रविवार, 7 अगस्त 2011

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल-3




आपरेशन, संसद सत्र और कैग रिपोर्ट
आमतौर पर कांग्रेस सुप्रीमो अपनी सेहत से ज्यादा देश की चिंता करती है, मगर इस बार बीमारी कुछ इतनी बढ़ गय़ी कि संसद और कैग रिपोर्ट की वजह से हंगामेदार संसद सत्र से ठीक पहले ही सुप्रीमों को मरता क्या नहीं करता की तर्ज पर अमरीका में जाकर कैंसर(?) का इलाज कराना जरूरी हो गया। एक तरफ मैडम आईसीयू में तो दूसरी तरफ कामनवेल्थ करप्शन की वजह से कांग्रेस शर्मसार है। खुद ईमानदार सदाचार और भी अनेकों मानवीय गुणों से संपन्न पीएम साहब पर भी आरोप लगने लगे। कांग्रेस के साथ साथ खुद अपने पीएम साहब भी सांसत में है, और पार्टी मुखिया देश से बाहर है। अब अपने आप तो कोई फैसला नहीं कर पाने वाले पीएम के सामने कितनी दुविधा की घड़ी हैं कि वे आखिरकार करें तो क्या करे ? एक तरफ बीजेपी वाले पानी पी पी कर पार्टी का बैंड( बाजा) बजा रहे है, फिर भी सारे लोग अमरीका से आदेश की बाट जोह रहे है।

ना कोई रहा है ना कोई रहेगा...

बुरा बृहो इस कामनवेल्थ गेम का कि आज इसकी सफलता का कोई नामलेवा तक नहीं है। और जिनके नाम इसके साथ उछल रहे है मानो सब पर गाज गिर रही है। आयोजन के शुरू से ही इनका नाम अनाप शनाप खर्चो को लेकर चर्चो में था, मगर सत्ता की तीसरी पारी खेल रही शीला को इससे साफ बच निकलने की उम्मीद थी। मगर तीन और तेरह दोनों की अशुभ अंक माने जाते रहे है, और दोनों ने शीला को दिखा दिया कि वाकई 13 का असर क्या होता है। हालांकि पार्टी शीला के पीछे खड़ी है, मगर कैग रिपोर्ट में प्रमाण इतने साफ और चौंकाने वाले है कि करप्शन और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं होने के बाद भी कांग्रेस को अपना फेस (बुक) को तो दिखने या दिखाने लायक तो बचा कर रखना ही होगा। यानी आपतकाल में एक गाना देश भर की गलियों में गूंजता था कि  ना कोई रहा है ना कोई रहेगा (शीला) इंदिरा तेरी है जाने की बारी...

लोकतंत्र है या आपातकाल

देश में लोकतंत्र है या आपातकाल ये कहना आसान नहीं है। कहने और दिखाने को तो प्रजातंत्र या लोकतंत्र ही है। जहां पर सबों को अपनी बात कहने और सरकार की नीतियों के खिलाफ धरना प्रदर्शन करने की भी छूट होती है। मगर रामदेव के साथ जो कुछ हुआ या अन्ना हजारे के साथ जो कुछ होने जैसा दिख रहा है। इसे कमसे कम लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है। काहे मनमोहन जी लोकपाल से इतना डरे हुए क्यों है ? क्या आपकी ईमानदारी केवल शोरूम वाली है या देश हित में भी इसका कोई मतलब है ? लोकपाल से आपकी पार्टी सामने खड़ी होने की बजाय भाग रही है ? फिर सबों पर लोकपाल लागू हो तो फिर पीएम को ही क्यों इससे बाहर रखा जाए ? मन साहब पीएम की तो देश के प्रति ज्यादा जिम्मेदारी होती है। आजकल तो कैबिनेट में मंत्री कम चोर उचक्के लुटेरे और घोटालेबाजों की तादाद ज्यादा हो गई है, ऐसे में पीएम यानी अलीबाबा को ही खुला छोड़ देना तो समझ से बाहर है। लोकपाल के फंदे से कुछ तो डर रहेगा। सारी जिम्मेदारियों से भागना तो ईमानदारी नहीं कहलाती है मन साहब ? क्यों साहब मैं कोई गलत बोल रहा हूं क्या मनमोहन जी


ईमानदारी पर आंच

 अपने सुपरमैन सरीखे पीएम मन साहब भी खतरे में है।  ज्यादातर कांग्रेसियों ने तो मैडम तक यह बात पहुंचा भी दी है कि अगला इलेक्शन मन साहब के बूते लड़ा ही नहीं जा सकता। कैग रिपोर्ट में पीएम दफ्तर को सीधे सीधे आरोपित किया जा चुका है। वहीं कई खेल मंत्रियों के विरोध को दरकिनार करके कलमाडी को बनाए रखने में हेल्प करने वाले मन साहब भी शक के दायरे में है। अगला पीएम कौन इस पर भी कई नामों की चर्चा होने लगी है। हालांकि बीमारी की वजह से यह मामला भले ही तूल ना पकड़ रही हो, मगर इसे हवा खूब दी जा रही है। अपन राहुल बाबा का नाम फिलहाल गरम नहीं है। बाबा पार्टी संगठन को मजबूत करने में लगे है। वहीं संगठन को तोड़ने में लगे नेताओं को देख कर भी दरकिनार कर रहे बाबा मन के विकल्प की खबर को दबाने में लगे है।


शीला के बाद कौन

शीला की गद्दी पर संकट के बादल गहराया है, मगर वे अभी बनी हुई है, मगर शीला विरोधी (समर्थक) भी इस क्यास में जुट गए है कि यदि इन्हें जाना पडे़ तो कौन होगा नेक्स्ट? इस कुर्सीदौड़ में कोई साथ हो या ना हो ( केवल तीन चार विधायक भी साथ रह जाए तो तुस्सी ग्रेट साबित हो जाओगे मैकू) मगर सबसे आगे माकन साहब कूद पड़े है। कैग रिपोर्ट का स्वागत करके होम मिनिस्टर को नाराज कर बैठे मैकू के अलावी कृष्णा तीरथ मैड़म का भी ना हवा में काफी ऊपर है। मायावती की तरह ही करौलबाग की तीरथ को कांग्रेस यूपी की माया के विकल्प के तौर पर देख रही है। तीरथ के बाद लाईन में पत्रकार से नेता और मंत्री बने रमाकांत गोस्वामी का नाम भी अप्रत्याशित तौर पर गरम हो चुका है। पत्रकार होने के बाद भी चारण वंदना में माहिर गोस्वामी शीला की खास पंसद है। कर्नाटक की तरह ही शीला की पंसद को तरजीह दी गई तो (खड़ाऊ सीएम) साबित होने में गोस्वामी दूसरे उम्मीदवारों में डा. एके. वालिया राजकुमार चौहान पर भारी पड़ सकते है। 

जय जय जयराम

आमतौर पर पोलटिक्स में ऐसा होता नहीं है, मगर अपनी बातों से वाद विवाद और हंगामा खड़ा करने वाले जयराम ने इस बार अपनी उदारता, सीखने की ललक और दूसरों के साथ बेहतर करने के बारे में लगन को देखकर कोई भी खिल्ली उड़ाने की बजायजयराम की जय जय ही करेगा। सचमुच ग्रामीण विकास मंत्री बनने के बाद इस जिम्मेदारी को और बेहतर तरीके से अंजाम देने के लिए किसी की परवाह और लोक लाज से पार पाते हुए जयराम ने पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह के साथ बैठकर घंटों इस मंत्रालय की अनसुलझी पहेलियों को जाना, और काम करने की अपनी प्राय़मिकताओ को तय करने में सलाह मशविरा किया। इस बार सरकार से अलग होने की लालू एंड कंपनी को सत्ता में भागीदार नहीं बनाया गया, मगर जयरा ने पोलिटिकल भेदभाव से उपर उठकर आपसी सदभाव और अनुभव शेयर करने की नयी परम्परा का मिशाल पेश किया है। शायद दूसरे लोग भी जयराम का अनुकरण करके देशहित को सबसे ज्यादा मान देने की पहल करेंगे।

दांव एक फायदा अनेक
कद्दावर रेल मंत्रियों की साया से बाहर निकलना आसान नहीं होता। ममता दी,लालू यादव, नीतिश कुमार रामविलास पासवान जैसे रेलमंत्रियों के सामने दिनेश त्रिवेदी को ना मंत्रालय में और ना ही संसद में कोई भाव दे रहा है। संसद में इनके कमरे से किसी ने नेमप्लेट ही हटा दिया। इस अपमान को खबर बनाने के साथ ही विरोध जताने का मानो मौका हाथ में आ गया। गांधीगिरी दिखाते हुए त्रिवेदी ने बस झट से गलियारे में ही टेबुल कुर्सी डालकर दफ्तर बना दाला और फटाफटा काम निपटाने में जुट गए। मंत्री जी को ना केवल मीडिया के कवरेज के साथ साथ कमरा भी हाथ में आ गया। पीएम से लेकर लोकसभा अध्यक्ष ने भी इसे गंभीरता से लिया। यानी एक्सीडेंट मिनिस्टर के रूप में कुख्यात हो रहे त्रिवेदीजी को अपनी इमेज बनाने के साथ साथ तमाम कद्दावर नेताओं से हटकर अपनी पहचान कायम करने में भी सफलता मिली।

पूरा देश होगा झुग्गी फ्री

 सत्ता में बैठे ज्यादातर लोग मुंगेरीलाल सरीखे सपने देखने में माहिर होते हैं। कभी दिल्ली को झुग्गी फ्री करने का सपना दिवगंत संजय गांधी ने देखा और देखते ही देखते दिल्ली में 1100 झुग्गी बस्ती आबाद हो गी। 44 पुर्नवास कालोनी में रहने वाले लाखों लोग आज भी सरकार के दामाद है, अलबता किसी प्लैट के मूल आवंटी की तलाश की जाए तो एक भी मूल आवंटी को खोज पाना लगभग नामुमकिन है। मगर इस बार कुमारी शैलजा ने देश को झुग्गी फ्री बनाने का सपना देखा और अपनी सीनियर मैडम से इसका फीता तक कटवा दिया। अब जूनियर मैड़म को कौन समझाएं कि अरबों खरबों के स्वाहा हो जाने के बाद भी देश झुग्गी फ्री हो या ना हो मगर लाखों झुग्गी बस्ती देश भर में आबाद जरूर हो जाएंगी।

नेता और नौकरशाह में अंतर

कैग रिपोर्ट आने के बाद जेल जाने की आशंका से भयभीत एक नौकरशाह का ब्लडप्रेशऱ हाई है। फोनवा पर हाल चाल पुछने पर वो लगभग टसूएं बहाने लगा। उसका दर्द है कि यार मैं कोई अकेला थोड़े ही हूं। मैं थोड़ा सख्त होकर बोला क्या औरतों की तरह कायर बने हो। थोड़ा दिलेर बनों यार सीबीआई वालों के सामने तो तुम सारा उगल दोगे। लगभग सुबकते हुए नौकरशाह ने कहा क्या करे यार नेता और नौकरशाह में यही तो अंतर है कि सारा गलत काम कराने में बराबर के साझेदार होने के बाद भी जेल अधिकारी जाता है और नेता ठहाके ही लगाता रहता है। मैंने सांत्वना दी तो थोड़ा संभलते हुए नौकरशाह ने मुझसे कहा कि यार मेरे पास सारे दस्तावेज है। मैं तो कईयों के लेकर ही अंदर जाउंगा। मैंने फिर मित्र को हड़काया फिर लगे बकने । किसे ले जाओगे ये तो बाद की बात है, मगर  पहले मुंह तो बंद रखो नहीं तो बेटा कहीं से आकर एक गोली तेरा (राम नाम सत्य है) बाजा बजा जाएंगे। अपनी गलती का अहसास होते ही वो मान गया और गिड़गिड़ाते हुए बोला यार जरा फोन करते रहा करो। इस पर मैं जोर से खिलखिला पड़ा। वाह प्यारे तेरे प्यार में अपन भी नपने की तैयारी कर बैठूं। यार सच तो ये है कि रंड़ी खाने में पकड़े जाओ या करप्ट ब्यूरोक्रेट के यहां पाए जाओ, दोनें में बदनामी एक समान है।  तब कहीं जाकर चंद सालों के भीतर करोड़पति बने नौकरशैह को अपनी गलती का अहसास हुआ।

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