंगे..? तो उनका जवाब खासा चौंकाने वाला था। केपीएस गिल ने अपनी बुलंद आवाज में कहा, “जब दिल्ली में गुलामी का प्रतीक औरंगजेब रोड मौजूद है, तो फिर शोभा सिंह के नाम में क्या बुराई हैआप औरंगजेब रोड का नाम बदलवा कर आइए, फिर मैं आपके साथ खड़ा मिलूंगा।

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