गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जब पत्रकार बन गये





कोरोना से करीब 10 करोड़ लोग होंगे बेरोजगार – रघुराम राजन

राहुल गांधी पत्रकार की भूमिका में, रघुराम राजन से किया साक्षात्कार

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कोरोना वायरस के कारण पूरे देश में लॉकडाउन जारी है। गंभीर संकट के इस दौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आज एक पत्रकार की भूमिका निभायी। उन्होंने लोगों के मन में देश के आर्थिक हालात को लेकर उठ रहे सवाल रघुराम राजन से किये। देश में  क्या हो रहा है, क्या होने वाला है, खासतौर से अर्थव्यवस्था को लेकर। इन सवालों के जवाब के लिए राहुल ने एक रोचक तरीका अपनाया। उन्होंने  इस बारे में रघुराम राजन से बात की,  ताकि आम लोगों को भी मालूम हो सके कि वे इस सब पर क्या सोचते हैं। 
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे रघुराम गोविंद राजन जाने माने अर्थशास्त्री हैं। मनमोहन सिंह की सरकार में प्रधानमन्त्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार बनने से पहले रघुराम राजन शिकागो विश्वविद्यालय के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में एरिक॰ जे॰ ग्लीचर फाईनेंस के गणमान्य सर्विस प्रोफेसर थे। सन 2003 से 2006 तक वे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख अर्थशास्त्री व अनुसंधान निदेशक रहे और भारत में वित्तीय सुधार के लिये योजना आयोग द्वारा नियुक्त समिति का नेतृत्व भी किया। राजन मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी के अर्थशास्त्र विभाग और स्लोन स्कूल ऑफ मैनेजमेण्ट; नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के केलौग स्कूल ऑफ मैनेजमेण्ट और स्टॉकहोम स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में अतिथि प्रोफेसर भी रहे हैं। उन्होंने भारतीय वित्त मन्त्रालय, विश्व बैंक, फेडरल रिजर्व बोर्ड और स्वीडिश संसदीय आयोग के सलाहकार के रूप में भी काम किया है।
पढ़िए कोरोना संकट के बीच भारत के भविष्य की आर्थिक चुनौतियों पर राहुल गांधी और रघुराम राजन के बीच हुई महत्वपूर्ण बातचीत के असंपादित अंश – 
  • भारत की आबादी के हिसाब से चार गुना टेस्ट करने की जरूरत
  • हमें 20 लाख टेस्ट हर रोज करने होंगे।
  • कोरोना के चलते भारत में 10 करोड़ नौकरियों पर छाएगा संकट
  • 65,000 करोड़ निकालना होगा गरीबों की मदद के लिए
राहुल गांधी – हेलो
रघुराम राजन – गुड मॉर्निंग, आप कैसे हैं?
राहुल गांधी – मैं अच्छा हूं, अच्छा लगा आपको देखकर
रघुराम राजन – मुझे भी
राहुल गांधी – कोरोना  वायरस के दौर में लोगों के मन में बहुत सारे सवाल हैं कि क्या हो रहा है, क्या होने वाला है, खासतौर से अर्थव्यवस्था को लेकर। मैंने इन सवालों के जवाब के लिए एक रोचक तरीका सोचा कि आपसे इस बारे में बात की जाए ताकि मुझे भी और आम लोगों को भी मालूम हो सके कि आप इस सब पर क्या सोचते हैं।
रघुराम राजन – थैंक्स मुझसे बात करने के लिए और इस संवाद के लिए। मेरा मानना है कि इस महत्वपूर्ण समय में ऐसे मुद्दों पर जितनी भी जानकारी मिल सकती है लेनी चाहिए और लोगों को भी जहाँ तक संभव हो, अवगत रहना चाहिए।
राहुल गांधी – मुझे इस समय एक बड़ा मुद्दा जो लगता है वह है कि हमें अपनी अर्थव्यवस्था को कैसे खोलने पर विचार करना चाहिए? अर्थव्यवस्था के कौन से वो हिस्से हैं, जो आपको लगता है जिन्हें खोलना बहुत जरूरी है और उन्हें किस क्रम में खोला जाना चाहिए?
रघुराम राजन – यह एक अहम सवाल है। हम संक्रमण का ग्राफ कम करने और अस्पतालों/मेडिकल सुविधाओं पर अत्यधिक बोझ न डालने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन साथ ही अब हमें यह भी सोचना होगा कि लोगों की रोजी-रोटी फिर से कैसे शुरू की जाए। लॉकडाऊन हमेशा बनाकर रखना बहुत आसान है, लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए यह नहीं चल सकता। इसे क्रमवार करना होगा। पहले वो स्थान, जहां पर आप सोशल डिस्टैंसिंग बनाकर रख सकते हैं। डिस्टैंसिंग केवल कार्यस्थलों पर ही नहीं, बल्कि कार्यस्थल के आवागमन में भी डिस्टैंसिंग जरूरी है।परिवहन का तरीका। क्या लोगों के पास परिवहन का निजी साधन हैं, साईकल, स्कूटर या कार है? या वो सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं? आप सार्वजनिक परिवहन में डिस्टैंसिंग कैसे बनाएंगे?
यह सारी व्यवस्था करने में बहुत काम और मेहनत करनी पडेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कार्यस्थल अपेक्षाकृत सुरक्षित हों। इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यदि कहीं दुर्घटनावश कोई ताजा मामले तो सामने आये, तो हम कितनी तेजी से प्रभावित लोगों को आइसोलेट कर सकें, वो भी तीसरे या चौथे लॉडाउन को लागू किए बिना, अगर ऐसा होता है तो विनाशकारी होगा।
राहुल गांधी – यही बात बहुत सारे लोग कह रहे हैं कि यदि आप बार-बार लॉकडाऊन में जाते हैं, यदि आप लॉकडाऊन खोलते हैं और आपको वापस लॉकडाऊन लगाना पड़ता है, तो आर्थिक गतिविधि पर इसका बहुत विनाशकारी प्रभाव होगा क्योंकि इससे विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं?
रघुराम राजन – हां, मुझे लगता है कि यह सोचना सही है। दूसरे लॉकडाऊन को ही लगाने का मतलब है कि आप गतिविधि (आर्थिक) को सही से शुरू करने में आप सफल नहीं हुए। इसी से सवाल उठता है कि अगर इस बार खोल दिया तो क्या आप तीसरे लॉकडाउन की जरूरत न पड़ जाए और इससे विश्वसनीयता पर आंच आएगी। ठीक कहा। मैं नहीं मानता कि हमें 100 प्रतिशत सफलता की ओर भागना चाहिए, यानी कहीं भी कोई केस न हो। फिलहाल ऐसा नहीं हो सकता। हमें केवल फिर से गतिविधि शुरू करने का प्रबंधन करना होगा, यानि जहाँ कहीं मामले सामने आएं, तो हम उन्हें आईसोलेट कर दें।
राहुल गांधी – लेकिन इस पूरे प्रबंध में यह जानना बेहद जरूरी होगा कि कहां ज्यादा संक्रमण है, और इसके लिए टेस्टिंग ही एकमात्र जरिया है। इस वक्त भारत में यह भाव है कि हमारी टेस्टिंग क्षमता सीमित है। एक बड़े देश होते हुए, अमेरिका और यूरोपीय देशों के तुलना में हमारी टेस्टिंग क्षमता सीमित है। कम संख्या में टेस्ट होने को आप कैसे देखते हैं?
रघुराम राजन – अच्छा सवाल है यह, अमेरिकी की मिसाल लें। वहां एक दिन में डेढ़ लाख तक टेस्ट हो रहे हैं। लेकिन वहां विशेषज्ञों, खासकर एपिडीमियोलॉजिस्ट्स की एकमत राय है कि गतिविधि खोलने की शुरुआत करने के लिए इन टेस्टों की संख्या को तीन गुना कर यानी हर रोज कम से कम 5 लाख टेस्ट करने चाहिए और कुछ लोग तो कई मिलियन टेस्ट करने की बात कर रहे हैं।  भारत की आबादी को देखते हुए हमें इसके साढ़े चार गुना टेस्ट करने चाहिए। अगर आपको अमेरिका जितना आत्मविश्वास चाहिए तो हमें 20 लाख टेस्ट हर रोज करने होंगे। साफ है कि हम उनके नजदीक भी नहीं, क्योंकि हम रोज 25,000 से 30,000 टेस्ट ही कर पा रहे हैं।
लेकिन गतिविधि शुरू करने के मामले में हमें समझदारी बरतनी होगी। शायद हमें आम जनता की व्यापक स्तर पर टेस्टिंग करनी पड़े। उदाहरण के तौर पर आम जनता के 1000 सैंपल लें और व्यापक स्तर पर चेक करें, यदि इनमें आपको वायरस का कोई भी चिन्ह मिले, तो सैंपल की गहराई में जाएं और देखें कि कहां से यह आया है। इस तरीके से हमारे टेस्टिंग के ढांचे पर भार कम पड़ेगा और कुछ मामले में कम गहन टेस्टिंग के बावजूद हम ज्यादा बेहतर काम कर पाएंगे। हमें ज्यादा समझदारी से काम करना होगा क्योंकि हम तब तक इंतजार नहीं कर सकते, जब तक हम अमेरिका जैसी टेस्टिंग क्षमता प्राप्त न कर पाएं। 
राहुल गांधी – पहले तो वायरस का प्रभाव गहरा होने वाला है और फिर अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव गहरा होगा। कुछ महीनों बाद अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगने वाला है।फिलहाल आप वायरस से लड़ने और 3-4 महीने बाद वायरस के विनाशकारी प्रभावों से लड़ने के बीच संतुलन कैसे बिठाएंगे?
रघुराम राजन – मेरा मानना है कि हमें प्राथमिकता निर्धारित करनी होंगी। हमारी क्षमताएँ व संसाधन सीमित हैं। हमारे वित्तीय संसाधन पश्चिमी देशों के मुकाबले ज्यादा सीमित हैं। हमें यह निर्णय लेना होगा कि हम तय करें कि हम वायरस से लड़ाई और अर्थव्यवस्था दोनों को एक साथ कैसे सँभालें। जब हम अर्थव्यवस्था खोलें, तो यह इस प्रकार हो कि आप बीमारी से उठ पाएं, न की मौत के सामने खड़े हों। 
सबसे पहले तो लोगों को स्वस्थ और जीवित रखना है। भोजन बहुत ही अहम इसके लिए। ऐसी जगहें हैं जहां पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पहुंचा ही नहीं है, अमर्त्य सेन, अभिजीत बनर्जी और मैंने इस विषय पर अस्थाई राशन कार्ड की बात की थी। लेकिन आपको इस महामारी का सामना एक अप्रत्याशित संकट की भाँति करना होगा। हमें जरूरतों के आधार पर लीक से हटकर सोचना होगा। सभी बजटीय सीमाओं को ध्यान में रखते हुए फैसले करने होंगे। हमारे पास संसाधन सीमित हैं।
राहुल गांधी – कृषि क्षेत्र और मजदूरों के बारे में आप क्या सोचते हैं। प्रवासी मजदूरों के बारे में क्या सोचते हैं। इनकी वित्तीय स्थिति के बारे में क्या किया जाना चाहिए?
रघुराम राजन – इस मामले में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर में किये गए हमारे प्रयासों का लाभ उठाने का समय है। हम उन सभी व्यवस्थाओं के बारे में विचार होना चाहिए जिनसे हम अपेक्षाकृत गरीबों तक पैसा पहुंचाते हैं। हमारे पास विधवा पेंशन और मनरेगा जैसे कई तरीके उपलब्ध हैं। हमें कहना चाहिए कि देखो ये वे लोग हैं जिनके पास रोजगार नहीं है, जिनके पास आजीविका चलाने का साधन नहीं है और अगले तीन-चार महीने जब तक यह संकट है, हम इनकी मदद करेंगे। लेकिन लोगों को जीवित रखना और उन्हें विरोध के लिए या फिर काम की तलाश में लॉकडाउन के बीच ही बाहर निकलने के लिए मजबूर न होने से रोकना लाभप्रद होगा और ये हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें ऐसे रास्ते तलाशने होंगे जिससे हम ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पैसा भी पहुंचा पाएं और उन्हें पीडीएस के जरिए भोजन भी मुहैया करा पाएं।
राहुल गांधी – डॉ राजन कितना पैसा लगेगा गरीबों की मदद करने के लिए, गरीबों को राहत देने के लिए?
रघुराम राजन – तकरीबन 65,000 करोड़। हमारी जीडीपी 200 लाख करोड़ की है, इसमें से 65,000 करोड़ निकालना, बहुत बड़ी रकम नहीं है। हम ऐसा कर सकते हैं। अगर ये गरीब के लिए है, उनकी जिंदगी बचाने के लिए हमें यह करना चाहिए।
राहुल गांधी – अभी तो देश संकट में है, पर कोविड के बाद क्या हिंदुस्तान को इस घटना से कोई फ़ायदा/बढ़त होगी? कोई स्ट्रेटेजिक फ़ायदा होगा? दुनिया में कोई बदलाव होंगे, जिससे हिंदुस्तान को फ़ायदा हो या जिनका हिंदुस्तान एडवांटेज ले सके? किस प्रकार से दुनिया बदलेगी आपके मुताबिक़?
रघुराम राजन – सामान्यतः, इस तरह की स्थितियां मुश्किल ही किसी देश के लिए अच्छे हालात लेकर आती हैं। फिर भी कुछ तरीके हैं जिनसे देश फायदा उठा सकते हैं। मेरा मानना है कि इस संकट से बाहर आने के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था के हर पहलु पर एकदम नए तरीके से सोचने की जरूरत होगी। अगर भारत के लिए कोई मौका है, तो वह है हम संवाद को किस तरह मोड़ें। इस संवाद में हम एक नेता की तरह सोचें क्योंकि यह दो विरोधी पार्टियों के बीच की बात नहीं है। लेकिन भारत इतना बड़ा देश तो है ही कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में हमारी बात को अच्छे से सुना जाए। ऐसे हालात में भारत अपने उद्योगों और सप्लाई चेन के लिए अवसर तलाश सकता है। लेकिन सबसे अहम है कि हम संवाद को उस दिशा में मोड़ें जिसमें ज्यादा देशों के लिए वैश्विक व्यवस्था में स्थान हो, बहु ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था हो न कि एक-ध्रुवीय या द्विध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था।
राहुल गांधी – क्या आपको नहीं लगता है कि केंद्रीकरण का संकट है। सत्ता का बेहद केंद्रीकरण हो गया है कि बातचीत ही लगभग बंद हो गई है। बातचीत और संवाद से उन बहुत सारी समस्याओं का समाधान निकलता है, जिनका आपने जिक्र किया है, लेकिन कुछ कारणों से यह संवाद टूट रहा है।
रघुराम राजन – मेरा मानना है कि विकेंद्रीरण न सिर्फ स्थानीय सूचनाओं को सामने लाने के लिए जरूरी है बल्कि लोगों को सशक्त बनाने के लिए भी अहम है। इस समय पूरी दुनिया में अशक्तिकरण कि यह स्थिति है फैसले मेरे द्वारा नहीं, कहीं और से किए जा रहे हैं। मेरे पास एक वोट तो है दूरदराज के किसी व्यक्ति को चुनने का। मेरी पंचायत और राज्य सरकार के पास ताक़त नहीं है। लोगों में यह भावना है कि किसी भी मामले में उनकी आवाज नहीं सुनी जाती। ऐसे में वे विभिन्न शक्तियों का शिकार बन जाते हैं।
रघुराम राजन – मैं आपसे ही यही सवाल पूछूंगा। राजीव गांधी जी जिस पंचायती राज को एक बार फिर लेकर आए, उसका कितना प्रभाव पड़ा और कितना फायदेमंद साबित हुआ।
राहुल गांधी – इसका जबरदस्त असर हुआ था, लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि यह अब कम हो रहा है। पंचायती राज के मोर्चे पर जितना आगे बढ़ने का काम हुआ था, हम उससे वापस लौट रहे हैं, और जिलाधिकारी और अधिकारी आधारित व्यवस्था में जा रहे हैं। अगर आप दक्षिण भारतीय राज्यों को देखें, तो वहां इस मोर्चे पर अच्छा काम हो रहा है, व्यवस्थाओं का विकेंद्रीकरण हो रहा है। लेकिन उत्तर भारतीय राज्यों में सत्ता का केंद्रीकरण हो रहा है और पंचायतों और जमीन से जुड़े संगठनों की शक्तियां कम हो रही हैं। 
रघुराम राजन – फैसले जितना लोगों को साथ में शामिल करके लिए जाएंगे, वे फैसलों पर नजर रखने के लिए उतने ही सक्षम होंगे। मेरा मानना है कि यह ऐसा प्रयोग है जिसे करना चाहिए।
राहुल गांधी –  लेकिन वैश्विक स्तर पर ऐसा क्यों हो रहा है? आप क्या सोचते हैं कि क्या कारण है जो इतने बड़े पैमाने पर केंद्रीकरण हो रहा है और संवाद खत्म हो रहा है? क्या आपको लगता है कि इसके केंद्र में कुछ है या फिर कई कारण हैं इसके पीछे?
रघुराम राजन – मैं मानता हूं कि इसके पीछे एक कारण है और वह है वैश्विक बाजार। ऐसी धारणा बन गई है कि बाजारों के वैश्वीकरण के साथ इसमें हिस्सा लेने वाले यानी फर्म्स भी हर जगह एक ही तरह के नियम लागू करवाना चाहती हैं, वे हर जगह एक ही तरह की समन्वय व्यवस्था चाहते हैं, एक ही तरह की सरकार चाहते हैं, क्योंकि इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। एकसमानता लाने की कोशिश ने स्थानीय और राष्ट्रीय सरकारों के अधिकार और शक्तियां छीन ली हैं। इसके अलावा नौकरशाही में केन्द्रीकरण की लालसा भी है, अगर मुझे शक्ति मिल सकती है तो क्यों न हासिल करूं। यह लगातार चलने वाली लालसा है। अगर आप राज्यों को पैसा दे रहे हैं, तो उन्हें इन नियमों का पालन करना ही होगा, न कि बिना किसी सवाल के उन्हें पैसा मिल जाए, जबकि मुझे पता है कि आप भी चुनकर आए हो और आपको इसका आभास होना ही चाहिए कि आपके लिए क्या सही है।
राहुल गांधी – इन दिनों एक नया मॉडल आ गया है, वह है सत्तावादी या अधिनायकवादी मॉडल, जोकि उदार मॉडल पर सवाल उठा रहा है। काम करने का यह एकदम अलग तरीका है और यह ज्यादा जगहों पर फल-फूलता जा रहा है। क्या आपको लगता है कि यह खत्म होगा?
रघुराम राजन – मुझे नहीं पता। सत्तावादी मॉडल, एक मजबूत व्यक्तित्व, एक ऐसी दुनिया जिसमें आप शक्तिहीन हैं, कभी-कभी ये अपील करता है, खासतौर से अगर आप उस व्यक्तित्व के साथ कोई संबंध रखते हैं, जब आपको लगता है कि उन्हें मुझ पर विश्वास है, उन्हें लोगों की परवाह है। इसके साथ समस्या यह है कि अधिनायकवादी व्यक्तित्व अपने आप में एक ऐसी धारणा बना लेता है कि , ‘मैं ही जनशक्ति हूं’ इसलिए मैं जो कुछ भी कहूंगा, वही सही होगा। मेरे ही नियम लागू होंगे और इनमें कोई जांच-पड़ताल नहीं होगी, संस्थानों के नहीं होंगे, कोई विकेंद्रीकृत व्यवस्था नहीं होगी। सब कुछ मेरे जानकारी के अनुसार होना चाहिए। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि जब-जब इस हद तक केंद्रीकरण हुआ है, व्यवस्थाएं धराशायी हो गई हैं।
राहुल गांधी – लेकिन वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में कुछ तो गड़बड़ हुई है। यह तो साफ है, यह नहीं काम कर रहा। क्या ऐसा कहना सही होगा?
रघुराम राजन – मुझे लगता है कि यह बिल्कुल सही है कि बहुत से लोगों के लिए यह काम नहीं कर रहा। विकसित देशों में दौलत और आमदनी का असमान वितरण निश्चित रूप से चिंता का एक कारण है। नौकरियों की अनिश्चितता, परायत्तता चिंता का दूसरा स्रोत है।आज यदि आपके पास कोई अच्छी नौकरी है तो यह नहीं पता कि कल आपके पास आमदनी का जरिया होगा या नहीं। हमने इस महामारी के दौर में देखा है कि बहुत से ऐसे लोगों के पास कोई रोजगार ही नहीं है, उनकी आमदनी और सुरक्षा दोनों ही छिन गई हैं।
इसलिए आज सिर्फ विकास दर धीमी होने की समस्या नहीं है। हम बाजारों के बगैर नहीं रह सकते, हमें विकास चाहिए। हम नाकाफी वितरण की समस्या से भी दोचार हैं। जो भी विकास हुआ उसका पूरा फल सब लोगों को समान रूप से नहीं मिल रहा है, बहुत से लोग छूट गए। तो हमें दोनों पहलुओं के बारे में सोचना होगा। इसीलिए मुझे लगता है कि हमें वितरण व्यवस्था के साथ-साथ अवसरों के वितरण के बारे में भी सोचना होगा।
राहुल गांधी – यह दिलचस्प है जब आप कहते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर से लोग जुड़ते हैं और उन्हें अवसर मिलते हैं। लेकिन अगर विभाजन और नफरत हो, तो लोग में अलगाव होता है, यह भी तो एक तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर है। इस वक्त विभाजन और नफरत का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर दिया गया है, और यह बड़ी समस्या है।
रघुराम राजन – सामाजिक समरसता से ही लोगों का फायदा होता है। लोगों को यह लगना आवश्यक है कि वे महसूस करें कि वे व्यवस्था का हिस्सा हैं, बराबर भागीदार हैं। खासतौर से ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में हम घर को बाँट कर नहीं रख सकते। तो मैं कहना चाहूंगा कि हमारे पुरखों ने, राष्ट्र निर्माताओं ने जो संविधान लिखा और शुरु में जो शासन दिया, उन्हें नए सिरे से पढ़ने-सीखने की जरूरत है, मैं भी आजकल उसे दोबारा सीखने में समय व्यतीत कर रहा हूं। लोगों को अब लगता है कि कुछ मुद्दे थे, जिन्हें उस समय दरकिनार किया गया, लेकिन उन्हें जानना चाहिये की वे ऐसे मुद्दे थे जिन्हें यदि छेड़ा जाता तो हमारा सारा समय एक-दूसरे से लड़ने में ही चला जाता।
राहुल गांधी – इसके अलावा, जब आपके पास भविष्य के बारे में विज़न न हो तो आप विभाजन करते हो और पीछे मुड़कर इतिहास को देखने लगते हो। आप जो कह रहे हैं मुझे सही लगता है कि भारत को एक नए विजन की जरूरत है। आपकी नजर में वह क्या विचार होना चाहिए। निश्चित रूप से आपने इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की बात की। ये सब बीते 30 साल से अलग या भिन्न कैसे होगा। वह कौन सा स्तंभ होगा जो अलग होगा?
रघुराम राजन – मुझे लगता है कि आपको हमारी क्षमताएं विकसित करनी होंगी। इसके लिए बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है। याद रखिए, जब हम इन क्षमताओं की बात करें तो इन पर अमल भी होना चाहिए। लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि हमारे औद्योगिक और बाजार व्यवस्था कैसे हैं। आज भी हमारे यहां पुराने लाइसेंस राज के अवशेष है। हमें सोचना होगा कि हम कैसे ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें ढेर सारी अच्छी नौकरियां सृजित हों। ज्यादा स्वतंत्रता हो, ज्यादा विश्वास और भरोसा हो, लेकिन इसकी पुष्टि करना एक अच्छा विचार है।
श्री राहुल गांधी – मैं यह देखकर हैरान हूं कि माहौल और भरोसा अर्थव्यवस्था के लिए कितना अहम है। कोरोना महासंकट के बीच जो चीज मैं देख रहा हूं वह यह कि विश्वास का मुद्दा असली समस्या है। लोगों को समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर आगे क्या होने वाला है। इससे एक डर है पूरे सिस्टम में। बेरोजगारी की बात करें तो, बहुत बड़ी समस्या है, बड़े स्तर पर बेरोजगारी है, जो अब और भयंकर होने वाली है। इस संकट से मुक्ति के बाद, जब अगले 2-3 महीने में बेरोजगारी बढ़ेगी, तो बेरोजगारी को दूर करने के लिए हम आगे कैसे बढ़ें?
रघुराम राजन – आंकड़े बहुत ही चिंतित करने वाले हैं। सीएमआईई के आंकड़े देखो तो पता चलता है कि कोरोना संकट के कारण करीब 10 करोड़ लोग और बेरोजगार हो जाएंगे। 5 करोड़ लोगों की तो नौकरी जाएगी, करीब 6 करोड़ लोग श्रम बाजार से बाहर हो जाएंगे। आप किसी सर्वे पर सवाल उठा सकते हो, लेकिन हमारे सामने तो यही एक आंकड़े हैं। और यह आंकड़ें बहुत चिंताजनक हैं। मुझे लगता है की हमें जितना तेजी से हो सके, उतना तेजी से अर्थव्यवस्था को ध्यानपूर्वक खोलना चाहिए, ताकि लोगों को नौकरियां मिलना शुरु हों। हमारे पास सभी वर्गों को ज्यादा समय तक मदद करने की क्षमता नहीं है। हम तुलनात्मक तौर पर एक गरीब देश हैं, लोगों के पास ज्यादा बचत नहीं है।
रघुराम राजन – लेकिन मैं आपसे एक सवाल पूछता हूं। हमने जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए अमेरिका और यूरोप को बहुत सारे उपाय उठाते देखा । भारत सरकार के सामने एकदम अलग हकीकत है जिसका वह सामना कर रही है। आपकी नजर में पश्चिम के शासन और भारत की जमीनी हकीकत से निपटने में क्या अंतर है।
राहुल गांधी – सबसे पहले स्केल, समस्या की विशालता और इसके मूल में वित्तीय समस्या का परिमाण है। असमानता और असमानता की प्रकृति। जाति जैसी समस्या, क्योंकि आप जानते हैं की भारतीय समाज जिस व्यवस्था वाला है वह अमेरिकी समाज से एकदम अलग है। भारत को जो विचार पीछे धकेल रहे हैं वह समाज में गहरे पैठ बनाए हुए हैं और अक्सर छिपे हुए हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि बहुत सारे सामाजिक बदलाव की भारत को जरूरत है, और यह समस्या हर राज्य में अलग है। तमिलनाडु की राजनीति, वहां की संस्कृति, वहां की भाषा, वहां के लोगों की सोच उत्तर प्रदेश से एकदम अलग है। ऐसे में आपको इसके आसपास ही व्यवस्थाएँ विकसित करनी होंगी। 
पूरे भारत के लिए एक ही फार्मूला काम नहीं करेगा, काम कर ही नहीं सकता। इसके अलावा, हमारी सरकार अमेरिका से एकदम अलग है, हमारी शासन पद्धति में, हमारे प्रशासन में नियंत्रण की एक सोच है। एक प्रोडूसर के मुकाबले हमारे पास एक डीएम है। हम सिर्फ नियंत्रण के बारे में सोचते हैं, लोग कहते हैं कि अंग्रेजो के जमाने से ऐसा है, मेरा ऐसा मानना है कि यह अंग्रेजों से भी पहले की व्यवस्था है। भारत में शासन का तरीका हमेशा से नियंत्रण का रहा है और मुझे लगता है कि आज हमारे सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। कोरोना बीमारी को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, इसलिए जैसा कि आपने कहा, इसे प्रबंधित करना होगा।
एक और चीज है जो मुझे परेशान करती है, वह है असमानता। भारत में बीते अनेक दशकों से ऐसा है। जैसी असमानता भारत में है, अमेरिका में नहीं दिखेगी। तो मैं जब भी सोचता हूं तो यही सोचता हूं कि असमानता कैसे कम हो क्योंकि जब कोई सिस्टम में असमानता अपने उच्च स्तर पर पहुंच जाती है तो वह सिस्टम काम करना बंद कर देता है। आपको गांधी जी का यह वाक्य याद होगा कि कतार के आखिर में जाओ और देखो कि वहां क्या हो रहा है। एक नेता के लिए यह बहुत बड़ी सीख है, इसे इसके पूरे महत्व से कम आँका जाता है, लेकिन मुझे लगता है कि यहीं से काफी चीजें निकलेंगी।
राहुल गांधी – आपकी नजर में असमानता से कैसे निपटें। कोरोना संकट में भी यह दिख रही है, यानी जिस तरह से भारत गरीबों के साथ व्यवहार कर रहा है, किस तरह हम अपने लोगों के साथ रवैया अपना रहे हैं. प्रवासी बनाम संपन्न की बात है, दो अलग-अलग विचार हैं। दो अलग-अलग भारत हैं। आप इन दोनों को एक साथ कैसे जोड़ेंगे।
रघुराम राजन – देखिए आप पिरामिड की तली, गरीबों के जीवन को बेहतर करने के कुछ तरीके जानते हैं, लेकिन हमें एहतियात से सोचना होगा जिससे हम हर किसी तक पहुंच सकें। मेरा मानना है कि सभी सरकारों ने भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए काम किया है, और बिना किसी शक के हम बेहतर काम कर सकते हैं। लेकिन चुनौतियों के बारे में मुझे लगता है कि सब तक पहुंचने में और उनका जीवन स्तर सुधारने में प्रशासनिक चुनौतियां हैं। लेकिन मेरी नजर में बड़ी चुनौती निम्न मध्य वर्ग और मध्य वर्ग के बीच फ़र्क़ की है, जिसके लिए हमें अच्छी नौकरियां बढ़ाने की जरूरत है ताकि लोग सरकारी नौकरी और उससे मिलने वाले आराम पर आश्रित न रहें। मेरा मानना है कि इस मोर्चे पर काम करने की जरूरत है और इसी के मद्देनजर अर्थव्यवस्था का विस्तार करना जरूरी है। हमारे पास युवा कामगारों की फौज होने के बावजूद हमने बीते कुछ सालों में हमारी आर्थिक विकास दर को गिरते हुए देखा है।
इसलिए मैं कहूंगा कि सिर्फ संभावनाओं पर न जाएं, बल्कि अवसर सृजित करें ताकि हर क्षेत्र फले फूलें। अगर बीते सालों में कुछ गलतियां भी हुईं हों तो यही रास्ता है आगे बढ़ने का।सॉफ्टवेयर और ऑउटसोर्सिंग सेवाओं के बारे में सोचें, जिसमें हम कामयाबी से बढ़ते रहे हैं, कौन सोच सकता था कि ये सब भारत की ताकत बनेंगी, और यह हो गया। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि यह इसलिए हुआ क्योंकि सरकारों ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया, हालांकि मैं ऐसा नहीं मानता। लेकिन हमें हर बढ़ने की संभावना को अवसर देना चाहिए, लोगों की उद्यमिता को मौका देना चाहिए।
राहुल गांधी – थैंक्यू, थैंक्यू, डॉ राजन
रघुराम राजन – थैंक्यू वेरी मच, आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा।
राहुल गांधी – आप सुरक्षित तो हैं न ?
रघुराम राजन – मैं सुरक्षित हूं, आपको शुभकामनाएँ 
राहुल गांधी – थैंक्यू, बाय।
Shri Rahul Gandhi’s Conversation

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