गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

भारत और नार्वे की पत्रकारिता




 भारत मे जोखिम भरी है पत्रकारित

 By: मुकेश शर्मा

|

Published: 02 Oct 2017, 10:10 PM IST

चेन्नई।भारतीय मूल के लेखक, पत्रकार और चिंतक सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ जो नॉर्वे के ओस्लो में बसे हैं का मानना है कि भारत में पत्रकारिता अत्यंत जोखिम भरी है। १० फरवरी १९५४ को लखनऊ में जन्मे सुरेश चंद्र शुक्ल कवि, लेखक, पत्रकार और फिल्मकार हैं। नार्वे में पत्रकारिता करने गए शुक्ल वहां आकेर्स आवीस ग्रूरददालेन पत्रिका में सेवारत हैं। तमिलनाडु के दौरे पर आए शुक्ल ने राजस्थान पत्रिका से देश में साहित्य और मीडिया की मौजूदा स्थिति पर तुलनात्मक चर्चा की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश।
नॉर्वे और भारत में पत्रकारिता
भारत में एलीट पत्रकारिता नहीं के बराबर शेष है। राजस्थान पत्रिका और द हिन्दू जैसे चुनिन्दा अखबार पत्रकारिता के उच्च मापदंडों को निभाते हुए चल रहे हैं। नार्वे में पत्रकारिता का मानक अत्यंत उच्च है। इसकी वजह पत्रकारों की यूनियन और कार्यदशाएं हैं।
वहां की सबसे बड़ी खूबी यह है कि समाचार पत्र महंगे होने के बाद भी हर शख्स अपना अखबार खरीद कर पढ़ता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का असर अवश्य है लेकिन वहां अंग्रेजी का अखबार प्रकाशित नहीं होता। मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र है और फेक न्यूज का प्रतिशत नगण्य है। भारत में मौजूदा मीडियाकर्मियों में गंभीरता और समझ का अभाव दिखाई देता है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि नार्वे का पत्रकार सुरक्षित है तो भारत में पत्रकारिता जोखिम भरी है।
नार्वे और भारत का साहित्य
नार्वे और भारतीय साहित्य में खासा अंतर है। नार्वे के साहित्य में अनुसंधान और खोज का तत्व नजर आता है जबकि भारतीय साहित्य अधिकांशत: भावना व कल्पना प्रधान होते हैं तथा इनमें उद्देश्यपरकता कम दिखलाई पड़ती है।
शायद यही वजह है कि भारतीय साहित्य का नोबल पुरस्कार नहीं मिल पाता। मसलन, भारतीय संस्कृति में फिल्मों व खेलों को पर्याप्त स्थान नहीं है जबकि ये दोनों संस्कृति के वाहक हैं।
नार्वे और भारत
नार्वे और भारत के रिश्ते काफी प्रगाढ़ हैं और आने वाले समय में मजबूती बढ़ेगी। वे जब १९८० में नार्वे गए थे तब पासपोर्ट और वीजा की आवश्यकता नहीं होती थी। आजादी के बाद भारत को मान्यता देने वाला पहला राष्ट्र ही नार्वे था। ४६ लाख की आबादी वाले इस राष्ट्र में अमीरी १९७५ के बाद आई।
आज नार्वे का एक रुपया सवा आठ रुपए भारतीय मुद्रा के बराबर है। जब वे नार्वे गए थे तब यह भारतीय मुद्रा का तीन चौथाई था। वहां की सामाजिक संरचना और सुरक्षा व्यवस्था भारत के मुकाबले मजबूत है। लेकिन भारत के आकार और घनी आबादी की वजह से वह इन पहलुओं में पिछड़ जाता है।
नॉर्वे में हिन्दी

नॉर्वे में हिन्दी का भविष्य सुनहरा है। अगर प्ले स्कूल में भी चार बच्चे हिन्दी जानते हैं तो इस विषय के शिक्षक की पृथक नियुक्ति कर दी जाती है। नॉर्वेजि के अलावा हिन्दी भाषी पत्रकार होने के नाते मुझे खूब सम्मान प्राप्त है। हिन्दी की वजह से गत एक साल में उनको भारत में ही ४ पुरस्कार मिले हैं। वे नॉर्वे से प्रकाशित होने वाली हिन्दी पत्रिका परिचय में बतौर पत्रकार काम करने गए थे। फिर वहां की स्थानीय भाषा पढ़ी और सीखी। अब वे द्विमासिक स्पाइल नाम की पत्रिका का प्रकाशन कर रहे हैं। इसके अलावा प्रवासी नाम से भी एक पत्रिका का प्रकाशन होता है जो हिन्दी और पंजाबी में प्रकाशित होती है। हिन्दी भाषा अध्ययन की भी माकूल व्यवस्था है। दसवीं और बारहवीं में हिन्दी में परीक्षा देने के इंतजाम भी हैं। इसके इतर भारतवंशी हिमांश गुलाटी नार्वे संसद के सदस्य भी हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कितनी बदल गयी दिल्ली / विवेक शुक्ला

 दिल्ली 1947- 2021 कितनी बदली   साउथ दिल्ली के सफदरजंग एन्क्लेव के करीब हुमायूंपुर में मिजो फूड तथा मयूर विहार में मलयाली रेस्तरांओं के साइन...