मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

सहजीवन की दस्तक /आलोक यात्री








📎 📎  आभार / साभार
दैनिक जनसत्ता, नई दिल्ली
(मित्रों की सुविधा के लिए मूल आलेख भी संलग्न)

सहजीवन की दस्तक

खबर दुखद है या सुखद, यह आप लोगों को तय करना है। लेकिन खबर दिलचस्प है। इन दिनों सोशल एनिमल कहा जाने वाला इंसान जब घर की चारदीवारी में कैद है, वन्य प्राणी दुनिया भर के शहरों के भ्रमण पर हैं। जंगल के शरणार्थियों का शहरों की तरफ आना इस बात का संकेत है कि हमने उनके इलाके में घुसपैठ की है, उनके ठिकानों पर कब्जा किया है, जिसे वह भूले‌ नहीं हैं। मानव और वन्य जीवों के बीच सहजीवन का जो बंधन लुप्त हो गया था वह एक बार फिर प्रकृति के साथ संधि के मुहाने पर खड़ा नजर आ रहा है। इसके विपरित मानव सहजीवन में आ रही दरार की खबरें चौंकाने वाली हैं। कोरोना वायरस की चपेट में आई दुनिया की बहुत बड़ी आबादी लाॅक डाॅउन के चलते घरों में कैद है। एक पखवाड़े से मानव गति के तमाम पहिए अवरुद्ध हैं। गांव-देहात के गली-मोहल्लों से लेकर कस्बे, शहर, महानगर की तमाम सड़कें और हाईवे सन्नाटे की चादर ओढ़े बैठे हैं। चौबीस घंटे की आपाधापी का पर्याय बने शहर सुप्तावस्था में हैं। विज्ञान साबित कर चुका है कि धरती पर मानव की गतिविधियों की धमक ब्रह्मांड में भी महसूस की जाती है। और यह धमक मानव को छोड़ कर धरती पर विचरण करने वाले हर प्राणी के लिए खतरे की घंटी है। बीते एक पखवाड़े से खतरे की यह घंटी भी स्थगित है। इसके विपरित शहरों में पसरे सन्नाटे की प्रतिध्वनि जंगलात तक जा पहुंची है। इसी का नतीजा है कि नोएडा, हरिद्वार, चंडीगढ़ सहित देश के कई इलाकों में वन्य प्राणी शहरों की चहलकदमी करने चले आए हैं। और देश-दुनिया में यह निरंतर हो रहा है।
  कोरोना वायरस के चलते इंसान आज जहां घरों में कैद रहने को विवश है वहीं विलुप्तप्राय प्रजाति के कई जंगली जानवर देश-दुनिया की सड़कों पर घूमते नजर आ रहे हैं। भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के अधिकारियों ने इन वन्य जीवों के वीडियो साझा किए हैं। जिनमें विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके कस्तूरी बिलाव का वीडियो भी शामिल हैं। कस्तूरी बिलाव आखिरी बार 1990 में देखा गया था। आईएफएस अधिकारी सुशांत नंदा ने केरल के कोझीकोड में सड़क पर घूमते हुए कस्तूरी बिलाव का वीडियो साझा किया है। नंदा ने ट्वीट किया है "सड़क पर अब कस्तूरी बिलाव के देखने का समय है"। यह जीव गंभीर रूप से खतरे में है और अब कुल ढाई सौ व्यस्क बिलाव ही दुनिया में बचे हैं। नंदा के एक अन्य वीडियो में देहरादून की सड़क पर रात के समय चीतल दौड़ता दिख रहा है। एक अन्य आईएफएस अधिकारी प्रवीण कासवान ने भी एक वीडियो साझा किया है। जिसमें चंडीगढ़ में सड़क पर सांभर हिरण नजर आ रहा है। एक अन्य वीडियो में चंडीगढ़ की सड़क पर तेंदुआ गश्त लगा रहा है। इस दौरान उड़ीसा की ऋषिकुलया नदी में दुर्लभ प्रजाति के ऑलिव रिडले कछुओं का देखा जाना भी एक सुखद दृश्य है। वन अधिकारियों को वहां दुर्लभ प्रजाति के अलबीनो कछुआ भी मिले हैं। एक वीडियो साझा करते हुए नंदा ने लिखा है कि वनकर्मियों को पहली बार अलबीनो मिला है। 
  जाहिर है कि इन दिनों इंसानी हस्तक्षेप कम होने से प्रकृति फिर से कैसे समृद्ध हो रही है? वन्य जीवों का मानव आबादी में बेखौफ भ्रमण इसका प्रमाण है। कोरोना वायरस के इस दौर ने हमें दिखाया है कि इंसानों का दखल बंद होने पर प्रकृति ने खुद को संभाल कर फिर से स्वयं को समृद्ध करना शुरू कर दियाया है। वन्य जीवों को प्रदूषण से निजात मिलना भी इसकी एक वजह हो सकती है। इस एक पखवाड़े के दौरान इंसान और वन्यजीवों की गतिविधियों से साबित हो गया है कि सरकार ने जंगलों को सिर्फ कारोबार के मकसद से ही इस्तेमाल किया है। जानवरों के न पर्याप्त भोजन की चिंता की गई न ही उनके अस्तित्व व पुनर्वास के बारे में विचार किया गया। उत्तर भारत के इलाकों के कई शेल्टर होम्स में अजगर और कोबरा सांप निकलने की कई घटनाएं भी सामने आई हैं। जो इस बात का प्रमाण हैं कि मानव की तमाम निर्ममता के बावजूद कई प्रजातियां स्वयं को बचाए हुए हैं।
  उत्तर भारत में मानव विकास की गाथा संभवत: सबसे पहले गंगा और यमुना नदी के बीच के भू-भाग पर ही लिखी गई होगी। यह पूरा भू-भाग अरावली और शिवालिक पर्वत श्रृंखला के बीच आता है। दिल्ली के आसपास की अरावली और शिवालिक पर्वत मालाओं के अस्तित्व की गाथा महाभारत में भी देखने को मिलती है। अरावली पर्वत श्रृंखला करीब 7 सौ किलो मीटर तक फैली हुई है। यह संसार की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। जो राजस्थान को उत्तर से दक्षिण दो भागों में बांटती है। यह पर्वतमाला भारत के राजस्थान, हरियाणा, गुजरात के अलावा पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत से होकर गुजरती है। अरावली के जंगलों में प्रमुख रूप से चीता, बाघ, लकड़बग्घा, तेंदुआ, लोमड़ी, सियार, नेवला, जंगली वराह, काला हिरण, नीलगाय प्रमुख थे। पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां भी यहां पाई जाती थीं। इलाके में मुगल सम्राटों की शिकारगाहों के प्रमाण भी मिलते हैं। फिरोज शाह तुगलक के काल (1351-1388) में) यहां चार शिकार महलों -मालचा महल, कुश्क महल,  भूली-भटियारी का महल और गालिब का महल के प्रमाण भी मिलते हैं।
  दिल्ली के आसपास और उत्तर भारत की दूसरी प्रमुख पर्वतमाला श्रृंखला है-शिवालिक। इसका विस्तार उत्तराखंड से लेकर नेपाल तक फैला हुआ है। जिम कार्बेट नेशनल पार्क भी इसी इलाके में आता है। इस पर्वत श्रृंखला को सबसे युवा पहाड़ी श्रृंखला माना जाता है। इसका विस्तार करीब नौ सो किलोमीटर में फैला है। इस पर्वत श्रृंखला को हिमालयी क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। अतीत में इस क्षेत्र में जिराफ और दरियाई घोड़े जैसे अफ्रीकी जानवर पाए जाने के प्रमाण भी मिलते हैं। हाथी, गैंडा, हिरण, तेंदुआ, भालू, लंगूर, हंगुल, याक और लाल पांडा भी यहां पाए जाते थे।
  अरावली और शिवालिक पर्वत श्रृंखला के बीच के जंगलात का एक बड़ा भाग मानव बस्तियों ने पाट दिया है। बचे हुए हिस्से को मानव अपने खाद्यान्न के लिए इस्तेमाल कर रहा है। अरावली पर्वत श्रंखला में वन्य प्राणियों की मौजूदगी नगण्य ही रह गई है। शिवालिक पर्वत श्रृंखला में सरकार या सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद जंगल का जो थोड़ा बहुत हिस्सा छोड़ा गया है वहां भी वन्यजीव गिनती के ही रह गए हैं। अब जबकि लाॅक डॉउन की अवधि में वन्य प्राणी अपने आसरे की तरफ लौट रहे हैं तो हम इंसानों को भी सहजीवन व सहअस्तित्व की अवधारणा और प्रकृति व पारिस्थितिकी से संतुलन कायम करने की बाबत नए सिरे से विचार करना होगा।

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