मंगलवार, 2 अगस्त 2011

मीडिया और उसकी प्रासंगिकता



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 राकेश पांडे, स्वतंत्र पत्रकार
मीडिया यानि की लोकतंत्र का चौथा स्तंभ। ताकत इतनी कि क्षण भर में ही क्रांति की ज्वाला भड़का दे और चिरनिद्रा में सोई सरकार को हिला कर रख दे। लेकिन लगता है इस तरह के कारनामें अब कहानियों और किस्सों का रुप ले चुके है। अब तो ये कारनामें कभी-कभी ही सुनने में आते है, जिनमें मीडिया का कुछ रोल होता है। इसका सबसे बडा कारण है मीडिया का औद्योगीकरण। अब लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ व्यवसाय बन गया है। टीआरपी की होड में सामाजिक सारोकारों से जुड़े मुद्दे गायब हो रहे हैं। आम आदमी और उससे जुडी समस्याएं मीडिया की परिधि में नहीं आतीं। अब इसकी परिधि में कुछ आता है तो वह है ग्लैमर और मसालों से भरी चटपटी खबरें। इसका ताजा उदाहरण है अभी हाल ही में भारत के तीन दिवसीय दौरे पर आई पाकिस्तान की विदेशमंत्री हिना रब्बानी खार। चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिंट सभी जगहों पर भारत और पाकिस्तान के प्रमुख मुद्दे गायब रहें। अगर चर्चा में रहा तो हिना का ग्लैमरस लुक, उनका पहनावा-ओढ़ावा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो हिना के एयरपोर्ट पर उतरते ही उनकी ग्लैमरस अंदाज की बखान शुरू कर दी। अन्य दूसरे दिनों की तरह ही मैं भी सुबह ऑफिस पहुंचा और पेपर पढ़ने लगा तो उस पेपर के एक पृष्ठ के आधे भाग पर केवल हिना रब्बानी का ही समाचार था। मुझे लगा कि इतने बडे कॉलम में दोनो देशों के मंत्रियों के बीच हुई वार्ता का विश्लेषण होगा लेकिन अफसोस की उन खबरो से मुद्दे गायब थे। उस कॉलम की खबरों के हिस्सा बने थे तो हिना के वस्त्र ,उनका चश्मा, पर्स और बैग। मुझे उसी अखबार से पता चला कि हिना रब्बानी के बैग की कीमत 12 लाख थी। उस खबर के पढने के बाद पहले तो मुझे हंसी आई लेकिन फिर मैं सोचने लगा कि क्या लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में खबरों का रुप बदल गया है या फिर दर्शक भी वही देखना चाहते है? ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है, इससे पहले भी कई ऐसे वाकये है जो मीडिया पर कई अनुत्तरित सवाल खडे कर दे रहे है। चाहे वह वर्ल्ड कप हो या आईपीएल, उस समय पुरी मीडिया में वही छाया रहता है। किसी खिलाडी की क्या दिनचर्या है या किस खिलाडी के किसके साथ अफेयर चल रहे है ये खबरे इनकी प्रमुखता होती हैं। पेड न्यूज यानि पैसे के एवज में खबरें छापना, यह भी मीडिया को कठघरे में खडा कर रहा है और उसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न खडा कर रहा है। एक तरफ मुल्क में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया की संख्या बढ़ती जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ उसकी धार भी कुंद होती जा रही है। और शायद मीडिया की कुंद होती धार का ही परिणाम है कि मुल्क में आम जनता से जुडी तमाम समस्याएं सुरसा की तरह मुंह फैलाये खड़ी है। दूसरों के घोटालों और उन पर लगें आरोपों की आलोचना करने वाली मीडिया को अपने अन्दर भी झांक कर देखना चाहिए कि क्योकि पिछले कुछ दिनों में मीडिया के दामन भी दागदार हुए है। साहित्य की तरह मीडिया भी समाज का दपर्ण हैं जिसके साथ इसके नुमाइंदो को न्याय करना ही होगा।

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