शनिवार, 25 अप्रैल 2020

रवि अरोड़ा की नजर से




वेदान्त बारास्ता स्पिनोज़ा

रवि अरोड़ा


मेरे मोहल्ले के मंदिर में हर मंगलवार को बहुत भीड़ रहती थी । प्रसाद चढ़ाने वाले ही नहीं बेचने वाले और इसे लेने वाले भिखारियों की भी अच्छी ख़ासी रेलमपेल रहती है उस दिन । मगर इस मंदिर के तमाम मंगलवार आजकल सूने-सूने से होते हैं। मेरे मोहल्ले का मंदिर ही क्यों , देश दुनिया के तमाम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर और अन्य सभी पूजा स्थल भी तो आजकल वीरान हैं । कोरोना के आतंक ने पूरी दुनिया की रौनक़ ग़ायब की है तो आदमी द्वारा बनाये गये भगवान के घर भी सुनसान क्यों न होंगे ? यक़ीनन तमाम पूजाघरों की वीरानगी ईश्वर के घर की वीरानगी नहीं हो सकती मगर वह शायर ही क्या जो इस पर बात कुछ तंज न करे या चुटकी न ले । अब उर्दू के मशहूर शायर अब्दुल हमीद अदम को ही लीजिये जिन्होंने लगभग आधी सदी पहले ही पूजाघरों की कुछ एसी ही वीरानगी पर यह शेर कह दिया था- दिल ख़ुश हुआ है मस्जिद-ए-वीराँ को देख कर ,मेरी तरह ख़ुदा का भी ख़ाना ख़राब है । अब अदम साहब जितनी समझ और साहस तो मुझमे नहीं मगर दो चार छोटी मोटी बातें तो मैं भी इस मौक़े पर कर ही सकता हूँ ।

सनातन धर्म शाश्वत है , इसमें कोई दो राय नहीं । मगर वेद और उपनिषद से शुरू हुई हमारी आस्थाएँ न जाने कहाँ कहाँ घूमती हुई अब कर्मकांडों में जाकर अटक गई हैं । पाप-पुण्य का एसा खेल हमारे साथ खेला गया है कि अब उनसे बाहर आने का कोई रास्ता ही नहीं सूझता । नैतिकता से मुँह चुराने को हमने धार्मिक स्थलों के चक्कर काटने शुरू कर दिये । बेशक तात्कालिक तौर पर ही सही मगर कोरोना की वजह से इस दिशा में अब कुछ आराम तो पड़ा है । बिज़नस मोडयूल बन चुके तमाम धार्मिक स्थलों की वीरानगी का बस इतना ही अर्थ है , इसे विज्ञान की धर्म पर बढ़त के रूप में क़तई नहीं आँका जा सकता । उधर, हमारी पीढ़ी की याददाश्त का यह पहला रमज़ान होगा जब इफ़्तियार दावतें नहीं हो रही होंगीं । पता नहीं अभी और कौन कौन से पूजा पाठ के दिन इसी प्रकार सोशल डिसटेंसिंग में बीतने हैं ।

विद्वान समझाते हैं कि कर्मकांडों से छुटकारा पाने के लिए हमें वेदान्त की और लौटना होगा । वेदान्त यानि वेदों का अंत यानि उनका सार अर्थात उपनिषद । मगर दुनिया पीछे तो लौटती नहीं । उसे तो हर मार्ग आगे की ओर चाहिये । तो आइये आगे के मार्ग की ही बात करते हैं ।बारूथ डी स्पिनोज़ा को याद करते हैं । वही स्पिनोज़ा जिसके ईश्वर को आइंस्टीन भी मानते थे । हमारे वेदान्त जैसी बातें ही तो करते हैं स्पिनोज़ा । ईश्वर को मनाने, उसकी चापलूसी करने और उसने डरने की बजाय उससे प्रेम की बात करते हैं स्पिनोज़ा । प्रेम भी भावुकता से नहीं वरन तन्मयता से भरा प्रेम यानि बौद्धिक प्रेम । स्पिनोज़ा वही सब तो कह रहे हैं जो हमारे वेद कहते हैं । आदि शंकराचार्य के अद्वैत की भाँति जीव और जगत को अलग न मानने की बात ही तो करते हैं स्पिनोज़ा ।
 स्पिनोज़ा का ईश्वर इंसान से कहता है कि मुझसे प्रेम करना है तो मेरी बनाई दुनिया से प्रेम करो । उसका ईश्वर हमसे कहता है कि एसा तुमने सोच भी कैसे लिया कि मैं तुम्हें तुम्हारे किये की सज़ा अथवा इनाम दूँगा । क्यों सुबह शाम मेरे आगे नाक रगड़ कर अपना वक़्त ख़राब करते हो । तुम्हारे धार्मिक स्थल मैंने नहीं बनाये , वे मेरा घर क़तई नहीं हैं । मैं तो क़ुदरत के कण कण में हूँ । तुमने एसे कैसे मान लिया कि तुम्हें सज़ा देने के लिये मैंने नर्क जैसी कोई अलग से जगह बनाई होगी , जबकि तुम मुझे बहुत प्रिय हो । बेशक यह बातें भी पुरानी हैं और अब से साढ़े पाँच सौ साल पहले पुर्तगाली दार्शनिक स्पिनोज़ा द्वारा कही गईं मगर देखिये हैं ना आज भी कितनी मौजू ?

 मैं भली भाँति जानता हूँ कि रहती दुनिया तक खुदा का खाना ख़राब कभी नहीं होगा । बेशक उसकी इबादतगाहों का आजकल खाना ख़राब है । मगर यह भी तो तभी तक है जब तक हम कोरोना से लड़ रहे हैं । इस महामारी से निपटते ही हम फिर एक दूसरे से लड़ेंगे और एक दूसरे के खुदा को अपने खुदा से अलग मानकर उसका खाना ख़राब करने की जुगत बैठाएँगे । ज़ाहिर है इस लड़ाई के शोर में फिर कहीं घुट जाएँगी वेदान्त और स्पिनोज़ा की बातें ।

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