बुधवार, 8 अप्रैल 2020

गुलजारी लाल नंदा के साथ कुछ पल दो पल /अनामी शरण बबल


 गुलजारी लाल नंदा को अब याद करने का मतलब / अनामी शरण बबल




आजाद भारत के दूसरे गृहमंत्री और दो दो बार  कार्यवाहक प्रधानमंत्री रह चुके गांधीवादी नेता गुलजारी लाल नंदा को याद करने का आज क्या मतलब है? सजग हमेशा सक्रिय ईमानदार कई  संगठनों के जन्मदाता, दर्जनों किताबों के लेखक भारत रत्न से नवाजे गये कालजयी नेता  गुलजारी लाल नंदा को आज याद करने का कोई मतलब नहीं होने के बाद भी  नंदा के होने के कई मतलब होते हैं।

आज से 22 साल पहले भारत रत्न से सुशोभित होने वाले श्री नंदा नै जीवन का शतक पूरा करके अंतिम सांस ली थी। यानी वे आज 120 साल के होते। तो आज जब ज्यादातर लोग अपने जीते हुए ही अपनी पहचान खो देते हैं। उसी आधुनिक समाज में 121 साल के किसी रंगहीन गंधहीन सीधे साधे सरल सहज सबों के लिए सुलभ ईमानदार नेता मंत्री को अब क्यों याद किया जाए? मगर जमाना कितना भी बन जाए, मगर नंदा जैसे नेता न कभी अप्रासंगिक होते हैं और ना ही अपना महत्व खोते हैं। यही उनकी सादगी सज्जनता सरलता की ताकत  है कि उनकी यादें मंद हो जाने के बाद भी नंदा सरीखे महामानव के उपर कुछ लिखने के लालच से  आज बीस साल के बाद भी अपने आपको रोक नहीं पा रहा हूं।



मुमकिन है कि आज के ज्यादातर लोग शायद नंदा जी के बारे मे अपनी अनभिज्ञता ही प्रकट करे। तो मै भी यह साफ कर दूं कि नंदा जी को लेकर मेरे मन में भी कोई बडा आदर भाव या जानकारियां का भंडार नहीं था। मगर जब कभी भी भारत के प्रधानमंत्रियों की सूचना पर नजर जाती एक पल के लिए मेरा मन ठहर जाता। मैं इनके बारे में जानने को उत्कंठित हो जाता कि इतना वरिष्ठ और काबिल होने के बाद भी नंदा पीएम क्यों नहीं सन सके?। यही उत्कंठा मुझे नंदा जी के साथ बांध रखा था। जब अगस्त 1996 में मुझे सपरिवार अपने छोटे भाई आत्म स्वरुप के पास अहमदाबाद जाने का मौका मिला। अहमदाबाद की यह मेरी पहली यात्रा थी। मैं काफी उत्साहित भी था। नंदा जी का पता तो नहीं मिला, मगर आवश्यक जानकारियों का पुलिंदा मेरे पास था। अहमदाबाद में उस समय मेरा छोटा भाई स्वामी शरण गुजरात के उस समय इकलौते हिंदी अखबार विराट वैभव में बतौर उपसंपादक काम करता था। पटना के मेरे सबसे घनिष्ठ पत्रकार संपादक रहे शर्मान्जु किशोर उस समय विराट वैभव के संपादक थे।

 अहमदाबाद में पहुंचते ही मैं अगले दिन विराट वैभव में जाकर उनसे मिला। पटना में करीब चार साल 1983-87 जून तक। जीवंत संपर्क में रहने के बाद भी कभी मुलाकात नहीं हुई थी। मेरी पत्रकारिता के विकास और उत्थान में इनकी कितनी बडी और निस्वार्थ भूमिका रही है इस  संदर्भ को विश्लेषित करने के लिए एक लेख लिखना मेरे लिए अनिवार्य है। हालांकि लेख पढकर बहुतों की भुकृटियां तन जाएगी। लोग नापसंद भी करेंगे, मगर हर आदमी हर किसी के लिए एकसमान सरल सरस सहज और अच्छा नहीं हो सकता और खासकर जब  इनके निधन के लगभग डेढ़ दशक बीत जाने पर तो उनपर लिखना और जरूरी भी हो जाता है कि कैसे और किस तरह उन्होंने मुझे पत्रकारिता का ककहरा बताया और सीखाया था।

हां तो विराट वैभव के दफ्तर से नंदा जी की बेटी डॉ. प्रतिभा पाटिल के घर यानी नौरंगपुरा के हिंदू कालोनी का पता मिल गया। जब मैं शर्मान्जु किशोर से विदा होने लगा तब उन्होंने बताया कि गुजरात भाजपा में भयानक भीतरघात उफान पर है। तुम गांधीनगर आने का पक्का कार्यक्रम और डेट बताओगे तो मैं पायनियर के ब्यूरो चीफ आर के मिश्र से टाईम तय कराके सीएम सुरेश मेहता और भाजपा के खंभा उखाड़ पोलिटिक्स कर रहे शंकर सिंह वाघेला से तेरी बातचीत  पक्कर करवाता हूं।  शर्मान्जु जी के इतने ग्लैमरस आफर पर मेरा मन खिल उठा। पर फिलहाल कल नंदा जी से श्री गणेश कर आगे की योजना तय करने का मन बनाया।



अगले दिन सुबह सुबह बिना फोन फान किए ही मैं अपने भाई के साथ नौरंगपुरा के हिंदू कालोनी में था। उस समय सुबह के लगभग नौ बज रहे थे तो मुझे लगा कि मैं कुछ पहले ही आ गया हूं। आटो से उतरकर डॉ. प्रतिभा पाटिल के घर की खोज करना उचित प्रतीत हुआ। और विभिन्न सडकों गलियों में भटकते हुए नंदा जी और डॉ. पाटिल की टोह ली। मुझे यह जानकर विस्मय हुआ कि ज्यादातर लोगों ने दोनों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की। अलबत्ता कुछेक ने बताया कि अगली सडक पर कोई वीआईपी फेमिली है जहां पर अक्सर गवर्नर सीएम या दिल्ली से आने वाले मिनिस्टर आते-जाते रहते हैं। मैं अपनी मंजिल के काफी करीब था। करीब दस बज चुके थे, लिहाजा मिडल क्लास संभ्रांत कॉलोनी में खोजबीन बंद कर एक चाय की दुकान से सही-सही पता लेकर मैं आजाद भारत के दूसरे गृहमंत्री और दो दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा के निवास के बाहर कॉलबेल बजा रहा था। अपने साधारण से घर के बरामदे में बैठीं कोई 74-75 साल की एक महिला दरवाजे के करीब आयी। नमस्कार करके मैंने बंद दरवाजे के बाहर से ही अपना विजिटिंग कार्ड आगे करते-करते हुए कहा कि मैं अनामी शरण बबल पत्रकार दिल्ली से आया हूँ। आपके  घर का फोन नंबर मेरे पास नहीं था इस कारण बिना बताए समय लिए ही आ गया कि जब अहमदाबाद में हूँ तो नंदा जी के दर्शन के बगैर लौटने का मन नहीं किया मेरे परिचय प्रवचन का महिला पर अच्छा प्रभाव पड़ा। मेरे कार्ड को लेकर सीधे गेट खोलती हुई पूछी आपको यहां तक आने में तो कोई दिक्कत नहीं हुई अनामी। उनके मुंह से अपना नाम सुनकर बहुत भला लगा। अपना परिचय देती हुई वे बोली  मैं नंदा जी की बेटी डॉ. प्रतिभा पाटिल हूं। उनकी सहजता सरलता सरसता और आत्मीय माधुर्य को देखते हुए हम दोनों भाईयों ने बारी बारी से पैर छूकर प्रणाम किया। वे लगभग भाव विभोर सी हो उठी। मेरे हाथों को पकड़ कर वे बोली चरण स्पर्श करनेवाले किसी पत्रकार को मैं पहली बार देख रही हूं। फौरन पलटते ही मैंने कहा कि मैं भी सबका पैर नहीं छूता दीदी मगर कहां पर खड़ा हूं काल पात्र पद गरिमा और छवि को तो देखना पड़ता है। मैं देश के एक अनमोल रत्न को देखने-सुनने आ रहा हूं जहां पर पत्रकार का अभिमान करना बेमानी होगा। मेरी बातें सुनकर वे खिलखिला उठी और उनकी नजर मेरे भाई की तरफ गयी। मैंने तुरंत उसका परिचय देते हुए कहा कि यह मेरा अपना सगा छोटा भाई स्वामी शरण है और अहमदाबाद से हिंदी के इकलौते अखबार विराट वैभव  में उपसंपादक है। मैनें अपनी जेब से उसके कार्ड को निकाल कर आगे कर दिया। उसके कार्ड को लेकर देखा। उन्होंने जिज्ञासा प्रकट की कि स्वामी जी एकदम खामोश हैं इस पर मैं खिलखिला पडा़। अरे दीदी बस मेरे सम्मान में यह खामोश है अन्यथा बातचीत में वो मुझसे भी स्मार्ट है। तो इस तरह पांच मिनट के भीतर ही हमलोग पूरी तरह स्नेहिल माहौल में बातचीत करने लगे। मैने अब नंदा जी से मिलने का आग्रह किया तो वे फौरन हमलोग को लेकर अंदर चलने को तत्पर हो गयी।



और इस तरह जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तो एकदम कमजोर काया के अत्यंत दुर्बल नंदा जी अचेतावस्था में बिस्तर पर सो रहे थे। डॉ. प्रतिभा ने बताया कि बाबूजी अमूमन सोए ही रहते हैं। इनकी देखभाल और देखरेख के लिए चार सहायक हैं। दो सहायता तो दिनरात यहीं पर रहते हैं, जबकि दो सहायक चार पांच  घंटे के लिए सुबह शाम आते हैं। पंडित हजारीलाल शर्मा सुबह शाम आकर भजन कीर्तन सुनाते हैं। जबकि देखभाल आदि के लिए हजारी चंद ठाकुर भंवरलाल नायक चिमन भाई चावला और कनुभाई के सहारे ही नंदा जी का सारा नित्य कर्म जीवन संपादित होता था। नंदा जी कितना समझ बूझ पाते थे यह तो नहीं कहा जा सकता था मगर सुबह-सुबह अखबारों की हेडिंग सुनते जबकि शाम को दूरदर्शन पर समाचार देखकर बताया जाता था। डा. प्रतिभा को सरकार द्वारा इनकी उपेक्षा का मलाल के साथ क्षोभ  भी था। 1980 तक नंदा जी दिल्ली के हरियाणा भवन में रहते थे। मगर गिरने से पैरों की हड्डी टूट गई। कोई सरकारी आवास नहीं होने के कारण लाचारगी में नंदा जी को  अपनी बेटी प्रतिभा पाटिल के साथ साथ रहने के लिए  अहमदाबाद लौटने पर विवश होना पड़ा। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री पीवी  नरसिम्हा राव को पत्र लिखकर अपना इलाज कराने की गुहार की. मगर प्रधानमंत्री राव की तरफ से कोई जवाब तक नहीं आया। अलबत्ता प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा द्वारा इलाज पेंशन सहायकों की सरकारी खर्चे पर व्यवस्था करा दी गयी। निरंतर जांच की व्यवस्था भी हुई। सरकार विदेश में भी इलाज के लिए सहमत थी मगर दुर्बलता के कारण डॉ. "बेटी ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दी।



करीब एक दर्जन किताबों के लेखक नंदा जी ने ही मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए इंटक का गठन कराया। भारत साधू समाज संगठन समाज हितकारी संगठनों की नींद रखी। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद कार्य वाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किए गये। इसके बावजूद कभी पीएम बनने की लालसा मन में नहीं जागी। जीवनभर सादगी और ईमानदारी के लिए विख्यात नंदा जी को भारत रत्न नहीं दिए जाने का मलाल पूरे परिवार को है।

करीब दो घंटे तक की गयी ढेरों यादों और दो दो बार चाय बिस्कुट के स्वागत परांत मै अपने बैग को संभालने लगा। दरवाजे तक आयी डॉ प्रतिभा का मन रखने के लिए मैनें कहा कि देखिएगा दीदी जिस दिन नंदा जी को भारत रत्न मिलेगा तो उस दिन मैं स्पेशली आपसे मिलकर खुशियों बांटने अहमदाबाद में  साथ-साथ रहूंगा। मेरी बात सुनकर वे खिलखिला पड़ी। क्या तुमको विश्वास है? मैनें तुरंत कहा कि यदि शंकर दयाल शर्मा जैसे समकालीन और नंदा जी को बहुत करीब से देखने और जानने वाला आदमी यदि राष्ट्रपति होकर भी भारत रत्न का सम्मान नहीं देंगे तो फिर भविष्य में भारत रत्न की उम्मीद बेमानी है। मेरी बातें सुनकर उनकी आंखे सजल हो गयी। इस तरह हास्य परिहास के बीच नंदा जी के सहायकों से भी हाथ मिलाकर मैं वहां से विदा हो गया।




 दिल्ली आकर नंदा जी की खबर सहित अहमदाबाद से लौटकर मेरी कोई चार पांच खबरें प्रकाशित हुई। फोन करके डॉ. प्रतिभा पाटिल को बताया और उनके आग्रह पर सहारा की कुछ प्रतियां भिजवा दी गयी। दिल्ली आकर भी मैं कुछेक दिनों में नंदा जी के हालचाल के साथ साथ अपनी मां से बडी़ उम्र की बहिन का भी हाल खबर ले लेता था। मैनें भले ही उनका मन रखने के लिए भारत रत्न मिलने की भविष्यवाणी कर दी हो पर हम सबको इसको लेकर अविश्वास ही था।

तभी अचानक मुझे कुछ बहुत जरूरी काम से अगले साल यानी 1997 के जुलाई माह के आखिरी सप्ताह में अहमदाबाद जाना पडा। गांधीनगर में फंसे रहने के चलते किसी से भी मिलने का समय नहीं निकाल सका। 25 जुलाई को शाम मे ट्रेन थी। 24 जुलाई को देर  रात तक सारा काम निपटाने के बाद भाई के साथ घर लौटा। अगले दिन यानी 25 जुलाई के पेपर में सुबह सुबह देखा कि नंदा को भारत रत्न मिल गया है राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने अपने पंचवर्षीय कार्यकाल के आखिरी दिन 24जुलाई 1997 को अरुणा आसफ अली और गुलजारी लाल नंदा को भारत रत्न प्रदान करने के आदेश पर हस्ताक्षर करके इस सर्वोच्च सम्मान की घोषणा को सार्वजनिक कर दी। पेपर देखते ही मैं उछल पडा और डॉ. पाटिल की खुशी में शामिल होने के लिए निकल गया।

 अपने घर के बाहर मुझे खड़ा देखकर डॉ. पाटिल अचंभित  सी हो गयी। भावविभोर होकर मेरा सत्कार की।  सजल नेत्रों से मुझे लेकर अंदर गमी और सबसे मेरा बतौर पत्रकार परिचय कराया
अमरीका में रह रही बेटी अभिलाषा और दामाद रश्मि भी मारे खुशी के फोन से पूरा-पूरा हाल लेने में तल्लीन थे। डा. पाटिल के पुत्र अलंकार नायक और बहू गीता नायक के चेहरे दमक रहे थे। बहू गीता अपने इस सौभाग्य पर नाज कर रही थी कि वे इस परिवार की बहू हैं। डा. पाटिल ने बताया कि कल से  सैकड़ों लोग आ चुके हैं और आज शाम तक कोई मुंबई से कोई चेन्नई कोलकाता दिल्ली या पटना लखनऊ से केवल शुभकामनाएं और मंगलमय बधाइयां देने के लिए आ रहे हैं। घर के चारो तरफ गुलदस्ते ही गुलदस्ते पडे थे। ओर इन्हीं फूलों के बीच 99 साल के नंदा जी के सहायक किसी तरह आरामकुर्सी पर सचेत सचेतन सचेतावस्था मे बैठा रखा था। इस भीड़ से अचंभित नंदा जी का चेहरा भी प्रफुल्लित था। नंदा जी के दोनों बेटे भी अपनी खुशी संभाल नहीं पा रहे थे। वही गेट के बाहर बैठे खुफिया अधिकारी भवानी गौड़ भी कल से इस घर के बाहर भीतर की हलचल में व्यस्त थे। बकौल भवानी
अमूमन यह घर शांत ही रहता था मगर कल से वीआईपी के आने-जाने का तांता लगा हुआ है।

आसपास के लोगों को भी काफी खुशी है। बहुतों को तो यह विस्मय हो रहा है कि उनके घर के बगल में इतनी बड़ी हस्ती सालों-साल से रह रहा है और इसकी भनक तक नहीं थी। घर के इर्द-गिर्द घूमती घाम और हाल का जायजा लेने के बाद मैंने रूस्तम होना ही बेहतर माना डा. प्रतिभा से मिला तो वे इन व्यस्तताओं के बाद भी मुझे मिठाई दी और मिठाई काएक डिब्बा देने लगी। मेरे तमाम विरोध के बाद भी वे बार बार बोलती रही कि इस मिठाई और सम्मान पर तुम्हारा भी अधिकार है। तुमने न केवल इस सम्मान की घोषणा की बल्कि इस अवसर पर यहां आकर  तुमने मेरी खुशी को बढा दिए। बकौल डा. प्रतिभा कल जब बाबूजी को इस सम्मान की घोषणा हुई तो मुझे तुम याद आए, मगर तुम इतनी जल्दी मेरे सामने खड़े रहोगे यह तो अकल्पनीय है। मेरे सिर पर हाथ फेरती वै गदगद हो उठी और मैं  भावुक।

अलबत्ता एचडी देवेगौड़ा को पूरा देश भले ही एक एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री मानता रहा हो मगर डा. प्रतिभा देवेगौड़ा को सबसे संवेदनशील और अपने देश के बुजुर्ग नेताओं के सच्चे हितैषी और अपना परिजन मानने वाला नेता की तरह देखती हैं। इस भावविभोर माहौल में सबों को नमस्कार करते हुए बाहर निकला। उनके बेटे ने अपनी कार से कॉलोनी के बाहर आटो स्टैंड तक छोड़ दिया। जहां से मैं अपने भाई के घर पहुंचा। शाम की ट्रेन से वापस दिल्ली आया। और दफ्तर में जाकर रिपोर्ट लिखी। जिसकी धूम रही। और इस तरह देश के एक महान स्वतंत्रता सेनानी और नेता से दो दो बार मिलने का मौका मिला या केवल देखने- का यह अहसास आज भी रोमांचित करता है। अलबत्ता 1998 मे नंदा जी के देहावसान के बाद तक तो मैं प्रतिभा नायक के संपर्क में रहा, मगर आज बीस साल के बाद वे या उनके परिवार में कौन है कहां है? इसकी जानकारी नहीं। इस बीच पिछले ही साल अहमदाबाद तीन बार गया मगर नंदा या नायक परिवार की न कोई खबर ले पाया न मिलकर हालचाल ही लिया। डा. प्रतिभा नायक दीदी अगर जीवित होंगी तो उनकी आयु भी कोई 93-94 साल की होगी। इस उम्र में उनको बेहतर सेहत की शुभकामनाएं दूं या.... दिवंगत दीदी के प्रति श्रध्दांजलि अर्पित करें। यह एक जटिल सवाल है। सबसे बेहतर है सबको सलाम नमस्कार के साथ अब भावनाओं की रेल को रोककर बस किया जाए। नंदा जी को विनम्र श्रद्धांजलि और नमन प्रणाम श्रद्धा सुमन अर्पित है।     -_

--   /    अनामी शरण बबल /13082018
8076124377 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा संस्मरण है। नई पीढ़ी को शायद उनकी याद भी न हो। इस महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिए बधाई।

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